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Sunday, September 23, 2012

चच्चा से भेंट

    यदि आपने शोले देखी हो तो उसमें एक सीन है कि जब अमिताभ बच्चन बसंती और धर्मेंद्र की शादी की बात करने बसंती की मौसी के यहां जा बैठते हैं और लगते हैं अपने दोस्त का गुणगान करने। यह पोस्ट उसी सीन से प्रेरित हो लिखी गई है।

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- अरे बेटा बस इतना समझ लो कि मिलीजुली सरकारी अर्थव्यवस्था देश के सीने पर पत्थर के सिल की तरह है। बस किसी तरह यह सरकार खेंच ले जाऊं तो चैन की सांस लूँ। ये गठबंधन की मजबूरियां, ये सहयोगियों के चोंचले, ये जनता की बेकसी,  ये श्रीमती जी की सहेलियों द्वारा कसी जाने वाली फब्तियाँ, अब क्या क्या संभालूं, किन किन को ढोऊँ ?

- हां सच कहते हो चच्चा, बडा बोझ है आप पर

- लेकिन बेटा, इस बोझ को तो कोई कुँएं में यूं ही फेक तो नहीं देता न। बुरा नहीं मानना, इतना तो देखना ही पडता है कि देश चलाने के लिये पैसे कहां से लाये जांय, सरकार के खर्च कहां से जुटाए जांय, तमाम योजनायें कैसी चलाई जांय, अब पैसे तो पेड़ पर नहीं उगते न बेटा ?

- पैसों वाले पेड़ का तो ऐसा ऐसा है चच्चा कि एक बार तमाम घोटालों पर सख्ती दिखाई जाय, तमाम घोटालेबाज पकड़ में आ जांय, उनसे ही सारी घोटलपंती की रकम वसूली जाय तो पैसों वाला पेड़ एक नहीं बल्कि पूरा का पूरा बगीचा ही उग आयेगा, और फिर बेवजह एफडीआई पर इतना जोर देने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, यूं रसोई गैस, पेट्रेल डीजल के दाम बढ़ाकर नाहक जनता पर बोझ डालना क्या अच्छी बात है ?

- तो क्या अभी मैंने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिये जो कदम उठाये वे खराब हैं, प्रिवेंटिव चीजें तो करनी ही पड़ती हैं न बेटा, लोग तो पशुओं से बचाव के लिये बाड़-ओड़ भी लगाते हैं, वो भी तो कुछ सोचकर ही करते हैं, फिर ये तो इकोनोमी का मामला ठहरा, इसे यूं ही तो नहीं छोड़ सकता ना ?

- नहीं नहीं ये मैंने कब कहा चच्चा कि इकोनॉमी को उसके हाल पर छोड़ दो, अर्थव्यवस्था की मजबूती तो बहुत जरूरी है लेकिन इस तरह रोज रोज दाम बढ़ाना भी तो ठीक नहीं, आम जनता तो वैसे भी दबी कुचली है

- तो क्या मैं अत्याचारी हूं , जनता को दबा कर रख रहा हूँ ?

- नहीं नहीं चच्चा, ये मैंने कब कहा....... लेकिन चच्चा जनता चीज ही ऐसी है कि अब मैं आपको क्या बताउं

- तो क्या जनता बेवकूफ है, नासमझ है ?

- छी छी छी चच्चा, वो और नासमझ ......ना ना ...अरे वो तो बहुत समझदार और सुलझे हुए विचारों वाली है। लेकिन चच्चा एक बार जब अपनी पर आ जाय तो फिर अच्छे बुरे का कहां होश रहता है, जिसे मन में आता है वोट देती है, जिसको मन आए गरियाती है। अब चुनावों के वक्त कोई किसी की उंगली तो पकड़ नहीं सकता ना ?

- ठीक कहते हो बेटा, मन माफिक मौजी जनता वो, कार्टून बनाकर छेड़-छाड़ करे जनता वो, उलूल जूलूल गरियाये जनता वो, अनाप-शनाप वोटिंग करे वो, लेकिन उसमें उसका कोई दोष नहीं है।

- चच्चा, आप तो मेरी जनता को गलत समझ रहे हैं। वो तो इतनी सीधी और भोली है कि आप तो उन्हें छोड़ केवल घोटालेबाजों को पकड़िये, उन्हीं से दाम वसूलिये, फिर देखिये ये सब्सिडी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, घोटाले की रकम से ही समस्या हल हो जायेगी और समय आने पर जनता की सब्सिडी की लत और टैक्स में छूट पाने की आदत भी जल्द ही छूट जाएगी।

- अरे बेटा, मुझ चच्चा को समझा रहे हो। ये सब्सिडी और टैक्स में छूट की आदत आज तक कभी छूटी है जो अब छूट जाएगी ?

