सफेद घर में आपका स्वागत है।

Monday, January 30, 2012

दुरूस्तीकरण ऑफ 'वैवाहिक स्थिति'

      कल्पना करें कि अचानक आपकी जीवन संगिनी को कोई आपकी पत्नी मानने से ही इन्कार कर दे तो ? आप लाख समझायें कि भई यही है मेरी श्रीमती जी लेकिन सामने वाला मानने के लिये तैयार न हो तो ?


    यह हाल ही में तब हुआ जब मैं आधार कार्ड बनवाने के लिये अपने घर के पास ही बने एक केन्द्र पर पहुंचा। वहां दो निर्दिष्ट डॉक्युमेंट चाहिये थे किसी के कार्ड बनाने के लिये। बच्चों के कार्ड बनाने के लिये उनका जन्म प्रमाण पत्र या स्कूल से बोनाफाइड सर्टिफिकेट पर्याप्त है बशर्ते पिता को पहले ही आधार कार्ड मिल गया हो या मिलने लायक डॉक्युमेंट सही पाये गये हों। मेरा आधार कार्ड करीब चार महीने पहले ही ऑफिस के पास लगे एक केन्द्र में आराम से बन गया था। उसके रेफरेंस नंबर के साथ बच्चों का भी आधार कार्ड बन गया लेकिन पत्नी का आधार कार्ड बनने की जब बारी आई तो एक डॉक्युमेंट कम पड़ता दिखा। पत्नी का वोटर कार्ड तो था, लेकिन रेशन कार्ड में नाम दर्ज करना रह गया था। दरअसल मेरे एक दूसरे फ्लैट के रेशन कार्ड में नाम ट्रांसफर करने के लिये पत्नी का नाम देने की कवायद चल रही थी और उसी दौरान रेशन कार्ड में पत्नी का नाम नहीं था।

  ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारी ने तब पत्नी के नाम बैंक पासबुक की मांग की, जबकि हम दोनों का ज्वायंट अकाउंट था। वह अड़ गया कि पत्नी के नाम अकाउंट होना चाहिये। मैंने मुस्कराते हुए कहा – "यार किसी महिला के साथ मेरा अकाउंट है तो जाहिर है पत्नी ही होगी, कोई दूसरी तो होगी नहीं"।  लेकिन शायद उसे मुझ पर विश्वास न था या हो सकता है तकनीकी रूप से यह कागजात पर्याप्त न थे। पैन कार्ड की बात हुई तो वह भी मौके पर नदारद। तभी एक ने कहा कि आपका मैरिज सर्टिफिकेट हो तो भी काम चल जायगा। लेकिन गँवई विवाह तो कागजों पर दर्ज नहीं किया जाता था, सो अब तक मैंने भी रजिस्टर नहीं करवाया था। जरूरत ही नहीं पड़ी। जौनपुर के एक मंदिर की दीवारों पर तो लिखा भी देखा था – विवाह कोई कानूनी बन्धन नहीं बल्कि जन्म जन्मांतर का अटूट बन्धन है जिसे बहुत कुछ सह कर निभाया जाता है। इस हिसाब से जानता हूं कि श्रीमती जी मेरे लिये ही बनी हैं और मैं श्रीमती जी के लिये। कम से कम इस जन्म में तो हमारा जन्म-जन्मांतर बुलंद है। लेकिन सरकारी काम तो सरकारी है। बंदे को मैरिज सर्टिफिकेट चाहिये था। उसके बिना आधार कार्ड नहीं बनना था । नतीजतन उस वक्त मेरे पहले से बने कार्ड के साथ-साथ बच्चों के कार्ड तो बन गये (रसीदी रूप में ) लेकिन श्रीमती जी का कार्ड न बन सका। उधर श्रीमती जी के मन में कुछ और शरारत चल रही थी। घर पहुंचते ही कह बैठीं – "आज से आप अपना इंतजाम अलग कर लिजिये"।

- क्यों ?

- "कानून मुझे आपकी पत्नी नहीं मानता, तब मैं क्यों आप की गुलामी करूं, खाना बनाउं, कपड़े धोउं, घर संभालू.....आप अब अपना इंतजाम कर लिजिये, अब से मैं आजाद हूं" :) 

श्रीमती जी की बात सुन मुझे भी चुहल सूझी – ठीक है तुम्हारी जैसी मर्जी, मैं भी आजाद हूं। ढूंढता हूं एकाध दूसरी।

- और ये जो तीनों बच्चे हैं वे ? उसी दूसरी वाली के पास रखेंगे ?  :)

- तुम जानों, आजादी तुम्हें चाहिये। तुम ही रखो अपने पास। मेरी गुलामी पसंद नहीं तो लेई जाओ जहां जाना चाहती हो।

- मैं क्यों ले जाउं। बच्चों के आधार कार्ड पर आपके ही कार्ड का रेफरेंस नंबर दर्ज है, कानूनन आप ही इनके सब कुछ हैं, पिता हैं। मेरा तो कोई वजूद ही नहीं है। अब तो मैं सरकारी तौर पर आपकी और आपके बच्चों की कुछ नहीं हूं..... बता देती हूं, हां :) 

   यह स्थिति वाकई मौजूं रही। शाब्दिक ही सही लेकिन श्रीमती जी ने चुहलबाजी में ही बाजी मार ली कि तकनीकी रूप से मैं अपने बच्चों का अभिभावक हूं, सारी जिम्मेदारी मेरी बनती है। उपर से लगे हाथ घोषणा भी कर दी है - "अब मैं आजाद हूँ"  :) 

