सफेद घर में आपका स्वागत है।

Thursday, June 28, 2012

सफ़ेद घर....कुछ बातें....कुछ यादें

        ल्यौ जी... सफ़ेद घर ने भी 400 पोस्टों का आंकड़ा छू लिया। डैशबोर्ड पर दिख रही तारीख के हिसाब से पिछले महीने ही मेरी ब्लॉगिंग के चार साल भी पूरे हो गये। यानि करीब करीब सौ पोस्ट प्रति वर्ष। आनंदम् आनंदम्। वैसे अंदर ही अंदर पता तो चल ही रहा था कि चार साल से लिख रहा हूँ.....ठीकठाक ही लेखन है ..न बहुत अच्छा है न बहुत खराब.. मौज-ए-सुकून चल रहा है लेकिन होते-होते चार सौ पोस्टें हो जाना मेरे लिये एक सुखद अनूभूति ही है क्योंकि कभी मैं सोचा करता था डेढ़-दो सौ पोस्टें लिख लूं बस्...आगे और टाईम वेस्ट नहीं......लेकिन पेन के विज्ञापन की तरह.... "लिखते लिखते लव हो जाय" की तर्ज पर अपन भी ब्लॉगिंग के साथ लिखते लिखते "लव यू टू" हो लिये। समयानुसार फेसबुक ट्वीटर पर भी घूमे लेकिन वो  किसी शायर ने कहा है न -


हम दिल्ली भी घूमे, लाहौर भी हो आये
ऐ यार मगर   तेरी  गली  तेरी  गली   है

     तो कुछ वैसी ही अनुभूति होती है मुझे ब्लॉग में। चाहे घूमते फिरते कितने भी सोशल नेटवर्किंग्स पर जुड़ूं, लेकिन असल आनंद अपने सफ़ेद घर पर ही मिलता है। चाहे यहां बमचक लिखूं या बतकूचन....हर एक का लुत्फ अलग ही महसूस होता है। अभी चार सौ पोस्टों के पूरी होने के उपलक्ष्य में जब अपनी पुरानी पोस्टों पर नज़र डाल रहा था तो कुछ को पढ़ते हुए बहुत हंसी आ रही थी कि - मन में बात आ रही थी कि क्या मैं ही हूँ जिसने इतना फालतू लेख लिखा था ( हो सकता है कुछ वर्षों बाद यही बात मैं आजकल की अपनी पोस्टों के बारे में कहूँ....कुछ पोस्टों के बारे में तो अभी से पता है कि खराब लिखा है :-)

     इस बीच ढेर सारे वाकये याद आ रहे हैं - एक वो पलक वाला मामला याद आ रहा है, अरे वही जिसमें एक पुरूष फर्जी प्रोफाइल के जरिये महिला बनकर कामुक इशारों से कवितायें लिखती थी और हजरात लोग थे कि वाह वाह कर आते थे। खूब वाह वाही किये...क्या बात ...क्या बात। जबकि मुझे शुरू से महिलाओं की लिखी कविताओं से अरूचि रही है। ऐसा नहीं कि मुझे कवितायें पसंद नहीं लेकिन नेट पर जो कवितायें हैं उनको देख देखकर अच्छा खासा मूड़ खराब हो जाता है। न सिर न पैर लेकिन टिप्पणीं देखो तो खांची भर भर। तिस पर पलक वाली कविताओं पर तो जैसे बाढ़ आई थी। मामला समझते ही मैंने मौज लेते हुए 'ओढ़निया ब्लॉगिंग' वाली मैंग्रोव पोस्ट लिखी.....और अचानक ही जैसे सारा बहाव उस मैंग्रोव पोस्ट की वजह से थम सा गया ......लोगों को अचानक से एहसास हुआ कि ठगे गये, किसी पुरूष ने महिला का रूप धरकर छका दिया। हद तो तब हो गई जब कुछ ऐसे लोग जो कभी यहां वहां टिप्पणी नहीं करते थे वे भी पलक की पलकों पर आबाद दिखे। वे लोग भी खदबदाये कि यार ऐसे कैसे भ्रमित हुए। बाद में तो न पलक रही न उसे ढोने वाली पालकीबाज...सबकुछ अंतर्ध्यान। उसका अंश है....

"कभी आपने गाँव में हो रहे नाच या नौटंकी देखा हो तो पाएंगे कि नचनीया नाचते नाचते अचानक ही किसी के पास जाएगी और भीड़ में से ही किसी एक को अपनी ओढ़नी या घूँघट ओढ़ा देगी। आसपास के लोग तब ताली बजाएंगे और लहालोट हो जाएंगे। कुछ के तो कमेंट भी मिलने लगेंगे जिया राजा, करेजा काट, एकदम विलाइती।
 
     और जो ओढ़नी के भीतर ओढ़ा दिया होगा वह अंदर ही अंदर नचनीया पर मुस्की मार रहा होगा और मुस्की मारते हुए जेब से पांच दस रूपए अपना नाम बताते हुए दे देगा। एकाध बार ओडनी के भीतर ही भीतर गाल-ओल भी सहला देगा। नचनीया फिर नाचते नाचते अपने स्टेज पर पहुंचेगी, हारमोनियम मास्टर तान पर तान छेडे रहेगा और इसी बीच वह घोषणा करेगी कि – ढेलूराम टेलर, केराकत चौराहा वाले की ओर से दस रूपईया इनाम और एही के लिए मैं अगला गीत उन्हें समर्पित करती हूँ कि – गर्मी के महीना, बाली उमरिया...... टप्प टप्प चुए पसीना बलम तनि पंखा चलाय द हो.......इतना कहना होगा कि भीड़ एकदम लहालोट.....सीटी बजने लगेगी, पानी का पिचकारी भीड पर फौवारा कर रहा होगा और जिसका नाम स्टेज पर से घोषित होगा और जिसके नाम पर गीत समर्पित होगा वह ढेलूराम टेलर अंदर ही अंदर मगन होगा कि चलो इसी बहाने मेरी दुकान का प्रचार हो रहा है"।

      दूसरी वो पोस्ट याद आती है - पलटदास वाली। इसमें भी कुछ वही प्रवृत्ति थी। भाई लोग जा-जाकर प्यार, भाईचारे और शांति से रहने वाला संदेश टिकाते और वहीं महिलाओं के ब्लॉगों पर मंडराते रहते। नतीजतन मौज लेती वह पलटदास वाली पोस्ट लिखी। कई ब्लॉगर उखड़े-पखड़े, किसी ने मौज ली तो किसी ने कुढ़ना ठीक समझा। लेकिन कुछ भी हो, मजा आया था उस पोस्ट को लिखकर। अंश देखिये...

      "जब देखो तब कोई न कोई आकर ब्लॉगजगत में नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगता है। यह नैतिक है, वह अनैतिक है। महिलाओं पर ऐसा मत लिखो, पुरूषों पर वैसा मत लिखो, फलां लिखो, टलां लिखो। इतनी ज्यादा प्रेंम-सद्भाव, नैतिकता, समानता, विश्व बंधुत्व, भाईचारा ठेलने लगते हैं, कि लगता है जैसे किसी देवता के अवतारी पुरूष हैं। और नारीवादीता तो जैसे इनके हाथों में विष्णु भगवान की तरह सजने वाला फूल ही समझिये। जहां कहीं इन्हें लगता है कि कोई सुन नहीं रहा, तुरंत नैतिकता का शंख फूंकना शुरू कर देंगे। इधर उन्होंने शंख फूंका नहीं कि उसकी आवाज सुनकर तमाम उपलब्ध गण शंख ध्वनि के बाद एक साथ जय बोल देंगे"।

     वैसे एक बात नोटिस की है अपने लेखनी में कि मैंने फिल्म, साहित्य या रोजनामचों को लेकर ही अधिकतर पोस्टें लिखा है, न कि ब्लॉग, ब्लॉगिंग या ब्लॉगत्व आधारित मजमेबाज पोस्टें। इसे मैं अपने लिये एक किस्म की उपलब्धि ही कहूँगा वरना तो ब्लॉगिंग का 'इंटेलेक्चुअल भिखमंगापन' भी देखा है जिसमें कोई बंदा / बंदी बिना किसी दूसरे ब्लॉगर की पोस्टों में छिद्रान्वेषण किये अपनी पोस्ट निकाल ही नहीं पाते। या कभी कभार लिखे भी तो पोस्ट-दर-पोस्ट किसी न किसी ब्लॉगर की पोस्ट से सटती हुई लगेगी, फलाने वहां कहे, ढेकाने यहां कहे इसलिये मेरा मत मैं अपने ब्लॉग पर प्रकट करता हूं।

