सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, March 25, 2012

सुन रही हो कि नहीं.....

- हम इहां बम्मई में आपन काम धन्धा देखें कि तू लोग का रगरा-झगरा

- अरे तो मिलि-जुलि के रह नहीं सकती हो, कि जरूरी है लड़का बच्चा को लेकर
मार झगरा करना

- अरे त तनिक तूंही गम खाय लो.....कि जरूरी है हाथ में हंसुआ लेय के बजबै करो

- बिट्टी के तबियत कैसी है

- अरे त दवा-ओवा करवा दिया करो कि वह भी मैं ही आकर करवाऊँ

- सुन रही हो कि नहीं....अ तनि बिट्टी का दवा ओवा करा देना ....पइसा भेज रहा हूं

- अरे तो ......अरे......अब देस भर का पंवारा न पढ़ाओ......बात बता दूँ साफ.....

- कौन

- अरे तो बहिनिया के त अभी बिदाई दिया था तबले फिर आय पहुंची है त कौनो बात नहीं

- दे देना जो समझ में आये.....मोजम्मिल के इहां से जौन पियरकी वाली साड़ी
लाये थे वो होगी न.....तो उहै दे दो....का करोगी पेटी में रख के......

- अरे तो लेते आउंगा....अब बहिन क बिदाई छूछे करना ठीक नहीं न होगा....

- सुन रही हो कि नहीं...

- अरे त रत्तनवा के लिये जौन बाबा सूट भेजे थे वही दे दो के बिदा कर
दो.....बहिन का लड़का है तो अइसही भेजना ठीक नै न रहेगा.....अरे त दूसर
बाबा सूट लेते आउंगा....

- सुन रही हो कि नहीं....

- पन्नरह सै अबहियें इस्टेट बैंकिया से लगा दे रहे हैं....जाकर सुल्लूर
के संगे पइसा निकलवाय लेना.....

- हां त रिचारजौ कर दे रहे हैं...चिंता मत करो....औ लराई झगरा मत
करना...परेम से जेठान- देवरान रहि लेना....समझो कि जइसे कुल दिन ओइसे इहौ
दिन.....

- सुन रही हो कि नहीं

--------------

एक परदेसिहा वार्तालाप जिसे बस में बैठे बैठे सुन पाया। बगल में बैठा
बंदा मुंबई से कहीं अपने गाँव में रहने वाली पत्नी को फोन पर हिदायत दे
रहा था कि आपस में देवरानी जेठानी प्रेम व्यवहार से रहना....बच्चों को
लेकर झगड़ा मत करना....बहन (ननद) और उसके बच्चे जो घर आये हैं उनकी जाते
समय अच्छे से विदाई करना....अपनी साड़ी ननद को दे देना और जो नया वाला
बाबा सूट अपने बच्चे के लिये भेजा था वो भांजे के लिये दे देना....तुम
दोनों के लिये दूसरा भेज दूंगा......।

तमाम दुश्वारियों के बीच इस तरह की जिम्मेदारियां निभाते परदेसी मनुक्ख
को देख मन में एक अलग ही एहसास होता है। अमूमन इस किस्म की बातचीत उन
इलाकों की बसों में ज्यादा सुनाई देती हैं जिनमें कड़िया, पेंटर, सुतार
जैसे मेहनतकश लोग अपने घर परिवार से दूर रहते हैं और गरीबी के चक्रव्यूह
को भेदने में रात दिन जुटे रहते हैं । मुम्बई का संगम नगर इलाका उन्हीं
मेहनतकशों का इलाका है जहां कि यह वार्तालाप सुनाई दिया था।

- सतीश पंचम

Sunday, March 18, 2012

हाऊ टू कम्पलेन दीदी.....