   यह चुहल यहीं शांत न हुई। भोजन परोसने के दौरान भी श्रीमती जी छेड़ने से न मानीं – “लिजिये, न जाने किस मोह माया से परोस दे रही हूं न वरना मैं चाहूं तो कानूनी रूप से आपको न खाना दूं, न पानी .... मैं आपकी हूं ही कौन”   :)

     यह चुहल  काफी देर तक चलती रही। उधर नेट पर सर्च करना शुरू किया कि विवाह के इतने सालों बाद यदि रजिस्टर करवाना हो तो क्या क्या डॉक्युमेंट लगेगा, क्या क्या कवायद होगी। उसी दौरान पता चला कि उस पंडित की गवाही लगेगी जिसने विवाह कराया था, तीन लोगों की गवाही लगेगी। शंका हुई कि कहीं वह पंडित जी होंगे भी या नहीं, फिर सोचा और कोई हो या न हो अपने अरविंद मिश्र जी को ही ले जाकर खड़ा कर दूंगा कि यही थे जो मेरा विवाह करवाये थे, लेकिन वाकई लगता है कि विवाह का सर्टिफिकेट होना बहुत जरूरी है। पासपोर्ट आदि में तो मस्ट है। बाकी और भी कई बातों के लिये यह अति-आवश्यक भी है। ईश्वर न करे कभी कुछ किसी एक को दुख दर्द हो जाय तो सरकारी काम में हर जगह ऐसे सर्टिफिकेट मांगे जायेंगे, हर जगह वो सारे प्रूफ मांगे जायेंगे जो एक दूसरे को एक दूसरे का साबित करें। मंदिर की तख्ती भावनात्मक रूप से अपनी जगह सही है लेकिन व्यवहारिक रूप से सरकारी कागजात तो पूरे करने ही होंगे। आधार कार्ड का दूसरा डॉक्युमेंट यानि पैन कार्ड तैयार है। श्रीमती का कार्ड अब बन जायगा। लेकिन मैरिज सर्टिफिकेट भी बनाना जरूरी है, वरना श्रीमती जी की घोषणा कपाल पर बम की तरह गिरती रहेगी : )

  फिलहाल  जुट गया हूँ उस पंडित को ढूँढने जिसने मेरा विवाह कराया था, दो तीन गवाहों को भी ढूँढ़ना पड़ेगा, फोटू शोटू, निमंत्रण पत्रिका की एकाध बची खुची कापी नत्थी करनी होगी, लब्बो-लुआब यह कि अभी  इस कानूनी रूप से 'कुँवारे बाप'  की  कवायद लम्बी चलनी है.....ओ पण्डित जी....अरे तनिक सुनिये तो....अरे सुनो यार :)

- सतीश पंचम

Sunday, January 8, 2012

चुनावी आचार संहिता से पनप सकता है 'बूतक साहित्य'

     क्या मस्त जलवे हैं इस बार हो रहे पाँच राज्यों में होने जा रहे चुनाव के.....बॉलीवुड के सारे मसाले कूट-कूट कर डले हैं.....एकदम चौचक अंदाज में......इतने कि बिल्लो जो कभी गुलज़ार के कहने पर इस्क में ‘डली भर नमक’ डालने की बात कर रही थी, उसकी भी दाल फीकी पड़ जाय। जहां एक ओर बाबूसिंह कुशवाहा को लेकर दिलचस्प फिल्म चल रही थी, आरोप प्रत्यारोप लग रहे थे, विपक्षी पार्टीयां हाथ सेंक रही थीं, ताप रही थी, कुछ हाथ धो रहे थे वहीं क्लायमेक्स में आते आते बाबूसिंह कुशवाहा की चिट्ठी ने डैमेज कंट्रोल की भूमिका फिल्मी अंदाज में निभाई और अब तो उस फिल्म का तात्कालिक रूप से धीरे-धीरे पाटक्षेप सा हो गया लगता है, आग बुझ सी गई लगता है। हां, जब तक चुनावी माहौल रहेगा, रह रहकर कुशवाहा एपिसोड की राख कुरेदी जाना लाज़िमी है, आखिर राख ठहरी,  हाथ धोने के लिये काम तो आनी ही है :)

          दूजी ओर एक और बानगी देखिये कि चार बजे शाम अभिषेक मनु सिंघवी की प्रेस कांफ्रेंस हुई कि चुनावों के दौरान लेवल प्लेइंग होना चाहिये, मायावती और उनके हाथी की मूर्तियों को ढंकना चाहिये ताकि मतदाताओं पर उसका चुनावी असर न पड़े और उसके कुछ देर बाद टीवी पर ख़बर फ्लैश हो गई कि चुनाव आयोग ने मूर्तियों को ढंकने का फैसला कर लिया है। अब देखिये कितने क्विंटल तिरपाल और प्लास्टिक की शीट खप जायेगी। हो सकता है इसी बहाने किसी बंद होने की कगार पर पहुँचे प्लास्टिक कारखाने, प्लायवुड कंपनी याकि पैकिंग मटेरियल इंडस्ट्री को कुछ जीवनदान मिल जाय।

          वैसे भी इस तरह के एतिहासिक फैसले आगामी राजनीतिक, सामाजिक एंव आर्थिक जीवन के लिये नज़ीर का काम करते हैं। राजनीतिक क्षेत्र में जहां इस फैसले से राजनेताओं में संदेश जायेगा कि इस तरह के ‘सदा-ठाड़’ चुनाव चिन्हों के निर्माण से जनता में चिन्ह उनके अवचेतन मन तक पहुंचाया जा सकता है वहीं सामाजिक क्षेत्र में यह बदलाव होगा कि शिल्पकार पुन: अपना वह सम्मान अर्जित कर सकेंगे जिन्हें राजे-रजवाड़ों के अवसान के चलते खोना पड़ा था। लुहारों को फिर से भरपूर काम मिलने लगेगा क्योंकि शिल्पकार अपनी छेनी, हथौड़ी उनके पास ही बनवाने ले जायेंगे। फिर जब सब कुछ तैयार हो जायेगा तो चुनावी आचार संहिता अपना रंग दिखायेगी और उन निर्माण स्थलों को ढंकने का काम शुरू होगा। ढेर सारे प्लायवुड लगेंगे।

