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Sunday, September 23, 2012

चच्चा से भेंट

    यदि आपने शोले देखी हो तो उसमें एक सीन है कि जब अमिताभ बच्चन बसंती और धर्मेंद्र की शादी की बात करने बसंती की मौसी के यहां जा बैठते हैं और लगते हैं अपने दोस्त का गुणगान करने। यह पोस्ट उसी सीन से प्रेरित हो लिखी गई है।

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- अरे बेटा बस इतना समझ लो कि मिलीजुली सरकारी अर्थव्यवस्था देश के सीने पर पत्थर के सिल की तरह है। बस किसी तरह यह सरकार खेंच ले जाऊं तो चैन की सांस लूँ। ये गठबंधन की मजबूरियां, ये सहयोगियों के चोंचले, ये जनता की बेकसी,  ये श्रीमती जी की सहेलियों द्वारा कसी जाने वाली फब्तियाँ, अब क्या क्या संभालूं, किन किन को ढोऊँ ?

- हां सच कहते हो चच्चा, बडा बोझ है आप पर

- लेकिन बेटा, इस बोझ को तो कोई कुँएं में यूं ही फेक तो नहीं देता न। बुरा नहीं मानना, इतना तो देखना ही पडता है कि देश चलाने के लिये पैसे कहां से लाये जांय, सरकार के खर्च कहां से जुटाए जांय, तमाम योजनायें कैसी चलाई जांय, अब पैसे तो पेड़ पर नहीं उगते न बेटा ?

- पैसों वाले पेड़ का तो ऐसा ऐसा है चच्चा कि एक बार तमाम घोटालों पर सख्ती दिखाई जाय, तमाम घोटालेबाज पकड़ में आ जांय, उनसे ही सारी घोटलपंती की रकम वसूली जाय तो पैसों वाला पेड़ एक नहीं बल्कि पूरा का पूरा बगीचा ही उग आयेगा, और फिर बेवजह एफडीआई पर इतना जोर देने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, यूं रसोई गैस, पेट्रेल डीजल के दाम बढ़ाकर नाहक जनता पर बोझ डालना क्या अच्छी बात है ?

- तो क्या अभी मैंने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिये जो कदम उठाये वे खराब हैं, प्रिवेंटिव चीजें तो करनी ही पड़ती हैं न बेटा, लोग तो पशुओं से बचाव के लिये बाड़-ओड़ भी लगाते हैं, वो भी तो कुछ सोचकर ही करते हैं, फिर ये तो इकोनोमी का मामला ठहरा, इसे यूं ही तो नहीं छोड़ सकता ना ?

- नहीं नहीं ये मैंने कब कहा चच्चा कि इकोनॉमी को उसके हाल पर छोड़ दो, अर्थव्यवस्था की मजबूती तो बहुत जरूरी है लेकिन इस तरह रोज रोज दाम बढ़ाना भी तो ठीक नहीं, आम जनता तो वैसे भी दबी कुचली है

- तो क्या मैं अत्याचारी हूं , जनता को दबा कर रख रहा हूँ ?

- नहीं नहीं चच्चा, ये मैंने कब कहा....... लेकिन चच्चा जनता चीज ही ऐसी है कि अब मैं आपको क्या बताउं

- तो क्या जनता बेवकूफ है, नासमझ है ?

- छी छी छी चच्चा, वो और नासमझ ......ना ना ...अरे वो तो बहुत समझदार और सुलझे हुए विचारों वाली है। लेकिन चच्चा एक बार जब अपनी पर आ जाय तो फिर अच्छे बुरे का कहां होश रहता है, जिसे मन में आता है वोट देती है, जिसको मन आए गरियाती है। अब चुनावों के वक्त कोई किसी की उंगली तो पकड़ नहीं सकता ना ?