“दीदी हम आपको पइले ही बोला वो ठीक आदमी नेयी है उसको टिरेन का मिनि-शटर नेयी बनाना लेकिन आप हमेरा शुना ही नेयी दीदी”

“दीदी....हमकू तो ओयी टेम लगा था कि जो आदमी किलर्क बनना मांगता उशे आप टिरेन का मिनि-शटर बनाना केयू चाहेगा....लेकिन दीदी आप किसी का शुनता ही नेयी दीदी......अउर दीदी वो आदमी का घोमोण्ड देखो.....”

“नेयी आभी वो आपशे लिख के मांगता है कि हाटाना है तो हाटाओ लेकिन लिख के देओ.....किया वो आदमी किया शामझा कि दीदी इधर उशके जइशे किलर्क है जो ....”

“नेयी दीदी हामरा वो मतलब नेयी था.....वो किलर्क होता न वो जो कागज काम में हमेशा पोक्का बात करने के लिये बोलछी....ओ वाला किलर्क....”

“नेयी दीदी हाम आपका बात नेयी टालेगा दीदी....जिश दिन हाम आपका बात नेयी माना आप हमको ...आप हमको....ए....ए काला चोप्पल से मारना दीदी.......ये वाला चोप्पल से मारना दीदी...ये….”

“ओ शारी शारी दीदी........वो जोश में आके आपना चप्पल आपका मुं का पास ले गेया दीदी....बाकी चोप्पल शाफ है दीदी.....काल ही हाम कालीगंज से नेया खरीदा था.....”

“ऐ फेला....दीदी पेपर पेड मांगता है ला....खाली बेइठ के ये पारटी वाला का हम तेल निकाला....ओ पारटी का हम चाय निकाला बोल बोल के ......”

“हां दीदी येई लो पेपर पैड....आन पेन...ए फेला....तू पेन कउन तेरा फूफा लाएगा रे....की दिमाग केधर है तेरा....दीदी ये लो नाया वाला पेन .....काल ही बोलपुर का बाजार शे लाया दीदी....”

“नेयी दीदी ओ आदमी का नाम चिठी मत लिखो दीदी....उसका नाम लिखके आपना हाथ कियू गंदा करना....ओ मानूश को शेन्टर जेइशे शीखना न दीदी कि मुं बान्द कारेगा तो दुई-दुई टार्म तक बोड़ा वाला मिनि-शटर.....”

“आप लिखो दीदी...आप लिखो हाम ईधर ....ये जमीन पे बेइठा है दीदी...आप लिखो जो आपको लिखना हो....ऐ फेला....जाके पानी ले के आ...अउर देख ठान्डा पानी नेयी लाना हामको शापथ लेना टाईम जोकाम होएगा तो पूरा शापथ नेयी ले पायेगा.....पाद का शापथ लेगा तो गोपनेयता का शापथ नेयी लेयेगा..... ना गोपनेयता का शाप्पथ लेगा तो पाद का शाप्पथ भूल जायेगा..... ओइशे नेयी होना...शादा पानी ले आ”

“हां, दीदी....आप हामको बुलाया दीदी....”

“आरे दीदी आप ये किया किया.....हामरा नाम मिनि-शटर के लिये डाल देया....हाम आपका पार्टी भारकर दीदी....हामको आशमान में मत फेको दीदी......”

“हाम आपका हाथ जोड़ता दीदी हामको इधर ही पारटी भारकर रेन दो दीदी.....मिनिश्टर ना बनाओ”

“नेयी ओ बात नेयी....आप उशको भी बना शकता दीदी लेकिन ओ आदमी थोड़ा गोंडोगोल दीदी......देखा नेयी उश दिन पार्टी का मीटिंग में केइसा जोर जोर शे बोलून....ओ भी आपके शामने दीदी आप उधर बेइठा था तभी भी वो मीटिंग में....शोचो वो आदमी भी अइसा ही किलर्क निकेल गेया तो....”

“दीदी जेइशा आप बोलो दीदी ....हाम मिनि-शटर बन जाता लेकिन हाम राहेगा भारकर ही दीदी.....”