     इस तरह के ब्लॉगरीय इन्सपिरेशन या दूसरे शब्दों में कहूं तो भिखमंगेपन से मैं भी दो चार हुआ लेकिन बहुत कम। कभी कभार की भी तो टोटेलिटी में लेकर .....पलटदास, ओढ़निया ब्लॉगिंग, पुरस्कारीलाल वाली पोस्टें इसी कैटेगरी की थीं। वहीं कुछ पोस्टें ब्लॉगरों को संबोधित करते भी थी लेकिन वह भी तब जबकि ज्यादातर लोग मुंह में दही जमाकर बैठे थे। जानते सब थे कि गलत हो रहा है लेकिन नाहक झंझट न करने की सोच चुप रहे। लेकिन मुझे तो मौज लेनी थी सो ले ली। आजकल चल रहे "गैंग्स ऑफ वासेपुर" के तर्ज पर कहूं तो मैने उस तरह की पोस्टों में कईयों की "कह के ली"। आप सोच रहे होंगे कि अपने मुंह मिंया मिट्ठू बन रहा हूं, खुद की तारीफ किये जा रहा हूं तो बहुत संभव है आपकी बात सच भी हो। फिलहाल तो झूठमूठ की इंटेलेक्चुएलिटी ठेलने से अच्छा है कि अपने किये पर खुश हो लिया जाय, थोड़ा आत्ममुग्ध हुआ जाय, वैसे भी लंबी-लंबी फेकने वाले यहां बहुतायत में हैं, थोड़ी सी मेरी भी झूठ-सांच पढ़ ल्यौ यार :)

        हां, लगे हाथ एक और बात की ओर इशारा कर दूं, खास करके ऐसे लोगों के लिये जिनके मेरूदण्ड में विनम्रता का उत्स कुछ ज्यादा ही रहता है। तो ऐसे प्राणियों से इतना ही कहनाम है कि ब्लॉगिंग में उतनी ही विनम्रता रखें, उतनी ही दर्शायें जितने की आवश्यकता हो। ज्यादा विनम्र होने पर लोग कान पकड़कर इस्तेमाल भी कर लेंगे और बाद में केवल हें हें करके खींस निपोरने के सिवा और कुछ न कर पायेंगे। इस बारे में मैंने पहले भी एकाध जगह लिखा है कि हम अपने जीवन में चाहें तो निन्यानबे फीसद विनम्र रहें लेकिन एक पर्सेट का दंभ जरूर रखें क्योंकि यही एक परसेंट का दंभ आपके बाकी निन्यानबे फीसदी विनम्रता की दशा और दिशा निर्धारित करता है। इसी दंभ के चलते जिसे जहां जैसा लगे मन की कहा जा सकता है, जिसे टरकाना हो टरकाया जा सकता है और जिसे डांटना हो बेखटके वहां डांटा जा सकता है लेकिन यह डंटैती भी तभी फबती है जब बंदा / बंदी अपने दम खम पर ब्लॉगिंग करता हो न कि हीही फीफी और नेटवर्किंग फेकवर्किंग के चलते। यहां मैं उन "सदा-सर्वदा उखड़ै हैं" टाईप ब्लॉगरों की बात नहीं कर रहा, ऐसे ब्लॉगर बंदे-बंदीयों के उखड़ने-पखड़ने की लोग अब वैसे भी परवाह नहीं करते। यह एक तरह से अच्छा संकेत है कि लोग किसी की निजी खुंदक, मतिमूढ़ता, धौंस आदि को ज्यादा तवज्जो नहीं देते। जिसे जैसा मन आये लिखता है, पढ़ता है। ऐसे में क्या दबना-दुबना।

      अब बात अभी कुछ दिनों पहले गिरिजेश जी के सर्वप्रिय ब्लॉगों के चयन कार्यक्रम की जिसमें सफ़ेद घर भी चयनित हुआ था। जब चुनिंदा दस ब्लॉगों में सफ़ेद घर का नाम आया तो अच्छा तो लगा ही लेकिन मन तिक्त भी हुआ उन चिलगोजइयों से जिनमें कहा गया कि एलिट ब्लॉगर है, फलां हैं ढेकां हैं। उस पर कई जगह और कई तरह से बहसें हो चुकी हैं इसलिये उसपर ज्यादा न कहते हुए मैं उन स्नेहीजनों के प्रति बहुत-बहुत आभार प्रकट करता हूं जिन्होंने सर्वप्रिय ब्लॉगों की लिस्ट में सफ़ेद घर को भी शामिल किया....औऱ उन्हें भी आभार जिन्हें मेरा ब्लॉग अनुपयुक्त लगा क्योंकि मेरा खुद का मानना है कि ऐसे ढेरों ब्लॉग हैं जो मुझसे भी ज्यादा अच्छा लिखते हैं, उनकी थीम अच्छी है, सोच अच्छी है लेकिन चयन प्रक्रिया में नामांकित न हो पाये या कहीं न कहीं हम ही चयन करने में चूक गये। इस कवायद में चयन प्रक्रिया की अपनी सीमाएं भी थी लेकिन गिरिजेश जी ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की ताकि लोगों को चयन प्रक्रिया में शामिल किया जाय, उनकी बातों का मान रखा जाय।  खैर, इन तमाम बातों पर मची बमचक के आलोक में हाशिम रजा का शेर बहुत सटीक लग रहा है जिसमें वे कहते हैं कि

महफ़िल में लोग चौंक पड़े मेरे नाम पर
तुम मुस्करा दिए मेरी कीमत यही तो है :-)

 हां,  बमचक से याद आया कि अभी कुछ समय पहले ही बमचक सीरीज सफ़ेद घर में शुरू हुई है। उसकी कुछ पोस्टें हिडन तौर पर लिखी जा रही हैं तो कुछ प्रकट तौर पर सफ़ेद घर में पब्लिश भी होंगी। कुछ पोस्टों के पब्लिश न होने का कारण है मेरी वह फिल्म स्क्रिप्ट जिसके कुछ अंश इसी नाम से रजिस्टर्ड हैं और उसके मूलप्लॉट को तब तक प्रकट करना ठीक नहीं जब तक कि उसका फिल्मीकरण न हो जाये या प्रिंट में न आ जाय। कोशिश रहेगी कि बमचक दोनों रूप में लोगों के सामने लाया जाय। हांलाकि इसमें गालीयां हैं, भदेस बतकूचन है, देशज तंज है जिन्हें आम बोलचाल में असंस्कृत या अशिष्ट भी कहा जाता है लेकिन यही तो जमीनी भारत है, कहीं न कहीं हम रोज इस तरह की भाषाओं से रूबरू होते हैं। और फिर बमचक तो बमचक है । लिख इसलिये रहा हूं कि मुझे पता है कि इस तरह के बमचक साहित्य लिखने की एक उम्र होती है.......बुढ़ौती में बमचक नहीं लिख सकता क्योंकि बुढ़ौती शुचिता और शालीनता का ओढ़ना ओढ़कर दूसरों के लिखे बमचक को कोसने की उम्र है :-)

    अंत में अपने चार सैकड़े वाली इस पोस्ट को यहीं विराम देता हूं। आशा है सुधीजन बुरा न मानेंगे, और जिन्हें बुरा लगे वो बमचक पढ़ लें,   हो सकता है उसके भदेसपन को देख बुरा मान लेने वाला पैमाना और ज्यादा  उपर की ओर  उठे  :-)

- सतीश पंचम

( सभी तस्वीरें  जौनपुर के एक मेले की हैं जिन्हें अपने कैमरे से मई-2012 में  'हिंचा' था )

Tuesday, June 26, 2012

अग्निबाज क्लासेस

     जैसे ही  खबर आई कि दिल्ली के किसी सरकारी आफिस में आग लगी है, सारे के सारे न्यूज चैनल अपनी ओवी वैन को लेकर चल पड़े मंत्रालय की ओर, पता चला कि हल्की फुल्की आग है, संभाल लिया गया। सुनते ही कुछ के चेहरे मुरझा गये। मन ही मन एकाध तो गरिया भी रहे थे - हुंह ये भी कोई आग है, एक बित्ते भर की जगह पर सुलग कर रह गई। लेकिन आगजनी की इन बढ़ती घटनाओं से इतना जरूर पता चल रहा है कि कई लोग मना रहे होंगे कि “हे अग्निदेवता, जैसे सबका भला किये वैसे हमरा भी भला करो एकाध चैंबर वैंबर और जला दो, हाथी दफ़्तर..... खजूर दफ़्तर  ...समझ रहे हो न....”

