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Wednesday, October 31, 2012

"मस्ताभिलेख" उत्खननम्

     हाल ही में हुए उत्खननों से कुछ ऐसे अभिलेख मिले हैं जिनके बारे में इतिहासकार मानते है कि इन अभिलेखों में तीन हजार वर्ष पहले के किसी तोता-मैना प्रेम-प्रसंग का वर्णन है। वहीं दूसरी ओर कुछ लिपि विशेषज्ञों का मानना है कि यह उस काल के दो तोतों के बीच हुआ कव्वाली टाईप सवाल-जवाब है इससे ज्यादा कुच्छ नहीं।

    वहीं इस तोता-मैना प्रेम प्रसंग को लेकर एक अन्य विशेषज्ञ का कहना है कि अभिलेख के द्वितीय सोपान में
 मैना के नाम के आगे कुछ रकम दर्ज है लेकिन उस जगह से प्लास्टर उखड़ जाने के कारण असल कीमत पढ़ी नहीं जा सकी है।

   वहीं दूसरे इतिहासकार का मानना है कि शून्यों की संख्या और उखड़े हुए प्लास्टर के क्षेत्र को कैलिपर से नापा जाय तो कुल आठ शून्य और बैठेंगे। इस लिहाज से असल कीमत पचास करोड़ है। 



   दूसरी ओर एक अन्य वरिष्ठ इतिहासकार का मानना है - चूँकि तीन हजार साल पहले शून्य की कोई कीमत नहीं थी, कोई कितनी भी संख्या में शून्य लगा सकता था इसलिये उखड़े हुए प्लास्टर के बराबर शून्य गिनना और उस आधार पर मैना की कीमत बताना उचित नहीं। अपने बात की पुष्टि के लिये इतिहासकार महोदय ने तीन हजार साल पहले के घोटालों का उदाहरण दिया जिनमें लोग कहीं भी कभी भी भक्क से मुँह खोलकर कह देते थे- पचास हजार करोड़ के घोटाले हुए, सत्तर लाख करोड़ के घोटाले हुए।

   उधर समाजशास्त्र के विशेषज्ञों का मानना है कि उस दौर में इतनी महंगाई नहीं थी। इसलिये हो सकता है कि मैना की कीमत पचास रूपये से ज्यादा न हो लेकिन चारणों द्वारा मैना की कीमत बढ़ा चढ़ाकर बताई गई हो।

    इसी दौरान स्टूडियो में बुलाये गये पक्षी विशेषज्ञ श्री बहेलिया सिंह "ठठेर" का मानना है कि मैना की कीमत पचास रूपये से लेकर पचास करोड़ तक हो सकती है बशर्ते पता हो कि मैना का प्रेमी वह तोता आखिर करता क्या था, उसकी हैसियत कैसी थी, कुछ काम-धंधा भी करता था कि ऐसे ही बैठा रहता था :)

( ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश :)


- सतीश यादव

Tuesday, October 23, 2012

इतिहास-फितिहास....उत्खनन-फुत्खनन

Photo: Satish Pancham

    हाल ही में हुए पुरातात्विक उत्खननों कुछ ऐसे अभिलेख मिले हैं जिनसे पता चलता है कि तीन हजार वर्ष पहले भारतीय राज्यव्यस्था से जुड़ा कारोबारी वर्ग अपने वाहन चालक एंव नौकरों तक के नाम अपनी कंपनीयों की रजिस्ट्री कराता था, यही नहीं उनके नाम किसी गगनचुंबी इमारत में डूप्कलेक्स कक्ष भी पंजीकृत करवा देता था। अपने अधिनस्थों, नौकरों, वाहन-चालकों के प्रति इतना सहृदय होना भारत के स्वर्णिम इतिहास को दर्शाता है। 

    वहीं कुछ विद्वान इस तरह से ड्राईवरों, नौकरों के प्रति दर्शाये गये सहृद्यता को बड़ी बात नहीं मानते क्योंकि यह तीन हजार वर्ष पहले बहुत आम बात थी। कई लोगों ने अपने कारोबार में अपने नौकरों, ड्राईवरों, रसोइयों को हिस्सेदार बनाया था। संभवत: यही कारण है कि कइयों के मंत्रिमंडल या लगुए-भगुए समूह में शामिल लोगों को आम बोलचाल में किचन कैबिनेट कहा जाता था। उन "किचनैटों" का मुख्य कार्य केवल और केवल नेता-स्वामी की सेवा करना था, उसके हाथ-पैर दबाना था, बदले में नेता पूरी की पूरी कंपनी उनके पते पर रजिस्टर कर देता था। इस लिहाज से देखा जाय तो भारत का तीन हजार वर्ष पूर्व का काल किसी सतयुग से कम नहीं था, बल्कि सतयुग की कल्पना ही भारत के तीन हजार वर्ष पूर्व के मनोहर हालात को देखकर की गई थी :-)

(ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश)