“दीदी चाय खाबो दीदी.....फेला चाय भी ला...दीदी आप आइशा कारो आभी ओ उसको हाटाने का लेटर भी लिख ही दो दीदी....किया है कि जितना देर ओ रेहेगा ....उतना देर में अउर उसका घोमोण्ड बेढ़ेगा ही दीदी....आप लेटर लिख ही दो....कि आप उशका बदले हामको मिनि-शटर बनाना मांगाता....ऐ तरहा से दीदी जो वो बोलाना कि हामको दीदी लिख के देगा ताभी हाटेगा....तो वो भी पूरा हो जायेगा अउर हाम मिनि-शटर भी बान जायेगा नेयी तो केया होएगा ना दीदी....वो ….”

“लो दीदी चाय.....ऐ फेला...तू भी चाय ले....देखो दीदी हाम फेला तक को आपना तेरफ से चाय देता हेय...हम येयी तरे से शेन्टर में भी रेएगा दीदी...शाब बड़ा....छोटा एके जेइशा दीदी....”
“हे हे हे..... चालता हूं दीदी....पाद आउर गोपनेयता का शाप्पथ लेना हे...चालता हूं…ए फेला....तू भी नेया वाला कोपड़ा पेहेन ले....देख हाम मिनि-शटर बनेने जा रेहा ए.....”


- सतीश पंचम

( यह बतकूचन काल्पनिक है,  इस बतकूचन का किसी जिवित या अजिवित से कोई सम्बन्ध नहीं है  :)

 चित्र : गूगल बाबा से साभार

Saturday, March 10, 2012

अच्छर सटा के......

“अब फिर चलूं इस कलमुही साईकिल लेकर घिरिर घिरिर रेंगाते हुए” .


“तो क्या पहले नहीं जाते थे साईकिल लेकर ? किसने कहा था आपसे कि चुनाव लड़िये और साईकिल वाले से हारिये” ?

“तो क्या कोई कहे तभी चुनाव लड़ा जाता है” ?

“वो आप जानों, मना कर रही थी कि हाथी वाले के इहां से मत लड़िये चुनाव, लेकिन आप मानें तब न” ?

“तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे तुम्हें मालूम था कि हाथी हारेगा” .

“हाथी हारने वाला था या नहीं मैं नहीं जानती, लेकिन इतना जरूर जानती हूं कि यदि आप हाथी वाले से हारते तो इतना नकर नकर नहीं करते….. अभी साईकिल से हार गये तो रोज काम पर जाने से पहले साईकिल को गरिया देते हो कि इसी ने हराया, सोचिये कि आप को हाथी ने हराया होता तो क्या तब भी आप अपनी सईकिलिया को कोसते” ?

“मतलब” ?

“मतलब ई कि साईकिल बेचारी इसीलिये कोसी जा रही है कि आप उसी से हारे हो और वही आपके पास है, गाहे-बेगाहे सामने पड़ जाती है….. जो चुनाव चिन्ह हाथी से हारते तो कोसने के लिये हाथी कहां से लाते….. खुद का ठेकाना नहीं और कौसउवल के लिये हाथी पालियेगा” ?

“देखो गुलइची की महतारी, पहिले ही बहुत देर हो रही है, तुम अउर जियादे हमको न उलझावो”

“हम कहां आप को उलझा रहे हैं”

“एक तो हम मुखमंत्री नाहीं बन सके, और उपर से दतकेर्रा फाने हो”

“उत्तर परदेस का मुखमंत्री बनना आपके किसमतै में नहीं है तो क्या करोगे”

“अरे अइसे कइसे नहीं है – देख लेना एक दिन हम संकठा सिंह ‘हिलोर’ उत्तर परदेस का मुखमंत्री बनि के रहेंगे हां, बता देते हैं साफ”

“अरे जाइये, नाम संकठा और आये हैं मुखमंत्री बनने”

“देखो.....देखो तुम हद से जियादे आगे बढ़ि रही हो, भला क्या बुराई है हमारे नाम में” .

“हम काहें मुखमंत्री नहीं बन सकते” ?