      उधर इन अग्निकांडों से सरकारी सांडों में अजब सी खुशी देखी गई। जो पक्ष में हैं वे भी खुश जो विपक्ष में हैं वे भी खुश। इस धींगामुश्ती में उद्देश्य यही है कि जनता तक संदेश पहुंचे और उसी रूप में पहुंचे जिस रूप में पहुंचाना चाहते हैं। विपक्षी कह सकते हैं कि सरकार ने अपनी नाकामी छुपाने के लिये मंत्रालय को दिन-दहाड़े लाक्षागृह की तरह जलवा दिया। खड़े-खड़े फूंकवा दिया। उधर सरकार कह सकती है कि हम तो जांच के अंतिम दौर में थे लेकिन आग लग गई। अब फिर से जांच बैठानी पड़ेगी लेकिन अभी तो मंत्रियों के बैठने तक के लिये कुर्सी टेबल नहीं है, जांच तो दूर की बात है। सहयोगी दलों या आपस में न बन पा रहे नेताओं की जूतमपैजार भी जमकर होगी। जिस किसी को इस अग्निकांड से सबसे ज्यादा लाभ होता दिखेगा वह माईंडगेम खेलते हुए और जोर से चिल्लाकर कहेगा – “मेरा दफ्तर ही सबसे बुरी तरह क्यों जला ? जबकि वहीं बगल में फलाने ढेकाने जी का ठीक से क्यों नहीं जल पाया, यह घोर अलोकतांत्रिक है, इस पर कड़ी जांच होनी चाहिये”।

   उधर सुनने में आया है कि यह आग वाला फंडा पाकिस्तान में भी आजमाने की कोशिशें हो रही हैं। कई विशेषज्ञ पासपोर्ट वीजा की लाईन में लग लिये हैं। अपने अपने आकाओं की ओर से डांट भी सुन चुके हैं कि इतना बेहतरीन आईडिया दिया क्यों नहीं अब तक। किस बात के पैसे लेते हो। जाओ भारत जाकर आओ और देखो आग कैसे लगानी चाहिये, खामखां तुम लोगों की काहिली के चलते अपने पीएम बदलने पड़े। पहले बताये होते तो हम भी कुछ जुगाड़ करते। उधर अंदरखाने में बातें जो निकलकर आ रही हैं वे कहती हैं कि आगजनी की घटना जानबूझकर पाकिस्तान को चिढ़ाने के लिये की गई ताकि उसे नीचा दिखाया जा सके। पूरा इंतजार किया गया कि जरदारी हटें और फिर ......।

  इधर ट्रैक-टू डिप्लोमेसी वाले गवैये-बजनिये भी हैरान हैं कि भारतीय पक्ष ने आईडिया शेयर करने में कंजूसी दिखाई जबकि द्विपक्षीय समझौतों में ये बात खुलकर कही गई थी कि एक दूसरे की स्टेबिलिटी और सुविधा का खयाल रखा जायगा ताकि अमन कायम रहे। लेकिन भारत ने अपनी ओर से समझौते के अनुसार कुछ भी शेयर नहीं किया और स्थिर पाकिस्तान अस्थिर हो उठा। प्रधानमंत्री बदल उठे। पॉलिटीकल फ्रंट पर यह अच्छा संदेश नहीं है। कुछ ट्रैक-टू डिप्लोमेसी वाले दबे छुपे कह बैठे कि जैसे क्रिकेट में खेलभावना जैसा कुछ होता है वैसा पॉलिटीकल फ्रण्ट पर भी कुछ होना चाहिये।

 उधर सचिव स्तर के अधिकारी आपस में बातें करते पाये गये कि वर्मा की कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट जिसमें उसके कदाचार का वर्णन था औऱ उसके खिलाफ जा सकती थी ... वह भी स्वाहा हो गई है। यादौ जी को कल कचौड़ी गली में ढेर सारी खरीददारी करते देखे गये तो एक बंदा लपट लिया।

“और यादौ जी, फाइल जलने की खुशी मना रहे हैं”

“अरे नहीं, हम तो तनिक...”

“मनाइये मनाइये, लेकिन आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि आपकी वो पम्पापुर वाली फाइल जली नहीं है, अब भी स्टोर रूम में छंटाई, बटोराई का काम चल रहा है। वहीं लाल रंग वाली आपकी फाइल अधखुली पड़ी थी”

“अरे तो...”

“अरे तो अरे तो मत करिये....अभी भी समय है.....एक झटके में वहां से फाइल खसकवाई जा सकती है, बस तनिक प्रेम ब्यौहार बनाइये तो...”

“अरे तो आप लोग अपने आदमी हैं...आप से क्या छुपाना...काम हो जाने दिजिए.....हम कहां भागे जा रहे हैं”

“भागने की बारी आपकी है यादौ जी, बोलिये डील करेंगे या स्वर्णिम मौके का लाभ न ले पाने वाले वंचितो में नाम लिखवाकर अमर होना चाहेंगे”

“कितने” ?

“यही कोई पांच पेटी। ज्यादा नहीं है, इतना तो आप एक्कै महीना में झोर कर रख लेंगे”

“लेकिन”

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं, आपकी लाल फाइल जल उठी समझिये। नोट गिनिये तो आगे बात चलाऊं”।

“लेकिन ....”

“अरे अब भी लेकिन....एक आप ही नहीं हैं और लोग का भी फाइल सूखाया जा रहा है खुले में.....ज्यादे लेकिन करना हो तो हम चले आप लेकिन लेकिन करते रहिये....”

“ठीक है हम दे रहे हैं लेकिन हमारी फाइल लाल नहीं थी, वो तो नीली वाली थी, आप लोग कोई गलती तो नहीं कर रहे” ?

“यादौ जी, आपको क्या हम बेवकूफ लग रहे हैं। लाल फाइल नीली फाइल छोड़िये....अभी और जगह भी जाना है..ई फोन किसका आ गया ओह.......हां सर, जी सर....जी वो अपना ही आदमी है....लगाने दिजिए .....बहुत अच्छे से आग लगाता है.....हां हां पूरा बिसवास है....टरेनिंग हम ही दिया हूं उसको.....जी जी”

“तो आप लोग आग लगाने की ट्रेनिंग भी देते हैं क्य़ा” ?

“क्लासेस चलती है महराज क्लासेस। और फिर हम तो शिक्षाव्यवस्था में अगाध आस्था रखते हुए अपने चेलों को वेल ट्रेन्ड करते हैं, इतना कि एक दिन हमारे आफिस को ही उन चेलों ने आग लगा दी और कहने लगे कि सबने समय पर फीस दी थी। रिकार्ड ऑफिस जला उसमें हमारा क्या दोष। तो हमने उसी दिन जान लिया कि हमारी ट्रेनिंग परफेक्ट रही। अब ये चेले जिस भी प्रदेश में जाएंगे, आराम से कमा खा लेंगे। क्योंकि न घोटाले थमेंगे न उनकी जाचें रूकने वाली है, यह देश ऐसे ही चलता रहा है चलता रहेगा। इसे ज्यादा तेज चलाने की कोशिश करोगे तो सिंगुर की तरह औंधे मुंह गिर जायेगा और धीरे चलाने लगोगे तो नक्सली हिंसा में अपने विधायकों तक को बंधक बनवाना पड़ेगा। लेकिन यह मैं आपको क्यों बता रहा हूँ। आपको तो अपनी अधजली फाइल को ठिकाने लगाना है न....कहिेये करना है नहीं करना है”।

“करना है....वैसे क्या नाम बताया आपने अपने ट्रेनिंग इ्स्टिट्यूट का....” ?

‘पप्पू अग्नि संचालनालय’… वो क्या अपना ही दफ्तर तो है सामने, अभी कल ही ट्रेनिंग के दौरान जला दिया गया। बार बार बंगाल आने जाने में बहुत टाईम लग जाता और खरचा भी बढ़ जाता था। सो हमने इन्नोवेशन दिखाया और उसी खरचे में अपने ऑफिस को ही जलाकर लगे हाथ डेडिकेशन भी दिखा दिया। आज दूर दूर से लोग यहां ट्रेनिंग लेने आते हैं। अभी देखिये दू घंटा में फिर खड़ा कर देंगे। क्या है कि कम्पटीसन बहुत बढ़ गया है। हमारे अलावे और लोग इस फील्ड में आ गये हैं तो कमिटमेंट और डेडिकेशन तो दिखाना ही होगा। अब जो अपने ऑफिस तक जला देने में न हिचकिचाये उससे बढ़कर अग्निबाज भला और कोई क्या होगा……बड़ी मेहनत से यह साख बनती है”  :-)

   
- सतीश पंचम

Monday, June 18, 2012

धइलें रही हमके भर अंकवरीया.....बमचक - 8

      तन्मय ने कुछ लोगों को अपनी बर्थ पर कब्जा किये देखा तो पूछ बैठा,- "भाई साब, आप लोगों का टिकट" ?


"टिकस तो है लेकिन वेटिन्न में है, क्या करें हम तीन महीना पहले से टिकस निकाले लेकिन तब्बौ कन्फम नहीं हो पाया".