- चच्चा आप मेरी जनता को नहीं जानते। विश्वास किजिये, वो इस तरह की कैफियत नहीं रखती। वो तो कम से कम में गुजारा कर लेती है। बस एक बार एफडीआई वापस हो जाय, दामों में रोलबैक हो जाय तो वो ढंग का कमाने खाने लगेगी

- ओह, बस यही एक कमी रह गई थी। तो क्या जनता अब भी भूखी-बेकार है, कमाती धमाती नहीं, बिल्कुल फजूल बैठी रहती है ?

- तो इसमें कौन सी बुरी बात है चच्चा, इस तरह की फजूलियत तो बडे-बडे उंचे लोग तक करते हैं. बडे बडे सरकारी आयोजनों में इसी तरह की फजूलियतें दिखती हैं, अपने योजना आयोग की आंकड़ेबाजीयों को ही देखिये, करोड़ों खरच करके सर्वे होता है और अंत में बताया जाता है अफसरों के जरिये कि छब्बीस रूपईय्या वाला अमीर होता है और उंचे खानदान से होता है।

-अच्छा तो बेटा ये भी बताते जाओ कि ये तुम्हारी गुनवान जनता किस खानदान से है, उसका प्रदेश कौन सा है, उसकी बोली-भाषा कैसी है ?

-बस चच्चा उसके खानदान का सर्वे होते ही आप ही को सबसे पहले बताउंगा। फिलहाल तो इसे देश की जनता ही समझिये।

- एक बात की दाद दूँगा बेटा कि भले ही सौ बुराईयां हैं तुम्हारी जनता में लेकिन तुम्हारे मुंह से उसके लिये तारीफ ही निकलती है।

-अब क्या बताउं चच्चा, मेरा तो दिल ही कुछ ऐसा है। तो मैं ये रोलबैक पक्का समझूँ।

- पक्का ? भले सरकार गिर जाय, भले पीएमम पद चला जाय लेकिन मैं ऐसी जनता के लिये जिसे दशकों से सब्सिडी और सस्ते अनाज पाने की लत लग गई हो अपने फैसले से नहीं पलटूंगा. एफडीआई वापस नहीं होगी
- क्या बताउं चच्चा, नहीं जानता था कि एफडीआई बैकबोन की तरह ही इतनी ज्यादा जरूरी है, वरना इस देश से अंग्रेजों को हम भगाते ही नहीं, आखिर उन्होंने कौन सा इतना बुरा किया था. खैर, जैसा आप चाहें,

- चाय तो पीकर जाओ बेटा, तुम्हारी चच्ची ने बनाये हैं

- अब क्या चाय पीऊं चच्चा, आपने तो सारा मूड़ ही बिगाड़ दिया, अब किसके दर जाऊँ, सोचा था भाजपा वाले कुछ करामात दिखायेंगे लेकिन उन लोगों को केवल पसेरी भर बोलना आता है, और जगह जगह छींटना, देखे नहीं उनके लोग भी किस तरह कर्नाटक में कोयला का खेल खेले, कुछ फर्क नहीं है आप दुन्नू में.

- तो जब सब कोई भ्रष्ट है तो किसी और का समर्थन करने की बजाय तुम अपने चच्चा का ही समर्थन क्यों नहीं करते,

- करना ही पड़ेगा चच्चा, जब साईकिल और हाथी की सवारी आप एक साथ गाँठ लिये हो तो मेरी क्या बिसात

- तो मैं तुम्हें अपना वोटर मान लूँ, तुम्हारा वोट पक्का ?

- ऐसे कैसे पक्का, पहले आप मुझे सिलेंडर का कोटा नौ से बारह किजिए, फिर सोचूंगा

- तुममे और दीदी में कोई फर्क नहीं है, वो भी तो सिलेंडर का कोटा बढाकर मांग रही है

- इतने पर भी मुझमें और दीदी में बारह सिलेंडरों का फर्क है

- हां, लेकिन तुम तो अपने लिए मांग रहे हो जबकि दीदी सबों के लिये मांग रही है, इतने स्वार्थी कब से हो गये, मुझे देखो मैं अपने लिये नहीं देश के लिये सोच रहा हूं, विश्वास न हो तो अपनी चच्ची से पूछ लो

- अब क्या पूछना-पुछवाना चच्चा, चलता हूँ, घर पर किन्नर दो बार आकर पूछ-पछोर गये हैं कि सिलिंडर की डिलीवरी कब हो रही है ...कम्बख्त सिलिंडर न हुआ लल्ला हो गया....गैस एजैंसी के बुकिंग क्लर्क तक से उनकी सांठ-गाँठ हो गई है, वही उनको इन्फार्मेशन देता है कि आज उनके यहां सिलिंडर की डिलीवरी हुई है आज उनके यहां......नाचने गाने के बाद किन्नरों को बधावा न दो तो वो

 अपने कपड़े उतारने लगते हैं, आपको तो कुछ झेलना पड़ता नहीं, झेलना
 तो हम जैसों को पड़ता है

- अरे बेटा झेलना तो मुझे भी पड़ता है, देखा नहीं कैसे भरे हॉल में एक ने शर्ट उतार दी थी अपनी

- तो क्यूं ऐसे फैसले लेते हैं कि किन्नर से लेकर वकील तक कपड़े उतारने पर तुल जांय

- बेटा, अब क्या तुम्हें समझाऊं, इस देश को चलाने के लिये बहुत कुछ सहन करना पड़ता है, कैसों कैसों का समर्थन लेना पड़ता है, न चाहते हुए भी बिना मन का बोलना पड़ता है, कांटों का ताज है यह कांटो का ताज.