“वो इसलिये कि आप के नाम में तीन ही अच्छर है… ‘सं’ ‘क’ ‘ठा’ और उत्तर परदेस का चलन है कि यहां वही मुखमंत्री बनेगा जिसके नाम में चार अच्छर हो”

“हांय....क्या बक रही हो” ?

“और क्या....देख लो...राजनाथ के नाम में चार अच्छर....मायावती....चार अच्छर....मुलायम चार अच्छर....और अखिलेस चार अच्छर” !

“तो क्या हम इसलिये मुखमंत्री नहीं बन पाये कि हमारे नाम में चार अच्छर नहीं है” !

“और क्या….. यहां तक कि कल्याण के नाम में एक अच्छर लंगड़ ही सही चार अच्छर का रिश्ता कायम है”.

“तुम्हारी बात पर बिसवास नहीं होता गुलईची की महतारी” .

“बिसवास करो न करो....तुमहारी मरजी….. देखे तो थे पांच अच्छर वाले जगदंबिका को एक ही दिन में उत्तर परदेस की कुरसी छोड़नी पड़ी थी”.

“हां सो तो है….. तो क्या कहती हो, नाम बदल दूं.....संकठा से संकठेस रख लूं” ?

“संकठेस रखिये कि लंठेस रखिये...हम जा रही हैं अदहन रखने...तुम्हारे पेट-पटौनी का इंतजाम करने........अउर हां, इतना जानती हूं कि उत्तर परदेसवा चार नाम वालों से चले न चले तुम्हारे घर की रसोई चार अच्छर वाले सिलिंडरै से चलती है..... बात बता दूं साफै-साफ......चलती हूं...न...”.

"अरे सुन तो गुलईची की महतारी....अरी मेरा नया नाम तो बताती जा.....अरी सुन तो....अरी....... " :-)


- सतीश पंचम

Thursday, March 8, 2012

महीन राजनीति

"जी उन तमाम मूरतियों का क्या करूं जो चौक-चौराहे पर जगह जगह लगी हैं"

"लगी रहने दो, कौन तुमसे तगादा कर रही हैं".

"लेकिन यह ठीक नहीं लग रहा.... सरकार हमारी, शासन हमारा लेकिन मूर्ति उस विरोधी की".

"तुम यार हो गजब.... एक बार कह दिया कि लगी रहने दो मूरतियां तो समझ नहीं आता क्या" ?

"लेकिन कोई तुक तो हो उनके बने रहने में"

"कुछ काम बेतुके भी किये जाते हैं, एक यह भी मान लो".

"लेकिन" ?

"लेकिन क्या" ?

"कल को कोई उन मूर्तियों पर कालिख पोत दे, चप्पलों का हार पहना दे, जानबूझकर क्षतिग्रस्त करने की कोशिश करे तो" ?

"तो क्या ? निपट लेंगे ऐसे तत्वों से".

"ऐसे तत्वों से निपटना आसान नहीं होता। देखा नहीं....यह कहते कि हमारे आराध्य का अपमान किया गया.....कई जगह गोलीयां भी चल जाती हैं".

"तो ये मूर्तियां कौन सी आराध्य की श्रेणी में आती है".

"आज नहीं हैं, कल को हो जाएंगी"

"जब होंगी तब देखा जायेगा".

"नहीं वो बात नहीं, आराध्य बनने के बीज इन्हीं मूर्तियों की बदौलत बो दिये गये हैं। अब तो केवल समय का फेर है.....आज नहीं तो कल वह बीज फलेंगे जरूर".

"तुम यार बड़े शंकालु-जीव लग रहे हो."

