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Monday, October 8, 2012

कैसी जुल्मी बनाई तैंने नारी कि मारा गया ब्रम्हचारी.......चित्रलेखा रॉक्स डूड :-)


 कल शाम बरसाती मौसम में फिर से चित्रलेखा फिल्म देखी. मन लहलहा उठा। क्या गजब की फिलॉसफी, क्या गजब की अदाकारी, क्या गजब गीत-संगीत...अपन तो मुग्ध हो गये. इस फिल्म पर पहले भी पोस्ट लिख चुका हूं , वही पोस्ट अब फिर रि-पोस्ट कर रहा हूं।

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   मेरे यहां आज दुपहरीया आसमान में काले काले बादल जमा हो रहे थे। कुछ काले, कुछ श्यामल, कुछ उजले तो कुछ बेहद मटमैले। कुछ का आकार दैत्यों जैसा था तो कुछ पहाडों के होने का भ्रम दे रहे थे। एकाध को देख लग रहा था मानों कहीं आसमान में कोई आग जलाई गई है और उससे उठता धुआँ , उससे उठते गुबार ने समूचे आसमान को ढँक लिया है।

            अभी थोडी ही देर हुई थी कि बारिश झमाझम होने लगी। लोग जो यहाँ वहाँ आ जा रहे थे तपाक से किसी दुकान की शेड आदि में जाकर खड़े हो गए। बाईक से जाने वाले बाईक साईड में लगा वहीं कहीं किसी छत के नीचे खड़े हो गए। कुछ लोग उपर से गुजरते पुल के नीचे बाईक खड़ी कर बारिश से बचने लगे। धीरे-धीरे वातावरण में ठंडक आ गई। और आज यही वक्त था जब मैं अपने घर में फिल्म चित्रलेखा देख रहा था।
    
       चित्रलेखा....एक ऐसी फिल्म जो अपने आप में बेजोड़ है..अपने कथानक के कारण, अपने सुमधुर संगीत के कारण, अपने संवादों के गहरे भाव के कारण। और कॉस्ट्यूम............वो तो बस देखते ही रह जांय। सामंत बीजगुप्त का रंगभवन, नर्तकी चित्रलेखा का साज श्रृंगार, उसके बालों में शिवजी की तरह लगा आधे चाँद की आकृति,फूलों और बेलबूटों से सजे बाग. ....किस किस की तारीफ की जाय। हर एक फ्रेम अपने आप में बेजोड़।देखते ही लगता है कि राजा रवि वर्मा के बनाई तस्वीरें चल-फिर रही हैं।

          भगवती चरण वर्मा जी की कहानी पर आधारित यह फिल्म एक नर्तकी चित्रलेखा के इर्द-गिर्द घूम रही है जो मदिरा पान कर रही है, सज धज,..... साज-श्रृंगार में डूबी रहती है और सामंत बीजगुप्त से प्रेम कर बैठी है।

         इधर बीजगुप्त का विवाह किसी और से तय है लेकिन वह खुद चित्रलेखा के प्रेमपाश में हैं। इसी दौरान एक ब्रह्मचारी श्वेतांक का आगमन हुआ जिसे कि उसके गुरू ने सामंत बीजगुप्त के पास पाप और पुण्य का भेद जानने भेजा है। श्वेतांक को अपने ब्रह्मचर्य पर बड़ा घमण्ड है। रह रह कर वह महल की स्त्रियों को याद दिलाते रहते है कि मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ। मुझे मत छूओ। ब्रहमचर्य नष्ट न करो।

       तब उसके गुरू भाई सामंत बीजगुप्त समझाते हुए कहते हैं कि - ब्रह्मचारी श्वेतांक, तुम्हें किसी स्त्री को नहीं छूना चाहिए। ऐसे ही एक बार श्वेतांक रूपसी चित्रलेखा के सामने पड़ जाने पर उसका रूप देखते ही रह गए मुँह खुला का खुला। तब, सामंत चित्रगुप्त चित्रलेखा से उसका परिचय कराते हुए कहते हैं कि - ये हैं ब्रह्मचारी श्वेतांक, मेरे गुरू भाई।

