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Monday, October 22, 2012

नेट भरोसे मिथकीय जानकारीयाँ


     अमूमन मैं मंदिरों में भीड़भाड़ के समय जाने से कतराता हूँ और वह भी जब किसी देवी आदि का मंदिर हो तो बहुत ज्यादा। वजह, वहां होने वाले बेवजह के तामझाम और बहुत ही मूड़ खराब कर देने वाली भक्तों की धमाचौकड़ी। पता चला हाथ जोड़कर हम आँखें मूने ईश्वर का ध्यान कर रहे हैं तभी पीछे कोई महिला केश खोले झूमने लगे, हुश्श, हुश्श की आवाज निकाल कर शरीर में देवी आने का कार्यक्रम शूरू कर दे तो पूरा मूड ऑफ हो जाता है, कहां ध्यान पूजा आदि के लिये आये थे और इधर ये शुरू हो गईं हैं।  फिर जब मौका नवरात्रों का हो तो देवी भक्त कुछ ज्यादा ही उत्साहित हो जाते हैं औऱ ऐसे ऐसे कान फोडू शोर करते हुए माता की भेंटे
गाते हैं कि मन करता है घर पर ही रहते तो अच्छा था, नाहक मंदिर आये।


ब्रम्हा जी द्वारा Oracle के माध्यम से सम्बोधन के अभिलेखीय प्रमाण :-)
      इस शनिवार छुट्टी के दिन श्रीमती जी के साथ मंदिर में सुबह-सुबह पहुंचा। पूजा-ध्यान के बाद मंदिर में यूं ही नजरें घुमाई तो मंदिर में दीवारों पर कुछ पेपर चिपके नजर आये। इधर श्रीमती जी पूजा-आदि में व्यस्त थीं तो जिज्ञासावश उन पर्चों की ओर बढ़ गया। देखा तो नौ दिनों के नवरात्र पर दिनों के हिसाब से विवरण दर्ज था। पहला दिन फलां होगा, दुसरा दिन फलां होगा, इस दिन की यह महिमा है। उस दिन की यह महिमा है। इस दिन फलां रंग के कपड़े पहनने चाहिये आदि आदि। मैंने थोड़ा गौर से देखा तो उन पर्चों में से कुछ को पहले गूगल ट्रांसलेटर के जरिये इंग्लिश से हिन्दी में ट्रांसलेट किया गया था और कुछ पर्चों को किसी वेबसाइट से सीधे लेकर प्रिंट लिया गया था। इन पर्चों को देख पढ़ने की इच्छा हुई कि देखें आखिर गूगल ट्रांसलेटर क्या कहता है। कुछ पंक्तियां पढ़ते ही लग गया कि भइया ये अपने बस की बात नहीं है, ये किसी देवभाषा में लिखा गया है, इसे वही लोग पढ़ सकते हैं। बानगी देखिये कि लिखा गया है - "अंतत: एक Oracle के माध्यम से भगवान ब्रम्हा ने सम्बोधित किया". आगे का कंटेंट आप चित्र बड़ाकर ही देख ले तो बेहतर होगा, उस पूरे पेज के टैक्स्ट
यहां शब्दश: रखना बड़ा बोझिल लगा.

    बहरहाल, इन पर्चों से इतना तो पता चलता है कि नेट पर उपलब्ध जानकारीयों का इस्तेमाल इस तरह से धार्मिक आयोजनों में भी होने लगा है। यह जितना अच्छा है, उतना ही खराब भी है क्योंकि नेट पर जो कुछ भी कंटेंट हैं वो सही है या नहीं इसे जानने की कोई आसान विधि नहीं उपलब्ध है। सो पुष्टि के अभाव में हो सकता है कि कालांतर में ढेरों बनते बिगड़ते इतिहास की तर्ज पर ये जानकारीयां भी समय के साथ बिगड़ती-ढहती आगे बढ़ें। बिगड़ती-ढहती इसलिये कह रहा हूं क्योंकि मैं खुद कई बार फेसबुक पर समकालीन किसी मुद्दे को इतिहास की चादर ओढ़ाकर व्यंग्य, चुटकी आदि लेते रहता हूँ। यह इतिहास का ओढ़ाना मुझे जहां एक ओर आनंद देता है, समकालीन लोगों पर कटाक्ष करने का सुकून देता है तो वहीं मन ही मन यह शंका भी उत्पन्न करता है कि जो इतिहास हम पढ रहे हैं कहीं वह भी मेरे तरह व्यंग्य या हास्य का पुट देकर तो नहीं लिखा गया है.

