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Wednesday, July 25, 2012

मनजौकी भौजी और गुछून परसाद

    जैसा कि माना जाता है हर गाँव में कुछ औरतें तुनकमिजाज होती हैं, कुछ मरद 'छुटूआ' होते हैं, कुछ छुटूआ होकर भी रंगीले होते हैं, कुछ ऐसी ही गुण-लच्छनों से सुसज्जित बाशिंदे बमचकपुर गाँव में भी हैं। इनमें से कुछ सदगृहस्थ हैं तो कुछ का जब से विवाह हुआ है तभी से अपनी पत्नी के साथ 'ठकठेवन' चला आ रहा है । कभी-कभी इनकी आपसी बैठकी पेड़ के नीचे तो कभी खेत कियारी में, बाजार, मड़ैया में चलती रहती है। आज शाम गुछून परसाद और मंगर मउरिया की बैठकी चली है, गुछून परसाद,  जिनकी पत्नी विवाहोपरांत कुछ समय बाद ही अपने मायके चली गईं और पिछले तीन साल से ससुराल आने से मना कर रही है. गुछून अपनी मड़ैया में बैठे सरपत और अरहर के सींके निहार रहे थे कि तभी मंगर मउरिया आ पहुँचे, मंगर..... जिनके बारे में विदित है कि वे जब किसी से मिलते हैं तो उसके ही होकर बतियाते हैं, नतीजतन कई लोगों के मन के अंदर घुसकर वे टोह ले लेते हैं। फिलहाल गुछून परसाद के मोबाइल में पूर्वी उत्तर प्रदेश का धोबीयवा गीत चल रहा है....
“हाय रे घूघूटवा वाली
लेत बाड़ू आल्हर परान
हाय रे घूघूटवा वाली
लेत बाड़ू आल्हर परान....”


(हाय रे घूँघट वाली, तुम मेरे प्राण हर ले रही हो.....)



“क्यों गुछून, किसका घूँघट निहार रहे हो सबेरे-सबेरे” ?

“अरे किसका निहारूगां भाई इस उमिर में”

“तब क्या अजोर किये हो” ?

“ये, अरे ये.....ये तो मोबाइलवा में भरा कर लाये हैं रतऊ जी”

“कौन रतऊ जी वो जो आपके ममेरे भाई” ?

“हां वही लाये हैं बाजार से नन्हे की दुकान से गाना भरा कर, मैं तो सुनता नहीं, कभी-कभार सुन लेता हूं तो मनसायन हो जाता है”

“बढ़िया मनसायन करे हो, अ तनि आवाज तेज करो तो”

.....हो रे घूघूटवा वाली,
लेत बाड़ू आल्हर परान...
हो रे घूघूटवा....

“घूघूट से परान हर उठते हैं क्या गुछून” ?

“परान उसी में बसे हैं मंगर भाय”

“अरे तो लेवा क्यों नहीं लाते मनजौकी  भौजी को” ?

“लेवा तो लाऊं लेकिन आये तब न, कई बार सनेसा भेजा, कई बार पंचाइत बोलाया, भाई-भउजाई का किरिया धराया, क्या नहीं किया लेकिन मनजौकीया माने तब न”

“अच्छा एक बात पूछूंगा, सच्च सच्च बताना”

“पूछो”

“मनजौकी भौजी को तुमने मारा था गौने की रात” ?

“अब पुरानी बात क्यों उभार रहे हो मंगर”

“देखो बात न घुमाओ, यहीं तुम भी हो, यहीं मैं भी हूं, छोटे से बड़े हुए हैं हम लोग, बहुत कुछ एक दूसरे के बारे में जानते बूझते हैं, और किसी से न सही, कम से कम संगी-साथी से तो कह सकते हो”

“क्या कहूं” ?

“वही, क्यों मारे थे गौने वाली रात” ?

....

....

“चुप क्यों हो” ?

“मुझसे कही थी कि....”

...

“कुछ बोलोगे भी” ?

“कसम खाओ किसी से नहीं कहोगे”

“यही हाथ में बीड़ी है औ जरत चेनगारी है जो किसी से कहूँ”

“हम से कही थी कि....जो करना हो करके जाओ”

“तब” ?

“तब क्या...गुस्सा नहीं आयेगा” ?

