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Wednesday, September 19, 2012

द ग्रेट इंडियन सिलेंडर गाथा



      इन दिनों रसोई गैस के सिलेंडरों हेतु बनाये सरकारी नियम को लेकर बड़ा हो-हल्ला मचा है. हर कोई कह रहा है कि सरकार द्वारा साल में केवल छह सिलेंडर सब्सिडाइज्ड रेट पर देना सातवें से लेकर आगे तक के सभी सिलेंडर अधिक दाम देने वाला नियम गलत है. भला ऐसे कैसे हो सकता है कि एक परिवार द्वारा केवल छह सिलिंडर ही साल में इस्तेमाल किया जाय. औसतन हर परिवार में महीने भर के लिये कम से कम एक सिलिंडर तो लगता ही है. इस बात पर हल्ला मचना था और मच भी रहा है. लोग समझ नहीं पा रहे कि कहीं सरकार साल को बारह महीनों से घटाकर छह महीनें में तो नहीं तब्दील करने जा रही. कई बड़े-बुजुर्ग इस आशंका से इन्कार भी नहीं कर रहे. उनका मानना है कि सरकारें पहले इस तरह के बदलाव करती रही हैं. मसलन जमीनों के एन्ड यूज के हिसाब से सरकारें किसी जमीन को योजना क्रमांक “झल्ला 1ओ” के तहत पट्टे पर देती है. लेकिन जैसे-जैसे आबंटित जमीन अपने एन्ड यूज से हटकर किसी अन्य यूज में तब्दील हो जाती है (मसलन स्कूल के लिये आबंटित जमीन मॉल में तब्दील हो जाय) तो सरकार उस जमीन को योजना क्रमांक “वल्ला 15 बी” से संलग्न कर देती है ताकि योजना की शुचिता बनी रहे.


      ऐसा ही कुछ कोयला आबंटन क्षेत्र में भी हुआ. कोयले की गुणवत्ता और उसके एन्ड यूज के हिसाब से जिस कोयले को बिजलीघर की भट्टी में जाना था वह कहीं और चला गया. यही वजह है कि भारत के फिल्मी गीतकार “झल्ला-वल्ला” जैसे प्रात: स्मरणीय गाने बनाते हैं जिनके बोल होते हैं, हमने समझा था गोल्डन जुबली जिसे, वो तो कोयला दिखाकर फुर्र हो गया, झल्ला-वल्ला.....झल्ला-वल्ला.

    किंतु सोचिये कि यही छह सिलेंडरों वाला नियम त्रेता युग में लागू होता तो क्या होता, पेट्रोल-डीजल के दाम तब बढ़े होते तो क्या होता. पता चले रावण कल से ही अपने पुष्पक विमान में ईंधन भरवा रहे हैं क्योंकि रात बारह बजे के बाद से मूल्यों में पांच रूपये की बढ़ोत्तरी होने जा रही है. इधर रावण पेट्रोल पंप पर ईंधन भरवा रहे थे, उधर उनकी बहन शूपर्णखा जंगल में राम-लक्ष्मण के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुँच गई. जिस समय शूपर्णखा पहुंची, लक्ष्मण कंधे पर खाली गैस सिलेंडर लेकर कहीं जा रहे थे और सीता जी अपने पति राम जी से बोल चिंता जता रहीं थी कि आखिर वे कैसे रसोई बनायें, साल में केवल छह सिलेंडर ही सब्सिडाईज्ड रेट पर मिल रहे हैं, सातवें के लिये अधिक दाम चुकाने पड़ रहे हैं. राम जी सीता की बात सुन चिंतित थे कि उसी समय शूपर्णखा पहुंची थी. राम जी ने लक्ष्मण को रोककर कहा – "लखन, शूपर्णखा विवाह प्रस्ताव लेकर आई है, क्या कहते हो" ?

लक्ष्मण जी ने चुपचाप कंधे से खाली सिलेंडर उतारते हुए कहा – "मैं भला इस राक्षसी से कैसे विवाह कर सकता हूँ. शक्ल देखी इसकी ?  कितनी भयावह है".