"आप को मेरी बातें विश्वास के काबिल नहीं लग रहीं तो न सही लेकिन सोचिये कल को इन्हीं मूर्तियों के साथ छेड़छाड़ हो जाय तो विरोधियों को कहने का मौका मिल जायेगा कि जब निर्जीव खड़ी मूर्तियों तक की सुरक्षा नहीं कर पाते तो जीते जागते लोगों की क्या रक्षा कर पायेंगे"

"निर्जीव खड़ी मूर्तियों की सुरक्षा से क्या मतलब......हम क्या यहां मूर्तियों की रक्षा करने के लिये बैठे हैं.....एक वही काम रह गया है, कहने दो विरोधियों को....उनसे उस वक्त निपटा जायगा.... ये बाहर शोर कैसा है" ?

"जी ये लोग आप के पैतृक गाँव से आये हैं...कह रहे हैं आपका नाप-जोख लेना है, आपकी आदम कद मूर्ति की स्थापना करना चाहते हैं".

"अरे हम क्या कोई भगवान हैं। मना कर दो कि हम इन झंझटों में नहीं पड़ते".

"जी बहुत कहा लेकिन वे टल ही नहीं रहे".

"कौन कौन हैं, क्या नाम बता रहे हैं".

"जी एक कोई रामकलेश हैं, एक जगमोहन जी हैं, एक रामअजोर...."

"ओह....ये रामअजोर कब से हमारा भक्त हो गया" ?

"जी वही आदमी उनका प्रतिनिधी बनकर कह रहा था कि आपका नाप-जोख करना है.....आप उनके आराध्य हो".

"चप्पल लाना जरा.....मार कर भगावो सालों को....मूरति बनाने आये हैं..... साले कल तक यही हमारे पिछवाड़े डण्डा किये थे....ऐसे ही लोगों की वजह से पार्टी गर्त में चली गई थी.... हटाओ सालों को.... और सुनो.... वो क्या कह रहे थे....मूर्तियों से छेड़छाड़, कालिख और हार....क्या क्या......"

"जी वही जो आप सुने थे....अब हम जा रहे हैं आप को जो समझ आये आप किजिये"

"अरे तुम मूर्तियों की फिक्र मत करो....कोई न कोई साला यह खुराफात करेगा ही..... कानून व्यवस्था बिगड़ी तो हम खुद आदेश जारी कर देंगे कि इन मूर्तियों को लेकर कानून व्यवस्था बिगड़ रही है, हटाया जाय.....अभी खुद हटा देंगे तो समझ रहे हो न....."

"जी...."

"तो जाओ"

"उन लोगों से क्या कहूं..." ?

"कह दो...जाकर हल जोतें.....लड़के-बच्चों को समय दें.... ये फिजूल का उजबकई करना छोड़ दें......न मार-मार के हमईं इनकी मूर्ति बना देंगे.....राजनीति ससुरी जो न कराये"।


- सतीश पंचम

Wednesday, March 7, 2012

विनम्रता वोटम् ददाति

           कहते हैं विरासत संभालने का भी एक सलीका होता है। उस सलीके का एक नियम यह भी है कि अपने सिपहसालारों पर चाहे जितना रौब गांठ लो, लेकिन उनसे अलग, आम-जनों पर रौब गांठते समय सतर्क रहना चाहिये क्योंकि उन्हें तुमसे न तो कोई सीधे काम पड़ता है न वे कोई तुमसे उम्मीद ही रखते हैं। वे मान कर चलते हैं कि जब अपनी मेहनत का खाते-कमाते हैं, अपने बूते जीते मरते हैं तो किसी के रौब-दाब को क्यों मानना जबकि यह बात सिपहसालारों और कारिंदों पर लागू नहीं होती। उनका अस्तित्व ही रौबीले मालिक की नजरे इनायत पर टिका होता है। शायद यही बात समझने में राहुल भूल कर गये और समूची कांग्रेस उत्तर प्रदेश में धराशायी हो गई। वही कांग्रेस जिसकी विरासत कभी इलाहाबाद में आनंद भवन के चारों ओर कुलाचें मारती थी , जहां सत्ता का समीकरण तौलते वक्त बटखरा हमेशा जूते की नोक ही बना रहा, चाहे जिस ओर दाब दे....पलड़ा उतना ही झुकेगा जितना तौलने वाला झुकाना चाहेगा, न एक सूत कम न ज्यादा। लेकिन अब देखिये, उत्तर प्रदेश में क्या हालत है कांग्रेस की। न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि बाकी राज्यों में भी बेहद शोचनीय स्थिति है। और होती भी क्यों न, राहुल न तो अपने सिपहसालारों को कंट्रोल कर सके न खुद कंट्रोल हो सके। जिसके मन में जो आता गया बोलता गया।