“तब इतनी सी बात पर मार दिये” ?

“तुम इसे इतनी सी बात कहते हो मंगर” ?

“अरे यार रह गये लंठ के लंठ......नई नवेली थी, मुंह से निकर गया होगा”

“अरे तो ये कौन सी बात हुई कि जो करना हो करके जाओ” ?

“अब सुबह से आई थी, भूखी पियासी होगी, थकी मानी होगी, एक तो दूसरा घर तिसपर पराया मरद...तो बोल दी होगी”

“अरे तो ये कौन सी बात है.....कि...” ?

“फिर वही बात...”

“तो क्या उतनी सी बात को दिल से लगा लेगी......कि जब मन आये तब चार मनई के बीच कह देगी कि गौने की रात हमको मारे थे”

“जी में गुस्सा होगा तो कह देती होगी”

“ऐसा तो गुस्सा ही नहीं देखा कि जिनगी भर गौने वाला ठकठेवन ढोती रहे”

“बटलोईया जात.....इसी तरह जिनगी भर ढोती है भाई, हम आप बाहर-बाहर मिलते हैं, बाताचीती मे्ं भुला देंगे कोई बात होगी तो लेकिन उनके तो संसार-ब्यौहार में ससुराल, मायका, ननद, भौजाई का ठकठेवन लगा रहता है। ढोयें न तो क्या करें” ?

“लेकिन एक बात बताओ मंगर” ?

“पूछो”

“वही बात कहनाम है कि जब मैं तैयार हूँ मनजौकी को लिवा लाने के लिये, उसे मान सम्मान देने के लिये हाजिर-नाजिर हूँ तब क्या बात है कि वो आना नहीं चाहती” ?

“कैसे मैं बताऊँ...वो सिर्फ तुम बता सकते हो या मनजौकी भौजी”

“भेंट करवा सकते हो” ?

“मैं” ?

“हां तुम ही...करवा सकते हो मेरी भेंट”

“अरे तो तुम्हारी औरत है, चले जाओ ससुराल, कर लो भेंट, इसमें इतना क्या सोचना”

“यही तो बात है मंगर, मैं खुलकर ससुराल वालों के सामने नहीं जाना चाहता, अकेले में मनजौकीया से मिलना चाहता हूँ”

“ये भी कोई बात हुई, अरे जाओ भाई, इस तरह जिदियाने से काम थोड़ी चलेगा....जैसे सब पर-पंचाइत कर लिये, तो जाओ एक बार वह भी मन मारकर भेंट-गाँठ कर लो, क्या पता इस तरह सामने पाकर मन पिघल जाय”

“उसका मन पिघलेगा भला, मैं जानता हूँ उस भतारकाटी को”

“फिर वही बात ? औरतों वाली गाली मत दो, कितना भी करोध हो, मन सांत करके चले जाओ, मिल आओ”

“तुम चलोगे” ?

“मैं...मैं क्या करूंगा जाकर...अरे ससुराल तुम्हारी, औरत तुम्हारी, मैं क्यों जाऊं तेली का तीसर औ बनिया का नौकर बनकर”

“अरे चले चलना, ससुराल में तुम्हारी अच्छी खातिर करवाऊंगा”

“अरे यार तुम बड़े अजीब मनई लग रहे हो, सीधे-सीधे चुप मारके ससुराल चले नहीं जाते, संग-साथ ढूँढ रहे हो कि चले कोई”

“नहीं मंगर, मन में धुकधुकी लगी है, मन पंछिया रहा है”

“अरे यार बात अइसे कह रहे हो जैसे चोरी से किसी और की औरत से मिलने जा रहे हो”

“तुम नहीं जानोगे मंगर, मुझे मनजौकीया ने भले छोड़ रखा हो लेकिन ससुराल में मेरी अभी भी बहुत इज्जत है, राह-घाट कभी ससुराल पच्छ का कोई मिलता है तो बड़े परेम औ अदब से मिलता है”

“तो कह देते उन लोगों से कि हमारी औरतिया को पहुँचा दो, परेम-अदब तो चलतै रहेगा”

“कहा था, लेकिन ओ लोग भी मन गिराकर कहे कि मनजौकी के मन में कोई फांस अटकी है, बहुत कहा जाता है लेकिन आना नहीं चाहती”

“तो मेरी बात मान ल्यौ गुछून, जाओ मिठाई की झाँपी लेकर, टटकी नील से कुरता धोती रंगा लेना और चमचमाते हुए पहुँच जाओ...देखना अगर मनजौकी भौजी के मन में पिरित होगी तो आँख से लोर गिरा देगी, न हुमस के गले लग जाए तो कहना.....उस बखत तुम मुझे याद करोगे देख लेना”

“धुत्.... जब औरतिया गले लगेगी तब ससुर हम तुमको ईयाद करेंगे....खोपड़ीया खाली है क्या मेरी....” ?

