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Sunday, May 27, 2012

'काकस्पर्श'

       कुछ फिल्में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में माइलस्टोन के तौर पर जानी जाती हैं, जिनमें कि मेनस्ट्रीम फिल्मों के साथ-साथ क्षेत्रिय फिल्में भी आती हैं. ऐसी ही एक माइलस्टोन मराठी फिल्म इन दिनों महाराष्ट्र के सिनेमाघरों में चल रही है – ‘काकस्पर्श’. महेश मांजरेकर द्वारा निर्मित, गिरीश जोशी की पटकथा पर आधारित इस फिल्म के नाम को देखकर मैं कुछ दिनों पहले चौंका था क्योंकि काकस्पर्श आमफहम शब्द नहीं हैं, यह अपने आप में सुनने में ही एक किस्म की विशिष्टता दर्शा देता है.


     हाल ही में जब मुंबई के चित्रा सिनेमा में यह फिल्म देखा तो जो पहली प्रतिक्रिया मन में उभरी वह यही कि जो मुकाम ऑस्कर प्राप्त फिल्म ‘THE ARTIST’ को हासिल है, काकस्पर्श भी लगभग उसी मुकाम को हासिल करने की सहज हकदार है. हांलाकि दोनों फिल्मों की विषयवस्तु भिन्न है, दोनों का कथानक बिल्कुल अलग है, दोनों फिल्मों की मानसिकता अलग है, लेकिन दोनों फिल्मों में जो चीज कॉमन है वह है ‘टाईम फ्रेम’ और उस टाईम फ्रेम को प्रस्तुति का सलीका. जी हां, यह फिल्म सन् 1930-31 के आसपास के टाईम फ्रेम को कैप्चर करती है, ठीक उसी 1930-31 के टाईम फ्रेम को जिसे The Artist फिल्म में ब्लैक एण्ड वाइट के जरिये फिल्माया गया है. लेकिन काकस्पर्श उस ब्लैक एण्ड वाइट से अलग हटकर अपनी पूरी रंगीनियत के साथ पर्दे पर उतरती है. हरा भरा कोंकण इलाके का माहौल, वहां की शीतलता, वहां की ठसक सब पर्दे पर जैसे साकार हो जाते हैं.

       फिल्म में कोंकण क्षेत्र में रहने वाले एक ब्राह्मण परिवार की कथा है जिसका मुखिया हरी (सचिन खेडेकर) है. प्रगतिशील विचारों वाला हरी मंदिर में बलि देने जैसी प्रथा का विरोधी है, कई बार रूढ़िवादियों को आड़े हाथों ले चुका है, ब्राह्मण समाज का कोप भी झेल चुका है. उन्हीं दिनों चल रही बालविवाह की प्रथानुसार हरी अपने छोटे भाई महादेव की सगाई हेतु कोंकण के ही एक गाँव जाता है. लड़की देखी जाती है, हरी उस लड़की से उसका नाम पूछता है, उसकी पढ़ाई के बारे में पूछता है और आश्वस्त होकर छोटे भाई महादेव का विवाह उस बालिका से कर देता है. विवाहोपरान्त अगले दिन महादेव को मुंबई जाना है अपनी पढ़ाई के लिये लेकिन अभी-अभी शादी हुई है, नई नवेली दुल्हन उमा घर में है और उससे विदा लेना महादेव को अच्छा नहीं लगता. तभी दोनों के बीच चल रही घिचपिच को देख महादेव की भाभी तारा यानि हरी की पत्नी अपने देवर को इशारा करती है कि फणस (कटहल) तब तक नहीं खाना चाहिये जब तक पका न हो. जाहिर है, यह कूट शब्दावली उस बालिका वधू उमा के लिये थी जो अभी शारीरिक और मानसिक तौर पर तैयार नहीं है. महादेव लजा जाता है.

        समय बीतता है और एक दिन उमा रजस्वला होती है. महादेव की भाभी तारा को पता चलता है कि देवरानी अब बड़ी हो गई है तो प्रथानुसार उसके बड़े होने पर परिवार में समारोह होता है, महिलायें मंगल गीत गाती हैं. तारा अपने देवर को संदेशा भेजती है कि उसकी पत्नी उमा अब बड़ी हो गई है, फलशोधन विधी ( प्रथम मिलन ) का समय नजदीक है. फलां तारीख को पूजा आदि रखी गई है समय पर आ जाना. पत्र पढ़कर महादेव खुश होता है लेकिन उसकी तबियत खराब हो जाती है. किसी तरह गिरते पड़ते घर पहुंचता है. उसका भाई हरि चिंतित होता है कि इसकी खराब तबियत में विधि कैसे हो. लेकिन दूसरों की सलाह पर महादेव तैयार हो जाता है कि पूजा पर बैठेगा. कार्यक्रम तय समय पर शुरू होता है और पूजा में रह रहकर महादेव को खराब तबियत की वजह से दिक्कत होती है. उधर तारा और महादेव दोनों चिंतित होते हैं. किसी तरह पूजा पाठ का कार्यक्रम खत्म होता है और सुहागरात का समय आता है. इधर दुल्हन बनी उमा सेज पर बैठी है और लड़खड़ाते कदमों से महादेव कमरे में प्रवेश करता है. उमा को अपने ओक में भरना चाहता है लेकिन खराब तबियत उसे ऐसा करने नहीं देती. एक दो बार हाथ आगे बढ़ा उमा के चेहरे को देख उसकी ओर ताकता है और सेज पर ही धराशायी हो जाता है. उसकी तुरंत ही मृत्यु हो जाती है.

     पूरे परिवार पर वज्रपात हो जाता है. उमा को अभी से अपनी दुनिया वीरान लगने लगती है. भाई की मौत से टूटा हुआ हरी मृ्त्युपरांत क्रियाकर्म के दौरान कौओं को भोजन रखता है लेकिन कोई कौआ नहीं आता, दोपहर होने लगती है और आसपास खड़े लोगों की बेचैनी के बीच हरी आगे बढ़ कुछ बुदबुदाता है और कौवे आ जाते हैं.

        उधर घर में एक बूढ़ी विधवा गाँव के नाई को बुला लाती है ताकि उमा के सिर के बाल काटे जांय, उसे विधवारूप दिया जाय, लेकिन हरी अड़ जाता है कि उमा के बाल नहीं काटे जायेंगे वह जैसे रहना चाहे रह सकती है. लोग तरह तरह के आरोप लगाते हैं कि हरी हमेशा धर्म के विरूद्ध जाता है, मंदिर में भी बलि प्रथा का विरोध किया यह उसी का कुफल है लेकिन हरि किसी की नहीं सुनता और उमा का पक्ष लेता है. घर में पूजा-पाठ के दौरान बूढ़ी विधवा अत्या चाहती है कि उमा घर में पूजा-पाठ में न रहे, उसके हाथ का पानी ईश्वर को नहीं चलेगा लेकिन यहां भी हरि अड़ जाता है कि ईश्वर की पूजा उमा ही करेगी. हरी की पत्नी तारा को अपने पति द्वारा उमा का इतना ज्यादा पक्ष लेना अजीब लगता है. धीरे-धीरे उसे शक होने लगता है कि कहीं उसके पति उमा पर आसक्त तो नहीं. उधर उमा अपने जेठ हरि द्वारा जताई गई सहानुभूति से अभिभूत होती है. उसे लगने लगता है कि इस घर में उसकी देख-रेख करने वाला कोई तो है. उमा के मायके से उसके पिता आते हैं कि कुछ दिनों के लिये उमा को लिवा जांय लेकिन हरी विरोध करता है कि नहीं उमा का यहां विवाह हुआ है, अब वह यहीं रहेगी. हरी की पत्नी तारा को अजीब लगता है कि आखिर उसके पति उमा को उसके मायके जाने क्यों नहीं दे रहे. इस बीच तारा को अचानक पेट की गंभीर बीमारी जकड़ लेती है. उसे बिस्तर से उठने बैठने की मनाही है. ऐसे में घर का सारा कार्य उमा के सिर आ जाता है. जेठ हरी के लिये कपड़ों का इंतजाम करना, तारा के बच्चों के लिये भोजन आदि का इंतजाम करना और ऐसे तमाम काम जोकि तारा अब तक करती रही है. चूंकि वैद्य के अनुसार तारा को पेट की बीमारी है और ऐसे में उससे कोई भी शारीरिक काम नहीं लेना है, तारा का पति हरि घर के बाहर ओटले पर सोता है. उसी दौरान तारा को अंदर ही अंदर शक होने लगता है कि कहीं उमा और हरि के बीच कुछ चल तो नहीं रहा. यही जानने के लिये तारा बिस्तर से उठ जाती है और जब देखती है कि उसके पति बाहर ओटले पर अकेले सो रहे हैं तो समाधान पाकर वापस मुड़ने को होती है लेकिन वहीं लड़खड़ाकर गिर जाती है. हरी की नींद खुल जाती है और तारा को उठाकर बिस्तर पर ले जाया जाता है. वहां तारा को पश्चाताप होता है कि उसने नाहक अपने पति पर शक किया लेकिन गंभीर बीमारी और अपने बच्चों की चिंता के बीच वह उमा से कहती है कि मेरे मरने के बाद तुम जेठ हरी से शादी कर लेना. दूसरी कोई आएगी तो मेरे बच्चों को नहीं देखेगी. उमा हक्का बक्का रह जाती है. उसे समझ नहीं आता कि यह क्या कहा जा रहा है. हरी भी हतप्रभ रहता है. बीमारी में की गई बकबक समझ ज्यादा तवज्जो नहीं देता. अगले ही दिन तारा की मृत्यु हो जाती है.

