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Sunday, August 5, 2012

गुछून परिणय सुशीला....... मन भतरा हो दहिजरा......

    अपनी पत्नी से ससुराल में अकेले मिलने जाने की बात गुछून परसाद ने मंगर से झटके से कह तो दी लेकिन अंदर ही अंदर कहीं कुछ ‘करक’ रहा था, घर में कैसे राय-बात की जाय, मां-पिता जी को कैसे उजागर करा जाय, ससुराल जाने पर पता नहीं पत्नी क्या कुछ कहे, दुत्कारे-फटकारे कि क्या कैसे.....। इन्हीं सब बातों को सोचते-सोचते गुछून परसाद गेहूँ के खेत की ओर बढ़ चले। थोड़ी दूर रहते ही जमीन से हरी-हरी गेहूँ की सूईयां निकली दिखीं। पिछले हफ्ते बोये गेहूँ मौसमी नमीं पाकर जल्दी ही अँकुआ गये थे ठीक गुछून के मन की ताजा सूईयों की तरह।

(बमचक -11....)

    मेड़ पर उकड़ूं बैठकर सोचते-विचारते गुछून ने मेंड़ पर उगी दूब चुटकी में दबा ‘पुट्’ की ध्वनि के साथ तोड़ लिया। उंगलियों से दूब की गाठें सहलाते-सहलाते मन की गाँठ भी सहला उठीं। याद आया कि जब मनजौकी के यहां से तिलकहरू आये थे तब उनमें सालिगराम मास्टर भी थे। लहीम-शहीम देंह वाले सालिगराम मास्टर ने तिलक के दौरान सामने बंसखट पर बैठाकर पूछा था – “पढ़ाई कहां तक किये हैं गुछून जी” ?

“जी इन्टर तक” - बहुत सकुचाते हुए गुछून ने बताया था

“आगे क्यों नहीं पढ़े” ?

“जी…..जी नहीं पढ़ पाये”

“कोई विशेष बात” ?

“जी……...”

   लेकिन गुछन के बोलने से पहले ही कक्का जी ने बात संभाल ली। “ घर-दुआर की जिम्मेवारी जो न कराये सालिगराम जी, और फिर आजकल पढ़े-लिखे का हाल तो सब लोग देख-ही रहे हैं”

    सालीगराम मास्टर ने अपने चश्मे को ठीक करते हुए एक नजर काका की ओर देखा और फिर गुछून की ओर देखकर कहा – “पढ़े-लिखे लोगों में उन लोगों का ही हाल खराब होता है जो ठीक से पढ़ाई-लिखाई नहीं करते, विद्यार्जन नहीं करते। वरना तो मेरिट जिसका अच्छा बन जाय तो वह ठाठ से सरकारी नौकरी न सही कोई ढंग का काम तो करना जान ही जाता है। अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों के मुकाबले पढ़ा लिखा होना मनुष्य को ज्यादा ‘सोभता’ है”

    अबकी गुछून के कुछ कहने से पहले ही लड़की के पिता रामधारी जी आ गये – “बात तो सही कह रहे हैं सालिगराम जी, लेकिन जब लड़का इन्टर तक पढ़ गया है तो आगे भी पढ़ ही जायगा”

   खैर, ले-देकर थोड़ी देर बाद तिलक का कार्यक्रम शुरू हुआ। गुछून की उंगली में कुश की बनी अंगुठी पहनाई गई, फूल अच्छत रखे गये…. मंत्र पढ़े गये… महिलाओं का मंगलगान शुरू हुआ और फिर धीरे से एक चमचमाती सोने की अंगूठी पहना दी गई। गुछून के अंतस् में महसूस हुआ मानों वह खुद वर पक्ष का होने के नाते मौजूदा मौके पर जबरिया ऐंठ कर ‘कुश की बनी अंगुठी’ हों और ये चमचमाती सोने की अंगुठी वधू मनजौकी...... नहीं...नहीं मनजौकी नहीं, ‘सुशीला’....विवाह के पहले तो यही नाम था मनजौकी का, वो तो घर की महिलाओं ने बिगाड़ दिया कह-कह कर कि- चाहे जितना सिखाया पढाया जाय, करती अपने मन की ही है। उसका एक बार मनजौकी नाम पड़ा तो बस पड़ ही गया। सुशीला पहले सुसीला बनी और फिर मनजौकीया.

    सोने की अंगुठी सी सुशीला, घसिहर ‘कुश’ से गुछून......उसके बाद तो टीमटाम से विवाह हुआ - विवाह में जा रही सफ़ेद अम्बेस्डर पर पीला-गुलाबी कागज चिपका था...महेन्द्रा वाली कपड़ही जीप पर भी वही कागज चिपका था जिस पर कि लिखा था ...

गुछून

     परिणय

            सुशीला



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......अम्बिका प्रिंटिंग प्रेस, अजोरहा.



लेकिन आज गुछून तो गुछून ही रहे, हां, सुशीला मनजौकी हो गईं.

  “नंदिनी बत्तीस है कि सोनालिका चउवन” ? – किसी के द्वारा अचानक पूछने से ध्यान भंग हो गया।

"राम-राम भईया आईये-आईये.... बिजैबीर जी"

"राम-राम.....मैंने पूछा कौन गेहूँ बोये हो – नंदिनी बत्तीस कि सोनालिका चउवन" ?

