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Monday, December 24, 2012

अजगरी सिस्टम......अजगरी धार


       पिछले कुछ दिनों से युवा छात्र-छात्राओं पर चल रहे सरकारी दमनचक्र के दृश्य देख बार-बार आँखें नम हो रही हैं। एक ओर से प्रदर्शनकारी खदेड़े जा रहे हैं तो दूसरी ओर से फिर आ डटते हैं। लगातार आँसू गैस के गोले छोड़े जा रहे थे लेकिन नौजवान थे कि डटे रहे। पूरी ताकत से लाठी भांजते पुलिसिये तड़-तड़ लाठी बरसाते रहे लेकिन युवा थोड़ी देर के लिये तो पीछे हटता लेकिन फिर तनकर खड़ा हो जाता मानों कहना चाहता हो- मार कितना मारना है, और तभी दूसरा पुलिसिया आकर लाठी जमा देता

  इधर मैं सोच रहा हूं ये नौजवान क्या कहकर घर से निकले होंगे, अपने माता-पिता से किस तरह कहे होंगे कि पापा पोस्टर बनाने हैं पैसे दो, आज पोस्टर कलर लेना है विरोध जताना है पैसे चाहिये। कुछ युवा अकेले रहते होंगे, साथियों संग रूम शेयर करते होंगे, युवतियां अपने शहर से दूर आई होंगी पढ़ने, घर से खरचे के लिये कुछ पैसे मिले होंगे, कैसे... उन्होंने अपने पर्स से रूपये निकाले होंगे कि आज पोस्टर बनाना है, उस पर स्लोगन लिखना है......कि आज सरकार को उसकी औकात बता देनी है कि उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराना है। कुछ बच्चियां अपने घरों में कहकर निकली होंगी बिट्टू मम्मी से कहना मैं लेट आउंगी आज कॉलेज में प्रेसेंटेशन है...... निखिल तू मम्मी को कह देना मैं निमिषा के साथ जा रही हूं देर हो जायेगी.....उधर निखिल मुस्करा कर रह जाता होगा, उसे पता होगा कि उसकी प्रिया दीदी आज मोर्चा लेने जा रही हैं सरकार से, वॉटर कैनन से, आँसू गैस से, लाठीयों से। दोपहर तक माता-पिता चिंतित होंगे कि मेरी बेटी भी कहीं इस प्रदर्शन में शामिल तो नहीं हो गई। कहीं मेरा बेटा भी तो इन प्रदर्शनकारियों में शामिल नहीं है ? स्वाभाविक है कि माता-पिता अपने बेटे बेटियों के लिये चिंतित होंगे लेकिन अंदर ही अंदर फक्र भी महसूस कर रहे होंगे।
 
     इधर विशूअल्स में देख रहा हूं कि पहले दिन वॉटर कैनन के जरिये पानी की मोटी धार से छितरा जाने वाला युवा अब जैसे जान गया है कि ये पानी ही तो है, इससे क्या डरना। अब युवा उन वॉटर कैनन को देख भाग नहीं रहे थे बल्कि पीठ पानी की मोटी धार पर आने दे रहे थे और  अपना मुँह दूसरी ओर फेर ले रहे थे मानों मुंह फेरकर सरकार से अपनी नाराजगी जताना  चाहते हों, कि हम अब तुम्हारे दमनचक्र से वाकिफ हो चुके हैं, कि हमने भी पानी की तेज धार को झेलना सीख लिया है। इधर पानी की मोटी अजगर सी धार आती उधर युवा गोल घेरे में इंडियन क्रिकेट टीम की तरह आकर सिर से सिर मिलाकर बांहें एक दूसरे की ओर जोड़ खड़े हो जाते, अब पानी की धार उन नवचट्टानों से केवल टकरा टकरा कर रह जाती और पास खड़े नौजवानों की टोली ताली पीट-पीटकर पानी की अजगरी मोटी धार झेलते उन युवाओं का उत्साह बढ़ाती, रह-रहकर सरकार को धिक्कारती रही। उधर पुलिसिये रह-रहकर थक जाते, फिर सुस्ताते, फिर लाठी भांजते। पानी का टैंकर खत्म होने आता, दूसरा टैंकर लगा दिया जाता। इन युवाओं का जोश-खरोश देख दिल से उन्हें धन्यवाद देने का मन कर रहा है। उन युवतियों, उन कॉलेजयीन छात्र-छात्राओं का आभार प्रकट करने का मन कर रहा है जो घर से सच या झूठ या जैसे-तैसे बोलकर निकले हैं कि आज अपनी आवाज को सरकार तक पहुंचा कर रहना है।