               सलमान खुर्शीद को ही लिजिए। जनाब कुछ यूं बेकल हो गये कि मुसलमानों के आरक्षण को लेकर चुनाव आयोग तक को धौंस देने लगे। एक दूसरे सिपहसालार बेनी को देख लिजिए, जनाब भिड़ गये चुनाव आयोग से खुर्शीद स्टाईल में । सलमान बोले तो हम क्यों न बोलें। और दिग्गी ? वे ठहरे 'सनातन बकहे' .....न जाने कितने 'बक' उन्होंने राह चलते बके हैं कि हर बक की अपनी अलग ही 'बिबलियोग्राफी' है। सिब्बल.....?  देखते ही जिन्हें धन्य-धन्य की ध्वनि प्रतिध्वनित होती हैं। अन्ना आंदोलन हो चाहे बाबा रामदेव का योगा क्लासेस हो, सभी पर खूब बोले, खूब जूतियाये। और राहुल जिनकी कि जिम्मेदारी बनती थी ऐसे लोगों को कंट्रोल में करने की, अपने प्रभाव से दबाने की वो निष्क्रिय से लग रहे थे मानों उन्हें मौन समर्थन हो। उन्हें  यूं छोड़ दिये जैसे वे लोग अपने अपने क्षेत्र के माहिर सिपहसालार हों, जो कर रहे होंगे ठीक ही कर रहे होंगे। और शायद यही वो 'गूढ़-तत्व' था जिसे जनता ने पकड़ लिया कि जो बंदा अपने दंभी, घमण्डी लोगों को सक्षम होते हुए भी जानबूझकर कंट्रोल नहीं कर रहा, भचर-भचर बोलने दे रहा है, खुलेआम राष्ट्रपति शासन की धमकी दिलवा रहा है, वह भला कैसे हमारा दुख दर्द सुलझवायेगा। वो भला हमें कैसे कोई राह सुझायेगा ?

            खैर, राहुल गांधी तो अपने बल-बुद्धि के हिसाब से कैम्पेन में लगे रहे। कभी गरीबों के यहां जाकर खाना खाते, कभी उनके साथ घमेले में मिट्टी ढोते तो कभी राह चलते बोलते बतियाते। यह एक वो चेहरा था जिसे राहुल जनता को दिखाना चाहते थे, जिसे प्रचारित करना चाहते थे लेकिन उनके उस 'चुप्पा' चेहरे का क्या जिसे जनता ने पहले ही देख लिया था। घमण्डी बोलों पर, दंभी वक्तव्यों पर जिस तरह से राहुल ने चुप्पी साधी थी आखिर वह भी तो एक चेहरा था, उसे कहां किस ओर छुपाते। सो जनता ने नीर-क्षीर विवेक से अपना मन बना लिया और रौबीले, चुलबुले, राजा साहब वाली छवि को दरकिनार करते हुए एक मौजूद विकल्प पर उंगली रख दिया कि यही सही। औरों को तो कब से झेल रहे हैं, इस एक को भी वैसे ही झेल लेंगे जैसे बाकियों को झेला है, लेकिन इसी बहाने एक दंभ और 'गरीबहे राजकुमार' वाले स्वांग को आईना तो दिखाया ही जा सकता है, सो जनता ने आईना दिखा दिया।