- तो ठीक है आप कांटो का ताज पहनिये मैं चलता हूं..... ल्यौ गाने-बजाने की आवाजें भी आने लगीं, लगता है घर पर सिलिंडर आ गया है..... चलूं, जाने क्या-क्या गाये चले जा रहे हैं - सज रही गली मेरी सुन्हरी गोटे से....सज रही गली मेरी....

- सतीश पंचम

Saturday, September 22, 2012

ईसवी सन् 4012 की इतिहास की उत्तरपुस्तिका के अंश

     भारत में महिलाओं की राजनीतिक एंव सामाजिक स्थिति की सुदृढ़ता का पता इस बात से चलता है कि आज से दो हजार वर्ष पूर्व 21 सितंबर 2012 के दिन जब समूचा विश्व, शांति एंव समृद्धि हेतु विश्व शांति दिवस मना रहा था ठीक उसी दिन जुम्मे की नमाज के बाद बंगाल की एक शासिका ने अपने समस्त मंत्रियों को केवल अपनी एक आवाज में उनके पदों से इस्तीफा दिलवा दिया । यह घटना इस बात की तस्दीक करती है कि भारत में महिलाओं की स्थिति 2012 ई में गुप्तकाल और मौर्यकाल की अपेक्षा बहुत अच्छी थी। केवल इतना ही नहीं, एक शासिका ने तो अपने जीते जी अपने राज्य में मूर्तियां लगवाईं थी जिसके अवशेष अब भी यदा कदा कई स्थानों पर मिलते हैं। नखलऊ, जिसे पूर्व में लखनऊ कहा जाता था वहां से उस महिला की ढेरों मूर्तियां हाथ में पर्स लिये साबूत अवस्था में मिली हैं। इसके अलावा दक्षिण भारत में भी महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ थी। अभिलेखों में प्रमाण मिलता है कि जब जया नाम की महिला के यहां उसके विरोधियों ने छापेमारी करवाई तो उसके यहां से सैकड़ों जोड़े चप्पलों की प्राप्ति हुई जिससे पता चलता है कि दक्षिण भारत में महिलाओं के पहनावे में चप्पल पहनना तब तक शामिल हो गया था, लोग शौक से चप्पल पहनते थे।


( ईसवी सन् 4012 की इतिहास की उत्तरपुस्तिका के अंश :)

- सतीश पंचम

Wednesday, September 19, 2012

द ग्रेट इंडियन सिलेंडर गाथा



      इन दिनों रसोई गैस के सिलेंडरों हेतु बनाये सरकारी नियम को लेकर बड़ा हो-हल्ला मचा है. हर कोई कह रहा है कि सरकार द्वारा साल में केवल छह सिलेंडर सब्सिडाइज्ड रेट पर देना सातवें से लेकर आगे तक के सभी सिलेंडर अधिक दाम देने वाला नियम गलत है. भला ऐसे कैसे हो सकता है कि एक परिवार द्वारा केवल छह सिलिंडर ही साल में इस्तेमाल किया जाय. औसतन हर परिवार में महीने भर के लिये कम से कम एक सिलिंडर तो लगता ही है. इस बात पर हल्ला मचना था और मच भी रहा है. लोग समझ नहीं पा रहे कि कहीं सरकार साल को बारह महीनों से घटाकर छह महीनें में तो नहीं तब्दील करने जा रही. कई बड़े-बुजुर्ग इस आशंका से इन्कार भी नहीं कर रहे. उनका मानना है कि सरकारें पहले इस तरह के बदलाव करती रही हैं. मसलन जमीनों के एन्ड यूज के हिसाब से सरकारें किसी जमीन को योजना क्रमांक “झल्ला 1ओ” के तहत पट्टे पर देती है. लेकिन जैसे-जैसे आबंटित जमीन अपने एन्ड यूज से हटकर किसी अन्य यूज में तब्दील हो जाती है (मसलन स्कूल के लिये आबंटित जमीन मॉल में तब्दील हो जाय) तो सरकार उस जमीन को योजना क्रमांक “वल्ला 15 बी” से संलग्न कर देती है ताकि योजना की शुचिता बनी रहे.


      ऐसा ही कुछ कोयला आबंटन क्षेत्र में भी हुआ. कोयले की गुणवत्ता और उसके एन्ड यूज के हिसाब से जिस कोयले को बिजलीघर की भट्टी में जाना था वह कहीं और चला गया. यही वजह है कि भारत के फिल्मी गीतकार “झल्ला-वल्ला” जैसे प्रात: स्मरणीय गाने बनाते हैं जिनके बोल होते हैं, हमने समझा था गोल्डन जुबली जिसे, वो तो कोयला दिखाकर फुर्र हो गया, झल्ला-वल्ला.....झल्ला-वल्ला.