"लेकिन मेरा तो कन्फम है, मुझे तो बैठने दिजिए"।

"हां हां बैठिये न आप ही की सीट है इसी में हम लोग भी चल चलेंगे...तनिक खसकिये बैठने दिजिए भाई साब को"

"कमाल है, सीट एक की है और आप लोग इतने मतलब क्या मेरे उपर बैठ कर चलेंगे"

"अरे नहीं भाई, आप को कौनो असुविधा नहीं होगी, आप निसाखातिर रहें ये तो मजबूरी आय गई है जो जाना जरूरी है नहीं तो हम खुदै किसी को तकलीफ नहीं देना चाहते"

"लेकिन तकलीफ तो दे रहे हैं"

"अब थोड़ा बहुत असोविधा प्रेम ब्यौहार में चल जाता है..है कि नहीं....आपको हम बेलकुल तकलीफ न होने देंगे, आप सोइये जितना सोना है, जहां सोना है हम लोग हे....यहीं भूईंया बिछाकर चल चलेंगे"।

"अजीब जबरदस्ती है"

"भाई साब आपसे जबरी हम नहीं करेंगे भाई, ई तो मोसीबत है तो जाना पड़ रहा है"

"देखिये अभी टीसी आएगा तो मुझे बात करनी पड़ेगी आप लोग इस तरह .....आखिर एक दो घंटे का रास्ता थोड़ी है पूरा चौबीस घंटा"

"तो वही आप भी हमारी परेसानी समझिये न, हम लोग भी एक दो घंटा का रास्ता होता तो खड़े-खड़ चल चलते लेकिन अब चौबीस घंटा अपाढ़ हो जाता है, अब देखिये उहां बाथरूम के पास कुछ लोग हैं लइका बच्चा लेके, चाहते तो हम भी उहां बइठ सकते थे लेकिन जो पहले से तकलीफ में है उसे और तकलीफ देना ठीक नहीं न है"।

         तन्मय उनकी बातें सुन हैरान हुआ कि एक तो ससुरे मेरी सीट कब्जियाये हुए हैं तिस पर अपनी दयालुता को भी तिखार रहे हैं, इनसे कैसे पार पाया जाय। तभी 69, 70 बर्थ वाले यात्री भी आ गये। एक महिला, एक पुरूष, और एक आठ दस साल का बच्चा। बतकही फिर शुरू हो गई।

"आप लोग का सीट" ?

"यहीं समझिये"

"समझने का क्या मतलब है" ?

"अरे भाई अभी यही बात तो मैं इन भाई साहब को समझा रहा था कि हम लोगों को जाना ओही ठिन है त काहे न संगे संग चल चलें"

"संग संग चल चलें क्या अइसे ही चल चलें, उठिये आप लोग सीट खाली किजिए"

"अरे भाई साहब हम लोग आप लोग को कौनो तकलीफ नहीं देंगे मान कर चलिये"।

"अरे तो मानने न मानने की बात बाद में है अभी आप सीटिया तो खाली किजिए, देख रहे हैं लड़का बच्चा लिये हैं तौने पे आप लोग उठ नहीं रहे"

"अरे त आप का सीट उपर का दोनों न है, हम तो नीचे बइठे हैं भाई साहब से पूछिये"

"ये लोग आपके साथ हैं" ?

"अरे नहीं, आप ही की तरह मैं भी परेशान हूं, मेरी सीट पर ही बैठे हैं और ..."

"अरे तो हटाइये न, जब इन लोगों का टिकट नहीं है तो क्यों जबरी बइठे हैं लोग"

"कह तो रहा हूं लेकिन सुन नहीं रहे"

"अब भाई साब आप लोग से हाथ जोड़ के बिनती है हट जाइये न अभी टीसी आएगा तो खुदै उठा कर बहरियायेगा, उससे पहले ही आप लोग अपना कहीं और ठिकाना ढूंढ लेते तो अच्छा था"।

"अरे तो हम कहां मन कर रहे हैं कि नहीं हटेंगे, आप की सीट है आप बैठिये तनिक सरकिये पांड़े जी, आइये बइठिये"

"अरे आप लोग समझते क्यों नहीं, लेडिज हैं साथ में बच्चा है एक और ...."

"अरे भई हम भी बाल बच्चे वाले हैं, हे यादौ जी हैं साथ में पूछिये हम लोग अभी एक बिबाह के सिलसिले में लड़का देखने जा रहे हैं, टिकस कन्फरम न हो पाया तो मजबूरी है"

"अरे तो जाइये न कोई और जगह"

"अरे भाई साब, आइये हम उठ जाते हैं, बइठिये, रामबचन जी आप बइठिये, सब लोग उसी में चल चलेंगे पारी क पारा आप को कोई तकलीफ नहीं होने दी जाएगी"।

    महिला और उसका बच्चा, खाली हुई जगह पर सिमटे-सिकुड़े जैसे तैसे बैठ गये। तीनों में से एक जो खड़ा हुआ था उसकी भावभंगिमा कुछ शहीदाना थी, मानों त्याग की मूर्ति हो। असर इतना कि उसके त्याग को देख तन्मय को अपनी सीट त्यागने की इच्छा हो गई लेकिन उससे त्यागा न गया, मामला चौबीस घंटे की लंबी यात्रा का ठहरा। जैसे तैसे मामला इस बात पर सुलझा कि अभी चले चला जाय आगे जाकर समझ लिया जायगा।

            गाड़ी छूटने में अभी एक दो मिनट की देरी थी। अब तक काफी लोग डिब्बे में सेटल हो गये थे और जो नहीं सेटल हो पाये थे वे टीसी नामक कल्कि अवतार का इंतजार कर रहे थे जिससे उम्मीद थी कि वो आएगा और सबकी सीटें कन्फर्म कर देगा, सबको उबार लेगा, सारी अड़चनें छूमंतर हो जाएंगी। और वाकई में कल्कि का अवतार लिये टीसी प्रकट भी हुआ लेकिन यह छोटा कल्कि था बल्कि 'थी' कहना उचित होगा। पंजाबी सलवार सूट के उपर से काला कोट पहने, हाथ में रसीद बुक और उस रसीद बुक के नीचे एल्यूमिनियम का छोटा सा टुकड़ा। कुल मिलाकर यही धज थी उन मोहतरमा की। पहुंचते ही उद्गार कुछ यूँ हुए – "हाँ भाई, किसी का कोई चालू टिकट कन्फरम कराना है, किसी को कोई फाइन ओइन भरना हो तो भर दे"।

        उन महिला कल्कि की उद्घोषणा सुन तन्मय को महसूस हुआ कि वाकई कोई अच्छा सा युग आ गया है कि लोग फाइन भी घोषित अंदाज में भरने-भरवाने लगे हैं। कि भई ल्यौ...ये हम इनके साथ जा रहे हैं, इनका टिकट कनफम है और मेरा चालू ....जो चारज बन पड़े लगा दिजिए...देने को तइयार हूँ। भला इस तरह की इमानदारी सतयुग में हो सकती है, वहां तो एक से एक चालू लोग थे लेकिन मजाल है जो रसीद कटवाये हों कभी। इधर तो एल्यूमिनियम के पतरे पर बाकायदा कार्बन कापी रखकर रसीद काटी जाती है।

    उन मोहतरमा की बात सुनकर तन्मय के उपर वाली बर्थे के बाशिंदे कुछ कहने को हुए - "देखिये बहन जी हमारी सीट पर ये लोग कब्जा किये हैं"।

उन लोगों की ओर देखकर बहन जी ने प्रश्नवाचक हो पूछ लिया – "आप लोग का कौन टिकट है" ?

"जी वेटिंग है कनफम नहीं हुआ है"

"तो इन लोगों की सीट पर आप लोग क्यों बैठे हैं" ?

"अरे हम कहां बैठे है, बस संग साथ चल चलेंगे, सीट तो आखिर उनकी ही है"

"तो बैठने दिजिए" – कहते हुए मोहतरमा आगे कहीं किसी का उद्धार करने चली गईं, जाते जाते एक और वक्तव्य देतीं गईं कि - "आगे लाइन टीसी आएंगे उनसे बात किजिए, सीट आपको जरूर मिलेगी आपकी है तो परेशान न होइये...हां भई किसी का चालू टिकट है जो रसीद बनवानी हो तो बनवा लिजिए न आगे जाकर ज्यादा चार्ज पड़ जायेगा"।

  अब मोहतरमा रसीदों की सेल लगाने के मूड़ में आ गईं थीं। ले लो...जल्दी से ले लो न बाद में भाव बढ़ जायेगा।

        तन्मय ने मन ही मन सोचा – शायद कोई बड़ा कल्कि आयेगा तब ही उद्धार होगा, तब तक ऐसे ही बैठे चला जाय। इसी सोच विचार में गाड़ी खुल गई, ट्रेन रेंगने लगी..... लोग टाटा बाय बाय करने में लग गये। जो लोग छोड़ने आये थे वे खिड़की की छड़ पकड़ खुद भी कुछ देर रेंगते हुए रेंगे और फिर जिस तरह से शेयरों, इन्श्यूरेंस आदि के विज्ञापनों में मार्केट रिस्क जल्दी जल्दी बोला जाता है कुछ उसी अंदाज में अपनी छिटपुट बातें तेजी-तेजी से कहते हुए बिना कोई रिस्क लिये ट्रेन की छड़ से अलग हो लिये।