       उधर मायावती का जाना आश्चर्यजनक नहीं था, उन्हें तो जाना ही था। पत्थरों से कब तक मन बहलाव हो सकता था। लोग तो घर में लगे जांता चक्की तक को काम हो जाने के बाद उठाकर या उखाड़ पखाड़ कर साइड में कर देते हैं फिर ये मूर्तियां तो केवल रौब जमाने और प्रच्छन्न शक्ति को भौतिक स्तर पर दिखाने के लिये थी। सो जनता ने उनके रौब दाब को भी नहीं माना। रही बीजेपी, सो उसकी हालत के बारे में क्या कहना। मुँह में पान भरके, काँखते, आँख मलकाते बूढ़ों के प्रति भला कोई क्या लालसा लेकर जाये। बहुत होगा तो आशीर्वाद ही मांगेंगे लोग। ऐसे संस्कार भी नहीं कि उन्हीं बूढ़ों से काम करवायें जिनके कि खुद हाथ पांव कांप रहे हों केवल यह सोच कर कि- कैसे होगा..... क्या होगा.... हमारी तो कछु समझ में ही नहीं आ रहा। ज्यादातर भाजपाई नेता उसी श्रद्धेय कैटेगरी के लगते हैं जिन्हें मान तो दे सकते हैं लेकिन एक गिलौरी पान देते वक्त भी सोचना पड़ता है कि कहीं खांसी उठ गई तो हमारे जिम्मे होगा कि हमीं थे जो उन्हें पान दिये थे।

             खैर, बात करूंगा मुलायम की, उनके बेटे अखिलेश की। लोगों ने उन्हें एक सशक्त विकल्प के रूप में देखा जो युवा भी था और डांट-डपट कर अपने सिपहसालारों को काबू में भी रख सकता था। डीपी यादव को आजम खान के कहने के बावजूद बाहर का रास्ता दिखाया और तो औऱ प्रवक्ता मोहन सिंह से प्रवक्ता पद भी छीन लिया। यह देखने में बड़ी साधारण सी बातें लगती हैं लेकिन इससे जनता में एक हल्का सा संदेश गया जरूर। लोगों के मन में एक क्षीणकाय 'कौंध' ने अंकुर जमाना शुरू किया और देखते ही देखते वह क्षणिक अंकुर चुनाव बीतते न बीतते बरगद के रूप में फैल गया नतीजा सबके सामने है वरना यही वह अखिलेश सिंह हैं जिन्होंने डेढ़ साल पहले मायावती के सोशल इंजिनियरिंग की काट न होने की बात मानी थी। अब जब जनता ने बम्पर वोटों से सपा को जिताया है तो ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो पहले तो सपा के विरोधी थे लेकिन लहर को देख उनके असर और शैली को निहार रहे हैं। देखते हैं, अभी आगे कहां तक खेला चलता है। अभी तो होली का माहौल है। वे मूर्तियां भी खुले में आ गई हैं जो अब तक ढंकी थीं। और जो अब तक ढंकी हैं.....या चुनावों के बाद अब खुद को भी ढंके रखना चाहती हैं तो उनके लिये ही शायद सिद्दीक देहलवी का शेर अर्ज़ किया गया होगा कि -

उलट दे ऐ सबा (हवा) तू ही नक़ाब-ए-रूख को चेहरे से
कभी  तो  देख  लें हम  भी  ज़रा  सरकार  की   सूरत

- सतीश पंचम

Sunday, March 4, 2012

'चिलम झार' पूछ-पछोर

 "देखिये यदि हमारी पार्टी को कम सीट मिला तो हम विपच्छ में बैठेंगे"

 "इतने संत हो गये आप" ?

 "संतई वाली बात नहीं".

 "फलाने जी कह रहे थे कि उन्हें 'उनसे' और 'उनकी उनसे' गठबंधन करने में एतराज नहीं" !

 "वो उनके स्वतनतर बिचार है".

 "तो आपके क्या परतंत्र विचार है" ?

 "आप बात को गलत दिसा दे रहे है".

 "जी मैं केवल तसदीक कर रहा हूं".

 "तसदीक करने के लिये क्या यही तरीका रह गया है कि किसी के मुँह में बात डालकर कहवाया जाय" ?

