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Friday, November 2, 2012

स्कॉर्फि़याना फ़रमान

     आजकल खापों के फरमान ढेर सारे सुनने में आते हैं। लड़कियों को जीन्स नहीं पहनने देना चाहिये। यदि कोई लड़की जीन्स पहने मिल जायेगी तो उसके गाँव के मुखिया को जुर्माना भरना पड़ेगा। फिर एक और फरमान आया कि लड़कियों को मोबाइल नहीं रखना चाहिये इससे वे बिगड़ती हैं और अभी हाल ही में फिर यह फरमान सुनने में आया कि लड़कियां स्कॉर्फ से मुँह ढंककर न चलें क्योंकि स्कॉर्फ उनके घर से भागने में सहायक है।  यदि स्कॉर्फ मुंह न ढंकें तो कोई भी लड़की पकड़े जाने के डर से नहीं भागेगी। 
  खैर, ये सारे फरमान ठहरे। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के फरमान सिर्फ हरियाणा ही में सुनाये जाते हैं, देश के बाकी जगहों पर भी इस तरह की चीजें देखने में आती हैं। अभी दो महीने पहले जब मैं अपनी लदाख यात्रा के दौरान करगिल से आगे द्रास की ओर बढ़ रहा था तब एक जगह मन हुआ कि कुछ नाश्ता कर लिया जाय तो आगे बढ़ें। आलू पराठों की दुकान दिखी और गाड़ी साईड में लगाकर हमलोग बैठ गये। इसी बीच मैं अपने बाकी के साथियों को ढाबे पर ही छोड़ वहां चहलकदमी करते हुए एक दूसरी दुकान जा पहुंचा। वहां दुकान के बाहर एक पोस्टर लगा था जिस पर कि हिजाब से संबंधित बातें लिखी थीं। पोस्टरों पर MIAC संगठन का नाम हाथ से लिखा था। थोड़ा बहुत समझने की कोशिश की तो पता चला कि इसमें महिलाओं के लिये इंस्ट्रक्शन थे कि किस तरह उन्हें खुद को ढंकना चाहिये, किस तरह से रहना चाहिये आदि आदि।
 
     तात्पर्य यह कि चाहे हरियाणा हो या कश्मीर, हर जगह इस तरह के फरमान देने वाले संगठन मौजूद रहते हैं। पंजाब में भी आतंकवाद के दौर में कुछ पोस्टर बंटे थे जिनमें महिलाओं लड़कियों के लिये हिदायत रहती थी कि वे बिंदी न लगायें, अपने आप को ज्यादा मॉडर्न न दिखायें।

    खैर, ये सारे फरमान पहले भी सुनाये जाते रहे हैं, तब जबकि नख से शिख तक ढंकी हिरोइनों का दौर था और अब भी जब पूनम पांडे आदि का दौर है। देखते हैं जमाना आगे जाकर किस करवट बैठता है ।  फिलहाल तो फरमान सुनाने वाले, सुनने वाले और उन्हें अमल में लाने वालों के बीच एक अजब सी रस्साकशी चल रही है। जितनी ही जोर से लोग महिलाओं को पर्दे में रहने को कहते हैं उतनी ही जोर से पूनम पांडे, राखी सावंत, शर्लिन चोपड़ाएं अपने अवतरित होने की मुनादी करती हैं। मध्यवर्ग पहले से मध्यम मार्ग पर है। न ज्यादा आगे जाना चाहता है न ज्यादा पीछे। तमाम असंतुष्टियों के बावजूद इतने में संतुष्ट है यही क्या कम है।

 - सतीश यादव 

9 comments:

रविकर said...

बढ़िया विषय-सटीक जवाब ।

फरमानों की खेप सौ, गई खाप यह खेप ।

पहले मारें भ्रूण में, होय बचे से रेप ।

होय बचे से रेप, अरे नामर्दों सुन लो ।

एक सुरक्षा कवच, गर्भ-कन्या हित बुन लो ।

मुस्टंडों का व्याह, समय पर अगर कराओ ।

गलत होय नहिं राह, सुता अनुपातिक लाओ ।

संगीता पुरी said...

मर्यादा में रहना अच्‍छी बात है ..
बंधन अधिक हो जाए तो तोडने को बाध्‍य होना पडता है

रविकर said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

indianrj said...

