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Saturday, April 21, 2012

सिनेजगत में अलग मुकाम रखती फिल्म - 'यादें' (1964)

         अक्सर माना जाता है कि भारत में एक्सपेरिमेंटल फिल्में कम बनती हैं, लोग पसंद नहीं करते या उन्हें बनाने के पीछे उद्देश्य केवल अपने क्रियेटिव मन की क्षुधा शांत करना होता है जो कॉमर्शियल फिल्म मेकिंग के दौरान अतृप्त महसूस करता है। इन बातों में बहुत हद तक सच्चाई तो है लेकिन अकेले फिल्म निर्माण क्षेत्र में ही ऐसा नहीं है, ऐसे कई और भी क्षेत्रों में देखा जाता है कि लोग अपनी क्रियेटिविटी को पॉपुलर वेव से बचाकर रखते हैं, बाजार से हटकर सोचते हैं और दुनियाँ के सामने एक नायाब कृति पेश करते हैं।

       सुनील दत्त निर्देशित 1964 में बनी फिल्म ‘यादें’ उसी क्रियेटिविटी और अनूठेपन की बानगी दर्शाती ‘ब्लैक एण्ड वाइट’ जमाने की एक खूबसूरत कृति है। ‘यादें’ जिसमें कि शुरू से अंत तक केवल और केवल सुनील दत्त नजर आते हैं। एक घर में, कभी किचन में नजर आते हैं, कभी ड्राईंग रूम में, कभी बेडरूम में तो कभी बाथरूम में केवल और केवल सुनील दत्त। साथ होती हैं केवल वे आवाजें जो बाहर से टेलीफोन के रूप में होती हैं या संस्मरण के रूप में कही गई बातें जिनके खोने-छूने, समझने-बूझने, लड़ने-डरने की मनोव्यथा से गुजरता एक शख्स जो शुरू से अंत तक बस बांधे रहता है। ‘यादें’ एक ऐसे शख्स की कहानी है जिसका भरा-पूरा परिवार है। एक पत्नी है दो बच्चे हैं। आपसी लाग-डाट है, अनिल अनूगूँज है और उन तमाम दुनियावी बातों के अलावा पति-पत्नी में होने वाले ‘झगड़ों का वितान’ है।

             फिल्म जब शुरू होती है तो हम देखते हैं कि कैमरा पूरे घर में जैसे टहल रहा है, परदों के हवा से हिलने की गति निहार रहा है, फोकस कभी घड़ी की सूईयों पर ठहर रहा है तो कभी फूलदान पर तो कभी सीढ़ियों को लो-एंगल से कैमरा दिखाता ही जा रहा है...दिखाता ही जा रहा है। फोन की घंटी बजती है औऱ कैमरा फोन पर जूम-इन करता है। घंटी लगातार बज रही है लेकिन कोई उठाने नहीं आ रहा। कैमरा अब बेचैन हो गया। वो जल्दी-जल्दी कभी हिलते परदों पर नज़रें घुमाता है तो कभी दरवाजे पर तो कभी कहीं और... मानों उसे भी बेचैनी हो कि फोन उठाये कोई। और फोन की घंटी अचानक बंद हो जाती है। थोड़ी देर की खामोशी के बाद किसी के आने की आहट सुनाई देता है और कैमरा दरवाजे की ओर ताकता है....तभी प्रवेश करता है एक शख्स जिसका नाम अनिल (सुनील दत्त) है। गुस्से में तमतमाया अनिल चिल्लाकर पूछता है – इस घर में कोई है या नहीं, कहां चले गये सब के सब। और फिर कैमरा अनिल पर फोकस करता है, उसके हाव-भाव दर्शाता है। उसकी बेचैनी और कुंठा को पल-पल दर्शाये चले जा रहा है। घर में किसी को न पाकर बेचैन अनिल सोफे पर गिर जाता है और इसी के साथ कैमरा जैसे खुद भी थककर अनिल की थकन का साथ देते हुए नीचे की ओर आ बैठता है।

