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Monday, August 27, 2012

'स्वर्ग' में भी मैगी !

सड़क के किनारे सटा बर्फीला प्रदेश, khardungla
       लद्दाख, जिसके बारे में केवल किताबों में अब तक पढ़ा करते थे, या बहुत हुआ तो टीवी या कहीं नेट पर कभी-कभार कुछ देख-ताक लिया करते थे, वहीं अबकी हम भी अपने कलीग्स के साथ हो आये।  वहां न अखबार, न टीवी, न नेट कुछ नहीं। उंचाई के साथ मोबाइल भी दिन में एक दो घंटे से ज्यादा नेटवर्क नहीं देना चाहता था मानों एक आग्रह सा कर रहा हो कि - "आये हो तो प्रकृति का पूरा मजा लो, ये प्राकृतिक सौंदर्य जाने फिर कब देखने मिले" ? सो, हम सभी रम गये उस स्वर्गीय नज़ारे का आनंद लेने में। हां, उस दुर्गमता को देखते हुए मन में कई बार चीनी तीर्थयात्री ह्वेनश्वांग का ख्याल आया कि उस दौर में कैसे आया होगा वह तीर्थयात्री जबकि सड़क आदि की सुविधा भी नहीं थी। माना कि रेशम मार्ग उस दौर में मौजूद था लेकिन....फिर भी....कैसे आया होगा ?



Tsomoriri Lake, Ladakh

     उधर कहीं-कहीं केवल पहाड़ ही पहाड़ दिखे तो कहीं बर्फ़ ही बर्फ़। कुछ जगहों पर याक चरते नज़र आये तो कहीं ढेर सारे घोड़े,  वह भी बिना किसी लगाम या रस्सी से बंधे, बिल्कुल स्वछंद। ड्राईवर से पूछा कि ये घोड़े जंगली हैं या पाले हुए। तो बंदे ने बताया कि ज्यादातर पाले हुए हैं। कभी-कभार जंगली घोड़े भी दिखाई देते हैं लेकिन वो पहली ही नज़र में पहचान में आ जाते हैं। यहीं कहीं इन घोड़ों का मालिक तंबू में होगा। शाम तक सभी घोड़े गोल बाड़े में खुद-ब-खुद आ जाते हैं। आश्चर्य हुआ कि इस दुर्गम प्रदेश में घोड़े खुद-ब-खुद लौट आते हैं जबकि चाहें तो इतना विस्तृत प्रदेश है कि अपने मालिक से दूर चाहे जहां तक निकल जांय, मालिक न पकड़ पायेगा। हां, ये जरूर हो सकता है कि कोई दूसरा घोड़ा मालिक उन्हें पकड़ ले। रास्ते में कहीं-कहीं घोड़ों को पैर में रस्सी फंसाकर गिराते और फिर उनके पैरों में नाल ठोकने का उपक्रम भी देखने मिला।

highest Cafetaria in the World, Khardungla

      रास्ते में कुछ जगह ठहर कर मैगी का भी आनंद लिया। मैगी, जिसके बारे में अक्सर बाबा रामदेव को बहुत शिकायत रहती है, उन्हें एक बार हिमालय के इन पहाड़ों में भी हो आना चाहिये। देखते कि कैसे वहां और कुछ खाद्य मिले न मिले मैगी जरूर मिलती है और सैलानियों की पहली पसंद भी यही रहती है क्योंकि या तो स्थानीय खाने से सैलानी अपना तादात्मय स्थापित नहीं कर पाते या फिर कभी आलू आदि की इच्छा हुई भी तो आलू आसानी से पक नहीं पाते। अत्यधिक उंचाई आड़े आ जाती है, जबकि मैगी एवरेडी है। जब चाहे तब टटक अंदाज में उपलब्ध। वो एक मारूति सर्विस सेन्टर का ऐड आता था न, जिसमें कि वीराने में दो बंदे एक पहाड़ी लड़के से पूछते हैं – ये है , वो है, फलां है, अलां है और लड़का हर प्रश्न का जवाब ना मे देता था। लेकिन जैसे ही मारूति सर्विस सेन्टर के बारे में पूछा जाता है लड़का हां कहता है। दोनों बंदे हैरान होते हैं कि इस वीराने में मारूति सर्विस सेन्टर उपलब्ध है। ठीक वही स्थिति हमारी हुई थी जब बेहद दुर्गम इलाके में भी हमें मैगी देखने मिली। लोग बड़े चाव से मैगी का आनंद लेते दिखे। बाबा रामदेव, या तो आप कुछ मैगी सा खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराओ जो हिमालय के इन दुर्गम स्थानों पर भी पहुंच सके, पक सके या फिर कुछ और मुद्दे उठाओ। हां, शीतल पेय यहां भी मिले लेकिन बहुत कम। लोगों को जरूरत भी क्या है। वैसे ही माहौल शीतल-शीतल रहता है।
पहाड़ों से खिसकती रोड़ी