    किंतु सोचिये कि यही छह सिलेंडरों वाला नियम त्रेता युग में लागू होता तो क्या होता, पेट्रोल-डीजल के दाम तब बढ़े होते तो क्या होता. पता चले रावण कल से ही अपने पुष्पक विमान में ईंधन भरवा रहे हैं क्योंकि रात बारह बजे के बाद से मूल्यों में पांच रूपये की बढ़ोत्तरी होने जा रही है. इधर रावण पेट्रोल पंप पर ईंधन भरवा रहे थे, उधर उनकी बहन शूपर्णखा जंगल में राम-लक्ष्मण के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुँच गई. जिस समय शूपर्णखा पहुंची, लक्ष्मण कंधे पर खाली गैस सिलेंडर लेकर कहीं जा रहे थे और सीता जी अपने पति राम जी से बोल चिंता जता रहीं थी कि आखिर वे कैसे रसोई बनायें, साल में केवल छह सिलेंडर ही सब्सिडाईज्ड रेट पर मिल रहे हैं, सातवें के लिये अधिक दाम चुकाने पड़ रहे हैं. राम जी सीता की बात सुन चिंतित थे कि उसी समय शूपर्णखा पहुंची थी. राम जी ने लक्ष्मण को रोककर कहा – "लखन, शूपर्णखा विवाह प्रस्ताव लेकर आई है, क्या कहते हो" ?

लक्ष्मण जी ने चुपचाप कंधे से खाली सिलेंडर उतारते हुए कहा – "मैं भला इस राक्षसी से कैसे विवाह कर सकता हूँ. शक्ल देखी इसकी ?  कितनी भयावह है".

लक्ष्मण की बात सुन शूपर्णखा और खुश हुई. संभवत: इंसानों में खूबसूरती को लेकर जो सराहनीय भाव है वैसा ही कुछ भाव राक्षसों में बदसूरती को लेकर हो.  जो जितना ज्यादा बदसूरत वह उतना ही अच्छा राक्षस माना जाता हो. सुंदरता का पैमाना ठहरा. क्या किया जा सकता है. यहीं देख लिजिए, भारत में स्त्रियों के पतले होंठ सुंदरता के लक्षण माने जाते हैं तो अफ्रीका में मोटे होठों वाली महिलाएं सुंदर मानी जाती हैं।

      उधर शूपर्णखा अब भी टल नहीं रही थी. तभी राम जी ने अचानक आदेशात्मक स्वर में लक्ष्मण से कहा – "लक्ष्मण, तुम शूपर्णखा से विवाह कर लो और एक नई कुटिया भी छवा लो. इस तरह हमें नियमानुसार सातवां सिलेंडर सस्ते दामों पर मिलने लगेगा. अभी प्रति परिवार छह सिलेंडर ही मिल रहे हैं, तुम्हारा परिवार बनते ही सातवें सिलेंडर की गुंजाइश निकल आयेगी"

    राम जी की बात सुन शूपर्णखा जी बोलीं – "आप सिलेंडरों की चिंता मत करें, मेरे भाई रावण के पास गैस सिलेंडरों की एजेंसी है, जितने चाहिये उतने हर महीने भिजवा दिया करेगा".

    शूपर्णखा की बात सुन राम जी हर्षित तो हुए लेकिन लक्ष्मण जी को लगा कि कहीं शूपर्णखा बरगला तो नहीं रही, क्योंकि उन्होंने सुना था कि रावण भले ही धनवान हो लेकिन है बड़ा कंजूस. जो शख्स पेट्रोल के दाम बढ़ने की बात सुनकर पहले ही अपने पुष्पक में ईंधन भरवाने लगे वो भला क्योंकर अपनी बहन के लिये गैस सिलेंडर मुफ्त में देने लगा. बात यहीं आकर फंस गई और लक्ष्मण जी ने आव देखा न ताव फट से उसके नाक कान काट दिये. नतीजा आप सभी जानते ही हैं. राम-रावण युद्ध हुआ. यह युद्ध भी इतना आसान नहीं रहा. कई ऐसे प्रसंग आये जब रावण ने इस युद्ध और उससे जुड़े खर्चों को लेकर मन ही मन अफसोस किया था।  विशेषत: तब जब हनुमान जी की पूँछ में आग लगाई जानी थी. महल के सारे कपड़े जब हनुमान जी की पूँछ में लपेट दिये गये तब आग लगाने के लिये पेट्रोल की जरूरत पड़ी. रावण ठहरा एक नंबर का कंजूस. पेट्रोल यूं किसी की पूँछ जलाने हेतु इस्तेमाल करने में आनाकानी करने लगा. देर होने लगी. उधर हनुमान जी पूँछ बढ़ायें जायें इधर पेट्रोल के दाम भी बढ़ते जांय. अंत में किसी तरह रावण राजी हुए और इससे पहले कि दाम और बढ़ें फटाफट पेट्रोल छिड़ककर कम दामों में ही आग लगवा दी गई. आगे की कथा तो आप लोगों को पता ही है.