     विज्ञापन एजेंसियों को अपने विज्ञापनों को नये ढंग से प्रसारित प्रचारित करने का मौका मिलेगा। चलता रहे....चलते रहे वाले विज्ञापन का कथानक बदल कर कुछ यूं होगा कि उनके प्लायवुड ने मायावाती की मूर्तियों से लेकर फलांवती तक को हर चुनाव में ढंका है। अलां चुनाव से लेकर फलां और ढेकां तक के चुनावों के दौरान प्लायवुड काम आता दिखाया जायेगा। एक ओर मूर्तियां सजी होंगी तो दूजी ओर प्लायवुड रखे दिखेंगे जो कि उन्ही पत्थरों की मूर्तियों से मजबूत आंधी-पानी को झेलते हुए दिखाये जायेंगे।

           एक कठिनाई यह होगी कि ऐसे लोग मिलने मुश्किल हो जायेंगे जो इन मूर्तियों को चुनावी आचार संहिता के दौरान ढंकने का काम करते हों। पता चला जिस एजेंसी को मूर्तियां ढंकने का ठेका मिला अगली बार सरकार बदलते ही उस पर गाज गिरे कि तूमने हमारी मूर्तियों को क्यों ढंका। बेचारे ऐसे मूर्ति ढंकने वाले मन ही मन डरे सहमें जा रहे होंगे कि कोई विपक्षी पार्टी वाला उनमें जोश भरने की कोशिश करेगा मानों अगली बार वही चुन कर आने वाले हों। कोई बंदा हीरानंद ‘सोज़’ की तरह कह भी देगा कि –

जनाजे वालो  ना  चुपके  कदम  बढ़ाये चलो
उसी का कूचा है तक करते हाये हाये चलो


         ऐसे में हो सकता है चुनावों के कई चरण होने से पर्दादारी लंबी चले। कभी जिले स्तर का चुनाव तो कभी नगर निगम का चुनाव तो कभी कुछ तो कभी कुछ। ऐसे में रोज वहां से गुजरने वाले जिन्हें आदत पड़ गई थी ऐसे बूतों को देखने कि पर्दादारी से आज़िज आकर सिद्दीक देहलवी जी की तरह शायराना तबियत से कहें –

उलट दे ऐ सबा (हवा) तू ही नक़ाब-ए-रूख को चेहरे से
कभी  तो देख  लें  हम  भी  ज़रा  सरकार  की    सूरत

        हद तो तब होगी जब उस शायराना राही की बात सुन हवा प्लास्टीक शीट्स को यहां वहां से छितरा दे और मूर्तियां कहीं-कहीं से झलकने लगें। ऐसे में अर्श मल्सियानी की तरह कोई विपक्षी पार्टी का शायर फिकरा न कस दे कि –

है देखने वालों को संभलने का इशारा
थोड़ी नक़ाब आज वो सरकाये हुए हैं

       फिलहाल यह तो शुरूवाती कठिनाईयां होंगी, आगे जाकर ऐसे ‘मूर्ति-ढंकैतों’ को लोग सहज ढंग से बाकी ठेकेदारों की तरह अंगीकार कर सकेंगे। ‘मूर्ति-ढंकैत’ आज इस पार्टी की प्रस्तर मूर्तियों को ढंकेंगे, कल उस पार्टी की मूर्तियों को ढंकेगें, जिससे राजनेताओं में देर-सबेर यह संदेश जाएगा ही कि मूर्तियां ढंकने वालों में और शम्शान में चिता जलाने वालों में कोई फर्क नहीं है। उनके सामने जो भी आता है उससे वे समभाव से व्यवहार करते हैं। हो सकता है कैरियर के नये आयाम खुल जांय। Sculpture, Mural, Painting, आदि के साथ साथ ‘Hide-Art’ या ‘छुपम-छुपाई आर्ट के नये कोर्सेस सिखाये जांये। उनमें बताया जाय कि हाथी वाले Sculpture को किस कपड़े से ढंका जाय तो उनके लंबे समय तक संरक्षण में आसानी होगी, बंदर वाले प्रस्तर किस ढंग से ढंके जांय तो उनके रंग-रूप को नुकसान न पहुँचे। राजनेताओं की मूर्ति हो तो कितना ढंकना चाहिये आदि आदि।

       इस सामाजिक बदलाव के साथ-साथ साहित्यक क्षेत्र में भी नये नये आयाम जुड़ेंगे। शायर तो शायर बड़े बड़े आलोचक भी अपनी धार तेज करते नजर आयेंगे। गरीबी और तंगहाली से जूझती जनता के दर्द को देख आलोचक महोदय कहेंगे – ‘बूतक’ साहित्य को साहित्यिक विधा के रूप में अंगीकार करना हमारे साहित्यकारों की कमअक्ली का नमूना है। सुनते ही ब्लॉगर-फेसबुकिये ऐसे आलोचकों पर टूट पड़ेंगे। क्या कह रहे हो बुढ़ऊ, चुप-चाप बुढ़ौती में घर में पड़े नहीं रहते, पोते-पोतियों को नहीं खेलाते, बहू की बनाई चाय नहीं पीते, आकर सम्मेलनों में ‘बूतक’ साहित्य की आलोचना करते हो।

