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Tuesday, September 18, 2012

वही इंद्रधनुष

      जीवन में ऐसा भी होता है कि किसी संग विवाह तय हुआ हो लेकिन कुछ कारणों से विवाह नहीं हो पाये. बाद में जब वही दोनों जन एक दूसरे को जाने-अनजाने मौका पड़ने पर सामने पड़ते हैं तो परिस्थितियां मन में कई अनजानी गांठे खोलती चलती हैं. उन्हीं बातों को लक्ष्य कर विवेकी राय जी ने एक कहानी लिखी.  पहले भी इस कहानी को कई बार पढ़ चुका हूँ लेकिन हर बार उसके नये नये Absracts सामने आ जाते हैं।  

       विवेकी राय जी, जिनके बारे में इतना बताना जरूरी है कि वे ग्राम्य जीवन के ऐसे रचेता हैं जो अपनी लेखनी के जरिए सब कुछ सामने लाकर धर देते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु जी के काल के लेखक सत्तासी वर्षीय वही विवेकी राय जी जिनके जीते जी ही उनके नाम पर सड़क भी है, विवेकी राय मार्ग – जो शायद भारत में एक हिंदी के लेखक के लिए प्रकट किए गये सम्मान के तौर पर नोबल पुरस्कार से कम नहीं है। इस कहानी से संबंधित बातें पहले भी पोस्ट में एक लिख चुका हूं. आज फिर से प्रस्तुत कर रहा हूं.

   प्रस्तुत कहानी वही इंद्रधनुष में एक शख्स है जिसका कि विवाह एक लड़की से पांच साल पहले होते होते रह गया……कारण जो भी रहे हों……लेकिन विवाह नहीं हुआ। बाद में उस लड़की का विवाह उसी शख्स के एक मित्र से हो गया। कुछ साल बाद किसी काम से वह शख्स अपने उसी मित्र के यहां आकर ठहरा जिससे कि उस लड़की का विवाह हुआ।


अब यहां इस शख्स के मन में आस पास की चीजों को देख एक अलग ही तरह के भाव आना जाना शुरू करते हैं …..वह सोचता है कि वह लड़की, वह स्त्री कहीं न कहीं से उसे ताक रही है…….एक तरह का उल्लास …… एक तरह का मनसायन……. कि इन्हीं से विवाह होते होते रह गया…..यही वह स्त्री थी जिससे विवाह होना था …..

इन्हीं सब बातों को बहुत खूबसूरती से दर्शाते हुए विवेकी राय जी लिखते हैं कि -
  
      पश्चिम ओर जिधर मुँह करके वह खड़ा था, ठीक उसके सामने एक बड़ा सा इन्द्रधनुष उग आया। उसे लगा, भीतर का इन्द्रधनुष बाहर कढ़कर टंग गया है। कहीं टूट नहीं, एकदम पूर्ण इन्द्रधनुष, आसमान की उंचाई को छूता हुआ, पूरे क्षितिज को घेरकर, सप्तरंगी निखार का तरल-ज्योति पथ।


    कोई सपना नहीं, कोई जादू नहीं, कल्पना नहीं, बिल्कुल ही सामने ……. नदी उस पार जिसे पकड़ा जा सकता है,ऐसा इन्द्रधनुष उग आया, बिना हल्ला गुल्ला किये।

   वह नदी भूल गया, नाव भूल गया। ……..पानी में खड़े खड़े चूड़ियों की खनखनाहट, मुक्त खिलखिलाहट और कंठवीणा के कुछ बोल गूंज गये। फिर एक बार गंगाजली प्रतिमा उसकी आँखों में लहरा गईं.
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   भोजन के लिए पीढ़े पर बैठा तो पीछे चुहान घर में, कोठिला के ओट के पीछे कुछेक क्षणों का समारोह हो गया और वही आर-पार का संग, लेकिन कितना जोरदार।


    वह कल ही वहाँ गया था। जरूरी काम था। नहीं तो भदवारी की शेष बीहड़ता में वह यात्रा नहीं करता। वहां पहुँचा तो अभी दिन था। दोस्त ने खूब खातिर की। उसे मालूम था कि ‘वह’ है और एक बड़ी थाली में उदारता के साथ भरकर ढेर सारी पकौड़ी आयी। तेल-मसाले में तर आम के अचार की एक बड़ी-सी सलगी फट्ठी और उसी तरह मिरचे का भी एक भीमकाय अचार। देख कर ही मारे मिठास के उसका मन भर गया।