  श्वेतांक ने सुधारा - ब्रह्मचारी नहीं........बाल ब्रह्मचारी।

 चित्रलेखा ने कटाक्ष करते हुए कहा - मेरा तोता भी ब्रह्मचारी है, बाल ब्रह्मचारी।

    अभी पाप और पुण्य को समझने का यह खेल चल ही रहा है कि चित्रलेखा ने एक दिन अकेले में अपने कोमल कोमल और नरम बतियों में श्वेतांक को उलझा कर उससे मदिरा पान का आग्रह किया....बावले श्वेतांक ने हिचकते हुए ही सही मदिरा पी ली ।  उसी वक्त सामंत बीजगुप्त का आगमन हुआ...श्वेतांक लज्जित.....ब्रह्मचर्य पर आँच.....अब क्या करें।

 आहत श्वेतांक सामंत बीजगुप्त से कहते है - स्वामी, मैंने पाप किया है। आज मैंने मदिरापान किया है। सामंत बीजगुप्त ने समझाते हुए कहा कि मदिरापान में कोई पाप नहीं। मैं तो रोज मदिरा पीता हूँ। लेकिन श्वेतांक का यह कहना कि मैं मदिरापान के बाद खुद को अपराधी महसूस कर रहा हूँ - सामंत बीजगुप्त को यह कहने पर बाध्य किया कि - यदि तुम किसी काम को करने के बाद अपराध महसूस करते हो तो वह कार्य अवश्य पाप है।
जाओ प्रायश्चित करो।

   और उसी वक्त पास बैठी चित्रलेखा के चेहरे के भाव बदल गए ....वह भी तो नर्तकी बन, अपने रूप जाल में फांस कर जो कुछ कर रही है कहीं न कहीं उसमें अपराध है। सामंत बीजगुप्त का यह कहना कि जिस काम को करने से मन में अपराध बोध हो वह पाप है.....चित्रलेखा को गहरे तक भेद गया।

      ऐसे में ही सन्यासी कुमारगिरी का आगमन हुआ जो चित्रलेखा को समझाने के लिए आए कि वह सामंत बीजगुप्त का पीछा छोड़ दे और यशोधरा से उनका विवाह हो जाने दे। फिल्म में सन्यासी और एक पतित नर्तकी के बीच पाप और पुण्य को लेकर हुए संवाद बहुत गूढ़ अर्थ लिए हैं और उन बातों को देख सुनकर पता चलता है कि कितनी मेहनत की गई है संवादों के लेखन में और तब तो गजब ही असर आता है फिल्म में जब चित्रलेखा अपने विरोध में खड़े सन्यासी कुमारगिरी को पाप और पुण्य का भेद समझाते यह गीत गाती है कि -

 सन्सार से भागे फिरते हो
भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना ना सके
उस लोक में भी पछताओगे

ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या
रीतों पर धर्म की मोहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को
कैसे आदर्श बनाओगे

ये भोग भी एक तपस्या है
तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचेता का होगा
रचना को अगर ठुकराओगे
सन्सार से भागे फिरते हो

हम कहते हैं ये जग अपना है
तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जनम बिता कर जायेंगे
तुम जनम गँवा कर जाओगे

       पूरे गीत को सुनते हुए महसूस हुआ कि गीतकार साहिर लुधियानवी जी ने कितनी गहराई से सांसारिक जीवन और व्यवहारिक जीवन के द्वंद्व को अपने गीतों के जरिए पेश किया है।