रास्ते में एक जगह पहाड़ों की ढलान से रोड़ी खिसकती नज़र आई। लेकिन वह रोड़ी आगे जाकर हिमांक संगठन द्वारा रखे ड्रमों की जद में आ जाती और वहीं के वहीं फिसलती रोड़ी ठहर जाती। सड़क सुरक्षित। तेल के खाली ड्रमों का सड़क के मैन्टेनेन्स हेतु कैसे बेहतरीन इस्तेमाल किया जाता है यह देखने लायक है।

एक और चीज जिसने ध्यान खेंचा वह था यहां बहने वाली सिंधु नदी जिसके बारे में केवल किताबों में ही देखते-पढ़ते आये थे। सिंधु घाटी की सभ्यता, हड़प्पा, मोहन-जोदड़ो की सभ्यता, सभी कुछ जैसे जेहन में एक-एक कर आने लगे। एक जगह गाड़ी रोककर उसके बेहद ठंडे पानी को अंजुलीयों में भर लिया। अच्छा लगा। रास्ते में श्योक नदी भी दिखी लेकिन वह भाव मन में नहीं आया जो सिन्धु नदी को देख आया था।

सिंधु नदी
करगिल से श्रीनगर की ओर जाते हुए रास्ते में सुरू नदी दिखी जिसकी तेज धारा की आवाज कार का इग्निशन बंद करने पर करीब आधे किलोमीटर दूर से सुनाई पड़ रही थी। करीब जाने पर शर्रर-शर्रर बहती सुरू को देख रोंगटे खड़े हो गये। इत्ती तेज धारा, इतना तेज पानी का बहाव पहली बार देखा था। उन मज़दूरों के प्रति सहज ही श्रद्धा भाव मन में भर आता है जो इतनी तेज बहती नदी के जोखिम के बावजूद वहां सड़क बना ले गये।

Kargil War Memorial
द्रास के उस क्षेत्र में पहुंचने पर जहां करगिल युद्ध हुआ था मन एकाएक उदास हो उठा। करगिल वार मेमोरियल देखने के दौरान यह मन:स्थिति बरकरार रही। अंदर जब मनोज पाण्डेय हॉल में पहुंचे तो सामने ही जैसे वह सारे दृश्य दिखने लगे जो करगिल वार के समय हमने देखे सुने थे। विक्रम बत्रा की तस्वीर भी दिखी – ये दिल मांगे मोर.