वह उसके दोस्त की बीवी है। उसे वह अच्छी तरह जानता है। एकाध बार देखा भी है। खूबसूरती में जवाब नहीं, लम्बी, छरहरी, सोनगुड़िया। संयोग नहीं बैठा, कट गयी, नहीं तो उसकी शादी ‘उसी’ के साथ लगी थी। यह कोई चार-पांच साल पहले की बात है।

“थके होंगे ?" दोस्त ने पूछा था।

“बिल्कुल ही नहीं”। उसने जवाब दिया।


चित्र: मेरे निजी कलेक्शन से..

वास्तव में वह बहुत सुख अनुभव कर रहा था। दोस्त का वह गांव उस दिन बहुत हंसता लगता था। मित्र के दरवाजे पर रौनक बरस रही थी। मच्छरों के डर से ढेर-सी करसी एक जगह कोने में रखकर धुँआ कर दिया गया था। मोटा कड़ा धुआं गुम्मज बांधकर पहले तो बैठक में अंड़स गया और फिर बाहर फैलने लगा। बैलों का सारीघर बैठक से लगा था। उसमें भी धुआं भरा था और उसी बीच खिला-पिलाकर हटाये गये बैल आँख मूंदकर जुगाली कर रहे थे। उधर से धुएं से मिल एक अजीब-सी गीली-गुमसाइन गोबरही गंध बैठक में आ रही थी। मगर यह धुआं और गंध जब भी उसके नथुने पर धक्का देतीं, फिसल जातीं और वह कैसे आराम से बीड़ी दगाये पड़ा था।

इन सब बातों को याद करने में भी एक सुख था मगर सामने सवाल था नदी पार जाने का, नाव का। उस पार वाले आदमी ने स्वर उंचा कर पूछा, “अरे भाई, नाव का कहीं पता है ? ”

बस कहीं से आती होगी। उसने उत्तर दिया।

और कहीं नहीं आई तो ?

इस तो का उत्तर उसके पास नहीं था। …..……

    उसके दोस्त ने रात में भोजन के लिए जगाया तो उसे रोमांच हो आया। हवेली में घुसते उसे लगा कि हर चीज पर उसके आने की छाप है, दालान में एक अतिरिक्त चिराग रखा गया है। नये सिरे से झाडू लगा है। आंगन में जिस ओर पानी गिरता है, हाथ लगा दिया गया है ( पानी निकाल दिया गया है ) और बहुत साफ लग रहा है। एक ओर आंगन में एक जोड़ी खड़ाऊँ गुनगुने पानी के साथ रखा है। अनावश्यक चीजें हटा दी गई हैं।

     पैर धोते-धोते उसका मन एक जोड़ी आँखों पर अटका रहा। किसी न किसी ओर से निशाना बांधा गया होगा। चौके में आते-आते तो वह जैसे एकदम उड़ रहा था। चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी (लीपन-पोतन) जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी। पीढ़ा भी धो-पोंछकर साफ किया गया लगता था। लोटा-गिलास चमचम।

    पीढ़े पर बैठते ही साड़ी की खरखराहट, चूड़ियों की खनक और कुछ सांय से (धीमे से) कही गयी बात की आहट पीछे कोठिले की ओट से मिली। इसी बीच परसी-गई थाली दोस्त ने सामने कर दी। सोनाचूर की सुवास से तबीयत भर गई।

“आप भी बैठ जाइये न !” उसने कहा।

   संकोच झाड़कर अब उसके दोस्त भी एक पीढ़ा खींच बगल में कुछ उधर हटकर इस तरह बैठ गये कि आवश्यकता पड़ने पर चीजें भीतर से बाएं हाथ सरकाया करेंगे।

     लक्ष्मीनारायण हुआ और दो-दो हाथ शुरू ही हुआ था कि भीतर से ‘हाय राम’ फिर एक खिलखिलाहट और फिर ‘घी तो आग पर ही रह गया’, बहुत धीमें पर साफ सुनाई पड़ा। उसने जिन्दगी में पहली बार कोयल की आवाज सुनी थी। एक जिंदा रस।