लक्ष्मण की बात सुन शूपर्णखा और खुश हुई. संभवत: इंसानों में खूबसूरती को लेकर जो सराहनीय भाव है वैसा ही कुछ भाव राक्षसों में बदसूरती को लेकर हो.  जो जितना ज्यादा बदसूरत वह उतना ही अच्छा राक्षस माना जाता हो. सुंदरता का पैमाना ठहरा. क्या किया जा सकता है. यहीं देख लिजिए, भारत में स्त्रियों के पतले होंठ सुंदरता के लक्षण माने जाते हैं तो अफ्रीका में मोटे होठों वाली महिलाएं सुंदर मानी जाती हैं।

      उधर शूपर्णखा अब भी टल नहीं रही थी. तभी राम जी ने अचानक आदेशात्मक स्वर में लक्ष्मण से कहा – "लक्ष्मण, तुम शूपर्णखा से विवाह कर लो और एक नई कुटिया भी छवा लो. इस तरह हमें नियमानुसार सातवां सिलेंडर सस्ते दामों पर मिलने लगेगा. अभी प्रति परिवार छह सिलेंडर ही मिल रहे हैं, तुम्हारा परिवार बनते ही सातवें सिलेंडर की गुंजाइश निकल आयेगी"

    राम जी की बात सुन शूपर्णखा जी बोलीं – "आप सिलेंडरों की चिंता मत करें, मेरे भाई रावण के पास गैस सिलेंडरों की एजेंसी है, जितने चाहिये उतने हर महीने भिजवा दिया करेगा".

    शूपर्णखा की बात सुन राम जी हर्षित तो हुए लेकिन लक्ष्मण जी को लगा कि कहीं शूपर्णखा बरगला तो नहीं रही, क्योंकि उन्होंने सुना था कि रावण भले ही धनवान हो लेकिन है बड़ा कंजूस. जो शख्स पेट्रोल के दाम बढ़ने की बात सुनकर पहले ही अपने पुष्पक में ईंधन भरवाने लगे वो भला क्योंकर अपनी बहन के लिये गैस सिलेंडर मुफ्त में देने लगा. बात यहीं आकर फंस गई और लक्ष्मण जी ने आव देखा न ताव फट से उसके नाक कान काट दिये. नतीजा आप सभी जानते ही हैं. राम-रावण युद्ध हुआ. यह युद्ध भी इतना आसान नहीं रहा. कई ऐसे प्रसंग आये जब रावण ने इस युद्ध और उससे जुड़े खर्चों को लेकर मन ही मन अफसोस किया था।  विशेषत: तब जब हनुमान जी की पूँछ में आग लगाई जानी थी. महल के सारे कपड़े जब हनुमान जी की पूँछ में लपेट दिये गये तब आग लगाने के लिये पेट्रोल की जरूरत पड़ी. रावण ठहरा एक नंबर का कंजूस. पेट्रोल यूं किसी की पूँछ जलाने हेतु इस्तेमाल करने में आनाकानी करने लगा. देर होने लगी. उधर हनुमान जी पूँछ बढ़ायें जायें इधर पेट्रोल के दाम भी बढ़ते जांय. अंत में किसी तरह रावण राजी हुए और इससे पहले कि दाम और बढ़ें फटाफट पेट्रोल छिड़ककर कम दामों में ही आग लगवा दी गई. आगे की कथा तो आप लोगों को पता ही है.

    उधर कई विद्वजनों का मानना है कि कुम्भकरण जान बूझकर छह महीने सोता था ताकि नियमानुसार साल में मिलने वाले छह सिलेंडरों के वक्त ही वह जगा रहे और खाने-बनाने में कोई परेशानी न हो. इस लिहाज से देखा जाय तो कुंभकरण जितना पत्नी का ख्याल रखने वाला पति मिलना दुर्लभ है जो केवल इस कारण साल के छह महीने सोता रहे ताकि उसकी पत्नी को रसोई गैस के छह सिलेंडरों की चिंता में न घुलना पड़े.

