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Wednesday, July 25, 2012

मनजौकी भौजी और गुछून परसाद

    जैसा कि माना जाता है हर गाँव में कुछ औरतें तुनकमिजाज होती हैं, कुछ मरद 'छुटूआ' होते हैं, कुछ छुटूआ होकर भी रंगीले होते हैं, कुछ ऐसी ही गुण-लच्छनों से सुसज्जित बाशिंदे बमचकपुर गाँव में भी हैं। इनमें से कुछ सदगृहस्थ हैं तो कुछ का जब से विवाह हुआ है तभी से अपनी पत्नी के साथ 'ठकठेवन' चला आ रहा है । कभी-कभी इनकी आपसी बैठकी पेड़ के नीचे तो कभी खेत कियारी में, बाजार, मड़ैया में चलती रहती है। आज शाम गुछून परसाद और मंगर मउरिया की बैठकी चली है, गुछून परसाद,  जिनकी पत्नी विवाहोपरांत कुछ समय बाद ही अपने मायके चली गईं और पिछले तीन साल से ससुराल आने से मना कर रही है. गुछून अपनी मड़ैया में बैठे सरपत और अरहर के सींके निहार रहे थे कि तभी मंगर मउरिया आ पहुँचे, मंगर..... जिनके बारे में विदित है कि वे जब किसी से मिलते हैं तो उसके ही होकर बतियाते हैं, नतीजतन कई लोगों के मन के अंदर घुसकर वे टोह ले लेते हैं। फिलहाल गुछून परसाद के मोबाइल में पूर्वी उत्तर प्रदेश का धोबीयवा गीत चल रहा है....
“हाय रे घूघूटवा वाली
लेत बाड़ू आल्हर परान
हाय रे घूघूटवा वाली
लेत बाड़ू आल्हर परान....”


(हाय रे घूँघट वाली, तुम मेरे प्राण हर ले रही हो.....)



“क्यों गुछून, किसका घूँघट निहार रहे हो सबेरे-सबेरे” ?

“अरे किसका निहारूगां भाई इस उमिर में”

“तब क्या अजोर किये हो” ?

“ये, अरे ये.....ये तो मोबाइलवा में भरा कर लाये हैं रतऊ जी”

“कौन रतऊ जी वो जो आपके ममेरे भाई” ?

“हां वही लाये हैं बाजार से नन्हे की दुकान से गाना भरा कर, मैं तो सुनता नहीं, कभी-कभार सुन लेता हूं तो मनसायन हो जाता है”

“बढ़िया मनसायन करे हो, अ तनि आवाज तेज करो तो”

.....हो रे घूघूटवा वाली,
लेत बाड़ू आल्हर परान...
हो रे घूघूटवा....

“घूघूट से परान हर उठते हैं क्या गुछून” ?

“परान उसी में बसे हैं मंगर भाय”

“अरे तो लेवा क्यों नहीं लाते मनजौकी  भौजी को” ?

“लेवा तो लाऊं लेकिन आये तब न, कई बार सनेसा भेजा, कई बार पंचाइत बोलाया, भाई-भउजाई का किरिया धराया, क्या नहीं किया लेकिन मनजौकीया माने तब न”

“अच्छा एक बात पूछूंगा, सच्च सच्च बताना”

“पूछो”

“मनजौकी भौजी को तुमने मारा था गौने की रात” ?

“अब पुरानी बात क्यों उभार रहे हो मंगर”

“देखो बात न घुमाओ, यहीं तुम भी हो, यहीं मैं भी हूं, छोटे से बड़े हुए हैं हम लोग, बहुत कुछ एक दूसरे के बारे में जानते बूझते हैं, और किसी से न सही, कम से कम संगी-साथी से तो कह सकते हो”

“क्या कहूं” ?

“वही, क्यों मारे थे गौने वाली रात” ?

....

....

“चुप क्यों हो” ?

“मुझसे कही थी कि....”

...

“कुछ बोलोगे भी” ?

“कसम खाओ किसी से नहीं कहोगे”

“यही हाथ में बीड़ी है औ जरत चेनगारी है जो किसी से कहूँ”

“हम से कही थी कि....जो करना हो करके जाओ”

“तब” ?

“तब क्या...गुस्सा नहीं आयेगा” ?

“तब इतनी सी बात पर मार दिये” ?

“तुम इसे इतनी सी बात कहते हो मंगर” ?

“अरे यार रह गये लंठ के लंठ......नई नवेली थी, मुंह से निकर गया होगा”

“अरे तो ये कौन सी बात हुई कि जो करना हो करके जाओ” ?

“अब सुबह से आई थी, भूखी पियासी होगी, थकी मानी होगी, एक तो दूसरा घर तिसपर पराया मरद...तो बोल दी होगी”

“अरे तो ये कौन सी बात है.....कि...” ?

“फिर वही बात...”

“तो क्या उतनी सी बात को दिल से लगा लेगी......कि जब मन आये तब चार मनई के बीच कह देगी कि गौने की रात हमको मारे थे”

“जी में गुस्सा होगा तो कह देती होगी”

“ऐसा तो गुस्सा ही नहीं देखा कि जिनगी भर गौने वाला ठकठेवन ढोती रहे”

“बटलोईया जात.....इसी तरह जिनगी भर ढोती है भाई, हम आप बाहर-बाहर मिलते हैं, बाताचीती मे्ं भुला देंगे कोई बात होगी तो लेकिन उनके तो संसार-ब्यौहार में ससुराल, मायका, ननद, भौजाई का ठकठेवन लगा रहता है। ढोयें न तो क्या करें” ?

“लेकिन एक बात बताओ मंगर” ?

“पूछो”

“वही बात कहनाम है कि जब मैं तैयार हूँ मनजौकी को लिवा लाने के लिये, उसे मान सम्मान देने के लिये हाजिर-नाजिर हूँ तब क्या बात है कि वो आना नहीं चाहती” ?

“कैसे मैं बताऊँ...वो सिर्फ तुम बता सकते हो या मनजौकी भौजी”

“भेंट करवा सकते हो” ?

“मैं” ?

“हां तुम ही...करवा सकते हो मेरी भेंट”

“अरे तो तुम्हारी औरत है, चले जाओ ससुराल, कर लो भेंट, इसमें इतना क्या सोचना”

“यही तो बात है मंगर, मैं खुलकर ससुराल वालों के सामने नहीं जाना चाहता, अकेले में मनजौकीया से मिलना चाहता हूँ”

“ये भी कोई बात हुई, अरे जाओ भाई, इस तरह जिदियाने से काम थोड़ी चलेगा....जैसे सब पर-पंचाइत कर लिये, तो जाओ एक बार वह भी मन मारकर भेंट-गाँठ कर लो, क्या पता इस तरह सामने पाकर मन पिघल जाय”

“उसका मन पिघलेगा भला, मैं जानता हूँ उस भतारकाटी को”

“फिर वही बात ? औरतों वाली गाली मत दो, कितना भी करोध हो, मन सांत करके चले जाओ, मिल आओ”

“तुम चलोगे” ?