    उधर कई विद्वजनों का मानना है कि कुम्भकरण जान बूझकर छह महीने सोता था ताकि नियमानुसार साल में मिलने वाले छह सिलेंडरों के वक्त ही वह जगा रहे और खाने-बनाने में कोई परेशानी न हो. इस लिहाज से देखा जाय तो कुंभकरण जितना पत्नी का ख्याल रखने वाला पति मिलना दुर्लभ है जो केवल इस कारण साल के छह महीने सोता रहे ताकि उसकी पत्नी को रसोई गैस के छह सिलेंडरों की चिंता में न घुलना पड़े.

    उधर सुनने में आया कि रावण के नाना रावण से नाराज चल रहे थे कि सारा दिन मंदोदरी संग रावण शतरंज खेलते रहते हैं ये नहीं कि गैस सिलिंडरों की समय पर डिलिवरी का ध्यान रखें. इस तरह तो एजेंसी हाथ से निकल जायगी. पीढ़ियों का बना-बनाया मुकाम टूटते देर नहीं लगेगी. उधर विभीषण भी रावण से खफा चल रहे थे कि भईया रिटेल में एफडीआई को लेकर कुछ कर नहीं रहे. खुद तो लंका संभाल रहे हैं लेकिन हमारी रीटेल वाली गुमटीयों पर आसन्न खतरे से अनजान बने हैं. मेघनाथ से जब विभीषण ने अपने मन की बात कही तो मेघनाथ उल्टे विभीषण पर चढ़ बैठे कि "एफडीआईयां आती जाती रहती हैं. उनको लेकर ज्यादा चिंतित होना हमारे राक्षसकुल की परंपरा के खिलाफ है. जाईये, जाकर दुकान संभालिये, देखिये कोई ग्राहक कुछ लेने तो नहीं आया"।

     बहुत संभव है विभीषण इन्हीं सब से उकता कर पाला बदल लिये हों. उधर बैद्य सुषेण भी अपने जेनेरिक दवाओं को लेकर रावण की बेखयाली और काहिली से तंग आ गये थे. विदेशी पेटेंट पर पेटेंट किये जा रहे थे और रावण थे कि बस सारा दिन – "हम हैं लंकेश, हम हैं, हम लंकेश, हम ये....हम वो" जैसे आत्मतोषी अट्ठहासी गर्जन किये रहते थे. रावण की इन्हीं गर्जनाओं को सुनकर एक दिन कुंभकरण ने नींद से उठकर कहा था – "भईया से कहो शोर कम करें, मेरी नींद में खलल पड़ रहा है"।



लल्ला मुस्काय ल्यौ.......
क्योंकि टैक्स कराहटों पर लगता है, मुस्कराहटों पर नहीं :-) 

    खैर, ये सब तो चलता ही रहेगा.  सुनने में आया है कि सरकार रसोई गैस की छह सिलेंडर की सीमा पर नरमी बरतने का मन बना रही है. यदि ऐसा है तो अच्छा ही है. लक्ष्मण जी सातवें सिलेंडर के चक्कर में  शूपर्णखा से विवाह करने से बच जायेंगे, सीता जी को रसोई हेतु परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी,  राम जी की मर्यादा पुरूषोत्तम की छवि भी बनी रह जायेगी. वैसे भी छवियों का बनना बिगड़ना इस बात पर निर्भर रहता है कि आप पर नियम कायदे किस करवट बैठते हैं. यदि सक्षम होंगे तो नियम कायदों के तहत ही छह सिलेंडर में काम चला लेंगे अन्यथा ब्लैक में लेने पर मजबूर होंगे, तब अपनी शुचिता और नैतिकता को ताक पर रख  बैकडोर से सिलेंडर चाहेंगे, सोर्स सिफारिश लगायेंगे. जिससे साबित होता है कि किसी देश के लोगों की नैतिकता-आदर्श आदि को डिगाना या उठाना सरकारों पर निर्भर है. चाहें तो सरकारी नियम को इस तरह बनायें कि सभी को आदर्श और इमानदारी के साथ जीने की सुविधा मिले या फिर  इमानदारी को बालपोथी के तहत स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबों तक ही सीमित रख दें और प्रति सातवें सिलेंडर पर बच्चों के पिता को कांखते और गृहिणियों को रसोई मेन्यू में एडजस्टमेंट करते देखा जाय. वैसे भी जहां सरकारें 26 रूपये में गरीबी अमीरी का फासला तय कर सकती हैं वहां सिलेंडरों की संख्या छह करना भी एक एहसान समझिये.