“अरे मैं तो बस एक बात कह रहा था”

“बात कहो या न कहो लेकिन पक्का बताओ, तुम्हारा मन क्या कहता है, मनजौकी मुझे निरास तो नहीं करेगी” ?

“नहीं करेगी भाई, बात मानो, चले जाओ चमरौंधा जूता पहन कर, औ हां, दाढ़ी बनवा लेना न जब अकवार में भरोगे तो दाढ़ी  चुभेगी........”

"तुम बदमासी बोले बिना न मानोगे"

"बदमासी की छोड़ो.....पता जरूर कर लेना कि भौजी के मन में कौन सी फांस है जो यहां आने से रोक रही है......और झांपी भर मिठाई ले जाना मत भूलना "

      और  मंगर मउरिया  बीड़ी फूंकते उठ बैठे.......जबकि गुछून परसाद अपने मुंह पर हाथ फेरते हुए सोच रहे थे  - मोजम्मिल नाऊ 'छूड़ा-कतन्नी' लिये किस ओर भेटाएंगे........  


(जारी......)

- सतीश पंचम

( चित्र : मेरे फोटोग्राफी कलेक्शन से )

9 comments:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

“यही हाथ में बीड़ी है औ जरत चेनगारी है जो किसी से कहूँ”


मस्‍त।।।


पूरी बातचीत इतनी मस्‍त है कि ऐसा लगा कि मेरी गली के ही दो लड़के खड़े बात कर रहे हों...

अरे तुम्‍हे काहे याद करेंगे, खोपड़ी खाली है क्‍या हमारी... हा हा हा हा हा...

बहुत करीब जाकर आ गए आप।


एक बार पढ़ने बाद तेजी से ऊपर से नीचे तक पढ़ता गया... दोबारा पढ़ने में अधिक आनन्‍द आया... :)

anshumala said...

ह्म्म्म ! अब कहानी पूरी हो तो कुछ टिप्पणी की जाये |

प्रवीण पाण्डेय said...

साथ रही तो कदर न जानी,
रूठ गयी तो बेग बुलानी।

Rajesh Kumari said...

प्रवीण जी आपकी बात का समर्थन करती हूँ.

नीरज गोस्वामी said...

सतीश जी ,आपके ब्लॉग पर देरी से आने के लिए पहले तो क्षमा चाहता हूँ. कुछ ऐसी व्यस्तताएं रहीं के मुझे ब्लॉग जगत से दूर रहना पड़ा...अब इस हर्जाने की भरपाई आपकी सभी पुरानी रचनाएँ पढ़ कर करूँगा....कमेन्ट भले सब पर न कर पाऊं लेकिन पढूंगा जरूर

“धुत्.... जब औरतिया गले लगेगी तब ससुर हम तुमको ईयाद करेंगे....खोपड़ीया खाली है क्या मेरी....” ?

ये लेखन है या कमाल है...ऐसी पोस्ट आपके सिवा किसी और के बस में नहीं लिखना...गज़ब किये हैं भाई.
नीरज

Satish Chandra Satyarthi said...

ई सब कहानी बनाए हैं या सच्चो है? ;) मामला रियलिटी सो टाइप चल रहा है..

सतीश पंचम said...

सतीश जी,

कल्पना के घोड़े दौड़ाने की पूरी छूट है ..... ठीक उसी कल्पनात्मक अंदाज में जिस अंदाज में यह बमचक लिखी जा रही है :):):)

गंगेश राव said...

अगले अंक का बेसब्री से इन्तजार है....देखते हैं कि कितना इम्तहान लेते हैं आप?

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मस्त लिखले हौवा गुरू..जय हो।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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