“मैं...मैं क्या करूंगा जाकर...अरे ससुराल तुम्हारी, औरत तुम्हारी, मैं क्यों जाऊं तेली का तीसर औ बनिया का नौकर बनकर”

“अरे चले चलना, ससुराल में तुम्हारी अच्छी खातिर करवाऊंगा”

“अरे यार तुम बड़े अजीब मनई लग रहे हो, सीधे-सीधे चुप मारके ससुराल चले नहीं जाते, संग-साथ ढूँढ रहे हो कि चले कोई”

“नहीं मंगर, मन में धुकधुकी लगी है, मन पंछिया रहा है”

“अरे यार बात अइसे कह रहे हो जैसे चोरी से किसी और की औरत से मिलने जा रहे हो”

“तुम नहीं जानोगे मंगर, मुझे मनजौकीया ने भले छोड़ रखा हो लेकिन ससुराल में मेरी अभी भी बहुत इज्जत है, राह-घाट कभी ससुराल पच्छ का कोई मिलता है तो बड़े परेम औ अदब से मिलता है”

“तो कह देते उन लोगों से कि हमारी औरतिया को पहुँचा दो, परेम-अदब तो चलतै रहेगा”

“कहा था, लेकिन ओ लोग भी मन गिराकर कहे कि मनजौकी के मन में कोई फांस अटकी है, बहुत कहा जाता है लेकिन आना नहीं चाहती”

“तो मेरी बात मान ल्यौ गुछून, जाओ मिठाई की झाँपी लेकर, टटकी नील से कुरता धोती रंगा लेना और चमचमाते हुए पहुँच जाओ...देखना अगर मनजौकी भौजी के मन में पिरित होगी तो आँख से लोर गिरा देगी, न हुमस के गले लग जाए तो कहना.....उस बखत तुम मुझे याद करोगे देख लेना”

“धुत्.... जब औरतिया गले लगेगी तब ससुर हम तुमको ईयाद करेंगे....खोपड़ीया खाली है क्या मेरी....” ?

“अरे मैं तो बस एक बात कह रहा था”

“बात कहो या न कहो लेकिन पक्का बताओ, तुम्हारा मन क्या कहता है, मनजौकी मुझे निरास तो नहीं करेगी” ?

“नहीं करेगी भाई, बात मानो, चले जाओ चमरौंधा जूता पहन कर, औ हां, दाढ़ी बनवा लेना न जब अकवार में भरोगे तो दाढ़ी  चुभेगी........”

"तुम बदमासी बोले बिना न मानोगे"

"बदमासी की छोड़ो.....पता जरूर कर लेना कि भौजी के मन में कौन सी फांस है जो यहां आने से रोक रही है......और झांपी भर मिठाई ले जाना मत भूलना "

      और  मंगर मउरिया  बीड़ी फूंकते उठ बैठे.......जबकि गुछून परसाद अपने मुंह पर हाथ फेरते हुए सोच रहे थे  - मोजम्मिल नाऊ 'छूड़ा-कतन्नी' लिये किस ओर भेटाएंगे........  


(जारी......)

- सतीश पंचम

( चित्र : मेरे फोटोग्राफी कलेक्शन से )

Sunday, July 22, 2012

चलो ड्राईवर

 साफ़-सुथरी  फिल्म "चलो ड्राईवर" को देखते हुए कई बार महसूस हुआ कि कहीं कोई टेलि-फिल्म तो नहीं दिखाया जा रहा ? और यह अहसास होना लाजिमी भी है क्योंकि सेटअप कुछ-कुछ वैसा ही नजर आया। वही दूरदर्शन वाले दुपहरीया प्रोग्रामों की तरह एक कमरा, दो सहेलियों की बतकही, एक को कुछ अलग करने का सपना। कुल मिलाकर कहानी कुछ यही है कि एक लड़की तान्या (कैनाज़ मोतीवाला) जिसे कुछ अलग करना है अपने जीवन में, वह ड्राईवरों के लिये निकली वेकेंसी देख पहुंच जाती है एक युवा बिजनेस टायकुन अर्जुन कपूर (विक्रांत महाजन) के ऑफिस। वहां भेंट होती है उस युवा बिजनेसमैन के दादा (प्रेम चोपड़ा) से। वहां दादा और पोते के बीच लगी एक शर्त के चलते वह लेडी ड्राईवर रख ली जाती है।


   दादा चाहता है कि पोता अर्जुन अपना नकचढ़ापन थोड़ा कम करे, बार-बार ड्राईवर बदलने की फ़ितरत से बाज आये वहीं पोता चाहता है कि ड्राईवर उसके मन माफिक होना चाहिये वरना बीच रास्ते में उसे उतार कर गाड़ी की चाभी ले लेगा। इन्हीं सारी बातों के बीच कहानी आगे बढ़ती है। शुरू-शुरू में महिला लेडी ड्राईवर को शर्त की आड़ में अर्जुन तान्या को परेशान करना चाहता है ताकि वह खुद ही नौकरी छोड़ दे और यह अपने दादा से लगी शर्त जीत जाय लेकिन रहते-रहते कुछ-कुछ नरम पड़ना शुरू हो जाता है। इसी बीच जो लेडी ड्राईवर बनी है वह अपने मालिक की बात-बात पर शर्त लगाने की फितरत को ताड़ लेती है और उसे उसके ही झांसे में फंसा कर अपने मामा-मामी को कार में घुमाने की शर्त लगवा लेती है। फिर तो वही होना है जो अक्सर ऐसी फिल्मी शर्तों में होता है। अब ड्राईवर के रूप में अर्जुन है और पिछली सीट पर सवारी के रूप में तान्या। कहानी में हल्के फुल्के क्षण तब आने लगते हैं जब लड़की के मामा के रूप में मनोज पाहवा की एंट्री होती है। मनोज अपनी एक्टिंग और चुटीले संवादों से इस फिल्म में कुछ-कुछ हास्य के क्षण बनाने में कामयाब रहे विशेषकर दिल्ली वाली स्टाईल में ड्राईवर पर तंज कसते हुए जब वे कार में बैठे बैठे शेखी बघारते हैं याकि अपनी पत्नी को लेकर छेड़छाड़ या फिकरे जैसा कुछ कसते हैं किंतु अंत आते-आते उन्हें भी झेलना मुश्किल हो गया है।