   लेकिन देखने में ये आया कि कुछ राजनीतिक मंशा पाले लोग भी उन युवाओं के बीच पहुंच गये। वे उफान पर पहुंचे प्रदर्शन को अपने पक्ष में मोड़ने की चाहत लिये उन युवाओं के बीच आने लगे और फिर तो वही हुआ जिसकी आशंका थी। विशुद्ध रूप से स्वत:स्फूर्त उपजा आंदोलन अब राजनीतिक मंशा पाले लोगों की गिरफ्त में आने लगा और देखते ही देखते जो आंदोलन नौजवानों और सरकार के बीच का था अचानक ही हिंसक हो गया क्योंकि प्रदर्शन अब नौजवानों का रह ही नहीं गया। वो तो सत्तालोलुप, येन-केन प्रकरेण लाईमलाइट में रहने वाले लोगों की गिरफ्त में आ गया था। सो यहीं से नौजवानों के इस आंदोलन का दरकना शुरू हुआ और कई पुलिसवाले जख्मी होना शुरू हुए। लेकिन सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री पहले इन नौजवानों के सामने आकर खुद नहीं मिल सकते थे जो स्थिति बिगड़ने के बाद बयान दे रहे हैं कि ये नहीं होना चाहिये था वो नहीं होना चाहिये था ?  क्या जरूरी था गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच फुटबॉल की तरह युवाओं को लुढ़काना जो कि पहले से ही आहत है और अपनी मांग पुरजोर तरीके से, संयमित ढंग से अभिव्यक्त कर रहे हैं ? क्या उसके सामने जाने की प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को उतनी भी हिम्मत नहीं बची थी कि उनके कुछ प्रतिनिधियों से सीधे मिलकर, सीधे दो टूक बात कर सकें, उनकी बात सीधे सुन सकें ?  नहीं जानता था कि प्रोटोकॉल, महिमाबखान, अबोव द मार्क, वीवीआईपी का चोगा इतना बोझिल और अपने आप में इतना जड़त्व लिये है कि अपने स्थान से हटने को तैयार ही नहीं।

   उधर कुछ युवा सोनिया गाँधी से मिले लेकिन वे भी केवल गोल-मोल बातें सुन सुनाकर हटा दिये गये। गृहमंत्री पुलिसियों द्वारा लाठी भांजना एक ओर से दुर्भाग्यपूर्ण बताते रहे दूसरी ओर पुलिस बाकायदा लाठी बरसाती रही, पानी की मोटी अजगरी धार पटकती रही नौचट्टानों पर। नौजवान मार खाते रहे, ठंड में भीगते रहे लेकिन डटे रहे। इसी बीच लाईमलाइट के लालायित लोग भी उन्हें गिद्ध की तरह नोंचने आ पहुंचे। उनके आंदोलन के श्रेय को अपनी ओर खसोटने आ गये और नतीज़ा हमारे सामने है। जो युवा घर से फिक्रमंद माता-पिता से कहकर आया होगा कि जा रहा हूं अच्छे काम के लिये आंदोलित होने वह अचानक हिंसक भीड़ का हिस्सा अनचाहे ही बना दिया गया। जो बच्चे अपने रूम-मेट से पैसे उधार लेकर पोस्टर आदि का जुगाड़ किये होंगे या कॉलेज के पुराने पोस्टरों को पलटकर लिखे होंगे अब वे खुद को ठगे से महसूस कर रहे होंगे। लेकिन इतना मैं जरूर समझता हूं कि उनके मन में सूकून होगा कि उन्होंने अपनी पवित्र भावना से सरकार को अवगत करा दिया। उन्हें अपनी बात पहुंचाने का दम-खम दिखाया। वहीं लाईमलाइट में रहने के आकांक्षी लोगों द्वारा आंदोलन में आ जुड़ना भले नकारात्मक बात हो लेकिन यह अपने आप में आंदोलन की सफलता ही कही जाएगी कि ऐसे लोगों को भी चाहे-अनचाहे जोड़ने-जुड़ने के लिये बाध्य कर दिया। ऐसी युवाशक्ति के जज्बे को मैं प्रणाम करता हूं।


