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Friday, October 5, 2012

The मध्यवर्ग

   रोज देखता हूँ कि मेरे ऑफिस में कार्यरत एक लड़की सुबह और शाम ऑफिस बस से आते और जाते बुर्का पहनती है। सुबह घर से आयेगी तो बुर्का पहनकर बस में चढ़ेगी और फिर पीछे की सीट जो अक्सर खाली रहती है वहां जायेगी और बुर्का उतार उसे तह कर बैग में रखेगी और फिर आगे की सीट पर आकर बैठ जायगी। यही क्रम शाम के समय जाते वक्त भी दोहराया जाता है। 

   इस लड़की का यूँ बुर्का बदलना पहले कुछ मुझे अजीब सा लगता था कि इतना भी क्या लजाधुर होना कि कार्यस्थल के लिये निकलो तो घर से बुर्का पहन कर, सारा दिन बिना बुर्के के काम करो और ऑफिस से शाम घर लौटो तो घर पर बुर्का पहनकर। लेकिन अब तो जैसे आदत सी हो गई है। लेकिन एक सवाल मन में जरूर खटकता है कि इस लड़की को घर वालों से इतनी पर्देदारी करनी पड़ रही है, जबकि बाहर वाले सहज भाव से हैं। उनसे कोई पर्देदारी नहीं।

     मध्यवर्ग की शायद यही दोहरी मानसिकता, लजाधुर होने और नये जमाने के साथ चलने की इच्छा सबकुछ गड्डमगड्ड कर देती है।
हमकदम :राखी गुलज़ार और परीक्षित साहनी सुबह-सुबह ऑफिस के लिये निकलते हुए

     एक फिल्म आई थी हमकदम। राखी गुलजार और परीक्षित साहनी मुख्य किरदार थे। जिसमें दिखाया गया था कि एक शहरी मध्यवर्ग किस तरह ऐसी ही परिस्थिति से दो-चार होता है। पूर्णतः घरेलू किस्म की पत्नी राखी को जब नौकरी मिलती है तो पहले तो वह समझ ही नहीं पाती कि कैसे वह बाहर निकले, कैसे लोगों से बात करे, कैसे क्या हो। इधर घर पर उसके सास ससुर रहते हैं जिनके सामने हमेशा वह सिर ढंक कर ही रही है, अब बाहर भी सिर ढंक कर कैसे निबाह हो। धीरे-धीरे नौकरी करते हुए पत्नी खुलना शुरू होती है, घर से निकलती है तो सिर पर पल्लू रखकर। ऑफिस पहुंचती है तो वाशरूम में जाकर चेहरा ठीक करती है, लिपस्टिक लगाती है, साड़ी ठीक पहनती है और फिर काम पर जुट जाती है। घर पहुंचने से पहले फिर वही उल्टा शुरू होता है। सिर पर पल्लू, लिपस्टिक पोंछाई और नॉर्मलीकरण।

     यह परिस्थिति देख अपने मध्यवर्गीय विडंबनाओं पर जहां कोफ्त होती है वहीं इन महिलाओं के जज्बे को सलाम करने का मन होता है कि घर और बाहर की दोहरी भूमिकाओं को वे किस खूबी से निबाह ले जा रही हैं।
उम्मीद करता हूँ कि मेरे ऑफिस में कार्यरत यह लड़की शायद आते जाते बुर्का पहनना छोड़ देगी या
क्या पता कोई और भी ज्यादा परंपरावादी परिवार में इसका विवाह हो उठे और फिर घर बैठने का फरमान सुना दे इसका पति तो ?    :(

  मध्यवर्ग बड़ा अजबै वर्ग है कम्बख्त ....।

- सतीश पंचम

(अभी दो दिन पहले ही फेसबुक पर यह स्टेटस अपडेट किया था,  वही स्टेटस पोस्ट के रूप में है )

13 comments:

rashmi ravija said...

चलिए हम भी अपना एक अनुभव बाँट लें....पास की बिल्डिंग में एक लड़की रहती है....छोटे से बच्चे को गोद में लिए अक्सर गेट के पास मिल जाती है. दो बातें हो जाती हैं. केप्री और टी शर्ट में ही होती है. एक दिन मैं वहाँ गुजर रही थी..साड़ी पहने बिंदी चूड़ी..सर पर आँचल लिए एक लड़की ने 'हलो' कहा...मैं दो मिनट उसे आश्चर्य से देखती रही..कहने ही जा रही थी..'आपको नहीं पहचाना'...कि पहचान लिया...'ये वही लड़की थी...'

उसने मुस्कुराते हुए ..थोड़ी दूर पर खड़ी एक महिला की तरफ इशारा किया ," आजकल सास आई हुई हैं.."

रविकर said...