       तन्मय ने अब अपने आसपास नज़र दौड़ाई। सामने की सीट पर कोई परिवार था जिसमें एक उम्रदराज दम्पत्ति और एक बाइस तेईस साल का लड़का था। साईड सीट नंबर 71 पर कोई बीस इक्कीस साल का लड़का झोला लिये बैठा था। उसी के पास 72 नंबर पर कोई राजस्थानी पगड़ी पहने एक शख्स बैठा था जिसकी फोन पर बातचीत से पता चल रहा था कि उसके कुछ संगी-साथी बगल के डिब्बे में भी थे जो इस मोहनजोदड़ो और हड़प्पा काल के रेल सिद्धांत को अवैध साबित करता था जिसके अनुसार रेलवे लोगों को जोड़ती है। उस शख्स के सामान की तरफ नजर पड़ने पर वहां केवल एक काले रंग की सरकारी खजाना ढोने वाली कलेक्शन पेटी थी जिसे अक्सर कोषागार की यात्रा जैसा आनंद लेने में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यह शख्स तो सरकारी नहीं लग रहा, फिर आसपास कोई अधिकारी या मुंसिफ भी तो नहीं दिख रहा.....और तभी किसी के मोबाइल पर कुछ बजने सा लगा.....इस हड़हड़- तड़-तड़ में तन्मय का ध्यान ही नहीं गया कि असल चीज तो अभी सुना ही नहीं जो ऐसी यात्राओं का मौजूं हिस्सा है......यानि किसी शख्स की लहरीया मोबाइल....और बोल भी क्या खूब फूट रहे थे.....


अपने पियवा से निहोरा करिस गोरिया
नजरीया के सोझा रहीं जी

ध्यान देने पर कुछ और बोल सुनने मिले...


नेहिया के सुख खोजे देहिया
एतना मत तरसाईं
चार दिन के रहे जवानी
फेर ना लौट के आईं
कर लीं कुछ दिन नैन मटक्का
मन मोरा बहलाईं

धइले रहीं हमके भर अंकवरीया
नजरीया के सोझा रहीं जी

अपने पियवा से निहोरा....
- Satish Pancham

( जारी....)

(बमचक सीरीज़ की कुछ पोस्टें पहले ही पब्लिश हो चुकी हैं...जिन्हें बमचक लेबल के साथ यहां पढ़ा जा सकता है )




Sunday, June 17, 2012

देस बटुरा रेलवई के डिब्बे में - बमचक-7

Disclaimer : बमचक सीरीज़ में कुछ शब्द अश्लील, गाली-गलौज वाले, अपठनीय भी हो सकते हैं, अत: पाठकों के अपने विवेक पर है कि बमचक सीरीज़ पढ़ें या नहीं।

(बमचक सीरीज़ की कुछ पोस्टें पहले ही पब्लिश हो चुकी हैं...जिन्हें बमचक लेबल के साथ यहां पढ़ा जा सकता है )

बमचक - 7 ( देस बटुरा रेलवई के डिब्बे में )

       तन्मय प्लेटफॉर्म की ओर आगे बढ़ ही रहा था कि बगल से गुजरते यात्री के सामान से टिक्क टिक्क की आवाज आने लगी। ध्यान दिया तो यह उस यात्री की लोहे की हरी पेटी थी जिसे सिर पर रख बगल वाला यात्री चल रहा था। हरे रंग की पत्रे वाली पेटी पर रंग बिरंगे फूलों की चित्रकारी थी। यह टिक्क टिक्क की आवाज उसी टीनहे पेटी के दबने से आ रही थी। एक पल को तन्मय के जेहन में अमेरिकन टूरिस्टर का विज्ञापन आ गया….और हंसी भी आई कि हम टूरिस्टर भी ढूंढते हैं तो अमेरिकन जबकि एक से एक रंगीन पेटीयों वाले इंडियन टूरिस्टर चलते फिरते मिल रहे हैं और वो भी टिक्क...टिक्क...टिक्क...टिक्क।

“ए रूक.....जाता किदर.....तेरे को रूकने को बोला तो सुनने को नईं आता क्या”

    अपनी सोच में आगे बढ़ता तन्मय एक पल को इस आवाज को सुन ठिठका कि कहीं उसे ही न बुला रहा हो कोई लेकिन फिर बिना कोई ध्यान दिये आगे बढ़ चला।

“अरे ए तेरे कोइच बुलाता मय.....”

     अबकी तन्मय ने पलटकर एक नज़र उस ओर देखा....साथ चल रहे दूसरे यात्री ने भी पलटकर आवाज की दिशा में देखा कि कहीं सम्बोधन उसके लिये न हो । यह एक पुलिसिया था जो डंडा फटकारते उस गरीब से दिखने वाले तन्मय के बगल में चल रहे यात्री से कह रहा था। बहुत संभव है यह यात्री अनरिजर्व्ड यात्रियों की कतार में खड़ा होने जा रहा हो । अनरिजर्व्ड यानि ‘चालू’ क्लास. पता नहीं किस बंदे की दिमाग की उपज थी यह ‘चालू क्लास’ कैटेगराइजेशन बाकि तो क्या एसी, क्या स्लीपर सभी ओर चालूगिरी समान रूप से विद्यमान है, फिर इस अनरिजर्व्ड कैटेगरी को ही ‘चालू’ क्यों कहा जाता है जानने वाला जानें. समझते देर न लगी कि अब यह पुलिसिया उसके टीन की रंग बिरंगी पेटी को सबके सामने खुलवायेगा, कुछ ऐसी वैसी चीज के नाम पर उसे परेशान करेगा और फिर दस पांच लेकर छोड़ देगा। चूंकि अभी गाड़ी आने में काफी समय था इसलिये दूर से यह माजरा देखने में कोई हर्ज न था। मजदूर यात्री ने अपने सिर पर रखे बाकस को पुलिसवाले के कहने पर उतार दिया। फिर शुरू हुई कीच-काच।

“तेरे को बुलाया तो सुनने में नहीं आता क्या” ?

“हमको लगा आप दूसरा किसी को बोलाय रहे हैं”

“दूसरा किसको बुलाएन्गा” ?

“अरे और भी त लोग हैं न तो....”

“ज्यादा बकवास नईं...क्या लिया है पेटी में” ?

“कपड़ा है साहेब”

“कपड़ा और क्या” ?

“कपड़ा ही है और कुच्छ नहीं है”

“खोल”

“अरे बहुत मोसकिल से भरे हैं साहेब खोलेंगे फिर रखेंगे आखिर क्या फायदा” ?

“तू फायदा बियदा मत सिखा चल खोल.....बोला वो करने का”

“अरे साहेब काहें परेसान कर रहे हैं कपड़ा है और कुच्छो नहीं है”

“तेरे को खोल बोला ना चुपचाप खोलने का”

    अब यात्री ने अपनी शर्ट के अंदर सीने के पास टटोल कर जनेऊ निकालना शुरू किया....एक छोर पर चाभी बंधी मिल गई।

“आईला हजार बारा सौ का चीज के लिये तू चाभी किदर किदर रखता है रे”

“अरे साहेब आप लोग खाली परेसान किये हैं...कह रहा हूं कुछ नहीं है” - रूआंसा होते हुए यात्री ने कहा.

“इदर नहीं, उदर टेबल पर लेकर चल.....”

      यात्री ने कहे अनुसार पेटी जमीन पर खोलने की बजाय बगल में रखे टेबल पर रखकर खोलना शुरू किया। तन्मय ने अनुमान लगाया कि इस मजदूर से दिखने वाले शख्स के पास कुछ ज्यादा माल-पानी तो होगा नहीं लेकिन जो कुछ भी होगा वह उसके लिये बहुत ज्यादा मायने रखता होगा। साल डेढ़ साल तक ठेला खेंचकर, सब्जी बेचकर, पेट काटकर उसने बचाकर रखे होंगे कुछ रूपये जिन्हें कपड़े की किसी तह में सिल दिया होगा। अंदर की पेट-जेब या पीछेवाली जेब का कोना। कहीं न कहीं हजार हजार की शक्ल में आठ दस गांधी छुपे होंगे।

        उधर पूछताछ शुरू हुई – “मोबाइल किसका है......पावती किदर है, मालूम नई चाइना मोबाइल नहीं चलता है....रोड से लिया तो भी पावती सकट लेना मांगता ना....कल को कोई टेररिस्ट अपना फोन यूज करके मार्केट में उसको बेच दिया अन चेकिंग में हाम लोग को ये फोन तेरा पास मिला तो तू तो गया ना बारा के भाव....देखो हाम आच्छे के लिये बोलता है.....और ये क्या सादी के वास्ते लेके जाताय क्या.....किसका.....लड़की का शादी है तो अइसा दागिना-बिगिना लेके जाता है क्या कोई.....च्छे....कइसा रे तुम लोग....ज्वेलरी वाला को बोलने का ना एक डिब्बा दो...ये अइसा क्या पेपर में बांध के सोने का चेन लेके जाता ए.....अरे जागा घेरेगा तो घेरने देना तेरा सामान तो सई रेगा.....लेके जाता सोने का चेन वो भी पेपर में बांद के.........ये चांदी का पायल किसका वास्ते ले जाता ....अउरत का वास्ते.... किदर रेती है तेरा अउरत.......गाव में रेती है मतलब फिर इदर तेरा काम कैसे चलता है.....आ...”