  - सतीश यादव

Monday, October 22, 2012

नेट भरोसे मिथकीय जानकारीयाँ


     अमूमन मैं मंदिरों में भीड़भाड़ के समय जाने से कतराता हूँ और वह भी जब किसी देवी आदि का मंदिर हो तो बहुत ज्यादा। वजह, वहां होने वाले बेवजह के तामझाम और बहुत ही मूड़ खराब कर देने वाली भक्तों की धमाचौकड़ी। पता चला हाथ जोड़कर हम आँखें मूने ईश्वर का ध्यान कर रहे हैं तभी पीछे कोई महिला केश खोले झूमने लगे, हुश्श, हुश्श की आवाज निकाल कर शरीर में देवी आने का कार्यक्रम शूरू कर दे तो पूरा मूड ऑफ हो जाता है, कहां ध्यान पूजा आदि के लिये आये थे और इधर ये शुरू हो गईं हैं।  फिर जब मौका नवरात्रों का हो तो देवी भक्त कुछ ज्यादा ही उत्साहित हो जाते हैं औऱ ऐसे ऐसे कान फोडू शोर करते हुए माता की भेंटे
गाते हैं कि मन करता है घर पर ही रहते तो अच्छा था, नाहक मंदिर आये।


ब्रम्हा जी द्वारा Oracle के माध्यम से सम्बोधन के अभिलेखीय प्रमाण :-)
      इस शनिवार छुट्टी के दिन श्रीमती जी के साथ मंदिर में सुबह-सुबह पहुंचा। पूजा-ध्यान के बाद मंदिर में यूं ही नजरें घुमाई तो मंदिर में दीवारों पर कुछ पेपर चिपके नजर आये। इधर श्रीमती जी पूजा-आदि में व्यस्त थीं तो जिज्ञासावश उन पर्चों की ओर बढ़ गया। देखा तो नौ दिनों के नवरात्र पर दिनों के हिसाब से विवरण दर्ज था। पहला दिन फलां होगा, दुसरा दिन फलां होगा, इस दिन की यह महिमा है। उस दिन की यह महिमा है। इस दिन फलां रंग के कपड़े पहनने चाहिये आदि आदि। मैंने थोड़ा गौर से देखा तो उन पर्चों में से कुछ को पहले गूगल ट्रांसलेटर के जरिये इंग्लिश से हिन्दी में ट्रांसलेट किया गया था और कुछ पर्चों को किसी वेबसाइट से सीधे लेकर प्रिंट लिया गया था। इन पर्चों को देख पढ़ने की इच्छा हुई कि देखें आखिर गूगल ट्रांसलेटर क्या कहता है। कुछ पंक्तियां पढ़ते ही लग गया कि भइया ये अपने बस की बात नहीं है, ये किसी देवभाषा में लिखा गया है, इसे वही लोग पढ़ सकते हैं। बानगी देखिये कि लिखा गया है - "अंतत: एक Oracle के माध्यम से भगवान ब्रम्हा ने सम्बोधित किया". आगे का कंटेंट आप चित्र बड़ाकर ही देख ले तो बेहतर होगा, उस पूरे पेज के टैक्स्ट
यहां शब्दश: रखना बड़ा बोझिल लगा.

    बहरहाल, इन पर्चों से इतना तो पता चलता है कि नेट पर उपलब्ध जानकारीयों का इस्तेमाल इस तरह से धार्मिक आयोजनों में भी होने लगा है। यह जितना अच्छा है, उतना ही खराब भी है क्योंकि नेट पर जो कुछ भी कंटेंट हैं वो सही है या नहीं इसे जानने की कोई आसान विधि नहीं उपलब्ध है। सो पुष्टि के अभाव में हो सकता है कि कालांतर में ढेरों बनते बिगड़ते इतिहास की तर्ज पर ये जानकारीयां भी समय के साथ बिगड़ती-ढहती आगे बढ़ें। बिगड़ती-ढहती इसलिये कह रहा हूं क्योंकि मैं खुद कई बार फेसबुक पर समकालीन किसी मुद्दे को इतिहास की चादर ओढ़ाकर व्यंग्य, चुटकी आदि लेते रहता हूँ। यह इतिहास का ओढ़ाना मुझे जहां एक ओर आनंद देता है, समकालीन लोगों पर कटाक्ष करने का सुकून देता है तो वहीं मन ही मन यह शंका भी उत्पन्न करता है कि जो इतिहास हम पढ रहे हैं कहीं वह भी मेरे तरह व्यंग्य या हास्य का पुट देकर तो नहीं लिखा गया है.