     फिल्म की स्टारकास्ट के लिये इतना ही कहना ठीक रहेगा कि – चलो ड्राईवर कहानी के लेखक विक्रांत महाजन खुद की लिखी कहानी पर एक्टिंग करने का मोह शायद छोड़ नहीं पाये और फिल्म हल्की पड़ गई। अर्जुन कपूर बनकर फिल्म में एक मुख्य किरदार निभाने वाले विक्रांत महाजन कहीं से भी बिजनेसमेन नजर नहीं आये।  ऐसे में जबकि जरूरत थी कि क्लोज शॉट से बचते हुए किसी और को बिजनेसमैन अर्जुन कपूर के रूप में दिखाये जाने की, विक्रांत महाजन ने खुद को ही कैमरे के आगे रख सारा मामला भंडुल कर दिया। फिल्म का संगीत साधारण है।

     खैर, फिल्म देखने तभी जांय जब लगे कि टेली-फिल्म जैसा कुछ देखने का मन है या दुपहरीया वाले दूरदर्शन सीरियल्स जैसा कुछ साफ-सुथरा देखने की तमन्ना है। हां,  इन दिनों जहां पुराने दिग्गज कलाकार एक-एक कर हमसे बिछड़ रहे हैं ऐसे में प्रेम चोपड़ा का इस तरह स्क्रीन पर दिखना एक सुखद एहसास दे जाता है।

- सतीश पंचम

Wednesday, July 18, 2012

......

      वह राजेश खन्ना की अदाकारी का ही जलवा था कि अभी कुछ दिनों पहले आनंद फिल्म देख रहा था और साथ ही साथ भोजन भी चल रहा था। आनंद के प्राण त्यागने वाले सीन के बाद भोजन गले से नीचे नहीं उतरा, थाली सरका दी और मुंह-हाथ धोने वाश बेसिन की ओर चल पड़ा। 
 पीछे से बेटी को कहते सुना  "पापा लगता है बहुत बड़े फ़ैन हैं राजेश खन्ना के"।

    शायद बेटी को नहीं पता कि उसके पापा अभी दो साल पहले ही उसकी मम्मी के साथ मुंबई के रीगल सिनेमा में आराधना फ़िल्म देखने गये थे। शो जब छूटा तो आखरी लोकल ट्रेन जा चुकी थी और हम  दोनों सड़कों पर टहलते हुए फिल्म पर बतिया रहे थे , टैक्सी वाला आकर सामने खड़ा हुआ - "कहां जाना है साहब" ? 

और मैं कह बैठा - "ले चलो जिधर तुम्हारा मन करे".

   वो तो श्रीमती जी थीं, जो संभाल ले गईं  "घर पर बच्चे इंतजार कर रहे होंगे और इधर आप राजेश खन्ना हुए जा रहे हैं"।

अलविदा राजेश जी, अलविदा।

- सतीश पंचम

Sunday, July 15, 2012

धुन्ध भरी सुर्खी.....

    इसे मैंने हाल ही में फेसबुक पर शेयर किया था  बुक लवर्स ग्रुप के अंतर्गत जिसमें कि किताबों को पसंद करने वाले लोग जुड़ते हैं। वहां शेयर करने के बाद लगा कि इसे ब्लॉग पर भी होना चाहिये इसलिये यहां भी शेयर कर रहा हूं। वैसे हाल-फिलहाल का देख रहा हूं कि पहले मैं ब्लॉग पर लिखने के बाद ही पोस्टों को फेसबुक पर शेयर करता था लेकिन आजकल उल्टा हो गया है। फेसबुक पर पहले लिख लेता हूं फिर ब्लॉग पर शेयर करता हूं.......लगे हाथ इस बदलाव का भी जायजा ले लूं  :-)

 खैर, आप भी नोश फरमायें उस फेसबुकिया स्टेटस का बजरिये - Book Lovers Group (BLG)

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   आजकल गोविंद मिश्र की कृति धुंध भरी सुर्खी का पठन-पाठन चल रहा है जो कि मूलत गोविंद मिश्र जी के लंदन यात्रा पर लिखा ट्रैवलॉग है। इस ट्रैवलॉग के कुछ हिस्से बेहद दिलचस्प हैं। 1979 के संस्करण में उनके लिखे एक वाकये पर मेरी नजर टंग गई जिसमें उन्होंने ब्रिटेन में हुई एक लेखकों की चिलगोजई गोष्ठी के बारे में लिखा था। उसे पढ़ते हुए लगा कि 1979 से 2012 के बीच के इन 34 वर्षों में भले दुनिया कितनी भी बदल गई हो, ब्लॉग आ गये हों, फेसबुक ट्वीटर आ गये हों, लेकिन लेखकीय चिलगोजइयां अब भी जस की तस चलती हैं। तनिक उनके लिखे उन पन्नों का जायजा लें। गोविंद जी लिखते हैं -


         मुझे देखकर क्लेटन ने “हैलो गबिंद” कहा और मुझे एक लड़की की बगल में बैठने का इशारा किया – शी इज आलसो अ विजिटर। मुझे हलकी सी हैरत हुई जैसे मैं गोष्ठी में शामिल होने नहीं बल्कि कोई तमाशा देखने आया था और दर्शकों के कोने में बैठा दिया गया था। मैं सोचता था कि वह उपस्थित लोगों से मेरा परिचय करायेगी, लेकिन मैं मात्र एक दर्शक था। लड़की और मैं फुसफुसाहट में बात करने लगे कि क्लेटन ने कुछ स्कूल मास्टरनी की तरह हमें चुप रहने का इशारा किया – “वी आर डिस्कसिंग अ वेरी इंपोर्टेंट इशू, यू नो” ?

           मैं दत्तचित्त होकर सुनने लगा। वे एक संग्रह छापने की बातचीत कर रहे थे – कविताएं फलां तारीख तक कमेटी ऑफ एडिटर्स के सामने हों, इस तारीख तक प्रेस में जायें और इस तारीख तक छप जायें – ये सब बातें तो थी हीं, कौन टाइप करेगा, कौन स्टैपल करेगा ये बातें भी हो रही थीं। सारा वातावरण इतना औपचारिक और गंभीर था कि मुझे तकलीफ महसूस होने लगी। मजा यह था कि ज्यादातर निर्णय क्लेटन खुद ले रही थी और बाकी लोगों को तामील के लिये सुना रही थी। फैसले वह नोट भी करती जाती थी क्योंकि कार्यवृत्त के रूप में उन सदस्यों के पास भी भेजना था जो मौजूद नहीं थे।


    इतना समझ में आ रहा था कि वे अपनी ही मेहनत और पैसे से कोई संग्रह निकालने वाले थे। बचत के खयाल से टाइप और स्टैपल करने का काम भी खुद ही करना चाहते थे। एक दूसरी बात जो मैंने और मौकों पर भी गौर की थी वह थी अंग्रेजों की छोटे से छोटे ब्यौरे में जाने की बात। ये लोग एक-एक ब्यौरे को पहले से ही तय कर लेते हैं और इसीलिए चाहे वह प्रशासन में हों चाहे किसी और जगह, जहां भी किसी सिस्टम या प्रक्रिया का बयान मिलेगा तो उसमें छोटे-से-छोटे डिटेल के लिए भी कोई न कोई गाइड-लाइन तय की हुई मिलेगी।