     उधर दिन बीतते गए और राज-रंग में डूबी, सामंत बीजगुप्त के प्रेम में गोते लगाती चित्रलेखा का मन धीरे धीरे अपराध बोध से ग्रस्त होने लगा। उसे लगने लगा कि यशोधरा जिससे सामंत बीजगुप्त का विवाह तय हुआ है उसके प्रति वह अन्याय कर रही है। सन्यासी कुमारगिरी की कही बातें उसे अब भी मथ रही होती हैं कि वह पाप कर रही है...। और एक समय आता है कि चित्रलेखा सब कुछ छोड़ छाड़ कर कुमारगिरी के गुफा में जा  पहुँचती है। सांसारिक जीवन का त्याग कर देती है।
 
     कुमारगिरी पहले तो अपने मठ पर किसी महिला साधक के होने पर ही आपत्ति जताई और कहा कि वह उन्हें अपनी शिष्या नहीं बना सकते। लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे। महान साधक और तपस्वी कुमारगिरी के यहाँ एक स्त्री ?

   लेकिन चित्रलेखा ने तब सन्यासी कुमारगिरी को चुनौती देते कहा -  क्या इसी तपस्या और ध्यान के बल आप मुझे पतिता मानने लग गए थे जिसमें इतनी भी सामर्थ्य नहीं कि एक स्त्री को अपने यहाँ आश्रय दे सके। मजबूरन कुछ सोच कर सन्यासी कुमारगिरी नर्तकी से सन्यासन बनी चित्रलेखा को अपने यहाँ रहने देने का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

       लेकिन, चित्रलेखा ने सन्यास भले धारण कर लिया हो....रूप तो उसका वही था,लावण्य तो उसका वही था। कुमारगिरी का ध्यान भटकने लगा.....तप, जप सब उन्हें अपना मन एकाग्र करने में सहायक न रहे। ईश्वर भक्ति से ध्यान बार बार चित्रलेखा के सौंदर्य की ओर भागता था। और एक दिन सन्यासी कुमारगिरी अपने आप पर काबू नहीं रख पाए और चित्रलेखा के मानमर्दन पर तुल गए।

    वह उसे बताते हैं कि आज सामंत बीजगुप्त का विवाह यशोधरा से हो गया है.....अब वह वापस नहीं लौट सकती....चित्रलेखा ने प्रतिरोध जताया लेकिन सन्यासी कुमारगिरी पर तो वासना ने अपना कब्जा कर लिया था...... चित्रलेखा को बलात् अपने शयनागार में ले जाकर पटक दिया...वासना की आग में रतिक्रीडा को आतुर कुमारगिरी के तप और सन्यास का चोला तार तार होने को उद्दत हो उठा। ऐसे में ही कुमारगिरी के एक शिष्य ने संदेश पहुँचाया कि सामंत बीजगुप्त ने भी राजपाट छोड दिया है और यशोधरा का विवाह श्वेतांक से हो रहा है जो कि अब बीजगुप्त के कहने से नया सामंत बनाये गये है।

     वस्तुस्थिति को जानकर सन्यासी कुमारगिरी को धिक्कारते हुए चित्रलेखा अपने बीजगुप्त से मिलने चल पड़ी और इधर सन्यासी कुमारगिरी की चेतना वापस लौटी.....वह क्या करने जा रहे थे....इसी झूठे जप और तप का बहुत मान था उन्हें......। अपने साथ हुए इस घटना से कुमारगिरी आहत हो आत्महत्या की ओर अग्रसर हुए तो उधर चित्रलेखा और बीजगुप्त का सुखद मिलन हुआ।

     फिल्म की जान है इसके गीत जो गहरे भाव लिये हैं। श्वेतांक के रोल में महमूद बहुत आकर्षित करते हैं तो सामंत बीजगुप्त के रोल में प्रदीप कुमार। चित्रलेखा के रूप में मीना कुमारी ने बहुत ही ज्यादा असरदार भूमिका अदा की है। भव्य चित्रण और क्लासिक फिल्मों के नजरिए से देखा जाय तो चित्रलेखा एक उत्कृष्ट फिल्म है।

  एक गीत जो बहुत ही ज्यादा सुमधुर और मन्नाडे की आवाज में गाया गया, वह है ब्रह्मचारी श्वेतांक के जरिए यशोधरा के प्रेम पाश में पड़ने पर गाया गीत -



लागी मनवा के बीच कटारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी
कैसी ज़ुल्मी बनायी तैने नारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी

ऐसा घुँघरू पायलिया का छनका
मोरी माला में अटक गया मनका
मैं तो भूल प्रभू सुध-बुध सारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी ...