    एक उदाहरण देखिये कि जब हरियाणा में बढ़ते बलात्कार का कारण चाऊमीन बताया गया तो क्या स्टेटस मैंने फेसबुक पर ठेला था -

       भारत के उत्तरी दिशा में एक स्थान के उत्खनन से कुछ ऐसे अभिलेखीय साक्ष्य मिले हैं जिनके बारे में विशेषज्ञ मानते हैं कि अभिलेख के द्वारा उस समय प्रचलित हिन्दी भाषा में लोगों को आगाह किया गया है कि तीखी, चटपटी "चाऊ और मीन" न खाया जाय क्योंकि उससे विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण बढ़ जाता है और लोग अनियंत्रित होकर सामने वाले पर झपट पड़ते हैं। 

वहीं विशेषज्ञ इस अभिलेख की सत्यता पर सवाल उठाते हैं क्योंकि जिन दिनो चाऊ और मीन को बलात्कार का मुख्य कारण बताया गया था ठीक उन्हीं दिनों समकालीन बंगाल प्रांत की एक शासिका के अभिलेखीय प्रमाणों में कहा गया है कि लोगों द्वारा अपने बच्चों को खुला माहौल देने के कारण इस तरह के विपरीत लिंगी आकर्षणों की संख्या बढ़ जाती है और बलात्कार आदि की घटनायें काबू में नहीं रहतीं। 

उपर्युक्त दोनों ऐतिहासिक अभिलेखों में हांलाकि बलात्कार के कारण अलग अलग बताये गये हैं, तथापि इन अभिलेखों से उस दौर के शासकों द्वारा अपनी जनता प्रति चिंता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। 

वहीं, उत्खनन से कुछ ऐसे लोक-ग्रंथ भी निकले हैं जिन्हें इतिहासकार कथा-कहानी से ज्यादा महत्व नहीं देते। ऐसी ही एक कथा में वर्णन है कि चाऊ और मीन नाम के दो भाई चीनी भूभाग से देशनिकाला देने पर हरियाणा नाम की जगह पर आये और तरह तरह के उत्पात करने लगे। कालांतर में चाऊ उसी प्रदेश का गवर्नर बना और मीन लाट साहब।

( ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश :)

ऐसा ही एक स्टेटस तब लिखा था जब गुजरात में एक नेता ने टोल टैक्स देने को लेकर हवा में बंदूक लहराई थी

 लोथल और धौलावीरा जैसे एतिहासिक स्थलों के करीब हाल ही में हुए उत्खननों से एक ऐसी बंदूक मिली है जिसके बारे में वैज्ञानिक मानते हैं कि इसे तीन हजार साल पहले किसी टोल टैक्स नाके पर किसी वीआईपी द्वारा हवा में लहराया गया था। अभिलेखों में साक्ष्य हैं कि टोल नाके पर उस बंदूक लहराने वाले वीआईपी शख्स के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह टोल के पैसे चुका सके। इस बात से पता चलता है कि तीन हजार साल पहले भारतवर्ष में इतनी ज्यादा इमानदारी थी कि चुने हुए जनप्रतिनिधि बड़ी मुश्किल से अपना घर खर्च चला पाते थे, जैसे तैसे वे इमानदारी के पैसों से ही जनता की सेवा भी करते थे लेकिन एक भी पैसा गलत ढंग से नहीं कमाते थे।

( ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश :)

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   उपर्युक्त उदाहरण से मन में यह शंका आना स्वाभाविक है कि कहीं जो कुछ हम लोग इतिहास के नाम पर पढ़ रहे हैं वो भी इसी तरह मनमौजियत के अंदाज में तो नहीं लिखा गया था। बहरहाल मंदिर के  ट्रांसलेशन वाले पर्चों को कल को कोई सदा सर्वदा भारत का ही गौरवगान करने वाला शख्स  इतिहास के थैले में झांकेगा तो यही कहेगा कि Oracle डेटाबेस ब्रम्हाजी के जमाने में भी था। उसी डेटाबेस में सभी के कर्म-सुकर्म अपडेट होते रहते थे।

 - सतीश यादव

Monday, October 15, 2012

अनकंट्रोल्ड प्रेस कान्फ्रेन्स



Note : यह हल्का-फुल्का लेख केवल समझदार वयस्कों के लिये है, रंग-बिरंगा झंडा फहराने वाले कतिपय वयस्क-गण इस लेख से तनिक दूरी बनाये रखें :-)
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"श्रीमान जन्गी जी, आप बताइये इन पत्रकारों को कि क्या आपको परिवार नियोजन के लिये हमारी एनजीओ से कोई कंडोम मिला था या नहीं मिला था" ?

"मिला तो था एक पैकेट लेकिन हम कहे जब खतम हो जायगा तो फिर मिलेगा...."

"देखा....देखा.....देखा.....फिर मिलेगा......यही है सच्चाई......आप लोग नाहक बात बनाते हैं"

"लेकिन आपने जिन्हें कंडोम दिया वे तो बूढ़े हैं, उनकी प्रजनन वाली उम्र तो नहीं लगती" .

"यह जाँच का विषय है, आप चाहे तो जाँच करा लिजिये कि वे अभी इस उम्र में भी सक्षम हैं या नहीं.....हो जाने दें जाँच".

"उन्हीं से क्यों नहीं पूछा जाता, जन्गी जी आप के कितने बच्चे हैं" ?

"आठ".

"क्या परिवार नियोजन का कंडोम काम नहीं आया" ?

"आया , बहुत काम आया".

"देखा...देखा...काम आया कह रहे हैं और आप पत्रकार लोग बस बाते बनाते हो".

"लेकिन जब आपको कंडोम दिया गया था इनकी एनजीओ की ओर से तब आठ बच्चे कैसे हो गये" ?