         अब परिवार में हरी है, तीन बच्चे हैं, एक बूढी विधवा अत्या है, और हाल ही में विधवा हुई उमा है. गांव के लोग तरह तरह की बातें करेंगे सोचकर बूढ़ी अत्या हरी से कहती है कि अब वह उमा से विवाह कर ले, वह भी उसे चाहती है लेकिन हरी तैयार नहीं होता. हां, इतना जरूर करता है कि उसके रहने-खाने, या कपड़ों आदि की कोई कमी न होने पाये. लोगों को बातें बनाने का मौका न मिले इसलिये ज्यादातर उमा से कटा-कटा रहने लगता है. समय बीतता है और बच्चे बड़े होते हैं. उन्हीं में से एक की जब शादी होती है तो बगल के कमरे में नवविवाहित जोड़े की आपसी बातें सुनकर उमा उनके दरवाजे के करीब कान लगाकर सुनती है. उन दोनों की बातें सुन रोमांचित होती है और तभी उसके सामने नजर आता है हरी जो गुस्से से उमा की इस हरकत को देख रहा था. उमा का जी धक् से हो जाता है कि जाने हरी उसके बारे में क्या सोचें. वह बिस्तर पर जाकर रो पड़ती है. अगले दिन जब हरी को उमा राशन लाने की लिस्ट देती है तो हरी सीधे न लेकर नौकर के हाथ से लेता है. अब से उमा के प्रति वह एक किस्म की बेरूखी दर्शाता है. लगातार एक ही घर में रहते हुए हरी द्वारा किये जा रहे इस अन्जाने व्यवहार से उमा आहत सी होती है. उसे समझ नहीं आता कि हरी आखिर ऐसा क्यों कर रहे हैं. उधर हरी गांव वालों को बातें बनाने का मौका नहीं देना चाहता और उमा द्वारा किसी बाहरी पुरूष से बातचीत करने पर भी रोक लगा देता है. यहां तक कि अपने परम मित्र बलवंत तक से रार ले लेता है जिससे कि उमा केवल अपना दुख प्रकट कर रही थी कि आखिर उनका मित्र क्यों इतना रूखा व्यवहार कर रहा है, हो सकता है कुछ गलती की हो मैंने लेकिन इतना सख्त व्यवहार ? उसी दौरान हरी वहां पहुंच जाता है और अपने मित्र को ताकीद देता है कि आज के बाद वह कभी बहू से बात न करे. जो कुछ कहना है घर के बाहर ही मुझसे कहे. दोनों दोस्तों में अनबन हो जाती है. समय बीतता है और उसी के साथ हरी द्वारा छोटे भाई की विधवा उमा के प्रति बेरूखी भी जारी रहती है जबकि उमा अपने जेठ द्वारा बरती गई सदाशयता और सहृदयता के कारण उसे अब भी बहुत मानती थी. विधवा होने के बाद जिस तरह हरी ने उसका साथ दिया वह एक विलक्षण बात थी लेकिन हरी द्वारा उसके प्रति कटा-कटा सा रहने वाला व्यवहार उसे असह्य हो जाता है.

        एक वक्त ऐसा आता है कि उमा और बेरूखी बर्दाश्त नहीं कर पाती और अन्न जल त्याग देती है. उसकी तबियत से घर के सभी लोग चिंतित हो जाते हैं. वैद्य द्वारा समझाये जाने पर कि उमा की तबियत ज्यादा खराब है और उसे जल्द से जल्द भोजन कराना होगा, हरी चिंतित हो जाता है. वह अब अपनी बेरूखी पर अंदर ही अंदर पश्चाताप करने लगता है. उसे बात लग जाती है कि उसके ही कारण आज उमा की यह स्थिति बन आई है. तब हरी अपने उस मित्र के पास पहुंचता है जिससे बोलचाल बंद हो गई थी. उसे उमा की हालत का वास्ता देकर मनाता है कि चल कर उमा को भोजन करने कहे. मित्र तुरंत तैयार हो जाता है. उमा के सामने जाकर वह मनौवल करता है कि कुछ पी लो, खा लो लेकिन उमा नहीं मानती. अंत में बाहर खड़े हरी का धैर्य जवाब दे जाता है. वह कमरे में आता है और सभी लोग बाहर निकल जाते हैं. उसी दौरान उमा को वह राज बताता है कि उसने अब तक क्यों उसके प्रति बेरूखी अपनाई थी, क्यों अब तक कटा-कटा रहा था. दरअसल जब महादेव की मृत्यु हुई थी तो उसके बाद कौवों को भोजन खिलाने के समय कोई कौवा बहुत ज्यादा देर तक न आया था. तब हरी ने आगे बढ़कर बुदबुदाते हुए कहा था कि – महादेव मैं जानता हूं कि तुम्हारे प्राण उमा में अटके हैं, क्योंकि तुम प्रथम मिलन के समय ही शय्या पर मृत हुए थे, मैं प्रण करता हूं कि मेरे जीवित रहते कोई दूसरा पुरूष तुम्हारी पत्नी को स्पर्श न कर पायेगा. और उसके बाद ही तुरंत ढेर सारे कौवे आ गये थे. यह बात हरी के मन को लग गई थी और यही कारण था कि वह जीवन भर उमा के लिये अच्छा-अच्छा खाने पहनने का इंतजाम करने के बावजूद उसके करीब न हुआ. लेकिन अब जबकि उमा के मन में अपने प्रति इतना प्रेम देख रहा है, उसकी जान पर आई देख रहा है तो वह तैयार है उमा से विवाह करने के लिये.

    उसी वक्त हरी अंदर जाकर अपनी पू्र्वपत्नी तारा का मंगलसूत्र लेकर लौटता है लेकिन उसके बाहर आते आते उमा अपने प्राण त्याग देती है. उमा के चेहरे पर मृत्यु पूर्व एक संतोष का भाव नजर आता है.

ऐसे में हरी के मन में एक फांस रह जाती है कि उमा की तबियत इतनी तो नहीं खराब थी कि अंदर के कमरे से मंगलसूत्र लाते-लाते उसके प्राण निकल जांय.

तब ?

और तब उसे एहसास होता है कि उमा उसे यानि हरी को इतना चाहती थी कि हरी द्वारा अपने छोटे भाई को दिया वचन कि ‘कोई अन्य पुरूष उसे स्पर्श न करेगा’ का मान रह जाय.

         यहां फिल्म की कहानी संक्षेप में बताने का कारण यह है कि ऐसे लोग जो मराठी नहीं जानते, वे भी यदि थियेटर या सीडी आदि पर ‘काकस्पर्श’ देखें तो उन्हें समझने में आसानी हो. जिन लोगों को कोकण की प्राकृतिक छटा देखनी है वे भी इस फिल्म को जरूर देखें. देखें कि वहां की 1930 की वेशभूषा किस तरह की थी, लोगों का रहन सहन कैसा था.

      इस फिल्म की एक और खास बात है ‘मराठी श्रमगीत’ जिनमें जांता डोलाते हुए गीत गाया जाता है, तो कभी दही मथने के दौरान गीत गाया जाता है. पहली बार रजस्वला होने पर महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले ओव्ही गीत भी हैं तो एक गीत जो मैं बचपन से सुनते आया हूं वह कई बार बजा है जिसके बोल हैं –

अरे संसार संसार, जसा तवा चुल्ह्यावर
आधी हाताला चटके, तेव्हा मिळते भाकर

 
( यह सांसारिक जीवन चूल्हे पर रखे गर्म तवे की तरह है, इससे पहले उंगलीयां जलती हैं और तब जाकर कहीं भोजन मिल पाता है)


    महेश मांजरेकर और उनकी पूरी टीम को बधाई इस शानदार फिल्म के लिये. उम्मीद करता हूं इस फिल्म को हिन्दी के अलावा और भाषाओं में भी डब की जाय ताकि और लोग इस बेहतरीन फिल्म का आनंद ले सकें.

- सतीश पंचम

Sunday, May 20, 2012

सरोखन धोतीवाले......बमचक-5


बमचक-5

परधान जब कोईराना में दाखिल हुए तो अपने दरवाजे पर बैठकर बीड़ी पीती जैतू की बूढ़िया मां मुनरा नजर आई।

“कैसी हो मुनरा” ?

“ठीक हई परधान” – कहने के साथ ही सिर पर पल्लू रखते हुए, बीड़ी वाला हाथ मुनरा ने बोरे की आड़ में कर लिया। मुनरा आज भी परधान का आदर करती है और वही आदर भाव मुनरा के बेटे जैतू और उसके परिवार के लोग परधान के प्रति रखते हैं। इस आदरभाव के मूल में ग्राम पंचायत की वह जमीन थी जिसे जैतू के बाप के मरने के बाद परधान ने दौड़ भाग करके मुनरा के परिवार के लिये जीवनयापन आदि के लिये ग्रामसभा की कुछ जमीन पट्टे पर दिलवाया था। यह वह दौर था जब गाँव में दुखियारे की सहायता के लिये विरोधी-समर्थक जैसा भेद नहीं होता था। लोग आपद धर्म निभाने से पीछे न हटते थे।

     जब विवाह के बाद एक बच्चा जन्मते ही मुनरा के पति रजिन्नर के बारे में खबर आई कि कलकत्ते में जूट मिल की मशीन में फंसने से उसकी मृत्यु हो गई है तो गाँव ने मुनरा को थाम लिया. जिससे जैसा बना उसने अपने से सहायता की, उसके एक बिगहे खेत के लिये जरूरी बेहन, खाद, पानी का इंतजाम किया गया। लोग जब अपना खेत जोतते तो एक फेरा मुनरा के खेत में भी देख आते कि कहीं उसके खेत भी जोतने लायक न हो गये हों।