          फिर शुरू होता है अनिल की खीझ और खिन्न मन:स्थिति का दौर जिसमें अनिल अपनी पत्नी को जी-भर कर कोसता है, उसे तमाम अंट-शंट बातें अकेले ही कहता रहता है। कैमरा फिर सक्रिय होकर अनिल पर नज़रें टिका देता है। कांच के डाइनिंग टेबल पर रखा दूध गुस्से में अनिल गिरा देता है और फैला हुआ दूध कांच की टेबल पर उस गुस्से और तमतमाहट का प्रतीक बन जाता है जिससे अनिल गुजर रहा है। कांच के डाइनिंग टेबल के नीचे लगा कैमरा उस छितराये दूध के बीच से अनिल का चेहरा दिखाता है जो अपनी पत्नी द्वारा बच्चों सहित घर छोड़ देने पर पल-पल बेकाबू होता जा रहा है। अनिल घर की तमाम चीजें उलट-पुलट कर देता है, अपने पुरूषत्व को दर्शाते हुए बड़बड़ाता है कि – क्या समझती है, मैं उसके बगैर नहीं रह सकता ? रह लूंगा। लेकिन इस गर्वेक्ति में भी कैमरा अनिल के चेहरे से वह थोथा भाव पकड़ ही लेता है। मानों कहना चाहता हो – मैं जानता हूं तुम झूठ बोल रहे हो। तुम अपनी पत्नी औऱ बच्चों के बिना नहीं रह सकते। वे तुम्हारी जिंदगी में इतने घुल-मिल गये हैं कि यदि चाहो भी तो नहीं निकाल बाहर कर सकते। और यहीं से शुरू होती है वो खट्टी-मिठी यादें जिनके जरिये अनिल अपने आप को अब अकेला महसूस करता है, अपने जीवन के सूनेपन की आशंका से अंदर ही अंदर हिल जाता है। उसे याद आता है कि कितना तो भरा-पूरा परिवार है उसका। सुंदर पत्नी है, बच्चे हैं लेकिन उसने कभी उनकी कद्र नहीं की। केवल अपने मन की करता रहा, अपने मन का जो चाहा सो कहते-सुनते रहा। कभी पत्नी की राय लेने या उसकी बातों को तवज्जो नहीं दिया। यहां तक कि अपने बच्चों की ओर से बेखबर रहा, और देखते देखते एक दूसरी महिला की ओर अपने मन को उछाल बैठा।

    नतीजा अब उसके सामने है। रोज-रोज का मनमुटाव, पति-पत्नि के झगड़े से होने वाला बच्चों पर असर इन सब बातों पर उसने कभी ध्यान नहीं दिया। उसे लगता रहा कि उसकी पत्नी उसकी है, वो भला उसकी हद से बाहर क्या जायेगी। लेकिन अब देखो, पत्नी चली गई है, बच्चे चले गये हैं और वह घर में अकेला है। कैमरा आगे भी अनिल के उन्हीं मनोभावों को बेहतरीन अंदाज में दिखाता चलता है। अनिल की निराशा, उसकी हंसी, उसके हत मनोभाव सारा कुछ कैमरा पल-पल दिखाये ही जा रहा है। कभी अनिल अपनी पत्नी के हेयरपिन को छूता है, कभी उसकी लिपस्टिक से अपनी हथेलियां रंग चूमने को होता है तो कभी कंघी में फंसे पत्नी के टूटे बालों के गुच्छों को सहलाता है। तमाम उन चीजों को छू-छूकर देखता है जो उसकी पत्नी से जुड़ी हुई थीं। रस्सी पर सूखते उसके कपड़े, बच्चों के कपड़े हर एक को छू-छूकर देखता है, महसूस करता है और देखते ही देखते फूट-फूटकर रोने लगता है।