   “तब यहां कौन तुम्हारा लजारू है, उठकर दे दो।" उसके दोस्त ने कहा। और जो आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

    न हाथ-पैर बजा, न शोर-हंगामा और एक घटना घट गई। दोस्त की बीवी ने नीले पाढ़ की चेक डिजाइन वाली हलके गुलाबी रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी। उसे यह रंग बहुत पसंद है। नीला और गुलाबी : विस्वास और भाव। उसने मन ही मन सोचा – अबकी धान उतरा तो ऐसी ही एक साड़ी अपनी बीवी के लिए खरीदेगा।

    भोजन समाप्त कर अंचवते-अंचवते वह एक निर्णयात्मक शब्दावली पर पहुंच चुका था – इंद्रधनुष में लिपटा चम्पा का ताजा फूल।

    इन्हीं सब विचारों से आलोड़ित वह कब सो गया पता ही न चला। अगले दिन कब वह दोस्त से विदा मांग बीहड़ बरसाती मंजिल तय कर वह नदी पर आ गया, यह भी पता न चल सका।
पछिवा हवा सिसकारी दे रही थी और हल्की ठंडक गुदगुदा रही थी। सवेरे ही सवेरे देव घिर आये। झींसी पड़ने लगी। वह कपड़ो को गीला कर देने के लिए काफी थी। उसने छाता तान लिया।

     उस पार तीन स्त्रियां थीं और एक पुरूष। ये लोग भी उसी की तरह प्रतीक्षातुर थे। नदी बहुत चौड़े पाट की नहीं थी, परंतु इस पार और उस पार में अंतर तो था ही। वक्त गुजारने के लिए उस पार वालों से बातचीत करना भी कठिन था। उसने देखा उस पार वालो के पास छाता नहीं है। पुरूष बेचैनी से नाव के लिए इधर-उधर ताक-झांक कर रहा है। उसे फुहार की तनिक परवाह नहीं है। वह साधारण कुर्ते धोती में एक किसान लग रहा है।

      अचानक वह चौंक उठा। वह स्त्री किसी काम से उठ गई तो उसकी आड़ में बैठी स्त्री की झलक साफ हो गई। वही चेक-डिजाइन, वही गुलाबी रंग, वही इंद्रधनुष, इंद्रधनुष के भीतर इंद्रधनुष, लेकिन यह दूसरा (इंद्रधनुष ) गठरी की तरह क्यों सिकुड़ा, धरती में गड़ा जैसा अतिसंकुचित क्यों। इसके भी कोमल कलाइयां होंगी, कलाइयों में चूड़ियां होंगी और चूड़ियों में खनक होगी। लेकिन वैसी खनक यहां कहां। वह तो पीछे दूर छूट गई, बहूत दूर जहाँ के धुले बागों के पत्तों में अजब सी तेज गाढ़ी हरियाली है, जहां की माटी में सुवास है। वह एक बार फिर गहरे में डूब गया और क्षण भर बाद वापस आया तो फिर वही मनहूस पानी।

      लेकिन अबकी बार उसे लगा कि यह नदी का पानी नहीं, सड़क है। सड़क की इस पटरी पर वह खड़ा है और उस पटरी पर एक सजीला समारोह है, जिसमें इंद्रधनुष के विशाल फाटक से होकर जाना है। रंगारंग ज्योति के ये दो सप्तरंगी खंभे गोल घेरा बनाते हुए आसमान में उठते-उठते पूरी उंचाई पर जाकर मिल गये हैं। अमरावती का फाटक, गोलोक का सिंहद्वार कि बैकुंठ की पवित्र पौर है ?