   मैं काफी ऊब रहा था। मेरे पास बैठी हुई लड़की भी बोर हो रही थी। वह बी.ए. की छात्रा थी और साहित्य में शौक की वजह से मेरी ही तरह पहली बार यहां के सर्किल में आयी थी। काफी निराश थी कि यहां आलपिन और स्टेपल की बातें चल रही थीं। हम कागज पर लिख-लिखकर एक दूसरे से बातें कर रहे थे।


    मुझे अपने देश की ब्यूरोक्रेसी याद आयी। मेरे सामने वह देश था, जिसने हमारे ऊपर यह ब्यूरोक्रेसी लादी थी। क्लेटन अपने घर में एक छोटा-मोटा दफ्तर खोले बैठी थी।


  मुझे प्यास महसूस हुई। आदतन उठ कर मैं खुद ही चला जाता और ढूँढकर पानी ले आता, लेकिन अब मैं सजग हो गया था। बगल की महिला से कहा, उसने किसी औऱ से और उसने क्लेटन से कहा। क्लेटन कुछ तंग-सी होती हुई उठी और एक गिलास किचन से पानी लाकर मुझे थमा दिया – और फिर अपने पोज में आ गई।


      तभी हमें एक फार्म भरने को दिया गया, टाइप किया हुआ। उसमें हमें नाम, पता वगैरह भरना था। कोई डेढ़ घंटे बाद साहित्य का नंबर आया। माहौल सारा कुछ वही रहा, सिर्फ क्लेटन ने पहली चर्चा के कागज़ एक तरफ सरका दिये। उसी ने आज की मीटिंग का अध्यक्ष बताया। अध्यक्ष वही सज्जन थे जो मुझे नीचे से लिवा लाये थे – मिस्टर फ्रैंक। अध्यक्ष ने जायजा लिया- “आज पढ़ने की कितनी चीजें हैं। एक लेख और कुछ कवितायें। आज क्या पढ़ा जाय” ? क्लेटन का सुझाव था- लेख। लेख अध्यक्ष का था ‘आयरिश लोक-धुनें’। फ्रैंक पढ़ने लगे। उदाहरण देते समय टेप-रिकार्डर का इस्तेमाल करते थे। इस बीच क्लेटन रजिस्टर में कुछ भरने में लगी हुई थी, शायद हमारे भरे हुए फार्मों को वहां उतार रही थी।


      लेख अच्छा था, यों कि उसको तैयार करने में काफ़ी मेहनत की गई थी। लेकिन बहस में ये बातें ज्यादा हुई कि लेख को इतवार के रेडियो में दिया जा सकता है या अमुक पत्रिका में छपाया जा सकता है। बहस के बीच में ही क्लेटन कागज पर लिखने लगी – कौन चाय लेगा, कौन कॉफी और कौन स्कवाश। वहां अब तक उपस्थित आदमी दस ही थे। लेकिन उसने बाकायदा कागज पर हिसाब लगाकर चाय, कॉफी, स्कवाश- फिर उनके भेद-विभेद, बगैर चीनी की चाय, नींबू की चाय, दूध की चाय, चीनी का स्कवाश – यह सब लिखा और फिर पर्चे को लेकर किचन में चली गई। मैंने दूर से देखा कि वह पर्चे को सामने रखकर सोचती हुई सारी चीजें तैयार करने में लगी हुई थी।


             एक सज्जन ने कविता पढ़ी – “विंड बिफ़ोर द रेन”. वड्सवर्थियन कविता थी। मैंने इस बीच सामने के तीन-चार लोगों से अपना परिचय दे डाला और कहा कि मैं उनके बारे में भी जानना चाहता हूँ। जिस कवि ने कविता पढ़ी थी उसने सुझाया कि इस बारे में मुझे क्लेटन से बात करनी चाहिए।


      मुझे यह साहित्यकारों का गिरोह कम, लड़कों का स्कूल ज्यादा लगा - जो सिर्फ एक ही मुंह से बोलता और सुनता था। क्लेटन स्वंय एक साहित्यकार नहीं, एक पत्रकार थी – किस स्तर की, मुझे पता नहीं लेकिन शायद यहां लेखक उसे कहते हैं जो छपता है और कुछ भी लिखता है। यह भी दिखाई दे गया कि क्लेटन बहुत ही डोमिनेटिंग महिला थी – वह टाइप जो हर व्यक्ति को पहली मुलाकात से ही वैसे ही हांकने लगती है जैसे अपने पति को हांकती है। यह भी समझ आया कि वहां इकट्टे सभी लेखकों और कवियों की महत्वाकांक्षा प्रोफ़ेशन राइटर बनने की थी। प्रोफ़ेशनल राइटर का यहां मतलब है वह लेखक जो धड़ाधड़ पत्रिकाओं में छपता है और लेखों से खूब पैसे कमा सकता है – इसके लिये वह कुछ भी और किसी भी स्तर के लेखन के लिये तैयार होता है. हमारे यहां विशुद्ध और व्यवसायिक लेखन के बीच अब भी एक रेखा है – चाहे कितनी ही बारीक क्यों न हो पर जो अब भी साफ-सुथरी है – यहां वह नदारद है। फ्रैंक की एक-आध चीजें छपी थीं। जिनकी किताबें निकली थीं उनमें सिर्फ एक जॉन थे। उनका उपन्यास हाउस ऑफ हेट हाल ही में छपा है। जब हम चाय पी रहे थे तब मैंने क्लेटन से पूछा कि क्या वह मुझे इन लेखकों और इनके लेखन के बारे में खुद ही या लेखकों के द्वारा अलग-अलग जानकारी दिलायेंगी, तो उसने काफी सूखे ढंग से कहा, “गबिंद, दिस इज नौट अवर कस्टम, वी कॉल द विजिटर बाय फर्स्ट नेम”।


        मुझे हैरत हुई कि एक तरफ तो पहले नाम से पुकारना और दूसरी तरफ ये औपचारिकताएं – क्या खूब गठबंधन है। 10 बजे के करीब मैं उठकर चल दिया। वह सिर्फ क्लेटन का ही तमाशा था। या तो उसने उसे अपना धंधा बना लिया है या फिर यह सब उसकी कोई मनोवैज्ञानिक भूख मिटाता है। लेखक यहां आकर जुड़ गये होंगे, क्योंकि क्लेटन से उन्हें छपने-छपाने में मदद मिलती होगी।


         जाते समय क्लेटन मुझे सीढ़ियों तक छोड़ने आयी। मैने उससे फिर पूछा कि उसके क्लब के जो सदस्य उपस्थित नहीं थे उनके लेखन के बारे में भी अगर मुझे जानकारी मिल सके तो मैं इस सर्किल का परिचय हिंदी लेखन-जगत से भी करना चाहूंगा। क्लेटन ने कहा कि इसके लिये मुझे उन व्यक्तियों से अलग अलग समय लेकर मिलना चाहिए। वह खुद कुछ नहीं कर सकतीं, क्योंकि वह स्वंय एक लेखिका है। इस दिखावे और घमंड पर मुझे हंसी आयी। कोई ताज्जुब नहीं कि साहित्य की इतनी अच्छी परंपरा होते हुए भी अंग्रेजी का सामयिक लेखन आज कहीं नहीं है।


- गोविंद मिश्र

धुंध भरी सुर्खी ( 1979, Travelogue by Govind Mishra)

National Publishing House, New Delhi

Wednesday, July 11, 2012

आसम वाला शताबुद्दीन....