उन तमाम वीरों के बीच कई सारे युद्धक मिसाइलों के खोल, बंदूकों की गोलियां और पाकिस्तानी घुसपैठियों (सेना) द्वारा छोड़ कर भागे गये असलहों के अंश भी दिखाई दिये। मन में एक किस्म की खिन्नता का भाव भी आया कि यूं तो हम बहुत अपने काम को लेकर हलकान रहते हैं कि ये काम करते हैं, वो काम करते हैं, बहुत बिजी रहते हैं लेकिन जरा इन सैनिकों के काम को देखा जाय, इनकी जीवन शैली देखा जाय तो हम कहीं नहीं ठहरते। खाने में जरा से कोई बाल आ जाय, या नुक्स दिख जाय तो आसमान सर पर उठा लेते हैं जबकि इनके पास युद्ध के दौरान खाना पहुंचने में ही तीन दिन लगते थे। पूड़ियां बनने के बाद सुखाई जाती थीं और फिर उसके बाद बंडल करके भेजी जाती थीं। और कोई तात्कालिक सुविधा भी नहीं थी कि आग जलाकर उन्हें तुरंता पुलाव जैसा कुछ दिया जाय। इस कठिनाई में जीने वाले और देश की रक्षा में डटे जवानों को देख मन में जहां श्रद्धाभाव उपजता है वहीं अफ़सोस भी होता है कि उज्जड्ड पड़ोसी देशों के चलते यह सब हमारे जवानों को झेलना पड़ता है।
3-idiots Shooting spot

वैसे देखने को तो और भी बहुत कुछ देखे, मोनास्ट्री, गुरद्वारा पत्थर साहिब, मैग्नेटिक हिल, थ्री इडियट का सू-सू प्वाइंट ( वही, जहां चतुर रामलिंगम ने सूसू किया था) वहां अब बाकायदा चिन्हित किया गया है। करगिल में रात भर रूकने के लिये जब होटल तलाशा जा रहा था तो दुकानों के वे शटर दिखाई दिये जिसमें कि गोलियों के निशान अब भी बने हैं, धूप आड़ी तिरछी होकर उन दुकानों में अब भी घुसपैठ करती है। उस होटल के रूम अटेंडेंट से बातचीत करने पर उसने बताया कि वह गुलमर्ग का है। करगिल में केवल नौकरी करता है। रात के आठ बजे जब करगिल बाजार में सैर करने निकला तो -करने के लिये एसटीडी बूथ पर गया तो बीसएनएल के लैंडलाइन वाला बीटल फोन दिखा। अरसे बाद बटन दबाकर पूश बटन फोन इस्तेमाल किया। एक दो बार टूं टूं की ध्विन से पता चला कि ठीक से बटन नहीं दबाया था। पुश बटन लैंडलाइन की आदत छूट जाय तो टूं टूं होनी ही थी। एक फल वाले के यहां रूककर ऐसे ही दाम पूछा तो पता चला केला सत्तर रूपये दर्जन। सेब साठ रूपये किलो। चाय पीने के लिये दुकान ढूंढने लगा ताकि वहां के लोगों से बातचीत करते हुए कुछ अपने लायक कंटेंट निकाल सकूं लेकिन कोई चाय की दुकान नहीं खुली मिली। सब कुछ जैसे दस साल पीछे जैसा लगा। सुबह एक दुकान के खुलने पर देखा वहां टेप रिकार्डर वाले कैसेट बिक रहे थे। पूछने पर बंदे ने बताया कि अब भी यहां कई जगह कैसेट चलता है। सीडी खूब बिकती है। यानि करगिल अभी कैसेट टू सीडी के संक्रमण काल से गुजर रहा है।

                   इस बारे में
Nubra Valley, Ladakh 
 गुलमर्ग के बंदे से पूछा कि करगिल पिछड़ा क्यूं दिख रहा है। मुस्कराते हुए बंदे ने यूं देखा मानों कहना चाहता हो – "आगे बढ़ने की जल्दी किसे है" ?