    उसने देखा इंद्रधनुष के फाटक के भीतर वह किसान बौने की तरह लग रहा है। वह बबूल का पेड़ एक मामूली झाड़ी की तरह लग रहा है। दूर-दूर के बगीचे मरकत प्राचीर की तरह लग रहे हैं। और वह नारी ? विशाल, गोल, रंगों के झिलमिल मेहराबी मंडप के बीच इंगुरौटी ( लकड़ी की पतली-लंबी सिंदूरदानी) की तरह लुढ़की है। कौन लूट रहा है कि लाज का ऐसा बचाव ? इंद्रधनुष धरती में धंस क्यों जाय ? पानी में खड़ा होकर वास्तव में उसका मछुआ मन दो पारदर्शी चंचल मछलियों की झलक के लिए छटपटा उठा।

    उसके मन में एक बात आयी मगर अपनी मूर्खता पर स्वंय हंस पड़ा। साड़ी की तरह साड़ी होती है, रंग की तरह रंग होता है और औरत की तरह औरत होती है। उस इंद्रधनुष को देखा और अब वह इसे भी देख लेगा, उसके भीतर से, उस फाटक से होकर गुजरेगा, दुनिया का एक खुशकिस्मत इंसान, लेकिन यह पानी ? इतनी देर बाद पहली बार वह क्षुब्ध हुआ।

          पानी चुपचाप बह रहा था। धरती पर सरकती यह चंचल धारा और आसमान में उभर आयी क्षणजीवी विविध रंगों की अचंचल मणि-मेखला ! उसने जोर से सोचा, उसे इसी दम उस पार जाना है। समय चूक न जाय।

            इंद्रधनुष आसमान में उसी-गम्भीर आवाज से छाया था। बल्कि उसके ठीक समानांतर उपर से एक और पतली धार की तरह हलके-हलके उभर आया । नीचे चेक डिजाइन और गुलाबी रंग का रहस्य उसी प्रकार अनखुला था। नाव उसी प्रकार लापता थी। अथाह पानी उसी प्रकार सामने लहरा रहा था। सब वही था, मगर कहीं कुछ जरूर बदल गया था। उसने बंडी और चादर लपेटकर सिर पर रखा। उसके उपर छाता, धोती से कसकर बांध, लंगोट पहने पानी में उतर गया और दो हाथ चलाया कि दूसरे किनारे की माटी मिल गई, लेकिन उसे सख्त अफ़सोस हुआ कि इंद्रधनुष सच्चाई नहीं है।

- विवेकी राय

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 तो ये थी कहानी ‘वही इंद्रधनुष’ । इसमें कितना अमूर्त है, Abstract है, यह शायद हर पाठक के लिए अलग अलग पैमाने पर होगा, लेकिन मेरे हिसाब से प्रस्फुटित तौर पर इस कहानी का Abstractism कहीं कहीं प्रखर हो उठा है जो शायद आप लोगों ने पढ़ते समय महसूस भी किया हो,

     जैसे, दाल में घी छोड़ने के समय .......आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

     इसी तरह एक जगह लेखक कहते हैं - चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी।

-  सतीश पंचम

साभार – 'कालातीत' ( पराग प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली)

लेखक – विवेकी राय

6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

न जाने कितने रंगों में उतराती रहती है ज़िन्दगी । दस दस वर्ष कर जीवन को देखता हूँ तो रंग बदलते दिखते हैं। सुन्दर समीक्षा।

रंजना said...

क्या कहें...

सचमुच इन्द्रधनुषी...!!!!

अतिसामान्य साधारण से घटने वाले प्रसंगों को इस तरह भी देखा जा सकता है और उन्हें ऐसे शब्दचित्रों में ढला जा सकता है....अद्भुत...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सुन्दर छोटी कहानी है। लग रहा है जैसे पहले पढी हो!

smt. Ajit Gupta said...

अद्भुत कहानी। मन के इन्‍द्रधनुष जब बनते हैं तब शायद आकाश में एक बूंद जल भी ना हो, लेकिन वे बन जाते हैं अपनी ही बूंदों के सहारे। आपका आभार, इतनी अभिव्‍यक्ति पूर्ण कहानी देने के लिए।

अनूप शुक्ला said...

अद्भुत कहानी।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

जितनी बार पढ़ो उतनी बार लगता है कि पहली बार पढ़े हैं। इस कहानी में बिसरते जा रहे भोजपुरी के शब्दावलियों का अभिनव प्रयोग मन में गहरे उतर जाता है। जिन वाक्यों की ओर आपने इशारा किया है वे वाकई ग़ज़ब की गुदगुदी करते हैं। विवेकी राय जी ग्रा्म्य जीवन, संस्कृति के अद्भुत चित्रकार हैं।

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