    एक उदाहरण देखिये कि जब हरियाणा में बढ़ते बलात्कार का कारण चाऊमीन बताया गया तो क्या स्टेटस मैंने फेसबुक पर ठेला था -

       भारत के उत्तरी दिशा में एक स्थान के उत्खनन से कुछ ऐसे अभिलेखीय साक्ष्य मिले हैं जिनके बारे में विशेषज्ञ मानते हैं कि अभिलेख के द्वारा उस समय प्रचलित हिन्दी भाषा में लोगों को आगाह किया गया है कि तीखी, चटपटी "चाऊ और मीन" न खाया जाय क्योंकि उससे विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण बढ़ जाता है और लोग अनियंत्रित होकर सामने वाले पर झपट पड़ते हैं। 

वहीं विशेषज्ञ इस अभिलेख की सत्यता पर सवाल उठाते हैं क्योंकि जिन दिनो चाऊ और मीन को बलात्कार का मुख्य कारण बताया गया था ठीक उन्हीं दिनों समकालीन बंगाल प्रांत की एक शासिका के अभिलेखीय प्रमाणों में कहा गया है कि लोगों द्वारा अपने बच्चों को खुला माहौल देने के कारण इस तरह के विपरीत लिंगी आकर्षणों की संख्या बढ़ जाती है और बलात्कार आदि की घटनायें काबू में नहीं रहतीं। 

उपर्युक्त दोनों ऐतिहासिक अभिलेखों में हांलाकि बलात्कार के कारण अलग अलग बताये गये हैं, तथापि इन अभिलेखों से उस दौर के शासकों द्वारा अपनी जनता प्रति चिंता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। 

वहीं, उत्खनन से कुछ ऐसे लोक-ग्रंथ भी निकले हैं जिन्हें इतिहासकार कथा-कहानी से ज्यादा महत्व नहीं देते। ऐसी ही एक कथा में वर्णन है कि चाऊ और मीन नाम के दो भाई चीनी भूभाग से देशनिकाला देने पर हरियाणा नाम की जगह पर आये और तरह तरह के उत्पात करने लगे। कालांतर में चाऊ उसी प्रदेश का गवर्नर बना और मीन लाट साहब।

( ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश :)

ऐसा ही एक स्टेटस तब लिखा था जब गुजरात में एक नेता ने टोल टैक्स देने को लेकर हवा में बंदूक लहराई थी

 लोथल और धौलावीरा जैसे एतिहासिक स्थलों के करीब हाल ही में हुए उत्खननों से एक ऐसी बंदूक मिली है जिसके बारे में वैज्ञानिक मानते हैं कि इसे तीन हजार साल पहले किसी टोल टैक्स नाके पर किसी वीआईपी द्वारा हवा में लहराया गया था। अभिलेखों में साक्ष्य हैं कि टोल नाके पर उस बंदूक लहराने वाले वीआईपी शख्स के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह टोल के पैसे चुका सके। इस बात से पता चलता है कि तीन हजार साल पहले भारतवर्ष में इतनी ज्यादा इमानदारी थी कि चुने हुए जनप्रतिनिधि बड़ी मुश्किल से अपना घर खर्च चला पाते थे, जैसे तैसे वे इमानदारी के पैसों से ही जनता की सेवा भी करते थे लेकिन एक भी पैसा गलत ढंग से नहीं कमाते थे।

( ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश :)

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   उपर्युक्त उदाहरण से मन में यह शंका आना स्वाभाविक है कि कहीं जो कुछ हम लोग इतिहास के नाम पर पढ़ रहे हैं वो भी इसी तरह मनमौजियत के अंदाज में तो नहीं लिखा गया था। बहरहाल मंदिर के  ट्रांसलेशन वाले पर्चों को कल को कोई सदा सर्वदा भारत का ही गौरवगान करने वाला शख्स  इतिहास के थैले में झांकेगा तो यही कहेगा कि Oracle डेटाबेस ब्रम्हाजी के जमाने में भी था। उसी डेटाबेस में सभी के कर्म-सुकर्म अपडेट होते रहते थे।

 - सतीश यादव

5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

5012 के पीढ़ियों को इतिहास पढ़ने में आनन्द आयेगा, यह तो निश्चित है।

kshama said...

Rochak to hoga....waise netpe aankh moond ke wishwas to nahee kiya ja sakta!

अल्पना वर्मा said...

आप की कल्पना की उड़ान गज़ब की है.

अंत में बात बड़े पते की की गई है ,शोध आवश्यक है .

वाणी गीत said...

इतिहास इसी तरह बदला जाएगा ..कब तक कर्नल टॉड के भरोसे रहेंगे :)

smt. Ajit Gupta said...

जो भी आज लिखा है वह कल इतिहास ही बनेगा। न जाने आज के लिखे की भविष्‍य में क्‍या कल्‍पना की जाएगी?

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