"अब हम कइसे बतायें कि कैसे हो गये".

"हमारा कहने का मतलब है कि क्या कंडोम घटिया क्वालिटी का था" ?

"घटिया तो नहीं हां, एक दिन से ज्यादा नहीं चलता था".

"माने, आप क्या उसे पूरा दिन पहने रहते थे" ?

"हां, पहनता था".

"अरे आप को पता है आप क्या कह रहे हैं, कंडोम भला कोई पूरा दिन पहने रह सकता है, कहीं नेताजी किसी आगल पागल को तो नहीं पकड़ लाये" ?

"देखिये अब ये जन्गी जी का मन है कि वे कंडोम दिन भर पहने रहें तो ये उनकी मर्जी है, आप हम कैसे रोक सकते हैं.... ये जन्गी जी दिमागी रूप से स्वस्थ हैं औऱ भला चंगा काम करते हैं"

"जन्गी जी, आप क्या काम करते हैं" ?

"मैं रन्दा मिस्त्री हूं, लकड़ीयों पर रन्दा चलाता हूँ उन्हें "पलेन" बनाता हूँ"

"पिछली बार आपको कंडोम का पैकेट कब मिला था" ?

"एक महीना पहले".

"कितने थे एक पैकेट में" ?

"यही कोई तीस पैंतीस होंगे बकि हम तीन ही दिन में खतम कर देते थे".

"हांय, आप ऐसा क्या ...मेरा मतलब है कि ऐसा कौन सा....आई मीन...ऐसा कैसे हो सकता है कि तीन दिन में तीस कंडोम खत्म हो जांय" ?

"अरे एक दिन में दस काम में लेते थे तो तीन दिन में तीस न हुए".

"आप एक दिन में दस कंडोम कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं" ?

"अरे हभई उनकी मर्जी, वो चाहे जितना खतम करें, मुद्दे की बात है कि हमने कंडोम वितरण अपने एनजीओ के जरिये किया था, मसला समाप्त".

"तो भी ये कैसे संभव है कि एक शख्स दिन में दस दस कंडोम यूज करे....क्या पता बाजार में ले जाकर बेचता होगा...जंगी जी क्या आप उन कंडोम्स को बाजार में लेजाकर बेचते थे" ?

"नहीं, हमको खुदै कम पड़ जाता था तो हम बाहर क्यों बेचेंगे".

"आखिर आपको कम कैसे पड़ जाता था...हम लोग जानना चाहते हैं" ?

"देखिये पांच "कन्नोम" इस हाथ की उंगली में पहनते थे और पांच "कन्नोम" इस हाथ की पाँचों उंगली में पहनते थे और वही पहनकर रंदा चलाते थे तो हाथ सुरच्छित रहता था".

"ओह तो क्या आप ......." ?

"देखिये अब आप लोग ज्यादा निजी सवाल पूछ रहे हैं, मुद्दा यही था कि कंडोम का वितरण हुआ था या नहीं हुआ था, जंगी जी की बात से साबित होता है कि कंडोम का वितरण हुआ था, अब प्रेस कान्फ्रेंस समाप्त करता हूँ".

"नहीं नहीं आप को जवाब देना पड़ेगा, आप को जवाब देना पडेगा कि कैसे जंगी जी कंडोम को उंगलियों में पहन कर रन्दा चलाते थे.....क्या आप के एनजीओ ने दस्ताने नहीं बांटे थे यदि नहीं तो ऐसा क्यों" ?

"देखिये ये हमारा विषय नहीं है, अब यह बांटने के बाद कौन कैसे इस्तेमाल करता है हम कैसे बतायें" ?

"नहीं आपको बताना पड़ेगा मंत्री जी, आपको बताना ही पड़ेगा".

"डोन्ट पॉइन्ट फिंगर एट मी...डोन्ट पॉइन्ट फिंगर एट मी..."

"नहीं आपको बताना पड़ेगा..."

"जन्गी जी से पूछिए...."

"जन्गी जी आपको किसने बताया था कि कंडोम को उंगलियों में पहनना चाहिये" ?

"अब वही एक मैडम और एक डॉकटर साहेब आये थे, मैडम तो नहीं लेकिन डाकटर साहब उंगली में पहिनके बता रहे थे तो हम समझ गये थे"।

"देखिये, आपके एनजीओ ने जो डॉक्टर भेजा वो भी सही नहीं था, उसने गाँव वालों को गलत जानकारी बताई".

"देखिये, ये जाँच का विषय है, आप जाँच करा लें कि हमारे डॉक्टर कैसे गाँव में डेमो देते हैं या कैसे दे सकते हैं लेकिन मूल बात यही है कि कंडोम का वितरण हमारे एनजीओ की ओर से हुआ था और इसमें कोई भी....मैं फिर कहता हूँ कि कोई भी धांधली नहीं की गई...जिसे शंका हो, वो कोर्ट जा सकता है, उसकी जाँच कराई जा सकती है...अरे आप अब ....जी ? .... अरे बच्चे लोग गाँव में कंडोम को फुग्गा बनाकर उड़ा रहे हैं तो इसमें हम क्या कर सकते हैं, जाइये आप गाँव में जाकर पता किजिए.....जाइये जाँच कराईये...."