कोई चंचल कोई मतवाली है
कोई नटखट, कोई भोली-भाली है
कभी देखी न थी,
 ऐसी फुलवारी कि मारा गया ...

 बड़ी जतनों साध बनायी थी
मेरी बरसों की पुण्य कमायी थी
तैने पल में, भसम कर डारी कि
मारा गया ब्रह्मचारी ...

 मोहे बावला बना गयी वाकी बतियाँ
मोसे कटती नहीं हैं अब रतियाँ
पड़ी सर पे बिपत अति भारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...

मोहे उन बिन कछू न सुहाये रे
मोरे अखियों के आगे लहराये रे
गोरे मुखड़े पे लट कारी-कारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...

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तो यह रही मेरी दुपहरीया की समयावली.............आसमान मे दलबंदी करते काले काले बादलों की घटाटोप के बीच फिल्म चित्रलेखा की देखवाई।

- सतीश यादव

8 comments:

दीपक बाबा said...

नारी और ब्रहमचारी... :)

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

@ कुमारगिरी का ध्यान भटकने लगा.....तप, जप सब उन्हें अपना मन एकाग्र करने में सहायक न रहे

उसका तप / ध्यान कुछ भी सच्च नहीं था - सिर्फ अहंकार था - जो उसे इतना नशा दे रहा था कि वह दुनिया की हर दूसरी चीज़ से मिलने वाले नशे से अधिक ताकतवर था - सो वह किसी और चीज़ से attract होता ही नहीं था | जब चित्रलेखा आई तो उसका आकर्षण पहले वाले नशे को हरा गया |

ऐसे पता नहीं कितने "सन्यासी" हैं जो "सन्यासी" नहीं हैं - किन्तु यही अहंकार उन्हें पोस रहा है ....

संजय @ मो सम कौन ? said...

कल टीवी पर चैनल बदलते समय उत्पल दत्त दिखे तो रिमोट हमने कब्जिया लिया। पहले से देख रखी ’नरम-गरम’ आ रही थी और दिमाग में एक बात सूझी कि पंचम भाई देख रहे होते तो एक और समीक्षा देखने को मिलती। खैर, ’चित्रलेखा’ बहुत पहले देखी थी और तब बोरिंग लगी थी। कुत्ते का खून पीनेवाला कोई डायलाग नहीं था इसमें:) अब इस पोस्ट के आलोक में दोबारा देखेंगे।

शीर्षक वाला ब्रम्हचारी सही है या नीचे वाला ब्रह्मचारी, ये फ़ैसला आपका लेकिन ’महमूद के रोल में श्वेतांक बहुत आकर्षित करते हैं’ में गड्डमगड्ड हो गई है। बिगाड़ के डर से दूसरे टोकते नहीं और मैं टोके बिना रह नहीं सकता। ऐसे भी कई दिन से बड़ा सूना-सूना चल रहा है ब्लॉगजगत :)

प्रवीण पाण्डेय said...

त्याग भोग के बीच कहीं पर जीवन सर्वाधिक गतिमय।

सतीश पंचम said...

संजय जी,

ध्यान दिलाण वास्ते शुक्रिया...ठीक कर दिया है :)

अनूप शुक्ल said...

अच्छा विवरण है। अब कभी देखने का मौका मिलेगा तो देख डालेंगे।

नीरज गोस्वामी said...

भैय्या सच कहें हम भी इस फिल्म के बहुत बड़े दीवाने हैं..और गाने...जान लेवा हैं भाई..अहाहा
नीरज

Abhishek Ojha said...

फिलिम नहीं देखे... उपन्यास पढ़े हैं :)

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