-          सतीश यादव

स्थान पानी की मोटी अजगरी धार झेलते नव-चट्टानों से चौदह सौ किलोमीटर दूर

समय वही, जब प्रिया आँसू गैस से बचने के लिये गीला दुपट्टा अपने मुंह पर लपेटने को हो और तभी उसकी नजर सामने वॉटर कैनन से निकलते पानी की मोटी धार झेलते अपने छोटे भाई निखिल पर पड़े........

( मैंने बहुत व्यथित होकर यह पोस्ट लिखा। कई बार मन में आया कि इसे कहानी की शक्ल में लिखूं जहां कोई बेटी अपने पिता से इसलिये बचना चाहती है क्योंकि उसके पापा लाठी चार्ज करते हुए उसकी टोली की ओर बढ़ रहे हैं तो कोई भाई इसलिये हूजूम में चुपके से शामिल है कि कहीं उसकी दीदी पर लाठी पड़ने को हो तो वह तुरंत आगे बढ़ झेल ले.....लेकिन अंत में यही फैसला किया कि इसे कहानी की बजाय जस का तस ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में लिख देता हूं....कम से कम मन का गुबार तो निकले) 

7 comments:

Satish Chandra Satyarthi said...

आपकी भावनाएं और संवेदनाएं पूरी तरह से पहुँच रही हैं पढने वाले तक...

ashutosh's_worldblog said...

thanx 4 writing on such a crutual vonditions.....
u described the whole situation very clearly .
u knw that to make a deaf hear you u need a big boom. this government become deaf with ears.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सरकारों को लगता है कि‍ हर सवाल का जवाब बस डंडा गोली ही होता है, ये भूल कर कि‍ ज़रा कुछ दूर तक नज़र घुमाएं तो सच्‍चाई कुछ और नज़र आएगी

प्रवीण पाण्डेय said...

जूझती जो धार, उसको युवा कहना,
हर जगह मँजधार, जो भी हुआ, सहना।

प्रवीण शाह said...

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यथार्थ चित्रण...

पूरे घटनाक्रम को देखते मुझ को भी ऐसा ही लग रहा था... पर जैसे ही इस स्वत: स्फूर्त आक्रोश की अग्नि में लाइमलाइट के भूखे अपनी अपनी रोटियाँ सेंकने पहुंचे, अराजकता हावी हो गयी... हमारे युवा को अपनी उर्जा को फोकस करना होगा एक निश्चित उद्देश्य की ओर और यह भी पहचानना सीखना होगा कि मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक और योग गुरू से लेकर रिटायरमेंट के बाद फिर पद प्रतिष्ठा को तलाशते अफसरान कहीं उसका अपने निहित स्वार्थों के लिये मोहरा बना इस्तेमाल तो नहीं कर रहे...



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smt. Ajit Gupta said...

सरकार पूरी तरह से संवेदनहीन हो गयी है। असल में सरकार है ही नहीं। सरकार तो बस बहाना ढूंढ रही थी कि किसी भी विरोधी का चेहरा दिख जाए, उसके माथे ठीकरा फोड़कर हिंसा का ताण्‍डव कर दें।

प्रतिभा सक्सेना said...

कहानी इतनी प्रभावशाली नहीं होती -सारा सच बँधा-बँधा और धुँधलाया-सा लगता !

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