        इन्हीं क्षणों में उसे घर की दीवारों पर बच्चों द्वारा बनाई आड़ी-टेढ़ी लकीरें दिखाई देती हैं। किसी में बच्चों ने शेर बनाया है तो किसी में कुछ बनाया है। उसे याद आता है कि बच्चों की इन हरकतों पर वह खूब गुस्सा होता था। दीवार खराब करना उसे अच्छा नहीं लगता था। एक बार तो उसने देखा बच्चों ने एक आड़ा टेढ़ा शेर बनाया और लिख दिया था कि – पापा शेर हैं। उसने नजरें घुमाई और दूसरी ओर देखा कि बच्चों ने दीवार पर एक और आकृति बनाई थी जिसकी बगल में उन्होंने लिखा था – मम्मी बकरी हैं। जाहिर है, बच्चे उन दोनों पति-पत्नी के बीच होने वाले झगड़े अच्छी तरह समझ रहे थे। ऐसे में जबकि उसे सावधान हो जाना था उसने पत्नी को तब भी तवज्जो नहीं दी और आज ये दिन देखना पड़ा कि बच्चों सहित पत्नी घर छोड़कर चली गई है।

        इधर निराश हताश अनिल अपने पत्नी और बच्चों पर किये अपने जुल्मों से आहत हो मौत को गले लगाने की सोचता है, फंदे पर झूल भी जाता है लेकिन तभी उसकी पत्नी बच्चों के साथ घर में प्रवेश करती है औऱ पति को इस हालत में देख जल्दी जल्दी फंदे से मुक्त करती हुई फूट-फूट कर रो पड़ती है कि वह तो थोड़ी देर के लिये बाहर गई थी बच्चों के साथ और उसने अपनी यह हालत बना ली। उसे मौत के मुंह मे पहुंचाने की जिम्मेदार वह खुद है। आपसी टंटे की वजह से वह खुद भी फांसी के फंदे पर झूलना चाहती थी, मरना चाहती थी लेकिन उसे बच्चों के मोह ने ही अब तक जिंदा रखा है। अब वह कभी अपना व्यवहार कठोर नहीं रखेगी।

        यहां यह देखना बहुत दिलचस्प है कि किस तरह ‘स्टिल कार्टून इमेज’ के जरिये सुनील दत्त ने अपनी कहानी में यादों को जिवित किया है। कभी कार्टून को हाथों से ही आगे की ओर सरकाया गया है तो कभी कैमरे का फोकस विशेष एंगल से सुनील दत्त और नारी चेहरे वाले कैरीकेचर से सटा दिया गया है। बैकग्राउण्ड में आवाजें बदल बदल कर आ रही है। कभी पुरूष की कभी स्त्री की तो कभी कोलाहल की। पार्टी का दृश्य तो औऱ भी दिलचस्प अंदाज में दर्शाया गया है जिसमें कैमरा केवल सुनील दत्त को फोकस कर रहा है लेकिन आस पास लगे गुब्बारों में चेहरे बना दिये गये हैं जो उन लोगों के प्रतीक हैं जो पार्टीयों में हवाबाज बोलीयां बोलते हैं। यहां कई बार जब कैमरा किसी कैरीकेचर पर फोकस करता है, कार्टून पर जूम-इन करता है तो वॉयसओवर में कभी देवानंद बोलते हैं तो कभी राजकुमार तो कभी कोई और नामी हीरो। लेकिन उनकी केवल आवाजें ही सुनाई देती हैं वे खुद नहीं। इन्हीं सब बातों से यह फिल्म अपने आप में नायाब कृति बन गई है जिसे फिल्म इंडस्ट्री में एक अलग मुकाम हासिल है।

       मेरी संस्तुति है कि Film writers को या सिनेमा के स्टूडेंट्स को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिये कि कैसे एक अकेला शख्स बिना किसी और किरदार को दिखाये पूरी फिल्म का निर्माण कर सकता है, कैमरों का कैसे बेहतर इस्तेमाल कर सकता है, डायरेक्शन को कैसे अलग ही लेवल तक पहुंचा सकता है। उल्लेखनीय है कि सुनील दत्त की इस ‘यादें’ फिल्म को Guinness Book of World Records में ‘World’s Fewest Actors film’ के तहत दर्ज किया गया है। फिल्म की कास्ट देखने पर लिखा हुआ आता है – Sunil Dutt & Others.