      खैर, आने वाले समय में चुनाव आयोग के इस फैसले से राजनीतिक हलकों में बड़े बदलावों की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। कोई कांग्रेसी चुनाव चिन्ह हाथ को लेकर सवाल उठा रहा है तो कोई हाथी को लेकर अपनी संवेदना जाहिर कर रहा है। देखते हैं यह नई बयार किस ओर ले जाती है राजनीतिक माहौल को। फिलहाल तो उन  छिपी राजनीतिक इच्छाओं और सरकारी खर्चे से अपने को सदियों तक संरक्षित कर लेने की मंशा पर काबिल अज़मेरी का शेर बहुत सटीक लग रहा है जिसमें वे कहते हैं -

ग़म-ए-जहां के तकाज़े शदीद (बहुत) हैं वरना

जूनूँ-ए- कूचा- ए-दिलदार  हम  भी  रखते  हैं।

- सतीश  पंचम

Image Courtesy - http://news.rediff.com/slide-show/2009/jun/06/slide-show-1-queen-mayas-palace-of-illusion.htm

Thursday, January 5, 2012

'गुप्त' इच्छाओं की 'सुप्त' सामग्री :)

        दुनिया में तरह तरह के रोग होते हैं लेकिन कुछ रोग गुप्त रोग कहलाते हैं। गुप्त यानि कि जो छिपा हो, आड़ में हो, किसी को नज़र न आये। इस तरह के रोगों के लिये निदान हेतु, जड़ से खत्म करने के दावे वाले विज्ञापन यदा-कदा सड़कों के किनारे या किसी मकां के दरो-दीवारों पर चस्पां हुए हमें दिख ही जाते हैं कुछ उसी तरह जैसे फिल्मों के पोस्टर या राजनीतिक छुटभैयों के बैनर-बूनरों की तरह। पहली नज़र में देखने पर ये पोस्टर मन में अजीब सी कोफ्त टाईप की भावनायें उत्पन्न करते हैं लेकिन जब पढ़ने लगो तो उनके लेखन की शैली में एक किस्म की रंजकता होती है। सभी पोस्टरों के बोल-चाल, रोगों की नामावली और उन्हें ठीक करने के दावों को पढ़ने पर कुछ-कुछ नेताओं जैसा दावा मालूम पड़ता है- ये भी ठीक कर दूंगा, वो भी ठीक कर दूंगा, बस एक बार मौका दें :)


         अभी हाल ही में मुंबई के साकीनाका इलाके से गुजर रहा था। जरी-मरी इलाके में ट्रैफिक इतना स्लो था कि चाहो तो बस से उतर कर पान खा आओ, चाय पी आओ लेकिन क्या मजाल जो बस के पहिये का चक्कर पूरा हुआ हो। ऐसे में आप मजबूरन कभी एफ एम सुनते हैं, कभी बाहर ताकते हैं, कभी सहयात्री को तो कभी एफ एम वाले आर जे के चपड़-चपड़ से तंग आकर मेमरी कार्ड वाले गाने सुनने लगते हैं। लेकिन कितना सुना जाय, उसकी भी हद होती है। ऐसे ही हालात में नज़र जाती है बाहर के उन सूक्ष्म बातों पर जिनपर नज़र जाने के बावजूद जल्दबाजी में या यूं ही हम ध्यान नहीं दे पाते। अब ट्रैफिक पूरा जाम था, पिछले पन्द्रह बीस मिनट से तार बाजार के इलाके में फंसे पड़े थे तो ध्यान गया टेलीफोन के पैनल बोर्ड पर जो पोस्टरों से अटे पड़े थे। इन टेलीफोन के पैनल बोर्डों को मैंने जब कभी देखा है कोई न कोई कर्मचारी पुराने जमाने का रिसीवर लिये, दो वायर घुसेड़े हलू-हलू बोलते ही देखा है। वो तो भला हो मोबाइलों का जिन्होंने लैंडलाइन का इस्तेमाल कम करवा दिया वरना तो जिस रफ्तार से फोन फान की संख्या बढ़ी है, हर पैनल बोर्ड के आगे एक कर्मचारी झोपड़ी बनाकर रहता, वहीं रस्सी पर कपड़े सुखाता, नहाता धोता और लगे हाथ पान की छोटी सी दुकान भी खोल लेता :)

            खैर, अब जब टेलीफोन के पैनल बोर्ड काम में कम आते हैं तो उन पर पोस्टरों का कब्जा होना लाजिमी है। ऐसी ही जगहें पोस्टरों के लिये सबसे ज्यादा मुफ़ीद भी माने जाते हैं। फिल्मों के पोस्टर जिनमें अक्सर मार डालूंगा, काट डालूंगा, जीने नहीं दूंगा, कातिल हसीना जैसे नाम दिखते हैं तो कभी-कभी शीघ्रपतन, अंडवृद्धि, सूजाक, बवासीर जैसे विज्ञापन उन कातिल हसीनाओं से लोहा लेते नजर आते हैं। कभी कभी उन्हीं पोस्टरों के बीच राजनीतिक चाहत वाले छुटभैये नेताओं के पोस्टर भी नजर आ जाते हैं जो न सिर्फ अपनी तस्वीर चस्पां करते हैं बल्कि अपने राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरें भी लगाये रखते हैं जिनका ध्येय यह संदेश देना होता है कि राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के साथ गली मोहल्ले का यह नेता भी बैठता-उठता है। लेकिन मुसीबत तब हो जाती है जब भिन्न प्रकृति के पोस्टर इन पैनलों पर आसपास सटकर लगे हों या एक पर एक चस्पां कर दिये गये हों। ऐसे में होता यह है कि पढ़ तो रहे हैं शीघ्रपतन वाला पोस्टर लेकिन बगल में माननीय नेता जी का चेहरा दिखाई दे रहा है जो अभी अभी फलां प्रदेश में केन्द्र को हड़काते दिखे थे। बताइये, कितनी बड़ी विडंबना है कि जो नेता केन्द्र को हड़काता दिखता है उसके बगल में शीघ्रपतन वाला विज्ञापन दिख रहा है, जो नेता अमरीका रिटर्न है उसके बगल में सूजाक और तमाम बिमारीयों के नामों वाला पोस्टर चस्पां है :)