    कुछ जगह इंटरनेट कैफे भी दिखे। सैलून के नाम देखने पर होठों पर मुस्कान सी आ गई। बॉलीवुड स्टाईल हेयर कटिंग सलून, जुल्फिकार सैलून, लेटेस्ट स्टाईल सैलून। वहां खुबानी खूब बिकती दिखी। श्रीनगर पहुंचने पर डल झील शाम के धुंधलके में घिरा दिखा। रात भर होटल में रहे, अगले दिन डल झील में शिकारे का आनंद लिये। एक हाउस बोट के पास शिकारा ले जाकर कहने लगा – ये मिशन कश्मीर प्वाइंट है। इदर मिशन कश्मीर की शूटिंग होई थी। इधर मारकेट है। उधर वो है, इधर ये है। तमाम बातें सुनने के बाद मैंने पूछा शम्मी कपूर प्वाइंट किधर है पता है ? शिकारे वाला निरूत्तर। उसने अचकचाते हुए बताया – वो भी इधर ही किधर आया था। शूटिंग इध्र ही होई थी 'काशमीर की कली' की भी। बोत पुरानी फिल्मों की शूटिंग इध्रे होई थी। 
  
       खैर, हम सभी शिकारे में घूम फिर कर कुछ अपने लिये शूट-शॉट कर वापस हो लिये। श्रीनगर एअरपोर्ट जाने के पहले दिल्ली ढाबा में आलू के पराठे खाये। आनंद लिये। एअरपोर्ट पहुंच कर सुखोई की कर्णभेदी उड़ान का आनंद लिये। एक लंबी दाढ़ी वाले, आँखों में सुरमा लगाये कश्मीरी गार्ड को देख उसकी भाव-भंगिमा को फेसबुक पर अपडेट किये और लद्दाख यात्रा की यादों को जेहन में लिये लौट चले।


- सतीश पंचम


video

सरू नदी का दृश्य

29 comments:

मन्टू कुमार said...

आपके सफ़ेद घर के सहारे धरती का स्वर्ग घूम लिए ...बहुत ही रोचक और इस स्वर्ग की दशा को अंकित करता हुआ,,लाजवाब रचना..|
मेरा ब्लॉग आपके इंतजार में,समय मिलें तो,बस एक झलक-"मन के कोने से..."
आभार..|

अनूप शुक्ल said...

अच्छी रही यात्रा। अच्छे किस्से सुना दिये।

Rahul Singh said...

रोचक सफरनामा.

संजय @ मो सम कौन ? said...

एक दुर्गम लेकिन स्वर्ग जैसी दृश्यावली लिए सामरिक महत्व की जगह है लेह लद्दाख| ये अनुभव जरूर याद रहेगा आपको|

वाणी गीत said...

दुर्गम स्थानों पर रहने और लड़ने वाले सैनिकों की व्यथा इतने करीब से देखने पर और व्यथित कर जाती है .
रोचक यात्रा वृतांत !

प्रवीण पाण्डेय said...

पढ़कर आनन्द आया तो घूमने में बहुत आनन्द आयेगा।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह अच्‍छा घुमाया है. अच्‍छा लगा. इन जगहों की ख़ूबी ही यही है कि‍ यहां सब कुछ आराम से चलता है, समय भी.

देवांशु निगम said...

बहुत बढ़िया यात्रा रही, उतना ही बढ़िया चित्रण!!!! शुक्रिया !!!!

सागर नाहर said...

देखते हैं कब संयोग बनता है जाने का, फिलहाल तो आपकी पोस्ट से ही घूमने का आनन्द मिल गया।
सरू नदी के फोटो नहीं खींचे थे ?

दीपक बाबा said...

जिंदगानी कहाँ और नौजवानी कहाँ ...... कुछ ऐसे ही. फलसफा सुना है..


लेह लद्दाख के नेसर्गिक सौंदर्य, मैगी, तीन मूर्ख व कारगिल की शौर्यगाथा,


सुंदर

सतीश पंचम said...

सागर जी,

सुरू नदी का चित्र तो नहीं लेकिन विडियो जरूर बनाया है, देखता हूं कब तक अपलोड कर पाता हूँ :)

सतीश पंचम said...

लिजिए सागर जी, सरू नदी का विडियो अपलोड कर दिया है। साथ बैठे बंदे ने रिकॉर्ड किया था।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

आनंद आ गया पढ़कर देखकर। आप चाहते तो दो-तीन पोस्ट में विस्तृत वर्णन कर सकते थे।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

शीर्षक..'मैगी वाला स्वर्ग' न होकर 'स्वर्ग में भी मैगी!' सही रहता।

Satish Chandra Satyarthi said...