 "बात न डालें तो क्या बांस डालें" ?

 "जी" ?

 "जी मैं कह रहा था आपके फलाने प्रवक्ता जी कह रहे थे कि अलाने की 'उनकी से' सम्पर्क में हैं".

 "तो सम्पर्क में रहने से क्या होता है, इस समय हम ही आपसे सम्परक में हैं".

 "तो आप सच बात कैमरे प बोलने से डरते हैं" ?

 "हम नहीं डरते, पार्टी का कैडर तय करता है कि किसे बोलना चाहिये किसे नहीं".

 "कैडर माने क्या और कौन लोग होते हैं जरा खुलासा करेंगे" ?

 "आप लोग इस सब में क्यों पड़ते हैं" ?

 "हाईकमान माने क्या और कौन लोग होते हैं जरा बतायेंगे" ?

 "आप फिजूल के प्रश्न मत पूछिये काम की बात करिये" ।

 "अच्छा बताइये कि आप की पार्टी को कम सीटें मिलने का कारण कहीं घमण्ड तो नहीं है" ?

 "कामयाब होने से पहले तक सभी को घमण्डी होने का हक है".

 "ये तो बेंजामिन डिजरायली के विचार हैं".

 "तो हम कौन से डिजरायली से कम हैं".

 "आपके युवराज फेल होते दिख रहे हैं".

 "इसमें आप लोग क्यों मजा ले रहे हैं" ?

 "मजा लेने वाले हम कौन होते हैं.....हम तो केवल बात पूछ रहे है".

 "तो ढंग का पूछो न" !

 "ढंग की परिभाषा बताइये हम उसी ढंग से पूछेंगे" !

 "आपके चैनल हेड को पता होगा उसी से पूछिये".

 "इस वक्त तो मैं आप ही से पूछ रहा हूं....उनसे मैं बाद में पूछ लूंगा...."

 "आप मेरा वक्त जाया कर रहे हैं".

 "वक्त जाया हो रहा है मतलब आप बता सकते हैं कि यदि मैं आपसे इस वक्त बात न करता तो आप कौन सा ऐसा जरूरी काम कर रहे होते कि लगता कि सदुपयोग कर रहे हैं".

 "ये मैं आपसे नहीं कह सकता".

" हमारे खुफिया कैमरे से पता चला कि आप फलां फलां काम कर रहे थे - ये देखिये क्लिप जिसमें दिख रहा है कि आप घर में ठीक इसी वक्त कटहल छील रहे थे....उसके बाद आपने मेथी तोड़ने में श्रीमती जी की मदद की.....बाद में भिण्डी भी काटी......आंटा गूंथने जा रहे थे कि तभी किसी का फोन आ गया...आपने आंटा लगे हाथ से ही फोन रिसीव किया और श्रीमती जी के पैर छूकर माफी मांगते दरवाजे की ओर भागे.....आप लाल बत्ती वाली गाड़ी में बैठे और सीधे पार्टी कार्यालय पहुंचे....वहां जाकर ......"

"एक मिनट पहले तो आप ये बंद किजिये.....बंद किजिये आप....मैं आप के चैनल पर केस कर दूंगा...."

 "जी आप उसके लिये स्वतंत्र हैं लेकिन..."

 "लेकिन वेकिन की मां की #$%$%%....तू बन्द कर पैण दे ट%%%......हमारे घर में कैंमरा लगाकर &^%$^ हमें बदनाम कर रहा है....विरोधियों से मिला हुआ है तू और तेरा चैनल ....हमें भिण्डी काटता हुआ दिखा कर तू साबित क्या करना चाहता है ...."

 "भिण्डी काटने में विरोधी कहां से आ गये..."

 "मैं कहता हूं बन्द कर क्लिपिंग"

 "हम ये जानना चाहते हैं कि पार्टी दफ्तर में ये कौन लोग थे जिनके...."

 "बसेसर...लाइन काटो.....फोन मिलाओ इसके चैनल हेड से....."

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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