“बड़की बिट्टी कब आय रही है परधान” ? – मुनरा ने बैठे बैठे ही पूछ लिया

“अबकी देखो भादौं लगते ही लाने का विचार है” – चलते चलते ही जवाब दिया परधान ने और आगे बढ़ गये।

“जियत रहांय, जहां रहांय” – मुनरा ने हाथ उठाकर असीस दिया।

तभी परधान की नजर रामधन कोईरी के घर के पिछवाड़े पड़ी जहां पर कि अक्सर गंदगी रहती थी, महिलायें या पुरूष जब मन आता अपनी लघुशंका का निवारण वहीं करते थे। आज वहां एक छोटी क्यारी थी जिसमें भिण्डी उगाई गई थी।

“ये तो बड़ा अच्छा किया रामधन ने। घर के पिछवाड़े भिण्डी लगा दी”

“कोईराना में अब जमीन कहां बची परधान सब्जी ओब्जी उगाने के लिये. हर किसी के परिवार बढ़ रहे हैं तो जमीन घट रही है। अब जिसके जैसा दांव बैठ रहा है जमीन खन के बोय रहा है. यही न कमाई का रास्ता है कोईराने में” – सरोखन ने बताया।

    अभी उन दोनों की बातचीत चल ही रही थी कि सरोखन का घर आ गया। सरोखन की बुढ़िया लम्मो घर के बाहर ही बोरा बिछाकर बैठी थी. बाहर और कोई दिख नहीं रहा था। परधान को देखते ही लम्मों एकदम से उठ बैठीं.

“हाथ जोड़त हई परधान, ई कलकान से हमैं छुट्टी देलाय द” - लम्मों ने हाथजोड़कर परधान से कहा.

“अरे तो पहले बैठने दोगी कि आते साथ पंवारा पढ़ाओगी” – सरोखन ने आगे एक झोलंगही खटिया की ओर बढ़ते हुए कहा. आम के पेड़ के नीचे खटिया बिछा दी गई. निखड़ाहरे खटिया देख सरोखन अंदर से दरी लाने जा ही रहे थे कि परधान ने मना कर दिया कि ऐसे ही ठीक हैं.

    तभी अंदर से बहू ने लोटे में पानी के साथ मौनी में गुड़ रखकर भेजा गया। परधान ने लेने से मना कर दिया. वैसे भी दोनों परानी के भूखे रहते इस तरह गुड़-पानी लेना ठीक न था. बहुत आग्रह पर केवल पानी पीकर गमछे से मुंह पोंछ भर लिये.

   “त का कहात हय परधान, हम दूनूं जने क जिनगी क फैसला कराय के तबै जाईं” – लम्मों ने तर्जनी उंगली निकालकर हवा में लहराते कहा.

   “अरे पागल भई हो, हर घर में चूल्हा माटीये का है, टिनिर पिनिर तो चलता ही रहता है तो का करोगी जिऊ दोगी” ?

 “हर घर में चलत होई परधान लेकिन एस घरे के जइसे नांय जहां सासु के पीढ़ा फेंक के मारा जाय”

“ईतो गलत है लम्मों , इस तरह से नहीं होना चाहिये था लेकिन कुछ तुम्हारी भी तो बेजांह होगी...अइसे कइसे कोई पीढ़ा फेंक कर मारेगा” ?

“हम हेंही बइठी रहे परधान हेंही....देख रहे हो न ....हेहीं जइसे आज बइठी रहे ओइस्से एकदम बइठी रहे....तबले ई बड़की छिनरीया ने इहे पीढ़ा फेंक के मारा है....देख लो अब तक वइसे ही उलटा पड़ा है” – लम्मों ने उल्टे पढ़े पीढ़े की ओर इशारा किया.

“अरे तो कुछ बात होगी कि अइसे ही...”

“हम खाली एतना कहे रहे परधान कि अपने बाप के इहां जइसे रहती है वइसे मत रह तनिक मूड़े पर ठीक से साड़ी ले लिया कर....बड़ा बुजुर्ग लोग हैं....तनिक मान रख...तो बताओ इसमें क्या गलत किया मैंने”

“गलत तो नहीं कहा...लेकिन इतने भर से कोई क्यों मारेगा...”

“और वो नहीं बताओगी कितना गरियायी थीं.....बाप को हमरे गारी दी, भाई को गारी दी....हमारा बाल पकड़कर मारी उसे नहीं बताओगी” – पहली बार अंदर से सरोखन की बड़की पतोहू की आवाज आई थी

परधान ने नजरें जमीन पर गड़ाये हुए ही कहा – “त उहै तो कह रहा हूं कि बताओ क्या हुआ त आधे आध पर बता रहे हो....वो आपन बता रही हैं...तूम आपन बता रही हो”

“हमने 'पापा' को भी कह दिया था कि देखो 'मम्मी' हमरे ससुराल को गंदी बात बोलती हैं लेकिन पापा उनको बोलने की बजाय हमीं को बोलने लगे” – किवाड़ की ओट से बहू की आवाज आई.

    परधान को झटका सा लगा. इस धोती वाले सरोखन को बहू ‘पापा’ कहती है ये लम्मों जिसको बालों से ढील हेरने का ही गुन है मदाहिन-मदाहिन गन्हाती रहती है उसे बहू ‘मम्मी’ कहती है....वाह रे सरोखन....इसे ही भाग्य कहते हैं....वरना कहां हरजोतवा-सरजोतवा को कोई ‘मम्मी’ औ ‘पापा’ कहेगा..... जरूर पतोहीया पढ़ी लिखी होगी, आखिर ओकील की बेटी है.

    संभलते हुए परधान ने कहा – “लम्मों, पहली बात त ई कि पहली गलती तुम्हारी थी जो पतोहू को गरियायी....जब एक बार रिसता जुड़ गया तो उहो परिवार आपन है....इसमें बहू के परिवार को गरियाना कहां की बुद्धिमानी है” ?

“बात बुद्धिमानी वाली नहीं परधान सरीकत क बात है” - अबकी सरोखन से बोले बिना रहा न गया.

“कइसन सरीकत” ?

“इहे कि जब हम कहीं से हाट बजार से आ रहे हैं, कुछ सौदा खरीद ओरीद के ला रहे हैं तो क्या इसका फर्ज नहीं है कि उसे हटाकर चउके में रखे, घर में ले जाय. कल बाजार से आध पाव जलेबी ले आया था कि घर में लड़के बच्चे हैं तनिक खा लेंगे। लाकर वहीं ओसारे में रख दिया लेकिन मजाल है जो पतोहिया ने उसे वहां से हटाया हो” .

“तब” ?

“तब क्या, मैं वहां लोटा लेकर दिसा मैदान चला गया, ये लम्मों उधर बसंतू की बीमार महतारी को देखने तनिक उनके दरवाजे चलीं गई इधर कुकुर आकर जलेबी जूठार गया”.

“तब” ?

“औ पतोहू देखकर भी नहीं बताई कि कुकुर ने जलेबी जुठारा है....”

“हम नहीं देखे थे पापा...सच कह रहे हैं....हम खाली यही देखे कि कुकुर ने वहां कुछ सूंघा था और थोड़ा सा थोड़ी देर बाद चला गया था.....अन्हियारे ढिबरी के उजाले में ठीक से दिख भी नहीं रहा था...इधर छोटकी का पेट झर रहा था उसे ही पैरों पर बैठा टट्टी करा रही थी.....कइसे हम सब देखतीं” ?

“त दूरबीन लिया दूं....रांड़ आन्हर हो गई थी...दिख नहीं रहा था” – लम्मों ने प्रतिवाद किया.

“ए लम्मों तनिक ‘अइती’ में रहो....जब वह कह रही है कि उसे ठीक से नहीं दिखा तो क्यों बात बढ़ा रही हो” – परधान ने बीचबचाव किया.

“अरे एस आन्हर होय गई थी ये.....बता देते ओकील की बिटीया आन्हर है तो नहीं लाती पतोह बनाकर...अच्छे अच्छे दरवज्जा खांच रहे थे मेरे लइका के लिये”

“हां, बहुत सहुरगर हैं न आपके बेटाजी” ?

“देख्...देख् परधान..अब हमरे बेटवा पर आच्छन लगा रही है पतोहिया”

“अरे कुछ भी है, तनिक समझ-बूझ के रहो, काहे एतना छोटी-छोटी बात पर कलकान किये हो”

“छोटी बात नहीं है परधान, अभी आप ही देखे कइसे हमरे बेटवा पर बोली बोल रही है ई ‘भतारकाटी’ .....इसका यही सहूर देखकर तो वह पूछता ही नहीं” – लम्मों ने दांत पीसकर कहा.

“फिर फालतू बोल रही हो...जब कह रहा हूं कि समझ-बूझ के रहो तो क्यों बात बढ़ा रही हो. जाओ चुपचाप नहाओ-खाओ, इस तरह परिवार में बात-बेबात झगरा बढ़ाना नहीं चाहिये” - परधान ने अपनी ठुड्डी खुजलाते हुए कहा.

“हम कहां बढ़ाना चाहते हैं परधान, इसीलिये तो आपको बुलवाये कि तनिक आपौ देख लो कि किसकी अगुअई किये थे”- सरोखन ने परधान जी को याद दिलाया.

“फिर वही बात ? अगुअई किया था तो गलत तो नहीं किया था. पढ़ी लिखी पतोह पाये हो.....तुम्हें पापा और लम्मों को मम्मी कह रही है क्या कम है” ?

अबकी सरोखन ने सिर नीचे कर जमीन निहारना शुरू किया. बात तो परधान सच कह रहे हैं. और कोई पतोह पूरे गांव में अपने सास ससुर को मम्मी पापा नहीं कहती. और लोगों से एक दर्जा उंचा ही है सरोखन का कद. लेकिन इस बूढ़िया लम्मों को यह बात कौन समझाये ?