           अभी हाल ही में देखा कि बवासीर वाले पोस्टर की बगल में एक राष्ट्रीय पार्टी की सुश्री जी सिंहासन पर पसरी हैं। एक झटके में दोनों विज्ञापनों को एक साथ देखने पर लगता है जैसे विज्ञापन संदेश देना चाहता है कि बवासीर का इलाज होने के बाद आप भी कुर्सी पर इन्हीं की तरह पसर कर बैठ सकते हैं, तब वह साधारण कुर्सी जो अब तक आपको बैठते उठते चुभती थी, इलाज हो जाने के बाद सिंहासन जैसा अहसास दिला सकती है। वहीं एक और पोस्टर देखा जिसमें अण्डवृद्धि के विज्ञापन के साथ बगल में ही छुटभैये नेता का खिलखिलाता चेहरा था। दोनों पोस्टरों को एक साथ देखने पर लगता था मानों विज्ञापन कहना चाहता है कि अण्डवृद्धि का इलाज होने के बाद लोगों के चेहरे ऐसे ही खिले जाते हैं जैसे इस नेता का चेहरा खिला है। गर्मी, सूजाक या ऐसे ही रोगों वाले विज्ञापनों की गरिमा कैसे बढ़ जाती है यह उन ज्वाइन्ट पोस्टरों को देखने से पता चलता है।

    अफसोस यही रहा कि देर शाम रोशनी की कमी की वजह से उन पोस्टरों को कैमरे में क्लिक नहीं कर पाया वरना तो देखते कि कैसे फबते हैं जनप्रतिनिधि बवासीर वाली पंक्तियों के संग। काव्यात्मक ढंग से गा दिया जाय तो अच्छा खासा हिट गीत बन जाय। गनीमत यह रही कि पोस्टर चिपकाने वाले बालकों ने अण्डवृद्धि वाला पोस्टर पुरूष नेता के बगल में ही चिपकाया था (इतनी समझदारी दिखाई थी :)

      खैर, अब जब कभी गर्मी, सुजाक, शीघ्रपतन वाले पोस्टर दिखें तो नाक भौं न सिकोंडें, बल्कि उन पोस्टरों की कलात्मक शैली, उनकी रंजकता का आनंद लें। आखिर और किस पोस्टर में आपको इस तरह का ‘Logo’ मिलेगा जिसमें पाल वाली नाव में दो लोगों को बैठे दर्शाया गया हो और उनका  पता  लिखा हुआ मिले  -  सिनेमैक्स टॉकिज की टिकीट बुकिंग और कार पार्किंग गेट के बाजु में :)
(देखें चित्र)

              वैसे चुनावों की आचार संहिता से जान छुड़ाने का यह सस्ता और टिकाऊ उपाय हो सकता है, राजनेता अपने पार्टी के नाम पर तय संख्या से ज्यादा पोस्टर नहीं छपवा सकते लेकिन ऐसे क्लिनिकों के 'प्रचार सामग्री' पर भला चुनाव आयोग को कैसी आपत्ति होगी  जिनमें शख्स का पता ठिकाना ही नाव, पार्किंग और टिकट विंडों के बाजू में दर्शाया गया हो   :)

 - सतीश पंचम

Tuesday, January 3, 2012

पार्टी हैकमान...v/s....रोन्दडू नेता की श्रीमती जी !

पार्टी हाईकमान के सामने

- आप को चुनाव का टिकट चाहिये.... ठीक है हम इस पर विचार करेंगे लेकिन क्या आप बता सकते हैं कि आप मंत्री होते हुए भी सरे बाजार क्यों रो रहे थे।


- बस रूलाई आ गई थी सर, क्या करता, बहुत संभाला लेकिन रहा नहीं गया। अंत में बुक्का फूट ही गया।

- लेकिन बुक्का फूटने के बाद भी आप गमछे में रूपये बटोर रहे थे ?

- नहीं जी ऐसी बात नहीं, वो तो मैं लोगों के बीच अपने प्यार को बटोर रहा था।

- तो क्या आजकल प्यार गमछे में मिलता है ?

- जी, आजकल जमाना ही ऐसा है। वो गाना नहीं सुने थे, सजन जी दिलवा मांगे हैं...गमछा बिछाय के.....ही ही .....तो हम अपना गम उसी गमछे के छोर पर न्योछावर कर दिये थे औ पबलिकिया का हम बहुत सहानूभूति बटोरे, आप तो देखे ही होंगे टीवी पर।

- और क्या क्या बटोर सकते हैं ?

- जी, कुर्सी, दरी से लेकर प्रदेश सरकार तक बटोरने की काबलियत है हमारे अंदर ।

- केन्द्र सरकार क्यों नहीं ?

- वहां आप जैसे हैकमान लोग होंगे कि हम जैसे दरी-जाजिम बटोरू लोग कहां पार पायेंगे...ही ही...।

- सो तो ठीक है, लेकिन जनता में आपके रो देने से की छवि रोन्दड़ू की बनेगी उसका क्या ?