- ठीक कहते हो बेटा, मन माफिक मौजी जनता वो, कार्टून बनाकर छेड़-छाड़ करे जनता वो, उलूल जूलूल गरियाये जनता वो, अनाप-शनाप वोटिंग करे वो, लेकिन उसमें उसका कोई दोष नहीं है।

- चच्चा, आप तो मेरी जनता को गलत समझ रहे हैं। वो तो इतनी सीधी और भोली है कि आप तो उन्हें छोड़ केवल घोटालेबाजों को पकड़िये, उन्हीं से दाम वसूलिये, फिर देखिये ये सब्सिडी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, घोटाले की रकम से ही समस्या हल हो जायेगी और समय आने पर जनता की सब्सिडी की लत और टैक्स में छूट पाने की आदत भी जल्द ही छूट जाएगी।

- अरे बेटा, मुझ चच्चा को समझा रहे हो। ये सब्सिडी और टैक्स में छूट की आदत आज तक कभी छूटी है जो अब छूट जाएगी ?

- चच्चा आप मेरी जनता को नहीं जानते। विश्वास किजिये, वो इस तरह की कैफियत नहीं रखती। वो तो कम से कम में गुजारा कर लेती है। बस एक बार एफडीआई वापस हो जाय, दामों में रोलबैक हो जाय तो वो ढंग का कमाने खाने लगेगी

- ओह, बस यही एक कमी रह गई थी। तो क्या जनता अब भी भूखी-बेकार है, कमाती धमाती नहीं, बिल्कुल फजूल बैठी रहती है ?

- तो इसमें कौन सी बुरी बात है चच्चा, इस तरह की फजूलियत तो बडे-बडे उंचे लोग तक करते हैं. बडे बडे सरकारी आयोजनों में इसी तरह की फजूलियतें दिखती हैं, अपने योजना आयोग की आंकड़ेबाजीयों को ही देखिये, करोड़ों खरच करके सर्वे होता है और अंत में बताया जाता है अफसरों के जरिये कि छब्बीस रूपईय्या वाला अमीर होता है और उंचे खानदान से होता है।

-अच्छा तो बेटा ये भी बताते जाओ कि ये तुम्हारी गुनवान जनता किस खानदान से है, उसका प्रदेश कौन सा है, उसकी बोली-भाषा कैसी है ?

-बस चच्चा उसके खानदान का सर्वे होते ही आप ही को सबसे पहले बताउंगा। फिलहाल तो इसे देश की जनता ही समझिये।

- एक बात की दाद दूँगा बेटा कि भले ही सौ बुराईयां हैं तुम्हारी जनता में लेकिन तुम्हारे मुंह से उसके लिये तारीफ ही निकलती है।

-अब क्या बताउं चच्चा, मेरा तो दिल ही कुछ ऐसा है। तो मैं ये रोलबैक पक्का समझूँ।

- पक्का ? भले सरकार गिर जाय, भले पीएमम पद चला जाय लेकिन मैं ऐसी जनता के लिये जिसे दशकों से सब्सिडी और सस्ते अनाज पाने की लत लग गई हो अपने फैसले से नहीं पलटूंगा. एफडीआई वापस नहीं होगी
- क्या बताउं चच्चा, नहीं जानता था कि एफडीआई बैकबोन की तरह ही इतनी ज्यादा जरूरी है, वरना इस देश से अंग्रेजों को हम भगाते ही नहीं, आखिर उन्होंने कौन सा इतना बुरा किया था. खैर, जैसा आप चाहें,

- चाय तो पीकर जाओ बेटा, तुम्हारी चच्ची ने बनाये हैं

- अब क्या चाय पीऊं चच्चा, आपने तो सारा मूड़ ही बिगाड़ दिया, अब किसके दर जाऊँ, सोचा था भाजपा वाले कुछ करामात दिखायेंगे लेकिन उन लोगों को केवल पसेरी भर बोलना आता है, और जगह जगह छींटना, देखे नहीं उनके लोग भी किस तरह कर्नाटक में कोयला का खेल खेले, कुछ फर्क नहीं है आप दुन्नू में.

- तो जब सब कोई भ्रष्ट है तो किसी और का समर्थन करने की बजाय तुम अपने चच्चा का ही समर्थन क्यों नहीं करते,

- करना ही पड़ेगा चच्चा, जब साईकिल और हाथी की सवारी आप एक साथ गाँठ लिये हो तो मेरी क्या बिसात

- तो मैं तुम्हें अपना वोटर मान लूँ, तुम्हारा वोट पक्का ?