“बात मानता हूं परधान.....बाकिर वही बात कि तनिक पतोहीया काम-ओम में धियान देती तो अच्छा रहता...खाली मम्मीयै-पापा कहे से थोड़ो न पेट भरता है” ?

“अरे तो धीरे-धीरे सीख जायेगी...करेगी सब काम जइसे और लोग करते हैं....चलत बरधा को पइना नहीं मारा जाता ये जान लो .....यही लम्मों हैं....जब आईं थी तो केतना अपने सास से झगरा करती थीं हम लोग नहीं जानते क्या....कि आज ही आये हैं इस गांव में”

“हमार बात छोड़ा परधान...हम जइसे तब रहे ओइसे अबइहों हैं....बात बताईं साफ....लेकिन मजाल है काम में कौनो कमी होय”.

“काम में कइसे कमी दिखती जब सास जियती तो कमी दिखती. वो तो आठै दस साल में सादी के बाद चल गईं... अब काम में कमी निकाले तो कौन निकाले” ?

    सरोखन को अब परधान का यूं लम्मों पर आक्षेप लगाना खटकने लगा. बुलाकर लाये थे फरियाने उल्टे परधान पाला बदलकर बहू की ओर से बोल रहे हैं....सिर्फ ‘मम्मी’ और ‘पापा’ बोलने के चलते. सरोखन ने अब मानना शुरू कर दिया कि अंगरेजी बोल-चाल और कुछ करे न करे सुनने वाले पर असर जरूर करती है यहां तक कि लोगों की मति भी बड़ी जल्दी फेरती है, वैसे ही जइसे परधान की मति फेरी है.

   उधर परधान इन सब कलकान से अलग कुछ सोच रहे थे कि एक उनकी पतोह है जो समय पर कपड़े लत्ते और खान-पान का इंतजाम कर दे वही बहुत है. इस सरोखना का भाग्य जबर है....इस जन्म में ही ‘पापा’ कहला रहा है.....और ई ढीलहेरनी लम्मों जिसको केत्थौ का सहुर नहीं, ‘मम्मी’ बनी है......वाह रे भाग्य.....अब तो शायद अगले जनम में ही ई साध पूरी होगी.....इस जनम में तो होने से रही.

(जारी....)


- सतीश पंचम

Friday, May 18, 2012

कौन राह चलिहौ सरोखन ? .......बमचक-4


बमचक – 4

      परधान जी सरोखन के साथ कोईराना की ओर चल पड़े। चलते-चलते उन्हें महसूस हुआ कि जैसे प्लास्टिक के जूते में कोई कंकड़ आ गया है। रूककर पैरों में से सस्तहवा जूता निकाले, टेढ़ा करके झाड़े-झूड़े, एक छोटा कंकड़ निकल कर जमीन पर पहले से पड़े कंकड़ों में मिल गया।

 सरोखन को लगा कि शायद अपनी बात कहने का यह माकूल समय है. चलते चलते बोला – “देखा परधान” ?

“क्या” ?

“जिसको करकता है उसी को मालूम पड़ता है और दूसरा क्या जानेगा। आपके जूता में सिटका आया तो आपको महसूस हुआ तभी न जूता निकालकर सही किये”.

“वो तो मानी बात है सरोखन, मैं कहां मना कर रहा हूँ लेकिन ईहौ बात है कि अपनी इज्जत अपने हाथ होती है.... अब वो जमाना नहीं रह गया”.

“इतना तो मैं भी मान रहा हूं परधान, लेकिन क्या करूँ जियरा नहीं मानता। बताओ, मैंने क्या कमी की थी, अपनी जान से तो अच्छा-अच्छा ही खाया पहिनाया है। अब पतोहिया को ही जब अलग रहने का और अपने मरद की कमाई खाने का मन किया है तो कोई कितना थामे” ?

“तो कर दो अलग”

“ऐसे कैसे कर दूं अलग…. ये बड़का वाला ही नौकरी करता है, छोटा वाला तो वैसे ही है…..वो भी तो कमाने-धमाने लग जाय, हांथ-पैर ठीक से समथर हो जाय, तो कुछ मन करेर करके अलगा दूं..जाओ जिसे रहना है जाये चाहे जैसे रहे....”.

    तभी सामने से कोटेदार आते दिखे। सरकार की नजर में यह वो कोटेदार जी है जिन्हें लोगों के बीच मिट्टी का तेल कोटे के हिसाब से नापने और बांटने का लाइसेंस मिला है। ऐसी मान्यता है कि काम यह वही करते हैं नापने और बांटने वाला लेकिन ऐसे लोगों के यहां ही सप्लाई करते है जिन्हें अपने देश की मिट्टी से बहुत प्यार है, मसलन, हलवाई, दुकानदार, ठेठर मालिक, कैटरिंग वाला और ऐसे तमाम गणमान्य लोग। आम लोगों को के यहां जिस समय खबर आती है कि सरकारी मिट्टी का तेल आया है, उसके घंटे भर के भीतर पहुंचो तो तेल खत्म.

    कम्पटीशन की तैयारी करता एक लौन्डा कहीं से सुनकर आया था कि देखकर आया था पता नहीं लेकिन कह रहा था कि – “कोटेदार जी का कनेक्सन दो-दो सरकारों से है…..एक वो सरकार जो मिट्टी का तेल देती है और एक पीसी सरकार जो आते ही जादू से पूरा तेलवै गायब कर देता है”

         लोगों ने कई बार एतराज किया कि मिट्टी का तेल ज्यादा पैसे ले लो लेकिन दो तो सही. इस बात से साबित होता है कि बमचकपुर के लोग केन्द्र के उन योजनाकारों से भी आगे हैं जिनकी मंशा है कि घूस को लीगल कर दो लेकिन पब्लिक को सुविधा दो… इस तरह की नवीनता से आच्छादित अंकुरण जाहिर है गाँवों में ही होगा, शहर में तो अंकुआने के लिये कंक्रीट की जमीन बाधक होगी….क्या पता कोई अफसर बमचकपुर गांव होकर गया हो और लीगल घूस का आईडिया यहीं से उसने उठाकार प्रस्तावित किया हो…राम जानें सच्चाई क्या है.

     तभी कोटेदार ने करीब आकर जैरमी की तो परधान जी और सरोखन ने साथ-साथ जैरमी की.
“कहां जा रहे हैं परधान”?

“यहीं तनिक कोईराना से होकर आता हूँ”.

“हां, हो आइये, वहां भी जाना जरूरी है...कल रात इन्हीं के यहां से तो ढेर बेर तक टिनिर
पिनिर हो रहा था”.

“हां त वहीं जा रहा हूं”

“अरे त इनको सोचना चाहिये न कि अपुना से इज्जत बचाये बचती है और गंवाये जाती है… बताओ, क्या जरूरत थी बड़की पतोह को बाल पकड़कर मारने की”

“अरे तो उल्टा-पुल्टा बोलेगी तो मार नहीं खायेगी तो क्या”

“अरे वो जमाना गया सरोखन जब गाँड़ अरहर की पाती से भी ढंका जाती थी, आजकल सबके गांड़ै एतनी बड़ी बड़ी हो गई है कि भगवानौ परेसान हैं कि आखिर ये हो क्या रहा है....”

“बात मानता हूँ कोटेदार बकि.....”

    “देखो परधान जी, चाहे एक बात बोलूं चाहे दस बात....लेकिन कुल छोड़ के यही पूछता हूं कि सरोखन से अभी वो केस कर देगी बड़की वाली तो क्या ये थाम लेंगे ? तब तो फिर वहीं परधान के गाँड़ टोओगे कि चलो परधान गवाही दे दो कि हम सरीफ हैं.....बताओ.....उसका बाप ओकील, उसका भाई सरकारी बस में डराईबर...एक भाई एलएलबी फाइनल में पढ़ता ही है......अरे बता रहा हूँ.....भागने का ठिकाना नहीं मिलेगा”.

    परधान ने कोटेदार की बात को मोड़ने की कोशिश की। वैसे भी सरोखन फरियादी बनकर आया था, उसकी ओर परिस्थितिजन्य झुकाव रखना जरूरी था कुछ-कुछ वैसी ही परिस्थितिजन्यता जिससे आजकल न्याय व्यवस्था जूझ रही है, बड़े-बड़े लोगों के अतरंगी सामग्रीयों को तोपने ढंकने के लिये इस्तेमाल होती है। उनमें कर्ता और कारक का भेद मिट जाता है, साध्य भी कोई माने नहीं रखता....माने रखता है तो फरियादी की इज्जत और प्रसारण से राहत ताकि समाज में अमन चैन रहे, बच्चे न बिगड़ें। कुछ-कुछ इन्हीं परिस्थितियों से अब परधान जी गुजर रहे थे, भारतीय न्याय व्यवस्था के शीतल खंभे की मानिंद।

(जारी....)


- सतीश पंचम

Thursday, May 17, 2012

सरग क तरई.....बमचक -3

बमचक – 3

    परधान जब सरोखन के यहां जाने के लिये तैयार हो रहे थे तो धोती कुछ मैली दिख रही थी। दूसरी धोती लाने के लिये पोते को कहा तो भीतर से पतोहू की आवाज आई – "दूसरकी धोती कल राहठा में बझ गई थी, निकालते समय हिंचा गई".