        वहीं, आजकल के कॉर्पोरेट दौर में जहां फिल्मों का बजट करोड़ों का हो गया है, अरबों तक की लागत जाती दिख रही है यदि इस तरह की फिल्में बनाई जाये तो न सिर्फ खर्चों में कमी होगी बल्कि लागत वसूलने में भी आसानी रहेगी। सिरियलों के दो-चार कड़ियों के हिस्से जितनी लागत में बनने वाली ऐसी फिल्म से न सिर्फ लेखन, निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी आदि मांजने का मौका मिलेगा बल्कि नये ढंग से फिल्म इंडस्ट्री की बयार भी बहाई जा सकती है। लेकिन बात वही है कि कंटेंट इतना कसा हुआ रखना होगा कि दर्शक एकटक देखते रहें, किरदारों में उनकी दिलचस्पी बनी रहे और सबसे बढ़कर दर्शकों को महसूस हो कि हां, कुछ ऐसा देखा जिसे अब तक न देखा था।

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां की फिल्मी हस्तियां अपने केश सज्जा, रहन-सहन, वेशभूषा आदि से देश के करोड़ों लोगों को कंट्रोल करते हैं।

समय – वही, जब प्रोडयूसर फिल्म राईटर से कहे – “ऐसी फिल्म लिखिये जिसमें लागत कम हो, किरदार कम हों, रिटर्न अच्छा हो और दर्शकों की रूचि भी बनी रहे”।

राईटर छूटते ही कहे – “सीधे-सीधे कहिये न कि आप 'पॉर्न' बनाना चाहते हैं। उसमें मेरी राईटिंग का क्या काम” ?

और प्रोडयूसर उठते हुए कहे – “मैं ‘यादें’ बनाना चाहता हूँ.....जी भरकर 'तृप्त' होना चाहता हूँ” !

Sunday, April 8, 2012

'परमा'

        फिल्म इंडस्ट्री में कुछ फिल्में ऐसी भी बनी हैं जो कि मॉस ऑडियेन्स को शॉक ट्रीटमेंट देती हैं, एक तरह के रूटीन ट्रैक से हटकर सीधे ‘अरे ये क्या’ वाले भाव जनरेट करती हैं। सन् 1984 में बनी राखी गुलज़ार अभिनीत बंगाली फिल्म ‘परमा’ ऐसी ही फिल्म है। हाल ही में इसका हिंदी वर्शन देखा और कुछ पल के लिये ‘धंस’ सा गया।

फिल्म एक घरेलू महिला के अनायास बन उठे अवैध रिश्ते को कैमरे की नज़र से दिखाती है जिसे परत दर परत देखते हुए मन में अजीब सी ‘कचोट’ महसूस होती है। फिल्म में राखी ने 40 वर्षीय एक उच्च मध्य वर्ग की घरेलू महिला ‘परमा’ का रोल निभाया है जिसका जीवन बच्चों की स्कूली देखभाल करने, भतीजे, देवरानी, सास आदि के दैनंदिन कामों में बीतता है। सास को समय भर भोजन कराना, पति के कपड़े लत्तों का ख्याल रखना, धोबी से हिसाब किताब करना ऐसे तमाम काम करना जिसे कि घरेलू महिलायें करती हैं। बीच बीच में परमा अपनी हमउम्र महिलाओं की चाय-बैठकी आदि में भी आती-जाती रहती है। वे महिलायें भी उच्च वर्गों से ताल्लुक रखती हैं। कोई सिगरेट पीती है तो कोई और गुण बटोरे है। किसी का डिवोर्स हो गया है तो किसी को विदेश घूमने की जल्दी है।