       उधर लोगों का हुजूम प्लेटफार्म पर आना शुरू हो गया था। अपने डिब्बे एस-2 के जहां लगने की संभावना थी उस ओर तन्मय ने बढ़ जाना ठीक समझा। रूककर इन पुलिसियों की नोच खसोंट देखने से यात्रा में मूड़ खराब होना तय था। वैसे भी समय कितना भी बदल जाये, यात्रा की प्रकृति अपने आदिम जमाने के अनुसार ही अब भी है। पहले भी लोग यात्रा करते समय रास्ते में चोर-चाईं के मिलने से आशंकित रहते थे, लूटेरों द्वारा डकैतीयों, राहजनी आदि के चलते अपना माल असबाब गंवा बैठते थे और अब भी लोग उसी तरह यात्रा के दौरान लूटे खसोटे जाते हैं। बदलाव बस इतना हुआ है कि उस दौर के कुछ लुटेरे अब के जमाने में वेश बदल कर कहीं खाकी वर्दी में तो कहीं काले कोट-सफ़ेद पैंट तो कहीं दलालों के रूप में आ गये हैं।

     निर्धारित स्थान पर जहां एस-2 डिब्बे के लगने की संभावना था वहीं सूटकेस रख तन्मय ट्रेन का इंतजार करने लगा। लोग लगातार चले आ रहे थे। किसी के पास सामानों की पूरी खेप थी, कोई केवल झोले के साथ आया था। देखकर आश्चर्य हुआ कि महिलायें यात्रा के दौरान भी चमचम करते सलमा सितारों वाली मोटी साड़ी पहनती हैं, हाथ भर भरकर चूड़ियां। और मांग में भरा सिंदूर पसीने से भले लथपथ हो माथे तक सरक आये लेकिन पाव किलो भरना जरूरी है।

        तभी लोगों की गहमा-गहमीं ज्यादा बढ़ गई। तन्मय ने गाड़ी आने की दिशा में ध्यान दिया जहां के ओवरहेड वायर पर पीली झिर्री सी रोशनी आगे की ओर बढ़ती नज़र आ रही थी। सभी यात्री सतर्क हो गये। किसी ने अपना सामान हाथ में उठाया तो किसी ने आगे की ओर सरका दिया मानों ट्रेन रूकी और ये तुरंत अंदर घुसे। ट्रेन का इंजन अब नजर आने लगा था और फिर वह वक्त भी आया जब ट्रेन धड़-धड़ की धीमी होती आवाज के साथ निर्धारित स्थान पर आ लगी। उधर अनाउंसमेंट जारी था। “...जाने वाली ट्रेन प्लेटफार्म नंबर दस पर लग चुकी है....यात्रियों से निवेदन है कि....”।

     किसी तरह और लोगों के साथ तन्मय भी अंधेरे डिब्बे में अंदर पहुंचा। किसी के सामान का नुकाली हिस्सा पैर में चुभता सा लगा। पीछे की ओर गर्दन फेर कहना चाहा कि सामान जरा पीछे करो लेकिन उसके कहने से पहले ही जिस यात्री का सामान चुभ रहा था वह अपने से पीछे वाले यात्री को डपटने लगा – “अबे सामान पीछे कर, पैर को लग रहा है”। उस यात्री का यूं डपटना तन्मय के डपटने की लाइन और लेंथ से कहीं ज्यादा था, सो मुकाबला गैर बराबरी का देखते हुए तन्मय ने चुप रहने में ही भलाई समझी। अभी अंधेरे डिब्बे में लोग पैसेज के बीच ही सामान रख अपनी-अपनी सीट तलाश रहे थे कि कुछ लोगों को राष्ट्रकुल की तरह वाद-विवाद का मौका मिल गया। जिनकी ध्वनि और कंपन स्तर कुछ इस उंचाई पर था कि पीछे से चढ़ रहे यात्री जो सामान सिर पर लिये खड़े थे वे चुपचाप खड़े रहे कि पहले उनका निपट लेने दो। तन्मय ने ध्यान दिया तो बतकही कुछ यूं चल रही थी।

“आपका कौन सा सीट नंबर है दिखाइये” ?

“यही तीस और बत्तीस है लेकिन हम क्यों दिखायें टिकट पहले आप दिखाइये”

“अरे भई अभी कन्फर्म हो जायगा कि आप ही हैं टिकट पर कि हम हैं”

“अरे यार तीन महीना पहिले टिकट निकारे हैं और कह रहे हो कि…..”

“अरे तो हम कहां कह रहे हैं भईया कि आज ही निकाले हो, हम भी तो वहीं तीन महिना पहले का टिकट निकारे हैं”

“देखिये यही है तीस और बत्तीस”

“अरे यार तुम गलत डिब्बे में आ गये हो, ये एस-टू है और आपका टिकट एस-थ्री में है”

“तो ये डिब्बा....अरे रजिन्नरवा साले यही देखा था रे....उठा उठा सामान ....कह रहा था देख कर बइठना...यही पढ़ाई किये हैं डिब्बा तक नहीं चीन्ह पाते”

“अरे चलो यार रास्ता तो छोड़ो पढ़ाई निहार रहे हो...देख रहे हैं सामान लेकर लोग खड़े हैं इहां ये फरियवा रहे हैं”

“अरे आन्हर हैं दिखाई नहीं देता था कि कौन डिब्बा में चढ़ रहे हैं”

“अरे आप तो आन्हर मत बनो, आपका सामान छूआ रहा है हमें”

“अरे पैरवा उपर कर लिजिए तो हम यहां सामान रख दें”

“अरे आराम से भईया तनि समथर हो जाने दो...”

“ए बिट्टी वहीं रख सामान हां, तीस अउर एकतीस है”

“ए नरायन...चूतिया नाहीं त इहां आवा यार टार्च देखावा....उहां लांड़ चाटै खातिर खड़ा है....”

“अरे तो बोलो साइड हो जाने को....कि थून्ह अस खड़े रहोगे वहीं पर....”

“अरे लाइट नहीं है डिब्बा में और...”

“पबलिकियै चूतिया है तो गौरमेंट का करी...यही अभी दूसर कौनो साउथ वाली टरेन होती तो मार कर लेती पबलिक और टेसन मासटर ससुर हाथ जोड़ के लाइट देता”

“अरे चुप रहो आर....फालतू बोलत हय...अबहीं चढ़तैं हैं सब लोग तबले गौरमेंट एनकर लाइट ठीक करै आई”

“आप कहां तक जा रहे हैं” ?

“इलाहाबाद तक”

“अरे त हमहूं ओहीं लग्गैं ......चलिये चल चला जाई”

“अरे ये सामान आपका है...” ?

“हां हमारा ही है”

“अरे तो रास्ते से हटाइये न”

“हटा रहे हैं भईया तनिक सबको हटने तो दो”

“अरे तो समान हटाएंगे तब न हटेंगे लोग कि अइसे ही”

“काहे गरमिया रहे हो...कह रहा हूं समनिया हटा लेते हैं त ....”

“अर्र रज्जा लाईट आय गई”

“ए तनि हाउ बटनिया दाबा त”

“हां, अरे पंखा वाला हां ओही....आंय नहीं चल रहा, अरे रेलवई वाले जो है न...टिकट का पइसा ले लेंगे और सुबिधा के नाम पर लांड़ चटा देंगे...यही तो है.....हांय, अच्छा उ साइड वाला बटन है.....तब्बै....कहूं चलता काहें नाईं बा........अब तनिक गाड़ी चली तब हवा तनी-मनी लग्गी....”

“अरे भाई साहेब समनवा त हटाकर उहां रख दिजिए”

“अरे इहां कहां ये हमारी सीट है”

“अरे तो हमारी भी त सीटिया है न यार.... हम कहां कपारे पर ढोईं....नीचे सामान रखने के लिये तीनों बर्थ वाले हकदार हैं....थिरी टीयर क मतलबै हौ कि तीनऊ टीयर वाले समान रक्खंय..... अरे तो ज्यादा सामान थोड़ो है....”

“अरे यार ये डराम ओराम कहां से ले जा रहे हो यार.......बड़े छुछमाछर हैं” यार....बताओ...डराम इहां बम्मई से ढोय के ले जा रहे हैं उहां इलाहाबाद में डराम नहीं मिलता....का कहा जाय”

“भाई साहब आप को जब सोना हो सो लिजिएगा अबहींये से काहें बीच वाली बरथिया खोल रहे हैं, देखिये आठ बजे रात तक बइठने का अलाउ रहता है उसके बाद आप सो जाइये कोई कुछ नहीं बोलेगा........नीचे वाला बर्थ का अइसे ही नियम है भाई”

    ....... और तन्मय ने इन तमाम अखिल भारतीय आवाजों के बीच अपनी 68 नंबर की निचली सीट पा ही ली”

लेकिन अभी कहां.....अभी तो सीट के और दावेदार भी तो हैं......”