    उधर सुनने में आया कि रावण के नाना रावण से नाराज चल रहे थे कि सारा दिन मंदोदरी संग रावण शतरंज खेलते रहते हैं ये नहीं कि गैस सिलिंडरों की समय पर डिलिवरी का ध्यान रखें. इस तरह तो एजेंसी हाथ से निकल जायगी. पीढ़ियों का बना-बनाया मुकाम टूटते देर नहीं लगेगी. उधर विभीषण भी रावण से खफा चल रहे थे कि भईया रिटेल में एफडीआई को लेकर कुछ कर नहीं रहे. खुद तो लंका संभाल रहे हैं लेकिन हमारी रीटेल वाली गुमटीयों पर आसन्न खतरे से अनजान बने हैं. मेघनाथ से जब विभीषण ने अपने मन की बात कही तो मेघनाथ उल्टे विभीषण पर चढ़ बैठे कि "एफडीआईयां आती जाती रहती हैं. उनको लेकर ज्यादा चिंतित होना हमारे राक्षसकुल की परंपरा के खिलाफ है. जाईये, जाकर दुकान संभालिये, देखिये कोई ग्राहक कुछ लेने तो नहीं आया"।

     बहुत संभव है विभीषण इन्हीं सब से उकता कर पाला बदल लिये हों. उधर बैद्य सुषेण भी अपने जेनेरिक दवाओं को लेकर रावण की बेखयाली और काहिली से तंग आ गये थे. विदेशी पेटेंट पर पेटेंट किये जा रहे थे और रावण थे कि बस सारा दिन – "हम हैं लंकेश, हम हैं, हम लंकेश, हम ये....हम वो" जैसे आत्मतोषी अट्ठहासी गर्जन किये रहते थे. रावण की इन्हीं गर्जनाओं को सुनकर एक दिन कुंभकरण ने नींद से उठकर कहा था – "भईया से कहो शोर कम करें, मेरी नींद में खलल पड़ रहा है"।



लल्ला मुस्काय ल्यौ.......
क्योंकि टैक्स कराहटों पर लगता है, मुस्कराहटों पर नहीं :-) 

    खैर, ये सब तो चलता ही रहेगा.  सुनने में आया है कि सरकार रसोई गैस की छह सिलेंडर की सीमा पर नरमी बरतने का मन बना रही है. यदि ऐसा है तो अच्छा ही है. लक्ष्मण जी सातवें सिलेंडर के चक्कर में  शूपर्णखा से विवाह करने से बच जायेंगे, सीता जी को रसोई हेतु परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी,  राम जी की मर्यादा पुरूषोत्तम की छवि भी बनी रह जायेगी. वैसे भी छवियों का बनना बिगड़ना इस बात पर निर्भर रहता है कि आप पर नियम कायदे किस करवट बैठते हैं. यदि सक्षम होंगे तो नियम कायदों के तहत ही छह सिलेंडर में काम चला लेंगे अन्यथा ब्लैक में लेने पर मजबूर होंगे, तब अपनी शुचिता और नैतिकता को ताक पर रख  बैकडोर से सिलेंडर चाहेंगे, सोर्स सिफारिश लगायेंगे. जिससे साबित होता है कि किसी देश के लोगों की नैतिकता-आदर्श आदि को डिगाना या उठाना सरकारों पर निर्भर है. चाहें तो सरकारी नियम को इस तरह बनायें कि सभी को आदर्श और इमानदारी के साथ जीने की सुविधा मिले या फिर  इमानदारी को बालपोथी के तहत स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबों तक ही सीमित रख दें और प्रति सातवें सिलेंडर पर बच्चों के पिता को कांखते और गृहिणियों को रसोई मेन्यू में एडजस्टमेंट करते देखा जाय. वैसे भी जहां सरकारें 26 रूपये में गरीबी अमीरी का फासला तय कर सकती हैं वहां सिलेंडरों की संख्या छह करना भी एक एहसान समझिये.

- सतीश पंचम

14 comments:

देवांशु निगम said...