- रोन्दड़ू कौन नहीं है, बताइये....वहां पारलेमेन्ट में कुछ समय पहले देखा था एक भगवा स्वामी बड़ी जोर-जोर रो रहे थे.....आजकल उन पर साध्वी के साथ लटपटिया जाने का आरोप है...अखबरवा में तो पढे ही होंगे ।

- फिर भी....छवि तो छवि है.....रोवनहे उम्मीदवार को लेकर हमारी नाव कहां तक खेई जा सकती है।

- सर एक बार मौका त दिजिए....जइसे रोय गाय के गमछा में पइसा रूपिया बटोरे वइसे वोटवो बटोर देंगे....आप बस एक चांस दिजिए।

- लेकिन...

- सर एक ही चांस.....हार गये तो आप का कुछौ नहीं बिगडेगा...हमारा बगद जायेगा....औरतीया घर में घुसने नहीं देगी ।

- अरे...यार तुम फिर रोने लगे ।

- सार जी......हैकमान जी....हम द्रवित हो रहे हैं....कृपया इसे रोना न कहिये।

- ठीक है, आप को हम चुनावी टिकट देंगे लेकिन एक बात है.....रोने को तो रो लिये लेकिन हारने पर तुम्हारा गमछा तुम्हें ही ओढ़ाकर दुलहिन की तरह बारात निकालेंगे....इहौ जान लो।

- सरत मंजूर सरकार...आपका पैरवा कहां है.....तनिक चरण रज छूने का मन कर रहा है :)

--------------------------

घर में
- ए जी, कल आप काहे रो रहे थे, मुखमंत्री जी ने आपको मंत्री पद से हटा दिया इसीलिये ?

- अरे नहीं रे, वो मुखमंत्री होगी अपने घर की होंगी.....हम तो अपने लिये सहानूभूति बटोर रहे थे ।

- तो क्या सहानूभूति ऐसे बटोरा जाता है ?

- उ का है कि राजनीति और प्यार मोहब्बत में सब करना पड़ता है ।

- त का हमसे पियार करने में भी रो दिजिएगा ?

- अरे रोने का क्या कहती हो, कहो तो गा भी दें...बजा भी दें।

- अच्छा हटिये, पड़ोसन कह रही थी बबलू के पापा रो रो कर वोटवा मांग रहे थे।

- कहने दो, उसे का मालूम राजनीति में ये सब होता रहता है, कोई खुल्ले में रोता है कोई कमरे में।

- और वो शर्मा जी की चसमे वाली सीरीमती जी, पूछ रही थी कि कुसुम की अम्मा, काहे कुसुम के पापा रो रहे हैं, कुछ डांट ओंट दी हो क्या ?

- अरे सरमाईन का क्या ली हो.... बिना चार लात लगाये सुबह अपने पति को वो उठाती नहीं....बात करती है।

- अरे फिर भी, आप को अपना नहीं तो मेरा तो ख्याल करना था....बुक्का फाड़ के रो रहे थे।

- अरे तो रो लिये तो कौन बड़ा गुनाह कर लिये, मार इहां उहां हल्ला मचाई हो ?

- हल्ला न मचायें तो क्या करें, मिसराईन भी कह रहीं थी कि कुसूम के पापा को कुछ हो गया है क्या जो रो रहे हैं ?

- अब तुम पूरे मोहल्ले का नाम गिना डालो।

- अरे अभी तो यदुवाईन, पंडाईन, गुप्ताईन का बकियै है।

- भाड़ में जांय तूं और तुम्हारी पड़ोसिन, तनिक  अंखियां द्रवित क्या हुई  सब की सब पूछने लगीं।

- पूछें न त का करें, मरद आदमी कभी रोता है भला ?

- हमारी मरदानगी पर संका मत करो।

- हम काहें संका करेंगी....हम को मालूमै है...एक दू ठौ और रक्खे हो बंगला छवा के।

- अब तुम हद से आगे बढ़ रही हो।

- अरे ज्जाईये.....उसी लहुराबीर वाली के साथ हद पद गाईये....इहां नहीं.....वो भी जान गई होगी कि कितना बड़ा मरद मिला है कि सरे बाजार रो रहा था।

- देखो मेरा हाथ उठ जायेगा।

- हथवै न उठेगा.....आइये तो देखूं तनिक.....ए कुसूमी....जा तनिक गुप्ताईन...पंड़ाइन...मौरियाईन सबको बुला ला तो....तनिर ओ लोग भी त देखें कि कितना बीर बहादुर मरद है जो औरतीया को मार रहा है।

- देखो मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं...चुनावी मौसम है...पोजिसन खराब मत करो ।

- देखिये....फिर रोने लगे.....हे भगवान....कहां चली जाउं....ए कूसूमी.....रूक जा रे...मत जा। फिर से गुप्ताईन पूछने लगेगी ठोड़ी पर हाथ रखकर.......कुसूमी के पापा को मारी-ओरी हो क्या ? डांट-ओंट
 दी होती, इतना मारने-पीटने की क्या जरूरत थी :)


- सतीश पंचम

Monday, January 2, 2012

जाड़ों की नर्म धूप में..... औन्धे पड़े रहें कभी.... लोकपाल लिये हुए :)