      परमा में भी कई गुण है। वह सुरूचिपूर्ण है, सितार बजाना जानती है, अंग्रेजी बोलना पढ़ना जानती है। लेकिन घर के तमाम कामों के बीच उसे सितार आदि के लिये समय ही नहीं मिल पाता । इसी बीच दुर्गा पूजा के दौरान परमा के भतीजे का एक फोटोग्राफर मित्र राहुल आता है जो दुर्गा पूजा के दौरान घर भर की तस्वीरें खींचता है। तस्वीरें खिंचवाने के दौरान उसकी नजर परमा पर पड़ती है जो चालीस की उम्र की घरेलू महिला होने के बावजूद अलग ही आकर्षण रखती है। दुर्गा पूजा खत्म होती है और तमाम खेंची गई तस्वीरें राहुल घर वालों को दिखाता है। लोग आश्चर्यचकित होते हैं राहुल की इस खूबसूरत फोटोग्राफी पर। कुछ समय बाद राहुल इच्छा जाहिर करता है कि वह घरेलू महिलाओं की फोटोग्राफी सीरिज़ बनाना चाहता है और उसके लिये परमा को फोटोग्राफ करना चाहता है।

राहुल की फोटोग्राफी से पहले से प्रशंसक परमा के पति को कोई आपत्ति नहीं होती। वह इजाजत दे देते हैं और लंबे समय के लिये बिजनेस टूर पर चले जाते हैं। राहुल घर में आकर परमा की फोटो खेंचना शुरू करता है। कभी धोबी वाले का बिल देते हुए तो कभी कोई काम करते हुए। इस बीच परमा बच्चों को स्कूल लाती ले जाती है, सास को समय पर दवायें देती है, खाना खिलाती है। सभी के स्कूल जाने, काम पर जाने के बाद राहुल परमा की फोटो खिंचना शुरू करता है।

एक दो दिन बाद दोपहर में परमा से घर के बाहर चलकर फोटो खिंचवाने के लिये कहता है। परमा अपनी सास से इजाजत ले गाड़ी में बैठ कलकत्ता शहर में किसी अलग थलग सी जगह पर जाती है। कुछ कुछ वह भी राहुल की ओर खिंचना शुरू हो जाती है। उधर परमा को राहुल की नज़रों में एक किस्म का आकर्षण सा नज़र आता है, कहीं कुछ हो होवा न जाय इस डर से चिंतित वह अपने भतीजे से कहती है कि अपने मित्र को आने से मना कर दे क्योंकि वह इन सब से असहज महसूस कर रही है।

           इस बीच राहुल आता है और उसे सामने देख अपनी असहजता भूल जाती है और वैसे ही बच्चों के स्कूल जाने के बाद दोपहर में अपनी सास से इजाजत ले बाहर फोटोग्राफी के बहाने जाती है। अपने मायके के उजाड़ खंडहर से घर में वह राहुल के साथ फोटोग्राफी के इच्छा से जाती है जहां परमा की विधवा मां उनका स्वागत सत्कार करती है। खंड़हर की उपरी मंजिल में खिड़की खोलने के दौरान कबूतरों की फड़फड़ाहट को चमगादड़ों का उत्पात जान कर परमा अचानक ही राहुल के साथ आलिंगनबद्ध हो जाती है। वहां परमा को एहसास होता है कि कुछ गलत हो गया है। भतीजे की उम्र का यह तेईस चौबीस साल का युवक उससे यह सब करना ? परमा घर आकर अकेली रोती है, बिलखती है। इस बीच कुछ और वक्त गुजरता है और किसी न किसी बहाने राहुल और परमा एक दूसरे के सम्पर्क में आ ही जाते हैं। अब दोनों में अवैध रिश्ता बन जाता है। राहुल और परमा एक जगह जाते हैं तो मजाक ही मजाक में राहुल परमा को अपनी पत्नी बताता है। परमा के यह बताने पर कि उसके घर में एक श्यामल रंग का पौधा था जो बचपन से प्रिय था लेकिन नाम नहीं पता है, राहुल उसे वही पौधा बाजार से खरीद कर देता है।