परधान ने चुपचाप धोती सरियाना शुरू किया, मैली तो मैली कम से कम देंह तो ढंकेगी। उधर सरोखन लकड़ी के चौकी पर बैठा परधान को अगोर रहा था। परधान के कई बार कहने पर भी उसने कलेवा नहीं किया, बार-बार रट लगाये था कि उसकी बूढ़िया भूख्खल है तब तक एक दाना अंदर नहीं उतरेगा। करेजा धधक रहा है अब तक।

परधान ने ज्यादा जोर देना ठीक न समझा। अंदर से पता नहीं क्या रूखा-सूखा आये। कल तो 'निराल' करेले की सब्जी से भेंट हुई थी, न प्याज न कुछ जबकि घर में सबको पता है करेले की तेलउंस  भुजिया में मजगर पियाज और  कमतर  करेले के 'सवदगर' खवइया हैं परधान।

   उधर बिजेन्नर मास्टर भी हग-मूत के दतूअन पानी करके लुंगी में गीला हाथ पोंछते आ गये थे।

"का हो सरोखन ? क्या हाल है" ? – परधान को इस वक्त अच्छा नहीं लग रहा था बेटे द्वारा इस तरह दुखियारे से पूछना। टोक दिये – " वो गयादीन गेहूँ की दंवाई के लिये कह रहा था, कब कहूँ" ?

"कह दिजिए जब आना हो आये, कौन बड़ा 'ओथुवा' है कि...."

"कौन बड़ा 'ओथुवा' वाली बात नहीं...कोई रहना चाहिये न घर पर, कौन बोझ थमायेगा, कौन बोरा सइंतेगा, कहां क्या सब देखना पड़ेगा न कि मास्टरी है चार लाईन खींच दोगे तो हो गया – ‘क’ से कईसे" ?

सरोखन बाप बेटे के इस कलकान के लिये तैयार न था। कहां तो आया था अपनी परेशानी लेकर औऱ ये बाप-बेटा ककहरा पढ़-पढ़ा रहे हैं।

तभी सड़क से जाते लक्खन यादौ दिखे। परधान को धोती पहनते देख करीब आकर जैरमी किये – "जै राम परधान".

"जै राम भईया जै राम....शहर की ओर जा रहे हो क्या" ?

"हां, तनि बिट्टी के गंवहीयवा बेमार है, उसी को देखने जा रहा हूँ".

"कौन बड़की वाली का कि छोटकी" ?

"वही छोटकी वाली जो गुलहरी में की गई है".

"वो वाला दामाद तो कहीं फर्नीचर में काम करता था न" ? परधान ने धोती की कांछ सहेजते पूछा।

"हां, वही"

"क्या हुआ है उसे" ?

"पता नहीं, एकाएक बेहासी आ गई, बोतल पर बोतल चढ़ रही है.... हमरे 'परदीप क माई' त काल्हु से अन्न न छुई है"

परधान सोच में पड़ गये कि एक ये है जो दामाद की तबियत को लेकर भूखी पियासी है और एक ये सरोखन है जो पतोहू के कलकान को लेकर भूखा है। यानि जो जहां है अपने में परेशान ही है।

लक्खन यादौ ने परधान की तंद्रा तोड़ी यह कहते कि – "परदीप क माई आधी रतिये हमको उठा दी कि जाओ दामाद का हाल-चाल लेते आओ, पता नहीं बिटिया कइसे सपरी होगी".

लक्खन यादौ के बारे में प्रसिद्ध है कि वे कभी अपनी पत्नी को 'रेरी' मारकर नहीं बुलाते, हमेशा से ही परदीप क माई ही बुलाते हैं। हां, जब तक परदीप न हुआ था तब तक ‘सुनत हई रे’ वाली संज्ञा-सर्वनाम का इस्तेमाल करते थे, वो तो एक दिन कहीं परदीपवा के जन्मने पर अस्पताल में देखे थे डॉक्टर-डाक्टरनी को तो कुछ ये भी सहुरगर हो गये,..... बाकि इनकी पत्नी शायद दूसरी कद काठी की थीं। ‘परदीप क माई’ वाले संज्ञा-सर्वनाम के बाद उन्हें लगा कि उनका प्रमोशन हो गया है और लक्खन का डिमोशन। सो, स्वनिर्धारित पदवी लक्खन के लिये दे दी गई – ‘ईहे दहिजरवा’ जिसके पीछे की दंतकथा है कि विवाह के समय कबूली गई चान्दी की करधन लक्खन की पत्नी को बच्चा होने तक न दी गई। इस बात को लक्खन अपना ‘ताव’ मानते तो लक्खन की पत्नी अपनी दयानत कि उसी ने दया करके चांदी की करधन माफ कर दी। लेकिन कुछ न कुछ तो ‘मोमेन्टो’ छेकाना था, सो लक्खन यादौ के लिये पद्मविभूषण-पद्मश्री सरीखा टाईटल चुना गया ‘ईहे दहिजरवा’।

उधर सरोखन परधान को अगोर रहे थे कि चलें जल्दी, कहां बतकही में फंस गये। उधर बिजेन्नर मास्टर भी कब तक चुप रहते। लक्खन से पूछ बैठे – "तुम्हारा बड़का दामाद क्या करता है आजकल" ?

"सउदिया गया है".

"कंपनी बीजा पे कि आजाद वीजा पे" ?

"अब ई कुल तो नहीं पता कि कौन बीजा पे लेकिन है सउदिये में"

"अरे तो उसका भी हालचाल ले लो, कहां रहता है ? क्या करता है ? न पता चलेगा कि यहां से गया है ड्राईवरी वीजा पे और वहां जाकर ऊंट चरा रहा है तब ‘लांड़ चाट के काना’ हो जाओगे एतना जान लो".

 "अरे अइसी बात नहीं है, बराबर खबर लेते रहता हूँ, अभी बिट्टी आई थी तो ढेर सारा कपड़ा लत्ता लेकर आई थी। परदीप क माई के लिये चमकऊआ साड़ी लेकर आई थी औ हमरे लिये हे देख रहे हो कुरता औ धोती लाई थी ई सब सउदिया का पैसा है कि अउर कुछ"

"खुस्स हो न" ?

 "इसमें खुस्स होने वाली कौन बात है, सब जहां रहांय अच्छे से रहांय हम एतनै चाहिथै। अउर का सरग के तरई थोड़ौ न चाही" ?

"न सरग क तरई क्या चाहोगे देख रहे हो यही सरोखन, बहुत बड़कई हांके थे कि पतोहिया का बाप ओकील है, कचहरी में मर-मुकदमा होने पर जीउ दे देगा,  इहां  भेनसहर होतै, ककुर बिलार तक न उठे तभी से  दुआर खांच डारे हैं,  इहां से उहां ‘रउन’ लगा रहे है कि पतोहिया रंणुई, हो ढेकनवा फलुई"

   परधान ने और रूकना ठीक न समझा। अपने बेटे के भचर-भचर से जी छुड़ाना था सो चल पड़े सरोखन के यहां समझाईश देने ......


(जारी.....)


- सतीश पंचम

Wednesday, May 16, 2012

सुबहदार सुबह.......बमचक-2

Disclaimer : बोर्ड बनवाने के लिये आर्डर दिया गया है, जैसे ही बनकर आ जायगा Disclaimer टांगा जायगा। तब तक आप लोग अपने 'रिक्स' पर पढ़ें :-)



 बमचक-2


      सुबह-सुबह जब गाँव के कोईराना की ओर से सरोखन मउरिया को अपने घर की तरफ आते देखा तो बिजेन्नर बो 'जर-बुतानी' - "ई एक ठो अउर निमहुरा आ रहा है परधान से मिलने, कौन कहे मुंह-गाँड़ धोकर परभूनाथ के दरसन करने के, कुदाल-खांची ठीक करने के...उ सब छोड़ के आ रहा है परधान का 'गाँड़ अगोरने'।

         उधर परधान जी घर के पच्छू ओर मच्छरदानी में काफी देर से जगे थे लेकिन उठने की शायद इच्छा नहीं थी या तबियत ही कुछ नरम। उधर सरोखन भी नम्मरी लखुआ। जानता था कि परधान जी की पतोहिया देखते मान जर-बूताएगी। सो कोशिश में था कि परधान उठें तो उन्हीं का संग साथ पकड़ दिशा-मैदान की ओर जाते-जाते बात कर ले। लेकिन जब देखा कि अभी तक परधान मच्छरदानी में से निकले नहीं हैं, ढुक्कूल खेल रहे हैं तो जिस रफ्तार से आया था उसी रफ्तार से वापस सड़क की ओर मुड़ चला। कुछ दूर आगे जाने पर महुए का पेड़ आया तो वहीं रूक गया। लेकिन कब तक रूके। एक तो रात से उसकी आत्मा सुलग रही है, बहू के 'दतकेर्रा' के चलते दून्नू परानी अपना भाग टोय रहे हैं। रात खाना रखा हुआ छोड़कर हट गये, अब 'नटई' जर रही है, पेट कुलबुला रहा है, मन का फेचकुर अलग। कुछ देर बैठे रहने के बाद सरोखन को लगा शायद अब परधान जी उठ गये होंगे। सो फिर एक बार उस ओर चल पड़ा। उपर छत पर सोकर उठते बिजेन्नर मास्टर ने सरोखना को आते देखा तो पत्नी को सुनाते हुए कहा - "ई सार अउरौ 'अंगरेज का चोदा' बना है.....इहां से उहां तक मारनिंग वाक कर रहा है । कौन कहे दतूअन पानी करने का, ई ससुर सुबहिये-सुबहिये अपना घर का दतकेर्रा लेकर दुआर खांच डाला है। ससुर इसके मारे हगना-मूतना तक दुसूवार है"।

           उधर सरोखना परधान जी के पच्छू वाले घर के करीब आया तो देखा परधान जी अपनी मच्छरदानी समेट रहे हैं। धीरे से धोती का एक छोर खुंटियाये हुए परधानजी के पास पहुंच जैरमी किया - "जै राम परधान"

"जै राम भईया जै राम...... का हो कईसन" ?