“भाई साब...ये आपकी सीट है क्या.......” ?


- सतीश पंचम

( जारी....)

Thursday, June 14, 2012

मुसाफ़िर चल तो सही......बमचक -6

Disclaimer : बमचक सीरीज़ में कुछ शब्द अश्लील, गाली-गलौज वाले, अपठनीय भी हो सकते हैं, अत: पाठकों के अपने विवेक पर है कि बमचक सीरीज़ पढ़ें या नहीं.....

Note:  बमचक सीरीज़ की पिछली पांच पोस्टें पहले ही पब्लिश हो चुकी हैं...पेश है कुछ हिडन पोस्टों के बाद अगली कड़ी - बमचक -6 )

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       तन्मय सीढ़ियां उतर ही रहा था कि तीसरे माले के सावंत अंकल ने सूटकेस देखते ही पूछा – “गाव को जाता क्या” ?

“हां”

“जाके आओ ...जाके आओ.... उदर भी जाके आना मांगता...थोड़ा हावा पानी आंग को लगेगा तो आच्छा हे”

“हां वो तो है......चलो मैं जाके आता”

“सांभाल के जाओ...अं...पिताजी को हामरा तरफ से नमस्कार बोलना....अं”

“जी..जरूर बोलूंगा....”

     बिल्डिंग से बाहर आते ही तन्मय की नजरें काली पीली टैक्सी ढूंढने लगी. एक टैक्सी आ तो रही थी लेकिन अंधेरे के कारण दिख नहीं रहा था कि टैक्सी खाली है या सवारी लेकर जा रही है. करीब आने पर टैक्सी रूकते ही तन्मय ने पूछा – दादर स्टेशन

"बैठो"

सामान रखकर अंदर बैठते ही टैक्सी खट से चल दी. तन्मय ने ध्यान दिया टैक्सी वाले के डैशबोर्ड पर यशोभूमि अखबार रखा है. तन्मय को याद आया कि अक्सर यह अखबार मुंबई के उत्तर भारतीय लोग पढ़ते दिखाई देते हैं जिसमें उत्तर भारत के छोटे शहरों कस्बों की बकरी मरने से लेकर मड़ई फूंक दिये जाने तक की खबरें होती है. प्रधानमंत्री की चीन यात्रा, राष्ट्रपति की अमेरिका यात्रा इन अखबारों के लिये संक्षिप्त खबरें होती हैं, मुख्य खबर होती है...जहरखुरानी के चलते वृद्ध दंपत्ति लुटा, गहरे गढ़े में गिरने से बछड़े की मौत वगैरह वगैरह.

टैक्सी वाले ने एफ एम रेडियो चला रखा था जिसमें किसी आरजे की चपड़-चपड़ चल रही थी. विषय था – मुंबई में किन्नर समुदाय से होने वाली ट्रैफिक समस्या

बाहर की ओर नज़र घुमाने पर तमाम दुकाने पीछे छूटतीं जा रही थीं. अंबिका मेडिकल स्टोर, अन्नपूर्णा स्टील, लक्ष्मी जनरल स्टोर, विवा टेलर.....।

“कहां घर पड़ेगा” ? – तन्मय ने टैक्सी ड्राईवर से पूछा

“भोपाल”

“लगते तो यूपी के हो”

“अरे तो यूपी और एमपी केतना दूरी है, सब बाजू-बाजू में तो है”

“हां सो तो है”

“आपका कौन घर पड़ेगा” ?

“इलाहाबाद”

“हम भी इलाहाबाद गये थे एक बार नहाने”

“कब” ?

“अअ् हो गये करीब बारह तेरह साल”

“अच्छा लगा इलाहाबाद” ?

“अच्छा तो जो था सो था लेकिन एक बात कहेंगे आप बुरा न मानियेगा”

“कहिये”

“आप लोग को देखा है कि केतना भी बड़ा आदमी हो जब गांव से आता है तो जरूर एक बोरा साथ में लेकर आएगा, और बोरा में क्या होगा – चावल, दाल, खटाई, अमचूर यही सब”

“हां वो तो है”

“आप बुरा मत मानना लेकिन हमने पिछले बीस बरीस में देखा है कि जो कोई गांव से आता है भले बीआईपी का आठ हज्जार का सूटकेस रखे होगा लेकिन साथ में एक बोरा सामान जरूर लेकर आता है, पता नहीं क्या अइसा होता है कि यहां नहीं मिलता गठियाये आते हैं”

“अरे भई, अपने खेत खलिहान की चीज होती है, घर की पैदावार होती है तो लिये आते हैं लोग, अचार हुआ, मुरब्बा हुआ, सिरका हुआ”

“वो चीज तो यहां से भी मिल जाती हैं”

“नहीं वो बात नहीं है”

“तो क्या बात है” ?

“आप बुरा मत मानियेगा”

“नहीं नहीं कहिये कहिये क्या कहना है”

“दरअसिल यहां बम्मई की औरतें काम करना नहीं चाहतीं.....नहीं तो चाहती तो जो चीज गांव की औरतें बना कर दे रही हैं वही चीज यहां भी बना सकती थीं”

तन्मय के चेहरे पर हंसी खिल उठी. टैक्सी वाला बड़ा अनुभवी लग रहा था.

“अरे नहीं ऐसी बात नहीं, यहां कहां औरतें अचार पापड़ सुखाने के लिये जगह पायेंगी गांव में तो खुला छत है, खटाई, अचार, पापड़ जितना सुखाना होता है सुखाती हैं”

“नहीं साहेब, करने को तो एक खिड़की जेतना धूप में भी सूप रखकर औरतें अचार बना लेती हैं, केतना गुजराती मारवाड़ी को देखा उनके यहां सूप में रखकर ही अचार-पापड़ धूप में रख देते हैं और...लगता है आगे टराफिक है….दूसरे रास्ते से चलूं क्या” ?

“चलिये जहां से आपको जल्दी लगे”

“हां, नहीं तो शाम के धंधे के टाइम ट्रैफिक में ही अटक जाउंगा तो खाउंगा क्या....यही तो धंधे का टाईम है”

“तो क्या कह रहे थे तुम” – तन्मय को टैक्सी वाले की बातों में रस मिलने लगा था

“येही की औरतें जो गाँव में रहती आई हैं , यहां बम्मई में आकर नाजुक सुकुआर बन जाती हैं....अचार-पापड़ माल से खरीद लेएंगी और ......अ देखो इधर भी टरैफिक है....लगता है आज सब ओर जामै जाम है”

     स्टेशन पर उतर कर टैक्सी से सामान उतारते समय टैक्सी वाले ने बगल में सामान उतारते एक परिवार की ओर इशारा किया...”वो देख...मैं कहता हूं पक्का वो आदमी के सूटकेस में टाटा नमक और चन्द्रिका साबुन होगा”

“क्या” ?

“हां, लोग इहां से वो सामान भी ले जाते हैं जो गाँव में मिलता है...दिखाने के लिये....नहीं तो पता कैसे चलेगा कि बम्मई से आये हैं.......”

    तन्मय ने मुस्करा कर टैक्सी वाले को किराया पकड़ाया और चल पड़ा स्टेशन की ओर मन ही मन यह सोचते हुए – विदेशों में रहने वाले भी तो यहां आते समय वो चीजें ले आते हैं जो पहले से यहां मिलती हैं, उनके लिये बम्बई गाँव है. वहां का टैक्सीवाला भी हम इंडियन्स को देखकर इस टैक्सीवाले की भांति सोचता होगा....कम्बख्त आते हैं तो अचार और बड़ियां लादकर, इनकी औरतें जो अपने देस में खटती रहती हैं यहां लंदन-अमेरिका आकर नाजुक हो जाती हैं......

 और  तभी प्लेटफार्म पर अनाउंसमेंट सुनाई दिया - “यात्री कृपया ध्यान दें.....11211 मुंबई-वाराणसी सुपरफास्ट एक्सप्रेस थोड़ी ही देर में प्लेटफार्म नंबर दस पर आने वाली है....यात्रियों से निवेदन है कि ......”


(जारी....)


- सतीश यादव

Thursday, June 7, 2012

'राजशौचालय' रॉक्स डूड

“हे अमात्य, क्या तुम बता सकते हो कि हमारे इस अभेद्य दुर्ग में हाज़त आदि का क्या प्रबन्ध है” ?

“हे राजन्.....मैं खुद इस बारे में अपनी ओर से चिंतित हूं.....”

“चिंतित होने से क्या होगा अमात्य, हाज़त चिंता करने से मिट तो नहीं जाती”

“आपकी बातों से मैं पूर्ण सहमत हूं कल संध्या बेला राजमाते ने भी यही प्रश्न मुझसे किया था कि दुर्ग में शौचालय और मुत्रालय की क्या व्यवस्था है”

“तो क्या कहा तुमने अमात्य” ?