- सतीश पंचम

Tuesday, September 18, 2012

वही इंद्रधनुष

      जीवन में ऐसा भी होता है कि किसी संग विवाह तय हुआ हो लेकिन कुछ कारणों से विवाह नहीं हो पाये. बाद में जब वही दोनों जन एक दूसरे को जाने-अनजाने मौका पड़ने पर सामने पड़ते हैं तो परिस्थितियां मन में कई अनजानी गांठे खोलती चलती हैं. उन्हीं बातों को लक्ष्य कर विवेकी राय जी ने एक कहानी लिखी.  पहले भी इस कहानी को कई बार पढ़ चुका हूँ लेकिन हर बार उसके नये नये Absracts सामने आ जाते हैं।  

       विवेकी राय जी, जिनके बारे में इतना बताना जरूरी है कि वे ग्राम्य जीवन के ऐसे रचेता हैं जो अपनी लेखनी के जरिए सब कुछ सामने लाकर धर देते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु जी के काल के लेखक सत्तासी वर्षीय वही विवेकी राय जी जिनके जीते जी ही उनके नाम पर सड़क भी है, विवेकी राय मार्ग – जो शायद भारत में एक हिंदी के लेखक के लिए प्रकट किए गये सम्मान के तौर पर नोबल पुरस्कार से कम नहीं है। इस कहानी से संबंधित बातें पहले भी पोस्ट में एक लिख चुका हूं. आज फिर से प्रस्तुत कर रहा हूं.

   प्रस्तुत कहानी वही इंद्रधनुष में एक शख्स है जिसका कि विवाह एक लड़की से पांच साल पहले होते होते रह गया……कारण जो भी रहे हों……लेकिन विवाह नहीं हुआ। बाद में उस लड़की का विवाह उसी शख्स के एक मित्र से हो गया। कुछ साल बाद किसी काम से वह शख्स अपने उसी मित्र के यहां आकर ठहरा जिससे कि उस लड़की का विवाह हुआ।


अब यहां इस शख्स के मन में आस पास की चीजों को देख एक अलग ही तरह के भाव आना जाना शुरू करते हैं …..वह सोचता है कि वह लड़की, वह स्त्री कहीं न कहीं से उसे ताक रही है…….एक तरह का उल्लास …… एक तरह का मनसायन……. कि इन्हीं से विवाह होते होते रह गया…..यही वह स्त्री थी जिससे विवाह होना था …..

इन्हीं सब बातों को बहुत खूबसूरती से दर्शाते हुए विवेकी राय जी लिखते हैं कि -
  
      पश्चिम ओर जिधर मुँह करके वह खड़ा था, ठीक उसके सामने एक बड़ा सा इन्द्रधनुष उग आया। उसे लगा, भीतर का इन्द्रधनुष बाहर कढ़कर टंग गया है। कहीं टूट नहीं, एकदम पूर्ण इन्द्रधनुष, आसमान की उंचाई को छूता हुआ, पूरे क्षितिज को घेरकर, सप्तरंगी निखार का तरल-ज्योति पथ।


    कोई सपना नहीं, कोई जादू नहीं, कल्पना नहीं, बिल्कुल ही सामने ……. नदी उस पार जिसे पकड़ा जा सकता है,ऐसा इन्द्रधनुष उग आया, बिना हल्ला गुल्ला किये।

   वह नदी भूल गया, नाव भूल गया। ……..पानी में खड़े खड़े चूड़ियों की खनखनाहट, मुक्त खिलखिलाहट और कंठवीणा के कुछ बोल गूंज गये। फिर एक बार गंगाजली प्रतिमा उसकी आँखों में लहरा गईं.
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   भोजन के लिए पीढ़े पर बैठा तो पीछे चुहान घर में, कोठिला के ओट के पीछे कुछेक क्षणों का समारोह हो गया और वही आर-पार का संग, लेकिन कितना जोरदार।


    वह कल ही वहाँ गया था। जरूरी काम था। नहीं तो भदवारी की शेष बीहड़ता में वह यात्रा नहीं करता। वहां पहुँचा तो अभी दिन था। दोस्त ने खूब खातिर की। उसे मालूम था कि ‘वह’ है और एक बड़ी थाली में उदारता के साथ भरकर ढेर सारी पकौड़ी आयी। तेल-मसाले में तर आम के अचार की एक बड़ी-सी सलगी फट्ठी और उसी तरह मिरचे का भी एक भीमकाय अचार। देख कर ही मारे मिठास के उसका मन भर गया।

वह उसके दोस्त की बीवी है। उसे वह अच्छी तरह जानता है। एकाध बार देखा भी है। खूबसूरती में जवाब नहीं, लम्बी, छरहरी, सोनगुड़िया। संयोग नहीं बैठा, कट गयी, नहीं तो उसकी शादी ‘उसी’ के साथ लगी थी। यह कोई चार-पांच साल पहले की बात है।

“थके होंगे ?" दोस्त ने पूछा था।

“बिल्कुल ही नहीं”। उसने जवाब दिया।


चित्र: मेरे निजी कलेक्शन से..

