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Saturday, September 22, 2012

ईसवी सन् 4012 की इतिहास की उत्तरपुस्तिका के अंश

     भारत में महिलाओं की राजनीतिक एंव सामाजिक स्थिति की सुदृढ़ता का पता इस बात से चलता है कि आज से दो हजार वर्ष पूर्व 21 सितंबर 2012 के दिन जब समूचा विश्व, शांति एंव समृद्धि हेतु विश्व शांति दिवस मना रहा था ठीक उसी दिन जुम्मे की नमाज के बाद बंगाल की एक शासिका ने अपने समस्त मंत्रियों को केवल अपनी एक आवाज में उनके पदों से इस्तीफा दिलवा दिया । यह घटना इस बात की तस्दीक करती है कि भारत में महिलाओं की स्थिति 2012 ई में गुप्तकाल और मौर्यकाल की अपेक्षा बहुत अच्छी थी। केवल इतना ही नहीं, एक शासिका ने तो अपने जीते जी अपने राज्य में मूर्तियां लगवाईं थी जिसके अवशेष अब भी यदा कदा कई स्थानों पर मिलते हैं। नखलऊ, जिसे पूर्व में लखनऊ कहा जाता था वहां से उस महिला की ढेरों मूर्तियां हाथ में पर्स लिये साबूत अवस्था में मिली हैं। इसके अलावा दक्षिण भारत में भी महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ थी। अभिलेखों में प्रमाण मिलता है कि जब जया नाम की महिला के यहां उसके विरोधियों ने छापेमारी करवाई तो उसके यहां से सैकड़ों जोड़े चप्पलों की प्राप्ति हुई जिससे पता चलता है कि दक्षिण भारत में महिलाओं के पहनावे में चप्पल पहनना तब तक शामिल हो गया था, लोग शौक से चप्पल पहनते थे।


( ईसवी सन् 4012 की इतिहास की उत्तरपुस्तिका के अंश :)

- सतीश पंचम

11 comments:

रविकर फैजाबादी said...

चालिसवीं सेंचुरी में, बोले पन्ने जोर।

अन्ने अनशन अन्न से, हुवे पुरुष कमजोर ।

हुवे पुरुष कमजोर, पूर्व में ममता छाई ।

माया शीला केंद्र, जया दक्षिण से आई ।

सबसे ज्यादा शक्ति, मुलायम सबको कर दे ।

हुई एक गौरांग, झोलियाँ भर भर भर दे ।।

रविकर फैजाबादी said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

दीपक बाबा said...

वाह वाह वाह


बहुत दिन बाद आपको 'रौ' में देखा.

anshumala said...

किन्तु अध्ययन में ये साफ नहीं हो पाया की ममता , जया और मायावती ने पार्टी में सुप्रीमो होने का अनुसरण उन्होंने मात्र पुरुषो को देखा देखी की या ये भारत के स्वतंत्र होने के बाद से ही हर राजनैतिक दल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था ना करके सुप्रोमो होने की पुरुषो द्वारा बनाई गई परंपरा का पालन भर किया , अध्ययन से ये भी साफ हुआ की इन तीनो महिला राजनैतिज्ञो ने अपने बल बूते पर अपनी पार्टी को इतने ऊँचे मुकाम तक ले गई जबकि इन्ही पार्टियों में जब पुरुषो का वर्चस्व था तो उन्होंने इतना ऊँचा स्थान नहीं बनाया था , अध्ययन में ये भी साफ हुआ की महिलाए भी राजनीति में अपनी जगह उसी साम्प्रदायिकता और जातिवादी राजनीती से अपनी जगह बनाई जैसे बाकि पुरुष राजनीतिज्ञ बनाते है , साफ होता है की महिलाओ ने भी पुरुषो की तरह ही राजनीति में पैतरे बाजी की और ऊँचा स्थान बनाया | सबसे अच्छी बात ये थी की इन तीनो ही पार्टियों में तीनो सुप्रीमो ने पार्टी को खानदानी नहीं बनाया अपने ही खानदान के लोगो को आगे नहीं बढाया जैसा की बाकि पार्टियों में पुरुष करते है पिता के बाद बेटा उसकी जगह ले लेता है ना की एक सक्षम नेता , अध्ययन में काफी चीजे निकली जिसका विश्लेषण धीरे धीरे किया जायेगा :))

प्रवीण पाण्डेय said...

काश तब तक लोग पढ़ने का गुण सम्हाले रहेंगे।

संजय @ मो सम कौन ? said...

'दुर्योधन की डायरी' की टक्कर का दस्तावेज :)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भूतदृष्‍टि‍ उत्‍तम है /:-)

smt. Ajit Gupta said...

इस इतिहासकार की तो मांग जबरदस्‍त रहेगी। कया पुरातत्‍ववादियों की तरह इतिहास लिखा है। लेकिन बहुत ही सूत्र रूप में लिखा गया है, इसे विस्‍तार दें।

Abhishek Ojha said...

:)

देवांशु निगम said...

यकीनन उस महिला का भी ज़िक्र होगा जो सरकार में न होकर भी उसको चला रही है , सुबूत भारत सरकार के सभी विज्ञापन हैं जिसमे प्रधानमंत्री के साथ उनका भी चित्र छप रहा है :)

भारत में स्त्रियों की स्थिति काफी मज़बूत है आजकल :)

GYANDUTT PANDEY said...

तन्दूर में नारी कंकाल भी मिले थे - वे किस युग के थे?

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