        इधर जब तक परमा का पति बाहर रहता है तब तक दोनों के बीच खूब रिश्ता चला। इस बीच राहुल बातों ही बातों में परमा से कहता है कि वह विदेश में अपने फोटोग्राफी प्रोजेक्ट के सिलसिले में जा रहा है। परमा उदास हो जाती है। इस बीच परमा अपनी एक तलाकशुदा सहेली से राय लेती है कि क्या करना चाहिये ? बच्चे बड़े बड़े हैं। भतीजे की उम्र का प्रेमी है राहुल। क्या किया जाय ? तलाकशुदा सहेली उसे जो कुछ कच्ची-पक्की राय देती है उसके आधार पर परमा निर्णय नहीं ले पाती। उधर राहुल विदेश जाता है और उसका पति घर आता है। अब परमा को एहसास होता है कि कुछ गड़बड़ हो गई है। एक दिन परमा के पति के हाथ में एक मैगजीन लगती है जिसमें पीठ उघाड़े हुए परमा की तस्वीर छपी होती है। उसे देखकर परमा के पति को माजरा समझ आ जाता है कि उसके न रहने पर यहां क्या क्या गुल खिला है। अब वह अपनी पत्नी का घरेलू बहिष्कार करना शुरू कर देता है। उससे अपना बिस्तर अलग कर लेता है, अपने कपड़ो को दूसरे कमरे में रखवा देता है और बच्चों को होम वर्क करवाने का जिम्मा खुद लेता है। कह भी देता है कि ऐसी पतित औरत से अपने बच्चों को नहीं पढ़वाना चाहता। परमा इन सब बातों से अंदर ही अंदर ग्लानि अनुभव करने लगती है। उसे घरवालों का बर्ताव बर्दाश्त के बाहर लगता है। घर की महिलाओं की बातें सुनकर उसे अंदर ही अंदर अपने आप पर शर्म आने लगती है कि उसने ये क्या कर दिया। परमा का बेटा अपनी मां के इस बदले रूप से सन्न रहता है। उसे रात में नींद नहीं आती। अपने चचेरे भाई से पूछता है कि मां को क्या हो गया है लेकिन चचेरा भाई उसे चुपचाप सोने की सलाह देता है। अंदर ही अंदर वह भी परेशान रहता है कि काकी मां ने ये क्या कर दिया।

        उधर परमा अंदर ही अंदर कभी टूटती है तो कभी इस विश्वास में जीती है कि उसका राहुल उसे उबार लेगा। लेकिन तलाकशुदा सहेली से पता चलता है कि राहुल का विदेश में कहीं अता पता नहीं है। वह युद्धग्रस्त देश की फोटोग्राफी करने गया था और अब कहां है किसी को कुछ नहीं पता। सुनकर गहरे अवसाद के बीच गुजर रही परमा बाथरूम में आत्महत्या की कोशिश करती है लेकिन घरवालों द्वारा बचा ली जाती है। सिर पर लगी गहरी चोट के कारण उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। अब घरवालों का रवैया परमा के प्रति कुछ नरम हो जाता है लेकिन मन में गांठ वैसी की वैसी बनी रहती है। इलाज के दौरान परमा को डॉक्टर सलाह देता है कि आपकी शारिरिक बीमारी का इलाज तो हो गया लेकिन मानसिक बीमारी का थोड़ा सा इलाज करना जरूरी है ताकि आपके अंदर जो अपराध बोध है उसे खत्म किया जा सके। डॉक्टर की बात सुनकर परमा कहती है उसे कोई अपराध बोध नहीं है। परमा की बात सुनकर उसके पति को धक्का सा लगता है। अंत में परमा यह बताकर सभी को आश्चर्य-चकित कर देती है अब वह नौकरी करना चाहती है, अपने दम पर रहना चाहती है। कोई भी छोटी-मोटी नौकरी करके वह खुश रह लेगी।

     अस्पताल में मानसिक इलाज की उसी बातचीत के दौरान अचानक ही परमा को उस पौधे का नाम ‘कृष्ण-पल्लवी’ याद आ जाता है जिसे वह बचपन से लेकर अब तक याद नहीं कर पाई थी। फिल्म के अंत में पौधे का नाम याद आ जाना दर्शाता था कि परमा पूरे होशो-हवास में है और उसे अपने किये का कोई अपराध बोध नहीं है। वह अपनी नौकरी और अलग पहचान की बात पर अडिग है।

     फिल्म जहां एक ओर महिला के स्वतंत्र निर्णय लेने के दृष्टिकोण को मुखर होकर दर्शाती है तो दूसरी ओर पितृसत्तात्मक समाज की बाड़ को बेंधते हुए झटका भी देती है यह कहकर कि क्या गलती पुरूषों से नहीं होती ?