"अबकी तो सोनालिका ही बोये हैं, पिछली बार नंदिनी बत्तीस बोया था – घट गया था। बाद में बाजार से खरीदना पड़ा था"

"हां बत्तीसवा में दाना तो मोटा होता है लेकिन कम उपजता है"

"ओही वजह से अबकी वह नहीं बोया। वैसे बनियौटा नंदिनी के ज्यादा दाम देता है, मोटा और अच्छा दाना दिखने से दाम बढ़ जाता है"

"हां ये बात तो है, बेचना हो तो नंदिनी बोओ, लेकिन जब अपने ही घर का खेवा-खर्चा चलाना है तो सोनालिका से अच्छा और कोई गेहूँ नहीं है भले उसका दाना छोटा होता है लेकिन अंटता है ‘पलबार’ में"

"सो तो है, वइसे कौन ओर जा रहे थे" ?

"यहीं 'असोक' के यहां जा रहा था, बयाना देने. बिट्टी की बिदाई कराकर लाना है तो सोचा असोक की जीप ही कर लूँ, दूसरे और किसी से थोड़ा सस्ते में ही पड़ेगा"

"यहीं भदोही की ओर ही तो जाना होगा न जीपिया को"

"हां, वो क्या न उधरै तो है, अरे गये तो थे चौथ लेकर देखे नहीं थे क्या" ?

"गया था, बहुत दिन हो गया"

"हां तो सत-अठ साल तो हो ही गया. वैसे तुम कब ला रहे हो अपनी दुलहनिया को. कुछ बात-ओत किये ससुराल वालों से"

अचानक इस तरह पूछ लिये जाने से गुछून को कुछ यूँ लगा मानों उसके मन की बात पकड़ ली गई हो. संभलते हुए कहा – "हां, बात चलाई तो है देखो कब वो लोग बिदा करते हैं"

"अरे तो लिवा आओ भाई, काहे मनमुटाव किये हो. थोड़ा बहुत ठकठेवन तो लगा ही रहता है घर गिरहथी में ..... भले अपने मायके में है तो क्या लेकिन है तो तुम्हारा ‘पलबार’ ही.... जिदियाने काम न चलेगा, जाओ और लिवा आओ".

गुछून परसाद सिर नीचे कर बात सुनते रहे, इस बीच बिजैबीर कब उठकर चले गये पता न चला। उंगलीयों में रखी दूब बात ही बात में गुछून ने ‘कुपुट’ दी थी, दूब से गांठ तो निकल गई थी, बची रह गई थी गोल सींक.........।

    दूर कहीं लाउडस्पीकर पर कोई 'कहंरवा' गीत बजा रहा था जो कभी-कभी हवा के रूख के अनुसार तेज सुनाई पड़ने लगता तो कभी धीमा.


मन भतरा हो दहिजरा के नाती
पेड़ा मिठईया कबहूं न खियावई
अरे गाजर खियावै भर-भर खाँची
मन भतरा हो दहिजरा के नाती 

लाल पियर कबहूं नहीं पहिरा
अरे बांधी कमरिया के काटी
मन भतरा हो दहिजरा के नाती
अरे लाल पलंग कबहूं नहीं सोवा
अरे लाल पलंग कबहूं नहीं सोवामन भतरा हो.....
     अबकी गुछून मेंड़ पर से उठे तो वह उठना कुछ अलग किस्म का था. उस उठाव में कहीं एक तरह की दृढ़-निश्चयता दिख रही थी.

(जारी......)

- सतीश पंचम


नोट : पिछली बार जब गुछून और मंगर की कड़ी लिखा था तो सोचा था कि अगली कड़ी जल्द लिखूंगा लेकिन लिखते-लिखते दस दिन होने आये और गुछून परसाद बिसरा उठे। दरअसल गुछून के कैरेक्टर में घुसकर बमचक लिखने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है, तब और जबकि माहौल बम्बईया हो, तमाम 'सोचहरी' आईटी-सॉफ्टवेयर आदि के इर्द-गिर्द चल रही हो... इसलिये अगली कड़ी कब आयेगी कह नहीं सकता. कोशिश करूंगा कि जल्द से जल्द लिखी जाय. वैसे भी कौन सा साहित्य का नोबल प्राईज छूटा जा रहा है :-)

( चित्र - मेरे गाँव  में किसी खेत का है ...."मन भतरा" गीत एक नौटंकी से है )

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6 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

गाँव की मिट्टी की खुशबू!

प्रवीण पाण्डेय said...

सही बात है, दुनियादारी जो न करा ले।

Satish Chandra Satyarthi said...

एकदम 'बमचक' सीरीज चल रही है.. जारी रहे.. मुम्बई के मथ-भुकावन माहौल में आप इतना लिख ले रहे हैं.. बड़ी बात है...

अनूप शुक्ल said...

बमचक मचाये हैं। परिणय कथा चकाचक है।

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

गुछून अब अपना संकल्‍प दृढ़ कर रहा है तो, अगली कड़ी में हो सकता है उसका ससुराल ही दिख जाए... :)

संजय @ मो सम कौन ? said...

अबके तो पन्द्रह दिन हो गये भैये, गुछून दद्दा ससुराल की तैयारी में व्यस्त दीखते हैं:)

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