"परधान अब चलि के फैसला करवा दो........."

"काहें, अब क्या बात हुई" ?

"अब एक बात होय तो बताईं....जब कुल बातै बात ब त बतावा काव बताई"।

"अरे तबौ.."।

"ईहे खटिया छू के कह रहा हूं परधान जो सबेरे के बेला हम झूठ बोली.... हम दोनो बूढ़ा-बूढ़ी काल्ह से खाये नहीं हैं....खाली पतोहिया के चलते...." सरोखन ने झोलंगही खटिया को हाजिर नाजिर मानकर सचमुच छूकर दिखा दिया कि वह ईश्वर को मानता है, खटिया से लेकर कुकुर-बिलार तक में उनकी उपस्थिति को स्वीकार करता है।

"अरे तो क्या पतोह के झगड़ा-झुगड़ी के चलते खाना-पीना छोड़ दोगे.....आज कल तो हर जगह टन्न मन्न होता रहता है"

"नहीं परधान, अब सहा नहीं जाता, बूढ़ीया को कल रात पीढ़ा फेंककर मारी है जंतसार वाली पतोहिया ने, और कन्नपुर वाली में तो आपै न अगुआ थे, अब आप ही चलकर फैसला कराईये कि हम बूढ़ी-बूढ़ा रहें कि जहर खाय के मर जांय "


"अरे जहर काहें खाओगे भाई" ?

"त क्या करूँ" ?

"अरे अपने से मिलजुलकर रहो और क्या। अब कन्नपुर वाली का अगुआ था तो क्या चाहते हो जिन्दगी भर मैं तुम्हारे घर के रगरा-झगरा का हिस्सेदार हो गया" ?

"नहीं वो बात नहीं परधान, सरीकत वाली बात है"

"तो वही सरीकत की बात तो मैं भी कह रहा हूँ"

    यह बातचीत अभी लंबी चलती लेकिन तभी पोता लालमणि घर के भीतर से लोटे में पानी भर कर लाया। परधान जी समझ गये कि सुबह-सुबह पानी भरा लोटा भेजना संकेत चिन्ह है बहू द्वारा कि - अपनी 'कलेक्टरी' को हटाकर कहीं और ले जाओ।

   परधान जी धीरे से लोटा उठाये और चल पड़े। पीछे-पीछे सरोखन भी चल पड़ा। वहीं उपर छत से यह नजारा देख बिरेन्नर मास्टर ने पड़ोसी छत पर बिस्तर समेट रहे लुल्लुर से कहा - "बताओ....क्या करें....परधानी ससुर किसी लायक रहने नहीं देती... देख रहे हो सबेरे-सबेरे चले जा रहे हैं सरोखन उनके गाँड़ के पीछे पीछे गाँड़ अगोरने। अरे आदमी अभी उठा है तो उसको सांस तो लेने दो कि पहले चल के तुम्हारा फैसला ही करवाये" ?

   उधर लुल्लुर का ध्यान कहीं और था। रात में कहीं तकिये के नीचे कुछ 'झिल्लीदार उत्पाद' रखा था लेकिन अभी मिल नहीं रहा था। न जाने कब कौन ले गया। मौके पर आँख खुली नहीं और अब देखो तो दस रूपये का वह 'झिल्लीदार उत्पाद' गायब। क्या पता बच्चों की महतारी ही न ले गई हो। लेकिन वह क्यों ले जाएगी। घर का कोई बच्चा भी तो छत पर नहीं आया था कि तकिया उठाकर छुट्टे पैसे के लालुच में कुछ ढूंढे।

   तभी नीचे से लुल्लुराईन का बोल फूटा - "उठे हो कि अभी और कुछ तुक-ताल भिड़ाना है"। लुल्लुर जी ने चुपचाप नीचे उतरने में ही भलाई समझी। सुबह-सुबह ही ये करकसा भवानी जो शुरू होगी तो पूरे गाँव-देस को जना देगी कि बिहान हो गया है।

     उधर बिरेन्नर मास्टर ने बीड़ी सुलगा ली कुछ उसी तरह जैसे बड़े आयोजनों के पहले कैंप फायर या जलते मशाल की परंपरा है। यह बड़ा आयोजन बिरेन्नर मास्टर के पाखाना जाने के पहले से शुरू होकर उनके लौटने तक चलता है। अमूमन इस दौरान पेप्सी की खाली बोतल भरना, खेत की ओर जाना, रास्ते में कोई भेंटा जाय तो जैरमी करना, कहां चोर आया था, भिंडी का भाव तेज है कि आलू का, किसके रिश्ते की बात चलाई जा रही है, कौन अगुआ, कल किसके यहां मार-झगड़ा हुआ इत्यादि-इत्यादि से लेकर खेत में कहीं आड़ ढूंढकर काँखने तक चलता है। वहां एक बार और बीड़ी सुलगाई जाती है, धुआँ व्योम में समाहित किया जाता है और व्योम अपने छुपने का ठिकाना ढूंढते हुए न चाहते हुए भी बार-बार उसी बमचकपुर में आने को मजबूर होता है जहां की यह कथन्नी है।


(जारी....)


- सतीश पंचम

Tuesday, May 15, 2012

जियत बाप से दंगम-दंगा.... (बमचक-1)


                                                                  ‘बमचक’

Disclaimer : कहनाम है सतीश पंचम का कि  ऐसे लोग इस पोस्ट को न पढ़ें जो कुछ ज्यादा ही शुचितावादी हों....'गाली-गलौज' देख 'नकर-नकर' करते हों, साहित्य और शुचिता की दुहाई देते हों। ऐसे लोगों से अनुरोध है कृपया कहीं जाकर कुछ और पढ़ें।

(1)

     मई की तपती दुपहरी में आम के पेड़ के नीचे मनोहर लोहार खटिया बीनने में तल्लीन हैं। उसके आस-पास गाँव के बच्चे जमा हैं। कुछ की नज़रें ऊपर टंगी हैं कि कब तेज झोंका चले और एकाध पका आम गिरे। बगल में ही एक कुतिया अपने अगले पंजों से कच्ची मिट्टी को खोद-खादकर नम मिट्टी में जगह बना आंखें बंद कर सोने की कोशिश कर रही है। ऐसे ही रमणीय माहौल में  प्राईमरी के मास्टर श्री बिजेन्नर नाड़े वाली पट्टेदार चड्ढी पहने, पैंट को उतार कर कांधे पर रख,  बनियान आधे पेट तक चढ़ाये हवा लेते हुए खटिया बुनते मनोहर के पास पहुँचे और पूछा – "हो गया मनोहर " ?

“बस हुआ ही जाता है। और इस्कूल से आय रहे हैं” ?

“हां, आया तो हूं लेकिन परधान नहीं दिख रहे” – मास्टर बिजेन्नर अपने पिता को बाकि गाँव वालों की तरह परधान ही कहते हैं। इस मामले में बिजेन्नर सचेत रहते हैं कि कोई उन्हें अपने पिता को बाबूजी कहते न सुन ले।

“आये तो थे यही खटिया बिनवाते समय बकिर उन्हें जाना पड़ा चमटोली में पंचाइत के लिये” – मनोहर ने रस्सी का फेंटा पटिया की ओर से लाते हुए कहा।

“ये क्यों चले गये वहां। ये तो खुदै ‘बकचोद’ हैं बइठे हैं उहां पंचाइत करने। ये नहीं कि कायदे से आकर नहा खाकर घर पड़े रहें, चले गये पंचाइत करने। एउ मरदे कौनो अर्थ के नहीं हैं”।

“अरे तो चले गये त का हुआ। चहेंटुआ कि लड़की का छुटी-छूटा का मामला था”।

“अरे तो यही मिले थे फरियाने के लिये। न गये होते बइठ के खटिया-खांची बिनवाते। हो देख रहा हूँ कुदार का बेंट ढिल्ल हो गया है, वही ठीक करवाते, न चले गये वहां पंचैती करने”।

मनोहर मुसकराने लगा। उसकी मुसकराहट से पता चल रहा था कि वह मास्टर बिजेन्नर के द्वारा अपने पिता के प्रति व्यक्त विचारों से वह काफी हद तक सहमत है। वैसे भी काम करने वाला मजूर अपने मालिक से सहमत हो जाने में बड़ा तेज होता है। जानता है कि असहमति जताने पर थोड़ी देर और भचर-भचर सुनना पड़ सकता है और मास्टर बिजेन्नर के बारे में प्रसिद्ध है कि वे बोलते समय अपनी आवाज में नमनीयता लाने के लिये मुंह से ‘जल-कणिकाओं’ की यदा-कदा फुहार भी करते हैं जिससे सामने वाला उनके इस धाराप्रवाह ‘बोलैती’ से भावविभोर तो नहीं लेकिन ‘थूकविभोर’ जरूर हो जाता है और मनोहरा यही बचाना चाहता था।

     उधर खूँटे से बंधी भैंस बों-बों चोकर रही थी। मास्टर बिजेन्नर को गुस्सा आ रहा था। एक तो अभी-अभी मोटरसाईकिल चलाकर आया हूं, तिस पर बाप जी गायब हैं, लड़के भी दिख नहीं रहे, औरत अपनी पतोहू के साथ भीतर टिन्न-पिन्न किये है और इधर ये भैंस भी चोकर रही है। एक नज़र हौदे के पास बों-बों करती भैंस को देख मास्टर बोले – “ई ‘छिनरिया’ अऊरौ गरमान बा”।

    यहां भैंस के लिये ‘छिनाल’ का सम्बोधन मास्टर बिजेन्नर के पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी होने का प्रमाण है। उनका मानना है कि रात-बिरात जब देखो यह भैंस अपना खूंटा उखाड़ कर दूसरे के खेतों में मुँह मारने चली जाती है, कई बार खूंटा मजबूती से गाड़ा गया, बड़े गाँठ वाला बांस का खूंटा जमीन तक धंसा कर गाड़ा गया लेकिन यह भैंस है कि उस गंठीले खूंटे को भी उखाड़-पखाड़ कर दूसरे के यहां मुंह मारने चली जाती है कुछ वैसे ही जैसे कोई विवाहिता अपने मंडवे तले बंधी गाँठ को भूल यहां वहां मुंह मारती है, ऐसे में भैंस को छिनाल की उपमा न दी जाय तो क्या दी जाय ?