        फिल्म में कई जगह 40 वर्षीय घरेलू महिला परमा के 23-24 वर्षीय राहुल से अवैध सम्बन्ध को दर्शाते हुए कैमरे का एंगल इस तरह से मोड़ा गया है कि दृश्य बेहद बोल्ड हो गये हैं। खासकर 1984 के कालक्रम के हिसाब से इन्हें ‘अति-बोल्ड’ ही माना जायगा। यहां फिल्म का एक पहलू यह भी है कि अंत आते आते फिल्म को फेमिनिस्ट अप्रोच दे दिया गया है जिसमें महिला द्वारा अपने किये पर अपराध बोध न होना, अलग नौकरी, जीवन को नई पहचान, नई दिशा देने की मंशा परमा के मनोभावों के जरिये अभिव्यक्त हैं।

      फिल्म अंत में इस प्रश्न पर अनुत्तरित ही रही कि महिला के ‘बिना अपराध-बोध’ वाली व्याख्या में परिवार पर क्या असर पड़ सकता है। किशोर उम्र के बच्चे, अपनी मां के इस अतीत को जान क्या सामाजिक स्थिति रखेंगे ? उनकी इच्छायें, उनकी आवश्यकतायें किस स्वतंत्रता की भेंट चढ़ेंगी। व्यक्तिवादी सोच और संयुक्त परिवार के कशमकश को झकझोरती यह फिल्म देखने योग्य तो है पर अनुकरणीय नहीं।


- सतीश पंचम

Wednesday, April 4, 2012

'ख़बरफ़रोश' !

      बड़ी अजीब बात है। टीवी पर खबरों में बताया जा रहा है कि 16 जनवरी 2012 के दिन भारतीय सेना की दो टुकड़ियां दिल्ली की ओर कूच कर गईं थी। यह वही दिन था जिस दिन वी. के. सिंह उम्र विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट गये थे, अलां हुआ था, फलां हुआ था। विशेषज्ञ बताते दिखे कि भई ये तो सेना का रूटीन अभ्यास था कि कोहरे में कैसे सेना जल्द मूवमेंट करती है। कैसे क्या संभालती है, बस उसी की कवायद थी, इसमें इतनी चिंता कैसी ? लेकिन नहीं..... चिंता उस बात की नहीं है कि कवायद रूटीन थी या नहीं, बल्कि चिंता इस बात की है कि ये खबरें लीक कौन कर रहा है ? विशेषकर तब जबकि राजनीतिज्ञों की टुच्चई अपनी हदें घटिया साजो-सामानों से जाकर जनरलों के हटने-हटाने तक पहुंच जाय, देश के गोपनीय पत्राचारों तक को अखबारों में छाप दिया जाय।

    आखिर इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर जब आई कि सेना की फलां नंबर की टुकड़ी ने मूवमेंट किया था तो इसकी खबर देने वाला भी तो कोई अंदरूनी सूत्र होगा। क्या गारंटी है कि इसके अलावा और कोई सूचना बाहर लीक नहीं हुई है, क्या गारंटी है कि रक्षा-भवन में वह जासूस अब भी नहीं बैठा है ?