कल दोपहर में न्यू बॉम्बे इलाके में एक जगह जाना हुआ और मौका ऐसा बन पड़ा कि दुपहर में काफी समय खाली बैठना पड़ा। उसी दौरान पास ही खड़े एक सिक्योरिटी गार्ड से मैंने बातचीत करनी शुरू की और फिर जब बातचीत का सिलसिला चल निकला तो बहुत कुछ जानने मिला। कल फेसबुक पर इस बातचीत को शेयर किया था आज ब्लॉग पर शेयर कर रहा हूं। बातचीत काफी दिलचस्प रही। आप भी नोश फ़रमायें।


"कहां से हो" ?


"आसम से"


"बढ़िया, लेकिन वो तो मुंबई से तो काफी दूर है".


"हां, पांच दिन लगता है जाने में"


"पांच दिन ! तो छुट्टी किस हिसाब से लेते हो" ?


"आने जाने का दस दिन अलग छोड़ के बोलना पड़ता है"


"मिल जाती है इतने दिन की छुट्टी" ?


"अभी मांगा नहीं"

"क्यों" ?


"तीन साल हो गया जबसे लगा तबसे छुट्टी नहीं लिया"


"क्यों" ?


"आइसे ही आभी जाएगा तो आएगा ही नहीं"


"वो क्यों" ?


"बस नहीं आएगा"


"तो क्या करोगे जाकर" ?

"देखेगा कुछ छोटा मोटा अइसा...."
......
....
.....
"तुम्हारा नाम क्या है" ?

"शताबुद्दीन"


"तो इतने दूर आने का कुछ खास कारण" ?


"थोड़ा कमजोरी था...."


"क्या" ?


"कमजोरी था अभी हो गया सब"

"हम्म....तो वापस जाओगे" ?


"हां आभी देखेगा"


"वैसे उस तरफ तो बोडो वगैरह का कुछ लफड़ा भी है ना" ?


"हां मैं तभी उधर ही था..पढ़ाई करता था"


"अच्छा....कौन सी क्लास" में ?


"मेरा इधर मैं मदरसा में था वो मदरसा होता है ना"


"हां हां.....तब" ?

"तभी उधर आर्मी वाला लोग मेरा इधर बोल के गया कि सब लोग छुप जाओ गोली चालने वाला है"

"फिर" ?


"फिर अइसा रात हुआ ना तब सब तेरफ से गोली चालू......हाम सब लोग आइसा जमीन में जागे बना के तीन दिन रेहा"


"तीन दिन ?


"हां उधर ही खाना सब सब"

"तो गोलीबारी कभी खतम हुआ" ?


"वो तो पहिले ही सुबह खातम हो गेया...लेकिन रात भर चला....बोडो वाला आर्मी को अन आर्मी वाला बोडो को....हाम डर के वजा से दो दिन छिपा था......तीसरा दिन आरमी वाला आया और बोला साब ठीक है..मैं तभी से घार छोड़ दिया"


"तो वहीं तो करीब में ही बांग्लादेश भी है"

"हां वो जैसा सामने का बिल्डिंग दिखता है ना उतना ही दूर पे बांग्लादेश है और इधर मेरा घर है"

"तो अभी घर वालों से कॉन्टेक्ट है" ?


"हां है..आभी जाने का है"


"कौन सी गाड़ी जाती है" ?


"नेई मालूम...इधर तिलकनगर सेई छूटता है उतना मालूम"

.....
.....
.....
 ( समय होता तो और बतियाता उस युवा सिक्योरिटी गार्ड से लेकिन कुछ ताजा-ताजा हुई पहचान और कुछ मेरे संकोच ने और कुछ पूछने से इन्कार कर दिया, फिर भी अच्छा लगा शताबुद्दीन से बात करना)
- सतीश पंचम

Sunday, July 1, 2012

बसावन की जेसीबी और बिजेन्नर मास्टर की कसक....(बमचक-9)

    इस बार की बमचक पोस्ट में गाँव में जेसीबी मशीन के आने की धमक है, एक तरह की 'सुलग' है तो किसी के जमीन की मालियत चकबंदी अधिकारी द्वारा कम लगाये जाने पर मची रार है जिसे सुलझाने के लिये लिखा गया एक दिलचस्प 'दरखास' ( सरकारी आवेदन पत्र) है ......बमचक सीरीज़ की कुछ पोस्टें पहले ही पब्लिश हो चुकी हैं...जिन्हें बमचक लेबल के साथ यहां पढ़ा जा सकता है,
     Disclaimer : बमचक - 9 की इस कड़ी में कुछ शब्द आम बोलचाल के हैं, जिनमें कहीं-कहीं असंस्कृत, अशालीनता एंवम्  भदेसपन की झलक है। अत: यह पाठकों के विवेक पर निर्भर है कि वे इस कड़ी को पढ़ें या नहीं

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       कभी-कभी गाँवों में सुबह की बैठकी चलती है। लोग गाँव के किसी ऐसे शख्स के यहां आ आकर बैठते हैं जिसका घर राह में पड़ता हो और जो सामाजिक रूप से कुछ रूतबा भी रखता हो। घर के राह में पड़ने का जियोग्राफिकल एंगल कुछ यूं है कि अक्सर लोग सुबह सवेरे इसी रास्ते काम के लिये निकलते हैं। किसी को कचहरी जाना है, किसी को स्कूल तो किसी को खाद भण्डार। कोई रिश्तेदार के यहां रिश्तेदारी निभाने जा रहा है तो कोई न्यौता हंकारी के लिये कुछ इंतजाम करने जा रहा है। ऐसे में राह में पड़ने वाला प्रतिष्ठित घर एक जरूरी पड़ाव के तौर पर इस्तेमाल होता है। जरूरी पड़ाव इसलिये कि कहीं कोई राय बात लेनी हो तो प्रतिष्ठित घर के सदस्यों से राय बात ली जा सकती है, कहीं कुछ कम बेसी हो तो ठीकठाक कराया जा सकता है। और फिर बमचकपुर में परधान के घर के अलावा और कौन सा घर होगा जो ऐसी हैसियत रख सके। और फिर उनके घर में पढ़े लिखे बीजेन्नर मास्टर जी हैं। उनके पिता परधान जी के नाते कुछ और लोग भी आ जुटते हैं।