यात्रा का रोमांच पहुँच रहा है...
सिंधु नदी का तो नाम सुनकर ही अलग सी अनुभूति होती है... देखकर-छूकर कैसा लगा होगा समझ सकता हूँ...

Vivek Rastogi said...

आपके बहाने स्वर्ग घूम लिये, मजा आ गया ।

मैगी से अच्छी अच्छी चीजें हमारे यहाँ उपलब्ध हैं जिसको गरम पानी में डालो और अपने भरपूर स्वाद के साथ तैयार, परंतु हम लोगों को तो मैगी की आदत लग चुकी है ना :(

सतीश पंचम said...

देवेन्द्र जी,

विस्तृत वर्णन के लिये दो-तीन पोस्टें नहीं पूरी किताब लिखी जा सकती है लेकिन फिर वही बात कि बाद में इच्छा रहे न रहे इसलिये लगे हाथ जैसा बन पड़ा लिख दिया एक ही पोस्ट में। वैसे भी आगे जाकर धीरे-धीरे लद्दाख यात्रा से संबंधित कंटेंट फेसबुक, पोस्ट आदि के जरिये बाहर आयेंगे ही :-)

शीर्षक के बारे में आपने अच्छा सुझाव दिया। आप ही का दिया शीर्षक इस पोस्ट को दे रहा हूँ :)

सतीश पंचम said...

विवेक जी,

गरम पानी में तुरंत बनने वाली चीजों के बारे में मुझे विस्तृत जानकारी नहीं है किंतु इतना तो तय है कि लोगों को मैगी काफी पसंद आ रही थी। खुद मैं भी माउन्टेन सिकनेस के दौरान खाली पेट होने से बचने के लिये मैगी ही खाता रहा :)

smt. Ajit Gupta said...

लद्दाख जाने का मन बहुत दिनों से है, देखे कब संयोग बनता है। साथ में मेगी ले जाएंगे हा हा हा हा।अब लौट आएं हैं तो आ जाइए ब्‍लाग पर अपने काम पर।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सही है..कभी-कभी नक्शा बनाते-बनाते जमीन ही गुम हो जाती है।:)

kshama said...

Man prasann ho gaya!

Abhishek Ojha said...

और हम आजतक जाने का सोचते ही रह गए :)

सतीश पंचम said...

अभिसेक बाबू,

लद्दाख के बारे में हम सोचते ही रह गये वाली बात एक हद तक चल सकती है.... लेकिन बियाह का क्या.....उस मामले में इस तरह का इस्टेटमेंट न दे बैठियेगा :)

और हम सोचते ही रह गये......

लगे हाथ बियाह कर लिजिए और 'मधुचंद्र' हेतु लद्दाख की ओर रूख किजिए :-)

Mired Mirage said...

टेप रिकार्डर वाले कैसेट तो मैं आज भी उपयोग करती हूँ. सोचा नहीं की कुछ गलत या पिछडापन है. :)
मैगी भी नहीं बनाती, लम्बा समय लेकर पकने वाली नूडल्स ही बनाती हूँ.लेख बढिया लगा.
घुघूतीबासूती

Kunal Sharma said...

Wow... Padhke Mazaa aa gaya :)

अदा said...

bahut hi badhiyaa...lagta hai jana padega..
agar chale gaye ham to saara shrey aapko jaayega..kyonki prerna yahin se mili hai..
aapka aabhaar.!

GYANDUTT PANDEY said...

वाह! इत्ती दूर घूम आये मैगी खाने के लिये!

विजय कुमार सिंघल 'अंजान' said...

बहुत सुन्दर यात्रा वृत्तान्त है। पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। लद्दाख-कश्मीर जाने की इच्छा बलवती हो उठी।
विजय कुमार सिंघल

P.N. Subramanian said...

अच्छा लगा लेकिन लेह का जिक्र ही नहीं हुआ ?

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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