- सतीश पंचम

Tuesday, October 9, 2012

देशज "बइठऊकी"

- अरे तो क्या उसका दामाद कुछ काम धंधा नहीं करता क्या, अरे तो देख ताक कर बियाह करना था ना, बताओ इतने बड़े घर की लड़की है और मरद बहेतु निकल गया.....अरे तो देख तो रही हूँ कि दमाद को बार बार टीबी पर बता रहे हैं कि कर्जा खाया था किसी का......

- अरे तो ऐसा दामाद भी नहीं होना चाहिये कि कुल करजै कर डारे

- दुरभाग है, देखो कैसे बीतता है लड़किया का, बीपत तो बड़ी भारी है

- अरे वो बिमला का आदमी नहीं, वो भी तो करजै कर डारा था न, आखिर में देखो कलकत्ता में डरैबरी कर रहा है

- अरे तो एतना जलदी डरायबरी थोडौ न मिल गया था, पहले खलासी बना था बिमला का आदमी, चार पांच साल खलासी था बाद में हाथ सफा होते होते डरैबर हो गया

- देखो, क्या लिखा है, ओइसे टाई ओई लगाकर दिख तो रहा है टीवी पर, कोट भी पहिरा है, मोंछ भी है, सब कर्जा करके इतना बन ठन के दिख रहा है, खुद के कमाई का पहिनता तो न जाने क्या करता

- अरे कोई कह रहा था कि कर्जा नहीं लिया किसी दोस्त ओस्त ने दिया था

- अइसे ही दे दिया था ?

- नहीं, अइसे ही क्यों देगा, कोई पागल है जो पइसा अइसे ही दे देगा दोसदारी के नाम पर.

- सब लोग तो कहते हैं दिया था, बिना सूद लगाये

- ये तो बहुत नई बात सुन रही हूं, भला कोई दोसदारी में इतना कैसे लुटा देगा, ऐसा कभी सुना तो नहीं

- सुना क्यों नहीं, किसन भगवान और सुदामा का नहीं सुनी थीं, वो भी तो दोसदारी में दे दिये थे, वइसे ही आज भी है, भारत को अइसे ही परंपरा मानने वाला देस नहीं कहते

- तो क्या ये दामाद सुदामा की तरह दरिद्र था ?

- वो तो उसके लोग ही जानें लेकिन अब तो टीवी पर दिख रहा है जो वही बता रही हूं , देखो कैसे आँख फाड़ के देख रहा है टीवी में से, जइसे अबहीं बाहर आ जायेगा..... एतना गुस्सईल दमाद है कि बस

- अरे अइसे ही लछमिनिया का पाहुन भी था, बियाह के टैम जब सब दे दवा लिया तो कहने लगा भैंस चाहिये दहेज में वरना खाना न खाऊंगा

- तब ?

- तब क्या, बहुत मनाने-चोनाने के बाद अंत में एक बैल दिया तो माना

- भैंस क्यों नहीं दिये ?

- भैंस देने पर लछमिनिया को ही दुहना पड़ता, अब बैल ले गया है तो खुद ही जांगर ठेठायेगा.....

- ऐ बिट्टी, देख दाल बह तो नहीं रही, तनिक चूल्हा धीमा कर तो :-)

  - सतीश पंचम

(फेसबुक पर इस पोस्ट को आंशिक रूप से पोस्ट किया था )

Monday, October 8, 2012

कैसी जुल्मी बनाई तैंने नारी कि मारा गया ब्रम्हचारी.......चित्रलेखा रॉक्स डूड :-)


 कल शाम बरसाती मौसम में फिर से चित्रलेखा फिल्म देखी. मन लहलहा उठा। क्या गजब की फिलॉसफी, क्या गजब की अदाकारी, क्या गजब गीत-संगीत...अपन तो मुग्ध हो गये. इस फिल्म पर पहले भी पोस्ट लिख चुका हूं , वही पोस्ट अब फिर रि-पोस्ट कर रहा हूं।

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   मेरे यहां आज दुपहरीया आसमान में काले काले बादल जमा हो रहे थे। कुछ काले, कुछ श्यामल, कुछ उजले तो कुछ बेहद मटमैले। कुछ का आकार दैत्यों जैसा था तो कुछ पहाडों के होने का भ्रम दे रहे थे। एकाध को देख लग रहा था मानों कहीं आसमान में कोई आग जलाई गई है और उससे उठता धुआँ , उससे उठते गुबार ने समूचे आसमान को ढँक लिया है।

            अभी थोडी ही देर हुई थी कि बारिश झमाझम होने लगी। लोग जो यहाँ वहाँ आ जा रहे थे तपाक से किसी दुकान की शेड आदि में जाकर खड़े हो गए। बाईक से जाने वाले बाईक साईड में लगा वहीं कहीं किसी छत के नीचे खड़े हो गए। कुछ लोग उपर से गुजरते पुल के नीचे बाईक खड़ी कर बारिश से बचने लगे। धीरे-धीरे वातावरण में ठंडक आ गई। और आज यही वक्त था जब मैं अपने घर में फिल्म चित्रलेखा देख रहा था।
    