    आज ऐसी ही एक बैठकी में बलीमुख जी आये हैं। बलीमुख जिनके नाम का शाब्दिक अर्थ है कि बन्दर की शक्ल वाला, लेकिन आज तक बलीमुख जी ने इस शब्द का अर्थ अपने हिसाब से लगाया है। बलीमुख यानि बजरंगबली के मुख वाला। उसी नाम का असर है कि इनके द्वार पर एक छोटा सा बजरंगबली का मन्दिर है। बलीमुख जी जब तक गाँव में रहते हैं रोज नहा धोकर बजरंगबली जी को जल चढ़ाते हैं। मंगलवार के दिन बाकायदा लड्डू भी चढ़ाते हैं। लेकिन ऐसे मंगलवार वर्ष में केवल दो तीन ही आ पाते हैं और बाकी के मंगलवार बजरंगबली जी इस इंतजार में बिता देते हैं कि बलीमुख जी को दिल्ली में कब छुट्टी मिलती है। काहे से कि वे वहां किसी अधिकारी की गाड़ी चलाते हैं। साल में दस पन्द्रह दिन की छुट्टी बहुत रोये गाये मिलती है। बलीमुख जी मनाते रहते है बजरंगबली जी से कि उनके अधिकारी को कुछ अक्ल दें, कुछ दया माया भरें और उनकी छुट्टी महीने भर खींच दें लेकिन बजरंगबली जी ठहरे स्वामीभक्ति के प्रतीक। जब वे अपने लिये रामजी से छुट्टी न मांग सके तो भला तो अपने भक्त को क्यों कर विपथगामी बनायें। सो ऐसे ही रस्साकशी चलती रहती है। बलीमुख जी छुट्टी मांगते रहते हैं, अधिकारी रखड़ा रखड़ा कर देते रहता है और बजरंगबली जी उसी गोल्डन पिरियड में बलीमुख जी के छोटे से मन्दिर में कुछ दिनों के लिये प्राण प्रतिष्ठित हो उठते हैं।

      अबकी बार बलीमुख जी को अपने गाँव की जमीन और उसकी चकबंदी प्रक्रिया से थोड़ा टेढ़े गुजरना पड़ा। उनकी किसी उपजाऊ जमीन की मालियत सर्वे के दौरान कम लगाई गई और नतीजतन जमीन की पैमाइस में कमी-बेसी हो गई। उसी के सिलसिले में गाँव के परधान जी के यहां बलीमुख जी पहुंचे हैं। परधान जी तो नहीं मिले, किसी के पंचैती के सिलसिले में गये थे लेकिन बिजेन्नर मास्टर जरूर मिल गये। हीरालाल यादव भी वहीं बइठे मिले। राम-रहारी के बाद बिजेन्नर मास्टर ने हालचाल पूछा और फिर आवश्यक लिखा-पढ़ी शुरू हुई। लड़के से कागज कलम अंदर से मंगाया गया। लिख उख कर बिजेन्नर जी अपनी उसी चिर-परिचित शैली में बलीमुख जी से रूबरू हुए -

    “हां त मर्दे बलीमुख, ये आबेदन पत्र लिख दिया हूँ, पढ़ कर सुना भी देता हूँ, धियान से सुनो, फेर से न बोलूंगा... इसमें लिखा है कि –

महोदय,

हमारा धनहा खेत का लेखपाल जी गलत पैमाइस किये हैं, उसकी मालियत तीस पैसे लगाये हैं ओ भी जानबूझकर ताकि हमारे परोस में रहने वाले अंगनु पुत्र चेपरूराम ग्राम बमचकपुरा, मौजा – टेढ़ूआना को दे दिया जाय। आपको जानकारी में हो कि मैं गाँव में ज्यादा रहता ओहता नहीं, हमारे बच्चों को मालियत, पैमाइस आदि के बारे में जेयादा जानकारी नहीं है, औरतीया भी पढ़ी लिखी नहीं है। इसी बात का फायदा उठाकर लेखपाल श्री नन्हूं मियां ने अंगनु के इसारे पर हमारे खेत की मालियत कम दिखाई है। इसलिये आपसे निवेदन है कि हमारा खेत की पैमाइस फिर से कराई जाय, मालियत तनिक गत के लगाई जाय।


एक विसेस निवेदन है कि शीघ्रता करें क्योंकि हमारा दस तारीख तो डिल्ली का टिकट है। मैं आप ही के बिभाग अधिकारी श्री भगौती प्रसाद जी के यहां डराईबर हूँ । बहुत मोसकिल से किसी तरह छुट्टी मिल पाया इस काम के लिये। अत निवेदन है कि जल्द से जल्द लेखपाल श्री नन्हूं मियां को आवशुक सुधार हेतु कहा जाय।




बलीमुख कनौजिया पुत्र खोखी कनौजिया
ग्राम - बमचकपुर
मौजा – इंगुरी
ब्लॉक - अझोरहा
इलाहाबाद

“सही है न” ?

“अरे आप लिखे हैं तो सहीये होगा, बकि अधिकारी जी आदेस जारी करें तब न” ?

“अरे आदेस काहे नहीं करेंगे, लंड़ऊ समझे हो क्या ? देख लेना सबसे पहले तुम्हारे खेत की मालियत सुधारी जायेगी। और तुम्हारे वो अधिकारी भगौती परसाद को कम समझे हो क्या” ?

“मानें” ?

“माने ये कि अधिकारी बर्ग हमारी-तुम्हारी बात एक बार सुनें या न सुनें लेकिन ऊ लोग का आपस में बहुत छनता है। एक को दूसरे से कब काम पड़ जाय कोई नहीं जानता। अरे हम तुम तो बहुत होगा तो हल-फाल, भईंस-गोबर इसी को लेकर टिन्न पिन्न किये रहेंगे और जरूरत होगा तो सील-लोढ़ा की नाईं ले-देकर एक दूसरे से काम चला लेंगे लेकिन अधिकारी बर्ग का बात सील-लोढ़ा से थोड़ों न चलेगा। उनका महकमा फइला रहता है। आज इहां हैं तो कल उहां। का पता कल को यह अधिकारी वहां आ जाय और वह अधिकारी इहां आ जाय। तब आपस में समझ बूझ के न रहना पड़ता है” – बिजेन्नर मास्टर ने अपना ज्ञान का पसेरी लुढ़काते हुए कहा।

“बात तो आपक ठीकै है, लेकिन ई न हो कि हम उहां डिल्ली जांय और अंगनु पइसा ओइसा खिलाय के मालियत अपने मन का रखा लें”

“अरे बकचोदई न सोचो, अइसे-कइसे मालियत गड़बड़ लगायेंगे, हम लोग हैं न। जाओ ठाठ से डिल्ली और जाते-जाते कचहरी में बिंदेश्वरी जी होंगे ओकील, उनसे मिल लेना काम में कहीं अड़चन आये तो हमारा परिचय बता देना”

“तो अभी इस दरखास के बाद क्या ओकील से भी मिलना पड़ेगा” ?