     सभी जान रहे हैं कि लोकपाल तो केवल बहाना भर है, असल मामला तो राजनीतिक उठा पटक है जिसमें कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। भाजपा पूरे मामले में अन्ना को सामने लाकर गेम खेल रही है तो कांग्रेस भी बिगड़ैल सांड़ की तरह जैसा मन आये वैसा बर्ताव कर रही है। जान तो अन्ना भी रहे हैं कि उन्हें राजनीतिक दांव पेंच में शिखंडी की तरह इस्तेमाल किया जा रहा हैं,  लेकिन इसके अलावा उनके पास चारा भी तो नहीं है। बाबा रामदेव का हाल सब देख ही रहे हैं, जरा सा टेढ़े क्या चलने लगे वही लोग जो उनके शिविर में आकर सांसों के आरोह अवरोह दुरूस्त करते रहे थे, लगे   बाबा को ही दुरूस्त करने।

        खैर, ये सब तो होना ही था,  चालें राजनीतिक ही सही लेकिन एक ठहराव को तोड़ती लग रही हैं, वरना तो एक वक्त ये भी था कि लोग कहते पाये गये - कांग्रेस के सिवा कोई और है ही नहीं जो देश चला पाये। एक तरफ वो तमाम क्षेत्रीय पार्टीयां हैं जो अपने ही हितों में उलझी हुई हैं, न तो उन्हें अपने प्रदेश को छोड़ बाहर का सोचना है न उन्हें इसकी जरूरत महसूस हो रही है। बंगाल में ममता अपनी चालें इस तरह चलती हैं कि केन्द्र पर असर बना रहे, सरकार कुछ नेगेटिव स्टेप न उठाने पाये तो वहां पंजाब में अकाली दल वाले वैसे ही अपने को सिकन्दर मान रहे हैं। उधर कश्मीर का तो हाल और भी अलहदा है। भाजपाईयों की यदा कदा होने वाली चैं-चैं से पता चलता है कि वहां कश्मीर में कुछ ऐसा हो गया है या वैसा वहां की सरकार सोच रही है वरना तो वहां की खबरें पूरे देश में ऐसे परोसी जाती हैं मानों वह कोई अलग हो गया शराबी टाइप पारिवारिक सदस्य है, अब अलग होकर जैसे चाहे वैसे रहे, खर्चा-पानी बराबर मिलता रहेगा बस अनाप शनाप पी-वीकर सीन न क्रियेट करे। पिये और शांत रहे। असम और पूर्वोत्तर की हालत भी कुछ ऐसे ही है। वहां के राज्यों को तो ऐसे ट्रीट किया जाता है जैसे कि गाँव के अंतिम छोर पर बसा कोई घर हो जो तभी नजर आता है जब कोई उस ओर जाये या वहां का कोई बाशिंदा गांव के बीचोबीच आये, वरना तो उसे एक तरह से गाँव बाहर ही मान लिया जाता है।

             इन तमाम अलहदा परिस्थितियों के बीच दक्षिण पर नजर डालें तो वहां भी मामला भिंडी है। उत्तर भारत में  सपा और बसपा के बारे में तो सोचना ही क्या, एकदम लल्लनटॉप भिड़ंत चलती है दोनों में। कई बार तो दोनों में कनटाप भी छिड़ जाता है। ले देकर बची भाजपा और कांग्रेस। दोनों ये बातें अच्छी तरह जानते हैं कि पूरे देश में यदि कोई पक्ष विपक्ष है तो यही दो हैं और इन्हीं में से एक देश की बागडोर संभालेगा। ऐसे में अन्ना को परिस्थितियों की नजाकत समझ आ रही है। गड़बड़ ये हो जाती है कि टीम अन्ना के सदस्य कभी कभी खुलकर कांग्रेस के विरोध में हो जाते हैं, ऐसे में जाहिर है दूसरे पवित्र पक्ष के रूप में भाजपा ही नजर आती है जोकि खुद भी न जाने कितने तरह के स्कैंम में भूमिका निभा चुकी है। कर्नाटक का खनन मामला अभी ताजा ही है। ऐसे में बात वही आ जाती है कि भ्रष्टाचार तो सबने किया लेकिन उनमें भी कौन कम भ्रष्टाचारी है। चुनना उन्हीं में से है। इसे भी नैतिकता और सदाचार का नया पैमाना ही समझिये जो अब धीरे धीरे भारतीय राजनीति में घुल सा गया है।

        अब रही बात लोकपाल पर हो रही नौटंकी की, तो उस दिन संसद में सबने देखा कि हर किसी पार्टी ने वहां क्या क्या गुल खिलाया है। कांग्रेस तो अपने टूटहे फूटहे बिल को इस तरह पेश कर रही थी जैसे वह बड़ी मेहनत से बिल काढ़ कर लाई है और भाजपा बिल को ऐसे नकार रही थी जैसे कि दुकान में स्वेटर खरीद रही है....इसमें दो फंद कम हैं, उसमें वो वाला पैटर्न नजर नहीं आ रहा,  गढ़न ठीक नहीं है ब्ला...ब्ला। यहां दोनों के बीच एक तरह की धींगामुश्ती रही जिसमें कांग्रेस ने जानते हुए भी कि नंबर कम हैं फिर भी अपनी ओर से लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की मांग रखी, एक तरह से दिखावा किया, उधर भाजपा ने भी इस दांव को भांपते हुए अपना हठ जमाये रखा और नतीजा टांय टांय फिस्स। बहस गई तेल लेने। ऐसे में परिणाम वही हुआ जिसकी आशंका थी। लोकपाल लटक गया।