       चित्रलेखा....एक ऐसी फिल्म जो अपने आप में बेजोड़ है..अपने कथानक के कारण, अपने सुमधुर संगीत के कारण, अपने संवादों के गहरे भाव के कारण। और कॉस्ट्यूम............वो तो बस देखते ही रह जांय। सामंत बीजगुप्त का रंगभवन, नर्तकी चित्रलेखा का साज श्रृंगार, उसके बालों में शिवजी की तरह लगा आधे चाँद की आकृति,फूलों और बेलबूटों से सजे बाग. ....किस किस की तारीफ की जाय। हर एक फ्रेम अपने आप में बेजोड़।देखते ही लगता है कि राजा रवि वर्मा के बनाई तस्वीरें चल-फिर रही हैं।

          भगवती चरण वर्मा जी की कहानी पर आधारित यह फिल्म एक नर्तकी चित्रलेखा के इर्द-गिर्द घूम रही है जो मदिरा पान कर रही है, सज धज,..... साज-श्रृंगार में डूबी रहती है और सामंत बीजगुप्त से प्रेम कर बैठी है।

         इधर बीजगुप्त का विवाह किसी और से तय है लेकिन वह खुद चित्रलेखा के प्रेमपाश में हैं। इसी दौरान एक ब्रह्मचारी श्वेतांक का आगमन हुआ जिसे कि उसके गुरू ने सामंत बीजगुप्त के पास पाप और पुण्य का भेद जानने भेजा है। श्वेतांक को अपने ब्रह्मचर्य पर बड़ा घमण्ड है। रह रह कर वह महल की स्त्रियों को याद दिलाते रहते है कि मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ। मुझे मत छूओ। ब्रहमचर्य नष्ट न करो।

       तब उसके गुरू भाई सामंत बीजगुप्त समझाते हुए कहते हैं कि - ब्रह्मचारी श्वेतांक, तुम्हें किसी स्त्री को नहीं छूना चाहिए। ऐसे ही एक बार श्वेतांक रूपसी चित्रलेखा के सामने पड़ जाने पर उसका रूप देखते ही रह गए मुँह खुला का खुला। तब, सामंत चित्रगुप्त चित्रलेखा से उसका परिचय कराते हुए कहते हैं कि - ये हैं ब्रह्मचारी श्वेतांक, मेरे गुरू भाई।

  श्वेतांक ने सुधारा - ब्रह्मचारी नहीं........बाल ब्रह्मचारी।

 चित्रलेखा ने कटाक्ष करते हुए कहा - मेरा तोता भी ब्रह्मचारी है, बाल ब्रह्मचारी।

    अभी पाप और पुण्य को समझने का यह खेल चल ही रहा है कि चित्रलेखा ने एक दिन अकेले में अपने कोमल कोमल और नरम बतियों में श्वेतांक को उलझा कर उससे मदिरा पान का आग्रह किया....बावले श्वेतांक ने हिचकते हुए ही सही मदिरा पी ली ।  उसी वक्त सामंत बीजगुप्त का आगमन हुआ...श्वेतांक लज्जित.....ब्रह्मचर्य पर आँच.....अब क्या करें।

 आहत श्वेतांक सामंत बीजगुप्त से कहते है - स्वामी, मैंने पाप किया है। आज मैंने मदिरापान किया है। सामंत बीजगुप्त ने समझाते हुए कहा कि मदिरापान में कोई पाप नहीं। मैं तो रोज मदिरा पीता हूँ। लेकिन श्वेतांक का यह कहना कि मैं मदिरापान के बाद खुद को अपराधी महसूस कर रहा हूँ - सामंत बीजगुप्त को यह कहने पर बाध्य किया कि - यदि तुम किसी काम को करने के बाद अपराध महसूस करते हो तो वह कार्य अवश्य पाप है।
जाओ प्रायश्चित करो।

   और उसी वक्त पास बैठी चित्रलेखा के चेहरे के भाव बदल गए ....वह भी तो नर्तकी बन, अपने रूप जाल में फांस कर जो कुछ कर रही है कहीं न कहीं उसमें अपराध है। सामंत बीजगुप्त का यह कहना कि जिस काम को करने से मन में अपराध बोध हो वह पाप है.....चित्रलेखा को गहरे तक भेद गया।

      ऐसे में ही सन्यासी कुमारगिरी का आगमन हुआ जो चित्रलेखा को समझाने के लिए आए कि वह सामंत बीजगुप्त का पीछा छोड़ दे और यशोधरा से उनका विवाह हो जाने दे। फिल्म में सन्यासी और एक पतित नर्तकी के बीच पाप और पुण्य को लेकर हुए संवाद बहुत गूढ़ अर्थ लिए हैं और उन बातों को देख सुनकर पता चलता है कि कितनी मेहनत की गई है संवादों के लेखन में और तब तो गजब ही असर आता है फिल्म में जब चित्रलेखा अपने विरोध में खड़े सन्यासी कुमारगिरी को पाप और पुण्य का भेद समझाते यह गीत गाती है कि -