“मिल लेना, और अइसा थोड़े है कि तुम लिख कर दे दिये और अधिकारी महोदय तुरंत पढ़ते साथ कुरसी छोड़ कर खड़े हो जायेंगे और कहेंगे आओ भाई बलीमुख, पहले हम आपका ही काम कर दें। अरे कागज-ओगज का काम है, टाइम लगता है”

“हम ओ नहीं कह रहे, माने हमारा कहनाम है कि ओकील का कौन काम, दरखास तो हम चकबंदी अधिकारी को न दे रहे हैं”

“अरे यार फिर वही बकचोदई वाली बात कर रहे हो...अरे जब तुम्हारी दरखास बनेगी तो उस दरखास के साथ पूछा जायगा कि जमीन तुम्हरी है इसका क्या साबूत है, तब ओकील बिंदेस्वरी जी नोटहा ‘कसम कागज’ पर लिख कर देंगे नहीं तो कचहरी में कहां से कसम खाने के लिये गंगाजली पाओगे....सो अइसे ही कागज पर कसम धराया जायगा कि तुम ही हो बलीमुख कनौजिया बल्द खोखी कनौजिया हो और तुम्हारी ही है जमीन”

“लेकिन हम कसम काहें खायेंगे, हमार पुरखा पोरनीया की जमीन, उहो बदे कसम खाय के कहना पड़े त एतना कागज पत्तर, खसरा खतौनी का कौन फायदा” ?

“अब ई सब सरकारी काम है, जेयादे घिचिर-पिचर करोगे तो लांड़ चाट के काना हो जाओगे ये जान ल्यौ.....”

“अरे यार डिल्ली में रहते हो, डराईबरी करते हो एतना त मलुमै होगा कि मर मुकदमा, कोरट-कचहरी का क्या हाल रहता है, एकदम से असूझ अस बतिया रहे हो मालूम पड़ता है पहिली बार ओथुआ में आये हो.....ऊ का नांव से….” – इतनी देर बाद हीरालाल यादव ने दोनों की बातचीत में हिस्सा लिया।

“अरे उ तो हमहूं जानते हैं भईया बकि गांव देस का मामिला तनिक अलगै न होता है”।

“कोच्छ नहीं, चुप मार के जाओ, औ जहां घटेगा-बढ़ेगा परधान जी, बिजेन्नर माहटर, सब लोग तो हैं न” – हीरालाल ने बलीमुख जी को इत्मिनान धराया।

अभी उन लोगों की बातचीत चल ही रही थी कि दूर से ही पीले रंग की जेसीबी आती दिखी। कुछ कुत्ते जेसीबी मशीन देख भूंकने लगे। बहुत संभव है कभी उन कुत्तों के पूर्वजों ने साईकिल देखकर भी ठीक ऐसी ही भूंकैती फानी हो जैसी कि उनके वंशज अब जेसीबी देखकर फाने हुए हैं।

“ई हथीनी जइसन मसीनिया छिनार अउरौ हड़हड़ करके कान खाय जाती है” – हीरालाल यादव ने कान खुजलाते कहा।

“किसके यहां जाय रही है” ? – बलीमुख ने जिज्ञासा जाहिर की।

“अलोपी के यहां, बंगला काट कोठी बनवा रहे हैं सरऊ” – बिजेन्नर मास्टर ने पिच्च से थूकते हुए कहा।

“गाँव में बंगला काट कोठी बनाकर क्या करेंगे, इहां कउन आ रहा है देखने उनका बंगला बंगूली” – हीरालाल ने बिजेन्नर मास्टर की ओर से अगाही मारनी चाही।

“अरे जानते नहीं, जिसके ढेर पइसा हो जाता है, अइसे ही निसरता है”

“हां, ऊ जियाउद्दीनवा को नहीं देखे एक्कै साल सउदिया गया था पइसा झोर के रख दिया” – हीरालाल ने जानकारी में विस्तार दिया।

“सउदिया नहीं आर, बोरनियो गया था, तुम्हारे लिये जो जाता है सब सउदियै जाता है” – बिजेन्नर मास्टर ने फिर से पिच्च से थूकते हुए कहा।

“अए जब जिनगी भर गांव में ही रहना है तो हमारे लिये तो जइसे बम्मई ओइसे कलकत्ता बोरनियो जांय चाहे सऊदिया, गये तो गाँव से बाहर ही” – हीरालाल खीं खी कर हंस दिये।

“अरे तो सही सही बोलोगे कि उसी में जोते रहोगे, हर बरधा है” – बिजेन्नर मास्टर की इस बात पर बलीमुख भी हंसे बिना न रह सके जोकि अब तक अपनी चकबंदी प्रक्रिया में खोये थे।

“अरे ये तो सुगरीव चला रहा है जेसीबीया को, एकवा डराईबर कहां गया” ? – हीरालाल ने कहा

“गया होगा कहीं....न छोड़छाड़ के भाग गया होगा कहीं और” – बिजेन्नर मास्टर तकिये पर ओठंगते हुए बोले।

इसी दौरान जेसीबी नजदीक आ पहुंची

“कहां जा रहे हैं खरबोटना लेकर” ? – हीरालाल ने उंची आवाज में पूछा।

नन्हूं मियां के इहां, घर बनवा रहे हैं – कहने के साथ डराईबर ने जेसीबी रोककर बंद कर दिया। हड़-हड़ हड़-हड़ की आवाज अचानक बंद हो गई। कुत्ते जो भूंक रहे थे अब भी भूंके जा रहे थे और होते-होते अंत में उनका भूंकना सम पर आ गया। शायद समझ गये हों कि ज्यादा भौंकने पर मिलने वाला तो कुछ है नहीं, फिर क्यों बेकार में भूंकना।

“अरे त दूसरका डराईबर नहीं आया” ? – बलीमुख जी ने अपनी चिंता को डराईवर की चिंता से काटना चाहा।

“उसके आँख में बिलनी हो गई है, कह रहा था झराने जाना है” – सुगरीव ने स्टेयरिंग पर निहुरे-निहुरे ही कहा।

“अच्छा-अच्छा...त कितने का तय हुआ है जेसीबीया का ‘कंटराज’ ” ? बिजेन्नर मास्टर ने हिसाब किताब जानना चाहा। वैसे भी इस तरह का सवाल वहां मौजूद लोगों में से बिजेन्नर मास्टर ही पूछ सकते थे, और लोग जेसीबी का टायर निहार लें वही बहुत है।

“आठ सौ रूपिया घंटा”

“हुँ....... आठ सौ रूपिया घंटा पर अलोपी तैयार हुए” ?