वास्तव में वह बहुत सुख अनुभव कर रहा था। दोस्त का वह गांव उस दिन बहुत हंसता लगता था। मित्र के दरवाजे पर रौनक बरस रही थी। मच्छरों के डर से ढेर-सी करसी एक जगह कोने में रखकर धुँआ कर दिया गया था। मोटा कड़ा धुआं गुम्मज बांधकर पहले तो बैठक में अंड़स गया और फिर बाहर फैलने लगा। बैलों का सारीघर बैठक से लगा था। उसमें भी धुआं भरा था और उसी बीच खिला-पिलाकर हटाये गये बैल आँख मूंदकर जुगाली कर रहे थे। उधर से धुएं से मिल एक अजीब-सी गीली-गुमसाइन गोबरही गंध बैठक में आ रही थी। मगर यह धुआं और गंध जब भी उसके नथुने पर धक्का देतीं, फिसल जातीं और वह कैसे आराम से बीड़ी दगाये पड़ा था।

इन सब बातों को याद करने में भी एक सुख था मगर सामने सवाल था नदी पार जाने का, नाव का। उस पार वाले आदमी ने स्वर उंचा कर पूछा, “अरे भाई, नाव का कहीं पता है ? ”

बस कहीं से आती होगी। उसने उत्तर दिया।

और कहीं नहीं आई तो ?

इस तो का उत्तर उसके पास नहीं था। …..……

    उसके दोस्त ने रात में भोजन के लिए जगाया तो उसे रोमांच हो आया। हवेली में घुसते उसे लगा कि हर चीज पर उसके आने की छाप है, दालान में एक अतिरिक्त चिराग रखा गया है। नये सिरे से झाडू लगा है। आंगन में जिस ओर पानी गिरता है, हाथ लगा दिया गया है ( पानी निकाल दिया गया है ) और बहुत साफ लग रहा है। एक ओर आंगन में एक जोड़ी खड़ाऊँ गुनगुने पानी के साथ रखा है। अनावश्यक चीजें हटा दी गई हैं।

     पैर धोते-धोते उसका मन एक जोड़ी आँखों पर अटका रहा। किसी न किसी ओर से निशाना बांधा गया होगा। चौके में आते-आते तो वह जैसे एकदम उड़ रहा था। चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी (लीपन-पोतन) जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी। पीढ़ा भी धो-पोंछकर साफ किया गया लगता था। लोटा-गिलास चमचम।

    पीढ़े पर बैठते ही साड़ी की खरखराहट, चूड़ियों की खनक और कुछ सांय से (धीमे से) कही गयी बात की आहट पीछे कोठिले की ओट से मिली। इसी बीच परसी-गई थाली दोस्त ने सामने कर दी। सोनाचूर की सुवास से तबीयत भर गई।

“आप भी बैठ जाइये न !” उसने कहा।

   संकोच झाड़कर अब उसके दोस्त भी एक पीढ़ा खींच बगल में कुछ उधर हटकर इस तरह बैठ गये कि आवश्यकता पड़ने पर चीजें भीतर से बाएं हाथ सरकाया करेंगे।

     लक्ष्मीनारायण हुआ और दो-दो हाथ शुरू ही हुआ था कि भीतर से ‘हाय राम’ फिर एक खिलखिलाहट और फिर ‘घी तो आग पर ही रह गया’, बहुत धीमें पर साफ सुनाई पड़ा। उसने जिन्दगी में पहली बार कोयल की आवाज सुनी थी। एक जिंदा रस।

   “तब यहां कौन तुम्हारा लजारू है, उठकर दे दो।" उसके दोस्त ने कहा। और जो आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

    न हाथ-पैर बजा, न शोर-हंगामा और एक घटना घट गई। दोस्त की बीवी ने नीले पाढ़ की चेक डिजाइन वाली हलके गुलाबी रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी। उसे यह रंग बहुत पसंद है। नीला और गुलाबी : विस्वास और भाव। उसने मन ही मन सोचा – अबकी धान उतरा तो ऐसी ही एक साड़ी अपनी बीवी के लिए खरीदेगा।

    भोजन समाप्त कर अंचवते-अंचवते वह एक निर्णयात्मक शब्दावली पर पहुंच चुका था – इंद्रधनुष में लिपटा चम्पा का ताजा फूल।

    इन्हीं सब विचारों से आलोड़ित वह कब सो गया पता ही न चला। अगले दिन कब वह दोस्त से विदा मांग बीहड़ बरसाती मंजिल तय कर वह नदी पर आ गया, यह भी पता न चल सका।
पछिवा हवा सिसकारी दे रही थी और हल्की ठंडक गुदगुदा रही थी। सवेरे ही सवेरे देव घिर आये। झींसी पड़ने लगी। वह कपड़ो को गीला कर देने के लिए काफी थी। उसने छाता तान लिया।

     उस पार तीन स्त्रियां थीं और एक पुरूष। ये लोग भी उसी की तरह प्रतीक्षातुर थे। नदी बहुत चौड़े पाट की नहीं थी, परंतु इस पार और उस पार में अंतर तो था ही। वक्त गुजारने के लिए उस पार वालों से बातचीत करना भी कठिन था। उसने देखा उस पार वालो के पास छाता नहीं है। पुरूष बेचैनी से नाव के लिए इधर-उधर ताक-झांक कर रहा है। उसे फुहार की तनिक परवाह नहीं है। वह साधारण कुर्ते धोती में एक किसान लग रहा है।