खापों को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए, कि जोर-ज़बरदस्ती दबाकर रखने की मनोवृति लड़कियों/महिलायों को विद्रोही बना सकती है, इसलिए अगर कुछ नियम बनाये जाएँ, तो वो लड़के-लड़कियों पर सामान रूप से लागू हों.

anshumala said...

आज कल टीवी पर एक विज्ञापन आता है की मरीज डाक्टर को अपनी आँख दिखाने के लिए जाता है और डाक्टर उसे दुनिया जहाँ की दूसरे चीजो का इलाज बताता रहता है अब बोलिया जब मर्ज कुछ और हो और इलाज किसी और अंग का होगा तो बीमार अच्छा नहीं होने वाला है , यही बात ऐसे सभी फरमान सुनाने वालो का है बीमारी कही और है और इलाज वो किसी और चीज का कर रहे है समाज ऐसे ही बीमार का बीमार ही रहेगा और नतीजा वो फिर अगली बार एक और फरमान निकाल देंगे। किसी भी चीज पर उतना ही दबाव डालिए जितना वो सह सके जरुरत से ज्यादा दबाव डालियेगा तो वो फट जायेगा , और आप इन फरमानों को पूनम पण्डे , राखी आदि आदि से क्यों जोड़ रहे है ये फरमान न तो उनके कारण है और न ही उनके लिए है और न ही वो कही से भी आम लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती है ।

Madan Mohan Saxena said...

बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति .

सतीश पंचम said...

@ आप इन फरमानों को पूनम पण्डे , राखी आदि आदि से क्यों जोड़ रहे है ये फरमान न तो उनके कारण है और न ही उनके लिए है और न ही वो कही से भी आम लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती है ।

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अंशुमाला जी,

यह मैं भी जानता हूं कि ये फरमान इन पूनमों आदि के लिये नहीं है. जरूरी नहीं कि जो लिखा जाय उसका शब्दश: अर्थ भी वही हो. दरअसल ये तमाम नाम एक प्रवृत्ति को इंगित करते हैं न कि व्यक्ति विशेष को.
चूंकि मध्यवर्ग इन उच्छृंखल प्रवृत्तियों से उतना ही बच-बचाकर चल रहा है जितना उन कठमुल्लों, खापों के संकीर्ण मानसिकता से, इसलिये लेख में इस बात का जिक्र किया.

संजय @ मो सम कौन ? said...

Main accused held in Loni murder case
Two days after a 16year-old girl was found burnt inside her house at New Mustafabad in Ghaziabad’s Loni town, police on Thursday arrested one of her neighbours for allegedly raping and killing her.
According to police, the accused allegedly entered her house on the night of the incident, raped her along with another man and then set her afire.
The ghastly incident came to light on October 30 when the minor was found burnt in the verandah of her house.
Although her family suspected it to be a rape case and pointed fingers at four local boys, police claimed the initial post-mortem report did not indicate any sexual assault.
The accused, 22-year-old Firoz, has said that he was friendly with the girl and spoke to her at 9.53pm on the night of murder. Taking her into confidence, he entered her house late at night while her parents had gone to Meerut.
“While the two were present inside the house, Firoz’s accomplice watched them from beneath the main door. He entered the house from the terrace and forced the girl to get physical with him. While the two men got physical with the victim, she fainted and did not regain conscious for long,” a senior police official said.
After the girl fainted, the second man, Gulzar, panicked and fled from the spot while Firoz allegedly set her afire and escaped, police said. Officials said the girl’s screams could not be heard by neighbours as a music party was going on nearby.
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Post
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page 7 - Hindustan Times(Delhi) 2nd November 2012.
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http://paper.hindustantimes.com/epaper/viewer.aspx

और दूसरे कारणों के अलावा शायद इस घटना में मोबाईल का भी बहुत बड़ा रोल रहा होगा।

किसी भी बात की तह में गये बिना सिर्फ़ इसलिये नकार देना कि यह बात किसी खाप पंचायत या किसी संगठन विशॆष के द्वारा कही गई है, ये हम लोगों की खासियत बन गई है।
आशा है जल्दी ही इस विषय पर और भी बात होंगी।

प्रवीण पाण्डेय said...

दौर चला अरमानों का,
बहके से फरमानों का,
जाओ ढंग से उत्तर ढूढ़ो,
कुचले उन सम्मानों का।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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