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Saturday, November 3, 2012

अपह्त हुएला गुरू एवम् तत्कालीन चिलगोइंया


    पुरातत्वविदों के अनुसार ढिल्लीका नामक स्थान से उत्खनन के दौरान एक ऐसा अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें कि किसी गुरू के अपहृत किये जाने का उल्लेख है। इतिहासकारों का मानना है कि अपह्रत गुरू सम्भवत: किसी ऐसे शिष्य के गुरू थे जो कि  योगाभ्यास के द्वारा अपना और अपने अन्य गुरू-भाईयों का भरण-पोषण किया करता था। कालांतर में उस शिष्य की अभिरूचि योगाभ्यास की ओर कम, तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रमों की ओर ज्यादा हो गई। शिष्य में अचानक पनपी इन अभिरूचियों से संभवत:  गुरू नाराज हो गये और उन दोनों के बीच खटपट शुरू हो गई।

   वहीं दूसरी ओर विदेशी इतिहासकारों का मानना है कि संपूर्ण विश्व में चार हजार वर्ष पूर्व अचानक ही गुरूओं पर ढेर सारी आफतें आई थी। पुराने गुरू धीरे धीरे लुप्त होते जा रहे थे और नये गुरूओं की आवक घट सी गई थी। ऐसे में किसी नामी-गिरामी शिष्य के गुरू का अपह्रत हो जाना लाजिमी है।
 
   वहीं एक अन्य अभिलेख जिसे कि हरिद्वार नामक स्थान से उत्खनन में मिला है, से पुष्टि होती है कि उल्लिखित शिष्य की राजनीतिक आकांक्षा एंव बड़बोलापन कालांतर में बढ़ जाने से तत्कालीन शासन व्यवस्था ने बल प्रयोग किया था और उस कार्यवाही में शिष्य को एक महिला के रूप में भेष बदलकर, भागकर अपनी जान बचानी पड़ी थी। अभिलेखों के कुछ स्थानों पर पलस्तर उखड़ जाने से इतिहासकार यह नहीं जान पाये हैं कि तत्कालीन सुरक्षा रक्षकों ने दाढ़ी-मूंछ वाली इस महिला को देख किस रूप में प्रतिक्रिया दी थी किंतु कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उस शिष्य का महिला के वस्त्रों में पाया जाना दर्शाता है कि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पुरूष और महिला में भेद नहीं करती थी, सभी से एक समान व्यवहार किया जाता था। इस मत की पुष्टि उत्तर प्रदेश के लखनऊ नामक स्थान पर पाये गये एक भित्तिलेख से होती है जिसके तृतीय सोपान में विवरण दिया गया है कि वहां का कोई पुलिस अधिकारी अपने पुलिसिया कार्यकाल के दौरान ही वर्दी पहने हुए मांग में सिंदूर भर, लिपस्टिक लगा, नाक में नथुनी पहन अपनी कुर्सी पर बैठता था। इस अधिकारी को कालांतर में वृक्ष से अपना ब्याह रचाते और नारीसुलभ गीत गाते भी पाया गया। इन प्रमाणों से स्पष्टत: यह इंगित होता है कि भारत में चार हजार वर्ष पूर्व नर-नारी में विभेद नहीं होता था, उन्हें समान दृष्टि से देखा जाता था।  

 (ईसवी सन् 6012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश )


- सतीश यादव

7 comments:

संगीता पुरी said...

योग्‍य शिष्‍य का चुनाव कर पाना गुरूओं के लिए बहुत बडी चुनौती होती है

प्रवीण पाण्डेय said...

रोचक पठन चल रहा है, हमारी समझ इतिहास के बारे में कुछ ऐसी ही है।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

रोचक इतिहास लिख रहे हैं।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सच्‍चाई तो ये है कि‍ यह बाबा बलिदान वगैहरा के नारे तो ज़रूर बड़े ज़ोर शोर से लगाता है पर भीतर ही भीतर मौत से बहुत डरता है. इस बाबो की भी जय.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बाबो =बाबे

Rahul Singh said...

भविष्‍य पुराण की रचना.

सञ्जय झा said...

......

......

jai ho...

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