तो जी आपने पोस्ट की डिमांड पूरी कर दी, वाह वाह !! शानदार और जानदार !!!एकदम्मै झक्कड़-झैय्यम पोस्ट है !!!!
"हमने समझा था गोल्डन जुबली जिसे, वो तो कोयला दिखाकर फुर्र हो गया, झल्ला-वल्ला.....झल्ला-वल्ला"

ये शानदार लगा :)

कुछ द्वापर युग का भी बताइए :)

Satish Chandra Satyarthi said...

हाहाहा... बढ़िया रही सिलिंडर कथा... ;)

Sonal Rastogi said...

jabardast..aage ki katha to aapko pata hee hai

smt. Ajit Gupta said...

अब प्रतिदिन केवल एक सब्‍जी और रोटी ही बनेगी। इसकी कमीपूर्ति शादी के जीमण से की जाएगी। कन्‍द फल मूल पर भी ज्‍यादा ध्‍यान देना होगा। कभी-कभी उपवास भी सेहत के लिए अच्‍छा रहेगा।

mukti said...

बढ़िया है, लेकिन अगर फेसबुकिया संवाद भी छाप दिए होते तो और मज़ा आता :)

प्रवीण पाण्डेय said...

लक्ष्मणजी को कोई उपाय भी तो नहीं है अब।

Abhishek Ojha said...

:)

शोभा said...

लल्ला मुस्काय ल्यौ.......
क्योंकि टैक्स कराहटों पर लगता है, मुस्कराहटों पर नहीं :-)
हम तो इस पर कुरबान

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

हा हा हा हा सुर्पनखा अब बुढाए गयी है। सिलेंडर का यही हाल रहा तो मजबूरन रामादेश का पालन लछिमन को करना ही पड़ेगा।

anshumala said...

ई सिलेंडर गाथा तो भारत के संयुक्त परिवारों की परम्परा को तोड़ देगा पहले आदेश आया था की एक पते पर एक ही गैस कनेक्शन रहेगा अब ६ ही सिलेंडर , गड़बड़ झाला देखिये की हम तो सब्सिडी वाला सिलेंडर जलाएंगे सिर्फ सवा दो लोग का परिवार है किन्तु बेचारी गरीब काम वाली बाई को आधे सिलेंडर महंगे वाले खरीदने होंगे क्योकि उसका परिवार बड़ा है , देखिये की सब्सिडी मिलना किसे चाहिए और मिल किसे रहा है , २ जी और कोयला मुफ्त बाटते इन्हें नहीं समझ आया की गरीब जानता भी रहती है देश में उसे सब्सिडी भी देना है जीने के लिए | सोचती हूँ इस तरह की योजना नियम बनाने वाले भारत में ही पैदा होते बड़े होते है यहाँ बाहर से लाये जाते है जो देश के सामाजिक ढांचे से परिचित ही नहीं है |

GYANDUTT PANDEY said...

अब आपका सुझाव यह है कि हम छ महीना सोते रहें?

सतीश पंचम said...

@ज्ञान जी,

छह महीने सोते रहने का कालखंड कांग्रेस शासित प्रदेशों में नौ सिलिंडर मिलने के बाद घटकर तीन महीने रह जायगा :)


सतीश पंचम said...

कांग्रेस शासित प्रदेशों में प्रति परिवार साल में केवल "नौं सस्ते सिलिंडर" देने की योजना का नोटिफिकेशन क्या आया इलाके के किन्नर सक्रिय हो गये हैं.

जैसे ही किसी के यहां सिलिंडर की डिलीवरी हुई नहीं कि किन्नर पहुंच जाते हैं, बधाई हो, आपके परिवार में "नौमाही सिलिंडर की डिलीवरी" हुई है, इस खुशी के मौके पर हमें कुछ बधावे की रकम दें वरना हमें तो जानते हैं कि न देने पर हम क्या-क्या कर सकते हैं :)

संजय @ मो सम कौन ? said...

सरकार जी का तो कहना है कि यह फैसला जन हित में लिया गया है| बड़ी कृपानिधान सरकार हैगी जी|

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