 सन्सार से भागे फिरते हो
भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना ना सके
उस लोक में भी पछताओगे

ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या
रीतों पर धर्म की मोहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को
कैसे आदर्श बनाओगे

ये भोग भी एक तपस्या है
तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचेता का होगा
रचना को अगर ठुकराओगे
सन्सार से भागे फिरते हो

हम कहते हैं ये जग अपना है
तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जनम बिता कर जायेंगे
तुम जनम गँवा कर जाओगे

       पूरे गीत को सुनते हुए महसूस हुआ कि गीतकार साहिर लुधियानवी जी ने कितनी गहराई से सांसारिक जीवन और व्यवहारिक जीवन के द्वंद्व को अपने गीतों के जरिए पेश किया है।

     उधर दिन बीतते गए और राज-रंग में डूबी, सामंत बीजगुप्त के प्रेम में गोते लगाती चित्रलेखा का मन धीरे धीरे अपराध बोध से ग्रस्त होने लगा। उसे लगने लगा कि यशोधरा जिससे सामंत बीजगुप्त का विवाह तय हुआ है उसके प्रति वह अन्याय कर रही है। सन्यासी कुमारगिरी की कही बातें उसे अब भी मथ रही होती हैं कि वह पाप कर रही है...। और एक समय आता है कि चित्रलेखा सब कुछ छोड़ छाड़ कर कुमारगिरी के गुफा में जा  पहुँचती है। सांसारिक जीवन का त्याग कर देती है।
 
     कुमारगिरी पहले तो अपने मठ पर किसी महिला साधक के होने पर ही आपत्ति जताई और कहा कि वह उन्हें अपनी शिष्या नहीं बना सकते। लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे। महान साधक और तपस्वी कुमारगिरी के यहाँ एक स्त्री ?

   लेकिन चित्रलेखा ने तब सन्यासी कुमारगिरी को चुनौती देते कहा -  क्या इसी तपस्या और ध्यान के बल आप मुझे पतिता मानने लग गए थे जिसमें इतनी भी सामर्थ्य नहीं कि एक स्त्री को अपने यहाँ आश्रय दे सके। मजबूरन कुछ सोच कर सन्यासी कुमारगिरी नर्तकी से सन्यासन बनी चित्रलेखा को अपने यहाँ रहने देने का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

       लेकिन, चित्रलेखा ने सन्यास भले धारण कर लिया हो....रूप तो उसका वही था,लावण्य तो उसका वही था। कुमारगिरी का ध्यान भटकने लगा.....तप, जप सब उन्हें अपना मन एकाग्र करने में सहायक न रहे। ईश्वर भक्ति से ध्यान बार बार चित्रलेखा के सौंदर्य की ओर भागता था। और एक दिन सन्यासी कुमारगिरी अपने आप पर काबू नहीं रख पाए और चित्रलेखा के मानमर्दन पर तुल गए।

    वह उसे बताते हैं कि आज सामंत बीजगुप्त का विवाह यशोधरा से हो गया है.....अब वह वापस नहीं लौट सकती....चित्रलेखा ने प्रतिरोध जताया लेकिन सन्यासी कुमारगिरी पर तो वासना ने अपना कब्जा कर लिया था...... चित्रलेखा को बलात् अपने शयनागार में ले जाकर पटक दिया...वासना की आग में रतिक्रीडा को आतुर कुमारगिरी के तप और सन्यास का चोला तार तार होने को उद्दत हो उठा। ऐसे में ही कुमारगिरी के एक शिष्य ने संदेश पहुँचाया कि सामंत बीजगुप्त ने भी राजपाट छोड दिया है और यशोधरा का विवाह श्वेतांक से हो रहा है जो कि अब बीजगुप्त के कहने से नया सामंत बनाये गये है।

     वस्तुस्थिति को जानकर सन्यासी कुमारगिरी को धिक्कारते हुए चित्रलेखा अपने बीजगुप्त से मिलने चल पड़ी और इधर सन्यासी कुमारगिरी की चेतना वापस लौटी.....वह क्या करने जा रहे थे....इसी झूठे जप और तप का बहुत मान था उन्हें......। अपने साथ हुए इस घटना से कुमारगिरी आहत हो आत्महत्या की ओर अग्रसर हुए तो उधर चित्रलेखा और बीजगुप्त का सुखद मिलन हुआ।

     फिल्म की जान है इसके गीत जो गहरे भाव लिये हैं। श्वेतांक के रोल में महमूद बहुत आकर्षित करते हैं तो सामंत बीजगुप्त के रोल में प्रदीप कुमार। चित्रलेखा के रूप में मीना कुमारी ने बहुत ही ज्यादा असरदार भूमिका अदा की है। भव्य चित्रण और क्लासिक फिल्मों के नजरिए से देखा जाय तो चित्रलेखा एक उत्कृष्ट फिल्म है।

  एक गीत जो बहुत ही ज्यादा सुमधुर और मन्नाडे की आवाज में गाया गया, वह है ब्रह्मचारी श्वेतांक के जरिए यशोधरा के प्रेम पाश में पड़ने पर गाया गीत -



लागी मनवा के बीच कटारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी
कैसी ज़ुल्मी बनायी तैने नारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी

ऐसा घुँघरू पायलिया का छनका
मोरी माला में अटक गया मनका
मैं तो भूल प्रभू सुध-बुध सारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी ...