“राजन....अब मैं आपको क्या बताउं.....जब भी मैं दुर्ग में शौचालय निर्माण की बात करता हूं राजपुरोहित अडंगा डालने लगते हैं”

“क्यों” ?

“उनका कहना है कि दुर्ग की स्वच्छता और शुचिता के लिये शौचालय निर्माण दुर्ग के भीतर नहीं बल्कि बाहर हो”

“ऐसा शायद उन्होंने अपनी पुरोहिताई के निहितार्थ कहा होगा”

“मुझे भी ऐसा ही लगता है राजन”

“तो राजपुरोहित रोज सुबह शाम अपनी हाज़त को कैसे निपटाते हैं”

“जी वो जलपात्र लेकर दुर्ग की दीवार पर बैठते हैं”

“तो क्या वहां स्वच्छता और शुचिता बाधित नहीं होती”

“उनका कहना है कि दुर्ग की दीवार पर वे इस तरह बैठते हैं कि सम्पूर्ण पीत तत्व बाहर की ओर गिरे..... दुर्ग के भीतर की ओर नहीं”

“ये क्या बात हुई अमात्य” ?

“जी उनका मानना है कि इसके कई लाभ हैं”

“मसलन” ?

“मसलन यही कि – पीत तत्व दुर्ग की दीवार से बाहर की ओर गिरने से दीवारों पर अलग से सुरक्षा खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती

“वो कैसे” ?

“दरअसल शत्रु सेनाओं द्वारा आक्रमण होने पर सीढ़ी या रस्सी के जरिये पहले दुर्ग की दीवार ही फांदी जाती है, यदि पीत-तत्व दुर्ग की दीवार पर आच्छादित हो तो शत्रु सेनायें दुर्ग में प्रवेश करने में कठिनाई का अनुभव करेंगी....उनके सैन्य अधिकारीयों को दुर्ग में प्रवेश करने से पहले पीत-तत्वों से आमना सामना करना पड़ेगा जोकि हमारे लिये सैन्य तैयारी में अतिरिक्त समय देने में सहायक होगा”

“लेकिन तब क्या होगा अमात्य जब राजपुरोहित दुर्ग के बाहर की ओर अपना पृष्ठभाग रखकर पीत-तत्व गिरा रहे हों और शत्रु सेनाएं भाला लेकर चोंक दें”

“सो तो राजपुरोहित जाने राजन कि ऐसे में उनकी क्या रणनीति होगी”

“खैर, उसके बारे में फिर कभी सोचेंगे परंतु ये सब तो युद्धकाल की बाते हैं, शांतिकाल में क्या होगा”

“लेकिन हर कोई तो शौचालय के लिये दुर्ग की दीवार का इस्तेमाल नहीं कर सकता, राजरानी हैं, राजकुमार-राजकुमारीयां हैं, दासीयां हैं उनके लिये तो कुछ न कुछ करना होगा”

“उनके लिये अलग से दुर्ग के एक ओर स्थान निर्धारित है राजन, यहां तक कि राजशौचालय के निर्माण हेतु राज्य भर में डुगडुगी पीटवा दी गई है... प्रस्तर शिल्पकारों के लिये आवेदन मंगाये गये हैं”

“तो क्या प्रजा के लिये राजशौचालय की कोई योजना नहीं है”

“वो कैसे हो सकती है राजन....फिर तो राजा और प्रजा में कोई भेद ही नहीं रह जायेगा”

“परंतु ईश्वर ने तो बिना राजा-प्रजा के भेदभाव के सभी लोगों को दैहिक निपटान की प्रकृतिगत चाहत दे रखी है”

“वो तो ईश्वर जाने राजन कि उन्होंने ऐसा क्यों किया....परंतु राजा-प्रजा में कुछ तो भेद होना चाहिये न” ?

“तो क्या भेद करने के लिये दैहिक निपटान ही रह गया है” ?

“राजन आप तो नाहक चिंतित हो रहे हैं”

“नाहक नहीं हमें इसका उत्तर चाहिये अमात्य”

“है राजन, लोग वैसे भी अपने अपने जलपात्र लेकर दुर्ग के कोने-टीलों में स्थान ढूंढ ही लेते हैं राजन, हमें उनके लिये चिंतित होने की इतनी आवश्यकता नहीं है, वैसे भी जिसे लगी हो वह दुर्ग-अटारी नहीं देखता बस तुरंत ही ‘मुर्ग’ बन जाता है आप इस बारे में नाहक चिंतित हो रहे हैं”

“वैसे राजशौचालय के निर्माण हेतु कितने कार्षापण खर्च होने का अनुमान है” ?

“यही कोई मुट्ठी भर गेहूँ जितनी संख्या होगी”

“मुट्ठी भर गेहूँ में कितने दाने आते हैं अमात्य इसका भान भी है तुम्हें” ?

“सो तो नहीं पता राजन परंतु कोई यदि कल को पूछ बैठे कि राजशौचालय के निर्माण में मितव्ययिता बरती गई कि नहीं तो हम कह सकते हैं कि केवल मुट्ठी भर गेहूं की संख्या जितने ही कार्षापण लागत लगी है”

“हमसे भला कौन पूछेगा अमात्य...यहां के राजा हम हैं, सर्वेसर्वा हम हैं और कोई हमीं से हिसाब किताब पूछेगा” ?

“वही तो मैं कह रहा हूं राजन परंतु आप मेरी बात समझ नहीं रहे थे”

“क्या समझाना चाहते हो” ?

“यही कि आप इन सब क्षुद्र बातों को लेकर नाहक चिंतित हो रहे हैं, राजशौचालय बनने दिजिए, भव्य बनने दिजिए, प्रजा में से जिस किसी को हाज़त होगी खुद ही निपटान क्षेत्र ढूँढ लेगा”

“आप हमें बहका रहे हैं अमात्य, अभी कल ही गुप्तचरों ने हमें सूचना दी कि प्रजा में राजशौचालय बनाये जाने से असंतोष है, लोग दबी जुबान कह रहे हैं कि राजन जरूरत से ज्यादा खर्च कर रहे है”

“उन्हें कह लेने दिजिए राजन, वो तो बेचारे निरीह प्राणी हैं, प्रजाजन हैं..... उनकी बातों का भला क्या बुरा मानना”

“बुरा मानने जैसी बात है अमात्य हमने चाहे-अनचाहे समूचे राज्य को ही राजशौचालय बना दिया है, राजकीय अन्नागारों में भंडारण की समुचित सुविधा के अभाव में अनाज खुले में सड़ रहे हैं, राज्यकर्मी जहां चाहे वहां निर्माण हेतु कृषिभूमि को अधिगृहित कर रहे हैं, पगडंडियों को राजमार्ग को रूप में दर्शाते हुए राज्य-व्यय बढ़ा रहे हैं और इतने पर भी हम चिंतित न हों तो धिक्कार है हमें राज्यप्रमुख होने पर”

“राजन, वो सब दुर्लक्षित किजिए, कहां तक चिंतायें ढोयेंगे, ये सब आपको शोभा नहीं देता, वो देखिये राजमिस्त्री और राज-योजनाकार जी यहीं आ रहे हैं, कृपा करके उनके सामने अपनी चिंताएं मत व्यक्त किजिएगा, राजनीति कहती है कि कभी अपने मनोभावों को उन लोगों के सामने व्यक्त नहीं करना चाहिये जो किसी के ‘पीत-तत्व निकासीकरण’ जैसी योजनाएं बना सकते हों”

“ऐसा क्यों अमात्य” ?

“ऐसा इसलिये राजन क्योंकि ऐसे योजनाकार लोग ईश्वर की बनाई दैहिक योजनाओं तक को अपने हिसाब से विनियोजित, संचालित करने की क्षमता रखते हैं, यहां तक कि गरीबी-अमीरी जैसी बातों तक को अपने हिसाब से निर्धारित कर सकते हैं जबकि ईश्वर भी इस कार्य में सीधे दखल नहीं देते. ऐसे में समझ सकते हैं कि राज्य के योजनाकारों के सामने हमारी आपकी क्या स्थिति है”.

“तो क्या ये ईश्वर से भी उंचे लोग हैं” ?

“कुछ ऐसा ही समझिये”

“ठीक है, कल से इनके लिये भी हमारे भवन के बगल में योजना भवन बनवाने के लिये डुगडुगी पिटवाई जाये और विशेष रूप से राजपरिवार के लिये निर्धारित स्थान के आसपास ही उनके लिये भी शौचालय का निर्माण कराया जाय....वरना हो सकता है कल को इतने महत्वपूर्ण लोग राजपुरोहित की तरह दुर्ग की दीवार पर बैठ पीत-तत्व बाहर गिरा रहे हों और शत्रु पक्ष खुन्नस में आकर तोप का मुँह उनकी ओर कर दे”



- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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