कहे दोगला नामवर, पूरा मध्यम वर्ग ।

संस्कार की ओढ़नी, उच्च वर्ग का स्वर्ग ।

उच्च वर्ग का स्वर्ग, चतुर चम्गीदढ़ चालू ।

यहाँ हिलाए पंख, पेड़ ढूंढे यह *मालू ।

दांत दिखाता जाय, जहाँ पर वर्ग खोखला ।

ऊंचे स्वप्न दिखाय, झूठ सब कहे दोगला ।।



* पेड़ पर चढ़ने वाली एक लता

रविकर said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

शोभा said...

यह हमने कॉलेज में भी देखा था वहा पर लडकियाँ बुरका पहन कर आती थी और लडकियों के common room में बुरका उतर कर रख देती थी कॉलेज के बाद फिर से पहन कर घर चली जाती थी. ये उन लडकियों की मजबूरी थी यदि वे ऐसा न करे तो पढ़ने की अनुमति शायद न मिले. और यही मज़बूरी घर वालो की होगी.

anshumala said...

यहाँ पर मारवाणी महिलाए घुमते जाते समय ( पति मित्रो के साथ ) अंदर जींस आदि पहने रहती है और बाहर से रेडीमेड साड़ी पहनती है जो अपनी गाड़ी आदि में आ कर उतार देती है , ये बात सास ससुर को भी पता होती है | मध्यम वर्ग बहुत ज्यादा बेवजह का आडम्बर करता है खासकर महिलाओ पर , और कई बार तो खुद के लिए नहीं बस दूसरे क्या कहेंगे इसी बात के लिए मरे जाते है , खुद मेरे ससुर जी ने मुंबई में मुझे सर पर पल्ला नहीं लेने दिया किन्तु जब कभी गांव जाती तो उसी ससुर के आगे सर पर पल्ला रख लेती | कई बार लगता है की महिलाए ये सब करती है इसलिए उन पर दबाव बनाया जाता है ये सब करने के लिए , मेरी मित्र के घर सभी महिलाए बुर्का पहनती थी किन्तु उसने साफ इनकार कर दिया , जबकि एक मित्र के पिता ने उस पर छोड़ दिया और कहा की पहनाना है तो पहनो नहीं पहना है तो मत पहनो किन्तु याद रखना की एक बार पहन लिया तो कभी उसे छोड़ने की इजाजत नहीं मिलेगी | महीले थोड़ी हिम्मत दिखाए तो ये ढकोसलेबाजी बंद हो जाएगी |

Rahul Singh said...

मन और भूमिका भी बदल देता है मेकअप.

सदा said...

बहुत सही ...

प्रवीण पाण्डेय said...

जब तक हम बटे रहते हैं, व्यक्तित्वों में, टूटते रहते हैं। एक हों, हम हर दिशा से।

GYANDUTT PANDEY said...

स्त्री ही नहीं, हम भी कई दोहरी-तिहरी भूमिकायें करते हैं। हां, इतना बन्धन नहीं होता...

संजय @ मो सम कौन ? said...

होटल में रात गुजारने के बाद जब होटलमालिक ने ग्राहक का अनुभव जानना चाहा तो जवाब मिला, "बेड में मौजूद बेशुमार खटमलों का शुक्रिया, जिन्होंने मुझे जकड़ कर रखा वरना मच्छर तो उड़ा कर ही ले जाते।"
भाई दादा, हम मध्यम वर्ग वालों को संस्काररूपी खटमल जकड़े रहते हैं वरना दिखावे के मच्छर उड़ाकर ले जायें। मध्यमवर्गीय ये छटपटाहट अजीब तो लगती है लेकिन ये जिन्दगी को जीने की जद्दोजहद का सुबूत है।
बहुत शानदार पोस्ट है, तीन चार बार पढ़ चुका हूं।

सुज्ञ said...

कभी कभी तो दिखाई देता है जो यह वेश परिवर्तन श्रम लेते है, रास आने लगता है। घर में मर्यादावान का सम्मान मिलता है और बाहर कदमताल का। दोनो एन्जॉय करते है। :)

अनूप शुक्ल said...

मेला मदार मां मुंह खोल के सिन्नी बांटिन,
ससुर का देख के घूंघट निकला डेढ़हत्था। -पढ़ीस!

नीरज गोस्वामी said...

मैंने ये बात अपनी ईरान यात्रा के दौरान हर बार देखी है...ईरान से भारत आते हुए वहां की महिलाएं जैसी ही फ्लाईट टेक आफ करती है अपने बुर्के बंद कर के वाश रूम की और दौड़ती हैं और जब बहर निकलती हैं तो पहचान में ही नहीं आतीं...जींस शर्ट और लिपस्टिक...पूर्ण परिवर्तन...फिर भारत से ईरान जाते हुए जैसे ही लैंडिंग का फरमान सुनाई देता है वो वापस अपनी उसी पोषक में आ जाती हैं जिस में उनका देश उन्हें मंज़ूर करता है...किसी की भावनाओं को रोकना मज़हब के बस की बात नहीं...


नीरज

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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