       गौर करने वाली बात यह है कि मास्टर बिजेन्नर किसी को गरियाने के मामले में सदा से ही सार्वभौमिक निरपेक्षता अपनाते आये हैं। वे पशुओं को भी उतनी ही सहजता से उपमा अलंकारों से नवाजते हैं जितनी सहजता से आदमी-औरतों को। कभी कभी तो निर्जीव और सजीव में भी भेद नहीं करते। जमीन ऊसर है तो उसकी नाप-जोख के समय ‘झंटही’ और ‘लंड़ही’ कहने से उन्हें गुरेज नहीं है। खेतों में बोने के लिये बीज ठीक नहीं लगा तो उस बीज को ‘बुजरी’ जैसी शब्दावली से नवाजना बिजेन्नर बखूबी जानते हैं। गँवई जीवन का ज्यादातर काम वे ऐसे ही उपमाप्रद अनुप्रास अलंकारों की जद में करते आये हैं।

    तभी भीतर से मास्टर बिजेन्नर के लिये बुलावा आया कि यहां आकर नहा खा लिजिए, वहां क्या कर रहे हैं। खटिया में ओन्चन हिंचता मनोहरा की समझ नहीं आ रहा था कि अभी तो यही बात मास्टर बिजेन्नर अपने बाप के लिये कह रहे थे और अब वही बात उनके लिये कही जा रही है। शायद इस घर में नहाना-खाना पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा हो। उसी वक्त कहीं भद्द से कुछ गिरने की आवाज आई। पलटकर देखते न देखते बच्चे उस ओर लपक लिये। एक आम चूकर गिर गया था। लेकिन बच्चे खुश होने की बजाय मुंह बनाकर रह गये थे क्योंकि वह आम दिखने में आम जैसे तो था लेकिन चिचुका-सूखा हुआ वैसे ही जैसे गाँव के ज्यादातर लोग हैं। मास्टर बिजेन्नर अपवाद हैं। वे चिचुके हुए नहीं, बल्कि सुग्गा कटवा आम हैं, ऐसा आम जिसके बारे में माना जाता है कि तोते ने चखा है और मीठा है....... भले ही उसे किसी कौवे ने ही क्यों न गिराया हो।


(जारी.... )


- सतीश पंचम



Sunday, May 13, 2012

नौटंकी टशन......

     इस बार गाँव जाने पर शादियों का मौसम चल रहा था और उसी के साथ मौसम था शादियों में होने वाले विभिन्न मनोरंजन कार्यक्रमों का। अभी गाँव पहुँचे दूसरा ही दिन था कि छत पर रात में सोते समय रात के ढ़ाई बजे कहीं से कुड़कुड़ीया नगाड़ा आदि बजने की आवाज आई। आँख खुल गई। ध्यान दिया तो यह कहीं नौटंकी के नगाड़े की टनटनाहट थी। तुरंत पास ही पड़े सेल फोन से चचेरे भाई को फोन लगाया। हांलाकि एक आवाज देने पर बंदा सुन लेता, वहीं दीवार के उस ओर आंगन में मच्छरदानी लगाकर सो रहा था लेकिन रात के ढ़ाई बजे आवाज देना अजीब लगा, जबकि गाँवों में आवाज लगाकर किसी को उठाना आम बात है। किसी की भैंस ने खूँटा उखाड़ लिया या किसी के खेत में नीलगायें आ गईं, या कोई और पशु ही खेतों में घुस आये तो आवाज लगाया ही जाता है ताकि खेत मालिक का नुकसान न हो लेकिन यहां मेरी कौन सी खेती बरबाद हो रही थी।

      सो भाई साब ने रात के ढ़ाई बजे मेरा फोन आश्चर्य से देख तुरंत उठाया कि बात क्या है ? मैने कहा – चल यार नौटंकी देखने जाना है।

क्या ?

हां यार नौटंकी देखने जाना है। चल फटाफट बाईक निकाल।

       भाई साब ने फोन कट किया और मच्छरदानी से निकल छत की ओर नजर डाली जहां मैं चांदनी रात में खड़ा था। आंखें मलते भकुआए चेहरे के साथ भाई साब ने एक बार फिर मेरी ओर देखा, मैने इशारा किया चल, देर हो रही है। इसके साथ ही मैं खुद जल्दी जल्दी सीढ़ियां उतर कर नीचे आ गया। अंदर कमरे में जाकर टॉर्च की रोशनी में कपड़े पहनें। पैरों में चप्पलें डाल, मोबाइल साथ ले चल पड़ा। उधर भाई साब अब भी भकुआए से मेरी ओर खटिया पर बैठे बैठे ताक रहे थे। मैंने कहा – चल यार मुझे रास्ता नहीं पता वरना मैं खुद चल देता। एक तो कच्चे पक्के पगडंडियों के रास्ते हैं, पता नहीं किस ओर से आवाज आ रही है, किस गाँव में हो रही है नौटंकी।

     अब भाई साब धीरे-धीरे उठे। पता नहीं, मन में क्या-क्या सोच रहे थे कि – इतना तेच ‘नच-देखुआ’ मैं कब से बन गया । बाहर निकलते समय अम्मा की आंख खुल गई। शायद वे हम दोनों की बातचीत के समय से ही जाग रही थीं। अंदर मच्छरदानी से ही उन्होंने धीमी आवाज में पूछा – कहां जा रहा है ? मैंने थोड़ा सकुचाते कहा – यहीं पास ही नौटंकी देखने। शायद यह सोचकर कि गाँव में घूमने फिरने ही आया हूँ कुछ कहा तो नहीं लेकिन एक तरह की मौन सहमति सी मिली।

     अगले ही पल मोटरसाईकिल की हड़हड़ाहट हुई और हम दोनों कच्ची पगडंडियों वाले रास्ते की ओर चल पड़े। भाई साब से पूछा – अरे यार, पता तो है न किस गाँव में है नौटंकी ?

       जवाब मिला – इतनी जल्दी भूल गये क्या ? शाम को उन्हीं के न्यौता करने गये थे तो छेना, रसगुल्ला चांपे थे अब पता पूछ रहे हो ?

     मुझे अपनी सोच पर हंसी आई। शाम के समय उसी जगह हम दोनों कन्या पक्ष हेतु दहेजा करने गये थे। लौटानी में डेरा-शामियाना उतर रहा था, वहां की मैंने रूककर मोबाइल से तस्वीरें भी लीं थी। बातों ही ही बातों में अपना मोबाइल रखने के लिये टी-शर्ट की उपरी जेब की ओर हाथ बढ़ाया तो वहां जेब ही नहीं थी। थोड़ा इधर उधर टटोला तो पता चला कि टी-शर्ट जल्दीबाजी में उल्टी पहन ली थी। भाई साब को कहा थोड़ा गाड़ी रोकना तो। उन्हें लगा शायद मैं लघु-शंका वगैरह के इरादे से हूँ। गाड़ी साईड में लगाई गई और मैने उतरने की बजाय उस पर बैठे बैठे ही टी-शर्ट उतारना शुरू किया तो भाई साब ने पूछा क्या हुआ कोई कीड़ा वगैरह तो नहीं घुस गया कपड़े में। हेडलाईट की रोशनी में कीड़े पतंगे बहुत आते हैं। मैंने उन्हें आश्वस्त किया, नहीं यार, कीड़ा वगैरह कुछ नहीं, टी-शर्ट उल्टी पहन लिया हूँ।

         अब भाई साब ने हंसते हुए कहा – इतने तेज नच-देखुआ कब से बन गये यार कपड़े तक का खयाल नहीं। मोटरसाईकिल फिर स्टार्ट की गई। जैसे-जैसे नौटंकी का शामियाना नजदीक आ रहा था नगाड़े और कुड़कुड़िया की आवाज और करीब आती जा रही थी। मोटरसाईकिल शामियाने के ठीक बगल में रोकी गई। वहीं पास ही नजर पड़ी जहां कि आग जलाकर एक तबले के आकार का वाद्य गरमाया जा रहा था। यह कुड़कु़डीया थी जिसके चमड़े को गर्मा कर ताना जाता था और नगाड़ा-उस्ताद के पास बदला जाता था ताकि उसकी आवाज से माहौल गरमाया रहे।

         मैंने देखा वहां काफी भीड़ थी। जो बाराती थे वे टेन्ट हाऊस से लाये गये खटियों पर पसरे थे, कुछ उठंगे थे तो कुछ सो गये थे। कुछ आस-पास के नचदेखुआ आगे स्टेज के पास जमीन पर अपनी चप्पलों को उतार उसी पर बैठे थे। किसी के पास लाठी भी थी। इन जमीनी नच-देखुओं में कुछ बच्चे थे, कुछ युवक कुछ बुजुर्ग। उधर स्टेज पर किसी डाकू और उसकी प्रेमिका अंजू का पार्ट खेला जा रहा था। होरमोनियम मास्टर जोश में था। हर डॉयलॉग पर एक लय बढ़ा देता और फिर अचानक ही नगाड़ा-उस्ताद की घम् की आवाज के साथ थम जाता।