      अचानक वह चौंक उठा। वह स्त्री किसी काम से उठ गई तो उसकी आड़ में बैठी स्त्री की झलक साफ हो गई। वही चेक-डिजाइन, वही गुलाबी रंग, वही इंद्रधनुष, इंद्रधनुष के भीतर इंद्रधनुष, लेकिन यह दूसरा (इंद्रधनुष ) गठरी की तरह क्यों सिकुड़ा, धरती में गड़ा जैसा अतिसंकुचित क्यों। इसके भी कोमल कलाइयां होंगी, कलाइयों में चूड़ियां होंगी और चूड़ियों में खनक होगी। लेकिन वैसी खनक यहां कहां। वह तो पीछे दूर छूट गई, बहूत दूर जहाँ के धुले बागों के पत्तों में अजब सी तेज गाढ़ी हरियाली है, जहां की माटी में सुवास है। वह एक बार फिर गहरे में डूब गया और क्षण भर बाद वापस आया तो फिर वही मनहूस पानी।

      लेकिन अबकी बार उसे लगा कि यह नदी का पानी नहीं, सड़क है। सड़क की इस पटरी पर वह खड़ा है और उस पटरी पर एक सजीला समारोह है, जिसमें इंद्रधनुष के विशाल फाटक से होकर जाना है। रंगारंग ज्योति के ये दो सप्तरंगी खंभे गोल घेरा बनाते हुए आसमान में उठते-उठते पूरी उंचाई पर जाकर मिल गये हैं। अमरावती का फाटक, गोलोक का सिंहद्वार कि बैकुंठ की पवित्र पौर है ?

    उसने देखा इंद्रधनुष के फाटक के भीतर वह किसान बौने की तरह लग रहा है। वह बबूल का पेड़ एक मामूली झाड़ी की तरह लग रहा है। दूर-दूर के बगीचे मरकत प्राचीर की तरह लग रहे हैं। और वह नारी ? विशाल, गोल, रंगों के झिलमिल मेहराबी मंडप के बीच इंगुरौटी ( लकड़ी की पतली-लंबी सिंदूरदानी) की तरह लुढ़की है। कौन लूट रहा है कि लाज का ऐसा बचाव ? इंद्रधनुष धरती में धंस क्यों जाय ? पानी में खड़ा होकर वास्तव में उसका मछुआ मन दो पारदर्शी चंचल मछलियों की झलक के लिए छटपटा उठा।

    उसके मन में एक बात आयी मगर अपनी मूर्खता पर स्वंय हंस पड़ा। साड़ी की तरह साड़ी होती है, रंग की तरह रंग होता है और औरत की तरह औरत होती है। उस इंद्रधनुष को देखा और अब वह इसे भी देख लेगा, उसके भीतर से, उस फाटक से होकर गुजरेगा, दुनिया का एक खुशकिस्मत इंसान, लेकिन यह पानी ? इतनी देर बाद पहली बार वह क्षुब्ध हुआ।

          पानी चुपचाप बह रहा था। धरती पर सरकती यह चंचल धारा और आसमान में उभर आयी क्षणजीवी विविध रंगों की अचंचल मणि-मेखला ! उसने जोर से सोचा, उसे इसी दम उस पार जाना है। समय चूक न जाय।

            इंद्रधनुष आसमान में उसी-गम्भीर आवाज से छाया था। बल्कि उसके ठीक समानांतर उपर से एक और पतली धार की तरह हलके-हलके उभर आया । नीचे चेक डिजाइन और गुलाबी रंग का रहस्य उसी प्रकार अनखुला था। नाव उसी प्रकार लापता थी। अथाह पानी उसी प्रकार सामने लहरा रहा था। सब वही था, मगर कहीं कुछ जरूर बदल गया था। उसने बंडी और चादर लपेटकर सिर पर रखा। उसके उपर छाता, धोती से कसकर बांध, लंगोट पहने पानी में उतर गया और दो हाथ चलाया कि दूसरे किनारे की माटी मिल गई, लेकिन उसे सख्त अफ़सोस हुआ कि इंद्रधनुष सच्चाई नहीं है।

- विवेकी राय

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 तो ये थी कहानी ‘वही इंद्रधनुष’ । इसमें कितना अमूर्त है, Abstract है, यह शायद हर पाठक के लिए अलग अलग पैमाने पर होगा, लेकिन मेरे हिसाब से प्रस्फुटित तौर पर इस कहानी का Abstractism कहीं कहीं प्रखर हो उठा है जो शायद आप लोगों ने पढ़ते समय महसूस भी किया हो,

     जैसे, दाल में घी छोड़ने के समय .......आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

     इसी तरह एक जगह लेखक कहते हैं - चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी।

-  सतीश पंचम

साभार – 'कालातीत' ( पराग प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली)

लेखक – विवेकी राय

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