- ऐसे कैसे पक्का, पहले आप मुझे सिलेंडर का कोटा नौ से बारह किजिए, फिर सोचूंगा

- तुममे और दीदी में कोई फर्क नहीं है, वो भी तो सिलेंडर का कोटा बढाकर मांग रही है

- इतने पर भी मुझमें और दीदी में बारह सिलेंडरों का फर्क है

- हां, लेकिन तुम तो अपने लिए मांग रहे हो जबकि दीदी सबों के लिये मांग रही है, इतने स्वार्थी कब से हो गये, मुझे देखो मैं अपने लिये नहीं देश के लिये सोच रहा हूं, विश्वास न हो तो अपनी चच्ची से पूछ लो

- अब क्या पूछना-पुछवाना चच्चा, चलता हूँ, घर पर किन्नर दो बार आकर पूछ-पछोर गये हैं कि सिलिंडर की डिलीवरी कब हो रही है ...कम्बख्त सिलिंडर न हुआ लल्ला हो गया....गैस एजैंसी के बुकिंग क्लर्क तक से उनकी सांठ-गाँठ हो गई है, वही उनको इन्फार्मेशन देता है कि आज उनके यहां सिलिंडर की डिलीवरी हुई है आज उनके यहां......नाचने गाने के बाद किन्नरों को बधावा न दो तो वो

 अपने कपड़े उतारने लगते हैं, आपको तो कुछ झेलना पड़ता नहीं, झेलना
 तो हम जैसों को पड़ता है

- अरे बेटा झेलना तो मुझे भी पड़ता है, देखा नहीं कैसे भरे हॉल में एक ने शर्ट उतार दी थी अपनी

- तो क्यूं ऐसे फैसले लेते हैं कि किन्नर से लेकर वकील तक कपड़े उतारने पर तुल जांय

- बेटा, अब क्या तुम्हें समझाऊं, इस देश को चलाने के लिये बहुत कुछ सहन करना पड़ता है, कैसों कैसों का समर्थन लेना पड़ता है, न चाहते हुए भी बिना मन का बोलना पड़ता है, कांटों का ताज है यह कांटो का ताज.

- तो ठीक है आप कांटो का ताज पहनिये मैं चलता हूं..... ल्यौ गाने-बजाने की आवाजें भी आने लगीं, लगता है घर पर सिलिंडर आ गया है..... चलूं, जाने क्या-क्या गाये चले जा रहे हैं - सज रही गली मेरी सुन्हरी गोटे से....सज रही गली मेरी....

- सतीश पंचम

7 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अरे ! ये 'लल्ला' भी अपने आप ही चला आया मेरे कार्टून के शीर्षक में /:-)

प्रवीण पाण्डेय said...

सन्नाट, जय हो, क्या करें हमारा तो दिल ही ऐसा है..

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

Brilliant
जबरदस्त पंच लगाया आपने पंचम जी,
अब नाम का अर्थ समझ में आया।
:)

सतीश पंचम said...

@ काजल जी,

और उस लल्ले को मैंने लपक कर उठा लिया..... :)

कितना प्यारा है लल्ला, हर किसी के घर में बदल बदल जाता रहता है, लोग भी इसके आने का बेसब्री से इंतजार करते रहते हैं इससे इतना प्यार करते हैं कि जिसके यहां नहीं जाता वे लोग उस दिन घर में खाना तक दुख के मारे नहीं बनाते........

उस दिन होटल "टोटल" जिंदाबाद :)

संजय @ मो सम कौन ? said...

भैये, 'सफ़ेद घर' आकर दिल तो बहुत बार गार्डन गार्डन हुआ है लेकिन इस शोले के रिमिक्स ने तो बिलकुल 'फट्टे चक दित्ते' :)
पढ़कर बस मजा आ गया|

सञ्जय झा said...

g a j n a a a t............
g h a n g h o t............

jai ho....

देवांशु निगम said...

आंय !!! ये तो शानदार हो गया :) :)

धाँसू-धूम-धड़ाका !!!!

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