      उधर मुम्बई में चला अन्ना का आंदोलन कुछ अपनी खामियों से तो कुछ सरकारी दांव पेंच से फ्लाप सा हो गया। वही आंदोलन जिसने अभी कुछ दिनों पहले केन्द्र सरकार के हाथ पांव फुला दिये थे अब निढाल पड़ा था। सरकारी मंत्री संत्री तो तबर्रा बोल ही रहे थे, टीम अन्ना के सदस्य भी पीछे नहीं रहना चाहते थे। विरोध कुछ इस तरह हुआ मानों कांग्रेस ही है जो लोकपाल नहीं बनने दे रही जबकि प्रश्न के आलोक में कांग्रेस के साथ साथ भाजपा भी उतनी ही दोषी होनी चाहिये थी। लेकिन नहीं,  भाजपा कुछ इस तरह पूरे मामले में घुसी दिखना चाहती है मानों वह लोकपाल की परम हितैषी है और कांग्रेस ही सब गड़बड़झाला कर रही है। यदि भाजपा के मन में लोकपाल के प्रति इतना ही प्रेम होता तो संवैधानिक दर्जा देने के प्रश्न पर पक्ष-विपक्ष का भेद न रखते हुए वह आगे बढ़कर संवैधानिक दर्जा देने में शामिल हो गई होती लेकिन यहां तो प्रश्न पॉलिटिकल गेन का था, माइलेज लेना था।आसन्न चुनावों तक तवा गर्म रखना था, सो मामला लटका रहा। अब जब होगा तब होगा। फिलहाल बहस चालू रखा जाय। वैसे भी बहस करने में हम भारतीयों का कोई सानी नहीं है।

          एक बात और, जिस किसी को लगे कि मैं भाजपाई या कांग्रेसी हूं, कम्यूनिस्टाई हूं या सपा, बसपाई, तो स्पष्ट कर दूं कि मैं इन सभी पार्टियों से उतना ही दूर हूं, उतना ही सिनिक हूं जितना कि एक आम जन जोकि इन पार्टियों से अघा गया है। न उसे कोई शुचित नजर आ रहा है न कोई पवित्र, अपवित्र। सभी एक से बढ़कर घाघ और पोंगावाद के परिपालक लगते हैं। इसलिये जिन किन्ही महानुभाव को मेरे लेखों में कहीं कांग्रेसी झुकाव दिखे, या भाजपाई झलक दिखे तो इसमें मैं अपनी ही कमी मानूंगा कि अपनी बात को सही ढंग से सम्प्रेषित नहीं कर पाया, अभिव्यक्त नहीं कर पाया। बाकी तो लोगों ने फेसबुक पर ऐसे भी स्टेटस लगा रखे हैं कि जितने कांग्रेसी हों फ्रेण्डलिस्ट से हट जांय याकि जितने संघी-भाजपाई हो स्वंयमेव हट जांय, मानों सारी समस्या उन्हीं फ्रेण्डों की वजह से हो। हद है।

 अमां कभी सांसदों के अंदरखाने के हावभाव तो ऑब्जर्व करो यार। जो लोग संसद में एक दूसरे को पानी पी पीकर कोसते नजर आते हैं वे भी बहस के बाद गार्डन, बाग बगइचा में गलबहियां डाले नजर आते हैं, चाय पान पर एक दूसरे को टिप्पस देते नजर आते हैं और तुम हो कि इतने में ही उखड़ पखड़ ले रहे हो कि हट जाओ मेरे फ्रेण्ड लिस्ट से :)


       चलिये, बहसों का अंत होना नहीं है, न हम थकेंगे बहस करते न वो थकेंगे.....बहस तो बहस है। फिलहाल आप वो मौजूं किस्सा पढ़िये जिसे अभी हाल ही में मैंने फेसबुक पर अपडेट किया था। सुबह-सुबह डिस्कवरी चैनल पर इजिप्त और नील पर कुछ प्रोग्राम आ रहा था और वहीं मैंने ये किस्सा गढ़ दिया। नोश फरमायें :)

      नील नदी के किनारे लोकपाल पर बहस करते आठ-दस नेता पाये गये। उनकी बेमतलब की बहस देख हजारों साल पुरानी एक ममी हिलने-डुलने लगी, अचानक मौसम गहरा सा गया, रेत के तूफान चलने लगे और एक चट्टान पिरामिड से खिसक कर आ गिरी। तभी वह ममी अपना ममत्व तोड़ कर बाहर आ गई और उन नेताओं से पूछा - क्या तुम्ही लोग लोकपाल पर बहस कर रहे थे ?


          उनके हाँ कहने पर ममी ने दुखी स्वर में कहा- काश, लोकपाल को लेकर ऐसी अंतहीन बहस हमारे समय में चली होती तो हम आज इस तरह ममी न बने होते....हमारे यहां तो बात ही बात में लोकपाल बन गया था........कम्बख्तों ने भ्रष्ट तरीकों से कमाये धन सहित हमें ठिकाने लगाने में कोई कोर-कसर बाकी न रखी, हमें ममी बनाने के बाद बगल में ही उन तमाम सोने चांदी जवाहरातों को भी रख दिये, और तो उपर से व्यंग्य के रूप में शिलालेख लिख मारे जिसे शब्दशः पढकर तुम्हारे इतिहासविद् तर्जुमा करते हैं कि 'हम महान थे'। बताओ, भला इससे बड़ा व्यंग्य आज तक लिखा गया होगा कि किसी शख्स को उसके कमाये धन-वैभव के साथ ममीकरण कर दिया जाय और कहा जाय कि 'ये महान था'।


काश लोकपाल पर कभी न खत्म होने वाली बहस हमारे जमाने में भी चली होती तो......।


      तात्पर्य, अन्ना हजारे जैसे लोग हजार सालों में एक ही आते हैं, :) फर्क यह रहा कि हम अब 'नुक्ता दर नुक्ता' बहस करना सीख गये हैं :)

अमृत्य सेन की किताब 'आर्गूमेटिव इंडियन्स' ऐसे ही नहीं लिखी गई थी :)

- सतीश पंचम

Image Courtesy : Google Image Search. 

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.