“अरे तैयार नहीं होंगे ? अभी मनई मजूर गाँव में कहां मिल रहे हैं, सब बम्मई, डिल्ली निकल गये हैं खाने कमाने, जो हैं वो नरेगा में लग गये हैं, मनई मजूर मिले तब तो

अरे तो नेंई खोदाई में केतना मजूर लगेंगे, जो लगेंगे आठ दस, ससता ही पड़ेगा कि

अरे नहीं, अब ऊ जमाना नहीं है, मजूर लेते हैं कम से कम दू सौ रूपया रोज और खोराकी अलग से, औ दिन भर उसी में रेंगे-रेंगे करते हुए नेंई खोदने में ही दस दिन लगा देंगे। खोराकी में भोजन-पानी की तैयारी में घर क लईका बच्चा, मेहरारू सब सती होंगी सो अलग। एतना झंझट लेने से अच्छा है जेसीबी लगाय के खोदाय दो नेंईं जो काम दस दिन में होगा, आधे दिन में खोद-खाद के निपटा दो, न मनई मजूर हेरने का झंझट न उनके भोजन पानी का परबन्ध”

“हां, कह तो ठीक रहे हो लेकिन फिर भी आठ सौ रूपिया घंटा जियादा लगता है”

“अरे तो जेसीबीया तेल भी तो उतना पीती है बाबू साहेब, फिर दो लोग चाहिये अंगुरी दिखाने के लिये, इहां खोदो....इहां मत खोदो.... एक टेम-परवायरी डराईबर, कुल जोड़ जाड़ लो तो मजे क खरचा पड़ जाता है..... फिर जिसका जेसीबी है उसको रोज का साढ़े तीन हज्जार रूपिया देना ही है देना है चाहे छिनार जेसीबी खड़ीयै क्यों न रहे”

“अरे त हां लोहे का हाथी लेकर चलने पर लम्मा तम्मा टिकटिम्मौ त रहेगा ही”

“तब क्या...ओही सब में न खरचा लगता है कि अइसे ही झूरे थोड़ी मांग रहे हैं आठ सौ रूपिया घंटा”

“तो जेसीबी बसौना की ही है न” ?

“अरे अब ऊ बसौना.... बसौना नहीं रह गया.....अब बसावन सेठ बन गये हैं, गुड़गाँव में रहते है, अब बड़वार मनई हो गये हैं। अइसन आठ गो जेसीबी है उनके पास, रोज का साढ़े तीन हजार जोड़ ल्यौ तो केतना हुआ, आठ तियाईं चऊबीस औ चार ऊ जोड़ि ल्यौ....अट्ठाईस हजार रोज का उसको निराल किराया मिल रहा है, तबले दू जेसीबी अऊर खरीदने जा रहे हैं”।

“पइसा वाली पारटी है भाई .....”

“अरे नहीं, अब आप से क्या छुपा है, देखे तो रहे कि पहिले सब बसवना, बसवना कह कर दुरदुराये रहते थे, हम लोग के जइसे खेतिहर रहे....बाप मरा तो पट्टीदार लोग जर जमीन हथियाने के चक्कर में पड़े.....मार झगरा हुआ औ सरीकत से अपना हिस्सा पट्टीदारन को सस्ते में बेचकर गुड़गाँव चला गया। जो रूपिया कउड़ी मिला उसमें कुछ काम धंधा करना चाहा तो समझै न आवै कौन काम करे। तबले मायावतीया नहीं वो फानी थी आगरा में कोइरीडोर, बस उसी में उसका दिमाग खुला औ एक अधिकारी से जाकर मिला। कहा हमको कुछ काम दे दो। अधिकारी सब मालूमात हासिल किया कि कउन है कहां का रहने वाला है, केतना पइसा कउड़ी है इसके पास। जइसे ही पता लगा कि पट्ठे के बास पुसतइनी जमीन बेचने का पइसा है, तुरंत सलाह दिया कि जेसीबी निकारो। कोइरीडोर बन रहा है, तुमहारी जेसीबी के लिये तुरंत परमिसन मिल जायेगी, ठाठ से जाकर कमाओ खाओ। बस, कुछ लोन से कुछ ओन से जेसीबी निकार दिया। फिर तो बसवना वो बसवना नहीं रहे, बसवना कल्ले से बसावन सेठ हो गये। आज देखो तो जो पट्टीदार लोग उसका जमीन सस्ते में लिये थे अबहूं ओही खेत में रिहनी क सिहनी हो जा रहे हैं लेकिन उखाड़ नहीं पा रहे औ ई पट्ठा गुड़गाँव में खाली बइठे बइठे चानी काट रहा है”।

“अरे हां, त लछमी जिसके आनी रहती है अइसे ही आती है” – बिजेन्नर मास्टर को पहली बार अपनी सरकारी नौकरी में हीनता नजर आई। कहां तो पूरे महीने में बीस-बाईस हजार मिलता है और उसमें भी फन्न ओन्न काट उठता है, इधर कल का बसौना रोज अट्ठाईस हजार कमा रहा है। इस सोच-विचार के बीच कब जेसीबी स्टार्ट होकर चल पड़ी उन्हें पता ही न चला। बलीमुख और हीरालाल भी उठने की तैयारी में थे तबतक अंदर से नारीकंठ से आवाज आई – “आज इसकूल नहीं जाना है क्या कि वहीं बइठ कर कमाने का मन है”।

   बिजेन्नर मास्टर ने फिर से पिच्च से थूका और छत की ओर निहारते हुए बोले – “आता हूं अभी, काहे एतना जलदी मचाई हो...नासतवै न करना है”।

एक बार फिर राम-रहारी हुई, हीरालाल और बलीमुख उठकर चल पड़े अपने-अपने घर की ओर, हीरालाल मन ही मन सोच रहे थे – एक मैं हूं कल रात का बसिऔरा खाकर चला हूँ, और इहां नासता बन रहा है, गरम-गरम। नौकरी-पानी हो तो अइसी ही ठाठ वाली।

उधर बिजेन्नर मास्टर के सामने थाली आ गई थी – रोटीयां तो ताजी ही बनी थीं लेकिन तरकारी रात वाली आलू-पड़वल की ही थी रसेदार। एक कटोरी में चीनी पड़ी ललछहूँ दही आ गई। एक लोटा पानी। बिजेन्नर मास्टर ने भोजन देखते ही पूछ लिया – “अरे तो कल जो नेनुआं लाया था वो नहीं बना क्या” ?

“दूसरी तरकारी नेनूआँ बना दूं औ रात वाली तरकारी फेंक दूं घूरे में……”

“अरे तो काहे बिगड़ रही हो मैं तो बस पूछ रहा हूं ....यही बात कायदे से नहीं कह सकती थीं......” ?


- सतीश पंचम

(जारी....)

( चित्र :  मई-2012 में जौनपुर में 'हिंचा' था)

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