     खैर, अब तो इस मसले पर राजनीति खूब हो रही है। सेना, जोकि अब तक विशेष परिस्थितियों में ही बाहर निकलती थी या उससे सम्बन्धित बातें लोगों तक पहुंचती थी, इस सब में नाहक बदनाम हो रही है, वह भी केवल जनरल और राजनीतिज्ञों की आपसी कड़ुवाहट के चलते। उल्लेखनीय है कि यह वही भारतीय सेना है जो अधिकतर अपने बैरको में ही बने रहने के लिये जानी जाती है, जनता के बीच खुलकर तभी बाहर आती है जब बहुत दुश्कर कश्मीर जैसे हालात हों। संभवत: बशीर बद्र का एक शेर सेना की इसी फितरत और हाल फिलहाल के राजनीतिक टकरावों के हालात को बखूबी बयां करते हैं जिसमें वे लिखते हैं कि -

मैं यूँ भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ
कोई   मासूम   क्यों  मेरे  लिये बद-नाम हो जाये

      यहां बात चाहे जनरल वी.के. सिंह की उम्र विवाद में छलकी मासूमियत की हो या हथियारों की खरीद फरोख्त में हुई धांधली की, सेना के मूवमेंट करने की बातें आखिर बाहर कैसे आ रही हैं ? गनीमत है कि सेना के कूच की यही खबरें ढाई महीने बाद फ्लैश की जा रही हैं। कहीं यही खबरें उस दौरान फ्लैश हुई होतीं जब जनरल वी. के. सिंह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे तो समझा जा सकता है कि कितनी अफरा-तफरी मचती। उस वक्त एक या दो टुकड़ी की ही खबर फ्लैश होती लेकिन अफवाहों के जरिये यह बात दो टुकड़ी के मूवमेंट तक ही सीमित रहती इसमें संदेह है। ऐसे में शेयर मार्केट क्रैश हो सकता था, लोग बदहवास होकर बैंकों से अपनी जमा-पूंजी बाहर निकाल सकते थे या फिर और कुछ भी घट सकता था। लोग कहेंगे शेयर मार्केट का क्रैश होना कौन सी नई बात है वो तो क्रैश होता ही रहता है। नहीं, गौरतलब है कि सामान्य दिनों में क्रैश होने में और 'कूप' के अंदेशे में क्रैश होने में काफी फर्क है। सामान्य दिनों का क्रैश व्यावसायिक घटनाओं के आलोक में आगे उबरने की गुंजाइश लिये होता है लेकिन तख्तापलट के दौरान मामला अनिश्ति होता है जिससे एक छोटे से समयांतराल में ही कंपनीयों के नाहक पलायन या बैंकरप्ट होने जैसी घटनाओं से माहौल नकारात्मक बन सकता है।

         दूसरी ओर गैर-वाजिब लाभ लेने वालों के लिये ऐसी अफवाहें संजीवनी का काम करती हैं। एक बार ऐसे तबके के मुंह खून लग गया तो हो सकता है जब तब तख्तापलट या ऐसी ही बातों का गुबार फैला दिया जाय और फिर जब तक धुंध छंटे सब कुछ लुट-पिट चुका हो। इसलिये सेना से संबंधित ऐसी खबरों को जहां तक हो सके अखबारों में छपने से रोका जाना चाहिये। कहने को तो हम कह सकते हैं कि पारदर्शिता जरूरी है, ये जरूरी है वो जरूरी है लेकिन उसकी वजह से जो ढिंकाचिका मचेगा उसका क्या ? जरूरी है क्या हर उस खबर को बाहर लाना जो धीरे-धीरे सेना को अंदर से तोड़ने लगे। इस तरह की खबरें साजिशन लीक करने का कहीं यही तो कारण नहीं कि सब कुछ भंडुल कर दो। साजिशकर्ताओं की नज़र में जिसको जैसा समझ आयेगा समझेगा, न समझे तो भी इस तरह की खबरों से किसी मजबूत दीवार की पपड़ी तो ढीली कर ही सकते हैं।
    
 अंत में भारतीय सेना के 16 जनवरी के उस मूवमेंट और उससे उपजी ख़बरनवीसी  पर शायर अनवर की वे पंक्तियां, जिसमें वे कहते हैं कि -

आकर  ख़राब  हैं   तेरे  कूचे  में  वरना   हम
अब तक तो जिस जमीं पे रहे, आसमां रहे

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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