     अंजू बना किरदार एक लड़का था जो कि साड़ी वगैरह पहन, सिंगार करके कुछ-कुछ किन्नरों की मानिंद नजर आ रहा था। उधर अंजू की बहन मंजू का भी किरदार कोई लड़का कर रहा था। रह रहकर जोकर उन लोगों की आपसी बातचीत में शामिल होकर हास्य उत्पन्न कर रहा था। यहां गौर करने लायक बात है कि जोकर पूरे नौटंकी के दौरान पक्ष और विपक्ष दोनों की ओर से बोलता है, बतियाता है और दर्शक उसकी इसी पाला बदल और तात्कालिक ह्यूमर मिश्रित संवाद अदायगी का, उसके चुटकुलों का खूब आनंद लेते हैं। मसलन एक दृश्य था जिसमें अंजू का विवाह एक कोढ़ी से होता है। अंजू का पिता अपनी बेटी को कुछ नहीं दान-दहेज में देता तो जोकर स्टेज पर आकर कहता है ये लो दस रूपये जिसे मैंने तुम्हारे पिता के यहां से चुराये हैं औऱ जाकर यहीं पास ही के फलां बाजार से चना-लाई खरीद लेना और दोनों जन गाते-खाते जीवन व्यतीत करना लेकिन मेरी रोजी में ‘गोजी’ (लाठी) मत डालना।


         जोकर के इस संवाद आदायगी पर बारात से ही कोई बंदा निकलकर स्टेज की ओर आता है और सौ-पचास या दस-बीस जैसा बने रूपये जोकर को अपना नाम-पता बताकर दे जाता है। जोकर उस नाम को माइक में बोलकर सुनाता है कि अलां गाँव के सिरी अनिल यादौ जी अंजू और कोढ़ी के विवाह से खुस्स होकर सौ रूपईय्या इनाम दिये हैं, इनका ‘सुकिरिया’। अगले ही पल जोकर फिर अंजू और कोढ़ी से संवादरत हो जाता है।

     इस पूरी कवायद में एक चीज गौर करने लायक रही कि लोग उन संवादों पर ज्यादा लहालोट होते हैं जो स्थानीय बातों को मिलाकर देशज अंदाज में बोले जाते हैं मसलन जोकर द्वारा लाठी की बजाय ‘गोजी’ बोलना और स्थानीय बाजार का नाम लेना दर्शकों को नौटंकी से जोड़ने में सहायक रहा।

      इसी बीच मैंने अपना मोबाइल कैमरा चालू कर कुछ तस्वीरें लेनी शुरू किया। कुछ अच्छी कुछ खराब। तभी मन किया कि अंदर ‘सिंगार खोली’ में दाखिल हुआ जाय। वहां के माहौल का जायजा लिया जाय। देखा जाय कि नौटंकी कलाकारों की जीवन शैली कैसी है, क्या होता है अंदर। बतौर राइटर भी मेरे लिये यह जिज्ञासा बनी थी क्या पता कुछ कंटेंट हाथ लगे।

          यही सोच मैंने भाई साब से कहा यार मुझे ‘सिंगार खोली’ में जाना है। नौटंकी मालिक से बात कर। गौरतलब है कि नौटंकी कलाकारों के चेंजिंग रूम को ‘सिंगार खोली’ कहा जाता है जिसमें परदे हटाकर झांकना या नजरें सटाना अभद्रता मानी जाती है क्योंकि वहां लड़का अपने कपड़े बदल लड़की का रूप धरता है, लाली पौडर, ब्लाऊज आदि पहनता है और ऐसे में कोई वहां ताके तो वह ठीक नहीं माना जाता।

       भाई साब ने मेरी बात सुन थोड़ा हैरानी जताई और कहा – जो कवर करना है यहीं कवर करो उधर अंदर क्या ‘माल-पूआ’ धरा है। जाहिर है वो आशंकित थे कि कोई परिचित यदि देख लेगा तो न जाने क्या सोचे। मैंने कहा - कुछ नहीं थोड़ा तफरीह करके आता हूँ। कहते-कहते मैं ‘सिंगार-खोली’ की तरफ बढ़ गया। इतना जरूर ध्यान रखा कि अंधेरे का सहारा ले आगे बढ़ा जाय। उधर कुछ तस्वीरें लेने के दौरान ही नौटंकी कलाकार जान गये थे कि कोई नौटंकी प्रेमी है।

     सिंगार खोली के बगल में सेनापति की पोशाक में बीड़ी फूंकते एक कलाकार के करीब जाकर कहा – आ जाऊं। बंदा समझदार था, तुरंत बोला – हां, हां क्यों नहीं। अंदर ले जाया गया। कुछ कलाकार जमीन पर सोये थे, कुछ तैयार हो रहे थे। मंजू बने कलाकार को देखा जोकि अब भेष बदलकर डाकूओं के साथ मिलने जाने का पार्ट खेलने जा रहा था। मैंने उसकी तस्वीर ली। इधर उधर की कुछ और तस्वीरें लेने के बाद ‘सिंगार खोली’ से बाहर आ गया।

    भाई साब खिन्न होकर मेरी ओर ताक रहे थे। मैंने पूछा क्या हुआ ?

“अरे यार तुम गाँव-ओंव की बात समझ नहीं रहे क्या ? वो साला चन्नरवा वहीं बाराती है, कल को शोर कर देगा कि सिंगारखोली में घुस कर ये लोग टाईम पास कर रहे थे। और कोई लेडी डांसर होती तो चलो मान भी जाता कि उनका फोटू वगैरह लिया जा सकता है अंदर घुसकर जो देखेगा तो यही समझेगा कि लड़के हैं मौज ले रहे हैं लेकिन ये क्या कि लड़के का फोटू ले रहे हो....लोग गलत मतलब निकालेंगे”

   भाई साब की बात सच थी। लोग खबरें फैलान में देर नहीं लगाते। इसका तोड़ कुछ यूं रहा कि अगले दिन सुबह भाई साब ने मेरी मासूमियत को सबके सामने कुछ यूं बयां किया  – “ये मरदे बहुत बेकार आदमी हैं। गाँव देस की रीत रिवाज समझते हैं नहीं, बस चले गये कैमरा उठाकर सिंगारखोली के अंदर। उधर साला चन्नरवा बारात में बैठा सब देख रहा था, कल को देखना सबको बात फैलाएगा कि फलाने के घर के लड़के ‘लौन्डाबाजी’ कर रहे थे”

- सतीश पंचम

Saturday, May 12, 2012

कारटून-फारटून....बतकूचन-फतकूचन

"तो क्या कहते हो" ?


"किस बारे में" ?

"वही कारटून प्रकरण पर".

"उसकी मां की आँख".

"बाप की क्यों नहीं" ?

"अंधा है".

"नाम क्या है उसके बाप का" ?

"कानून....."

"हाल ही में अंधत्व आया या जन्म से ही" ?

"जब से जनमा तब से".

"जन्म कब हुआ था" ?

"किसका" ?

"उसी कानून का".

"उसी से पूछो".

"पूछा था".

"क्या बताया" ?

"कह रहा था जिस दिन लोग कुछ जानने लायक हुए बस उसी रोज".

"कुछ बताया कि कहाँ जनमा था" ?

"बियांबान जंगल में...."

"कद-काठी में कैसा था ....मजबूत कि कमजोर" ?

"दोनों"

"मतलब"

"कमजोरों पर मजबूत हावी.... जैसे कमजोर हिरन पर शक्तिशाली शेर...जैसे निरीह खरगोश पर झपटमार कुत्ता.... "

"उस समय अकेला वही जनमा था या और कोई उसके साथ साथ जनमा था" ?

"कुछ और भी जनमे थे".

"कौन कौन" ?

"वकील , फैसलाकार, पुलिसिया..."

"सब के सब अंधे थे" ?

"अमूमन".

"वकील कैसा था" ?

"लंठ था".

"और फैसलाकार" ?

"महालंठ".

"पुलिसिये के बारे मैं नहीं पूछूंगा...उसे जानता हूँ ......वैसे करते क्या थे ये लोग" ?
"अंधत्व को पोषित करने में सहायक थे".

"आजकल क्या कर रहे हैं" ?

"अंधा-अंधा खेल रहे हैं".

"मतलब" ?

"एक को पिछले पांच छह साल से उसके ही  किताब में  छपता आया कार्टून नहीं दिखा".

"और दूसरा" ?

"दूसरे को अश्लील सीडी बिना देखे ही दिख गई और अच्छी तरह समझ भी आ गई जिस वजह से "उसने औरों के देखने पर रोक लगा दी".

"और तीसरा" ?

"उसे चोर दिखने पर भी दिखाई नहीं दे रहे... बहाने बनाता है कि चोर पकड़ूँ कि लड़की" ?

"तो क्या पहले चोर अच्छे से पकड़ता था" ?

"उसकी बातों से तो ऐसा ही लगता है".

"सुना गोली मारने की भी बात करता है" ?

"हां सुना तो मैंने भी है".

"तब तो उसे कुछ-कुछ दिखता होगा" ?

"हां, तभी तो निशाना  लगा पाता होगा".

"फिर अंधत्व क्योंकर" ?

"मजबूरी है".

"कैसी" ?

"समय की".

"समय भी तो अंधा होता है".

"हां बस चलता चला जाता है नहीं देखता कौन उसके साथ है कौन पीछे रह गया है".

"चलो अच्छा है कोई तो समय से है"

"हाँ.....वरना तो लोग एक कारटून तक समझने में साठ-साठ साल लगा देते हैं.....समय कहाँ तक रूके ऐसे लोगों के लिये ...."


- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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