कोई चंचल कोई मतवाली है
कोई नटखट, कोई भोली-भाली है
कभी देखी न थी,
 ऐसी फुलवारी कि मारा गया ...

 बड़ी जतनों साध बनायी थी
मेरी बरसों की पुण्य कमायी थी
तैने पल में, भसम कर डारी कि
मारा गया ब्रह्मचारी ...

 मोहे बावला बना गयी वाकी बतियाँ
मोसे कटती नहीं हैं अब रतियाँ
पड़ी सर पे बिपत अति भारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...

मोहे उन बिन कछू न सुहाये रे
मोरे अखियों के आगे लहराये रे
गोरे मुखड़े पे लट कारी-कारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...

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तो यह रही मेरी दुपहरीया की समयावली.............आसमान मे दलबंदी करते काले काले बादलों की घटाटोप के बीच फिल्म चित्रलेखा की देखवाई।

- सतीश यादव

Friday, October 5, 2012

The मध्यवर्ग

   रोज देखता हूँ कि मेरे ऑफिस में कार्यरत एक लड़की सुबह और शाम ऑफिस बस से आते और जाते बुर्का पहनती है। सुबह घर से आयेगी तो बुर्का पहनकर बस में चढ़ेगी और फिर पीछे की सीट जो अक्सर खाली रहती है वहां जायेगी और बुर्का उतार उसे तह कर बैग में रखेगी और फिर आगे की सीट पर आकर बैठ जायगी। यही क्रम शाम के समय जाते वक्त भी दोहराया जाता है। 

   इस लड़की का यूँ बुर्का बदलना पहले कुछ मुझे अजीब सा लगता था कि इतना भी क्या लजाधुर होना कि कार्यस्थल के लिये निकलो तो घर से बुर्का पहन कर, सारा दिन बिना बुर्के के काम करो और ऑफिस से शाम घर लौटो तो घर पर बुर्का पहनकर। लेकिन अब तो जैसे आदत सी हो गई है। लेकिन एक सवाल मन में जरूर खटकता है कि इस लड़की को घर वालों से इतनी पर्देदारी करनी पड़ रही है, जबकि बाहर वाले सहज भाव से हैं। उनसे कोई पर्देदारी नहीं।

     मध्यवर्ग की शायद यही दोहरी मानसिकता, लजाधुर होने और नये जमाने के साथ चलने की इच्छा सबकुछ गड्डमगड्ड कर देती है।
हमकदम :राखी गुलज़ार और परीक्षित साहनी सुबह-सुबह ऑफिस के लिये निकलते हुए

     एक फिल्म आई थी हमकदम। राखी गुलजार और परीक्षित साहनी मुख्य किरदार थे। जिसमें दिखाया गया था कि एक शहरी मध्यवर्ग किस तरह ऐसी ही परिस्थिति से दो-चार होता है। पूर्णतः घरेलू किस्म की पत्नी राखी को जब नौकरी मिलती है तो पहले तो वह समझ ही नहीं पाती कि कैसे वह बाहर निकले, कैसे लोगों से बात करे, कैसे क्या हो। इधर घर पर उसके सास ससुर रहते हैं जिनके सामने हमेशा वह सिर ढंक कर ही रही है, अब बाहर भी सिर ढंक कर कैसे निबाह हो। धीरे-धीरे नौकरी करते हुए पत्नी खुलना शुरू होती है, घर से निकलती है तो सिर पर पल्लू रखकर। ऑफिस पहुंचती है तो वाशरूम में जाकर चेहरा ठीक करती है, लिपस्टिक लगाती है, साड़ी ठीक पहनती है और फिर काम पर जुट जाती है। घर पहुंचने से पहले फिर वही उल्टा शुरू होता है। सिर पर पल्लू, लिपस्टिक पोंछाई और नॉर्मलीकरण।

     यह परिस्थिति देख अपने मध्यवर्गीय विडंबनाओं पर जहां कोफ्त होती है वहीं इन महिलाओं के जज्बे को सलाम करने का मन होता है कि घर और बाहर की दोहरी भूमिकाओं को वे किस खूबी से निबाह ले जा रही हैं।
उम्मीद करता हूँ कि मेरे ऑफिस में कार्यरत यह लड़की शायद आते जाते बुर्का पहनना छोड़ देगी या
क्या पता कोई और भी ज्यादा परंपरावादी परिवार में इसका विवाह हो उठे और फिर घर बैठने का फरमान सुना दे इसका पति तो ?    :(

  मध्यवर्ग बड़ा अजबै वर्ग है कम्बख्त ....।

- सतीश पंचम

(अभी दो दिन पहले ही फेसबुक पर यह स्टेटस अपडेट किया था,  वही स्टेटस पोस्ट के रूप में है )

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