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Sunday, July 22, 2012

चलो ड्राईवर

 साफ़-सुथरी  फिल्म "चलो ड्राईवर" को देखते हुए कई बार महसूस हुआ कि कहीं कोई टेलि-फिल्म तो नहीं दिखाया जा रहा ? और यह अहसास होना लाजिमी भी है क्योंकि सेटअप कुछ-कुछ वैसा ही नजर आया। वही दूरदर्शन वाले दुपहरीया प्रोग्रामों की तरह एक कमरा, दो सहेलियों की बतकही, एक को कुछ अलग करने का सपना। कुल मिलाकर कहानी कुछ यही है कि एक लड़की तान्या (कैनाज़ मोतीवाला) जिसे कुछ अलग करना है अपने जीवन में, वह ड्राईवरों के लिये निकली वेकेंसी देख पहुंच जाती है एक युवा बिजनेस टायकुन अर्जुन कपूर (विक्रांत महाजन) के ऑफिस। वहां भेंट होती है उस युवा बिजनेसमैन के दादा (प्रेम चोपड़ा) से। वहां दादा और पोते के बीच लगी एक शर्त के चलते वह लेडी ड्राईवर रख ली जाती है।


   दादा चाहता है कि पोता अर्जुन अपना नकचढ़ापन थोड़ा कम करे, बार-बार ड्राईवर बदलने की फ़ितरत से बाज आये वहीं पोता चाहता है कि ड्राईवर उसके मन माफिक होना चाहिये वरना बीच रास्ते में उसे उतार कर गाड़ी की चाभी ले लेगा। इन्हीं सारी बातों के बीच कहानी आगे बढ़ती है। शुरू-शुरू में महिला लेडी ड्राईवर को शर्त की आड़ में अर्जुन तान्या को परेशान करना चाहता है ताकि वह खुद ही नौकरी छोड़ दे और यह अपने दादा से लगी शर्त जीत जाय लेकिन रहते-रहते कुछ-कुछ नरम पड़ना शुरू हो जाता है। इसी बीच जो लेडी ड्राईवर बनी है वह अपने मालिक की बात-बात पर शर्त लगाने की फितरत को ताड़ लेती है और उसे उसके ही झांसे में फंसा कर अपने मामा-मामी को कार में घुमाने की शर्त लगवा लेती है। फिर तो वही होना है जो अक्सर ऐसी फिल्मी शर्तों में होता है। अब ड्राईवर के रूप में अर्जुन है और पिछली सीट पर सवारी के रूप में तान्या। कहानी में हल्के फुल्के क्षण तब आने लगते हैं जब लड़की के मामा के रूप में मनोज पाहवा की एंट्री होती है। मनोज अपनी एक्टिंग और चुटीले संवादों से इस फिल्म में कुछ-कुछ हास्य के क्षण बनाने में कामयाब रहे विशेषकर दिल्ली वाली स्टाईल में ड्राईवर पर तंज कसते हुए जब वे कार में बैठे बैठे शेखी बघारते हैं याकि अपनी पत्नी को लेकर छेड़छाड़ या फिकरे जैसा कुछ कसते हैं किंतु अंत आते-आते उन्हें भी झेलना मुश्किल हो गया है।

     फिल्म की स्टारकास्ट के लिये इतना ही कहना ठीक रहेगा कि – चलो ड्राईवर कहानी के लेखक विक्रांत महाजन खुद की लिखी कहानी पर एक्टिंग करने का मोह शायद छोड़ नहीं पाये और फिल्म हल्की पड़ गई। अर्जुन कपूर बनकर फिल्म में एक मुख्य किरदार निभाने वाले विक्रांत महाजन कहीं से भी बिजनेसमेन नजर नहीं आये।  ऐसे में जबकि जरूरत थी कि क्लोज शॉट से बचते हुए किसी और को बिजनेसमैन अर्जुन कपूर के रूप में दिखाये जाने की, विक्रांत महाजन ने खुद को ही कैमरे के आगे रख सारा मामला भंडुल कर दिया। फिल्म का संगीत साधारण है।

     खैर, फिल्म देखने तभी जांय जब लगे कि टेली-फिल्म जैसा कुछ देखने का मन है या दुपहरीया वाले दूरदर्शन सीरियल्स जैसा कुछ साफ-सुथरा देखने की तमन्ना है। हां,  इन दिनों जहां पुराने दिग्गज कलाकार एक-एक कर हमसे बिछड़ रहे हैं ऐसे में प्रेम चोपड़ा का इस तरह स्क्रीन पर दिखना एक सुखद एहसास दे जाता है।

- सतीश पंचम

8 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

ठीक है, इसे भी नहीं देखेंगे :)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

ठीक है, इसे भी नहीं देखेंगे :)

संजय @ मो सम कौन ? said...

'भंडुल'

आज ये सीखा:)

BS Pabla said...

दिलचस्प

प्रवीण पाण्डेय said...

कुछ ऐसा देखने का मन करता है तो डिस्कवरी देख लेते हैं..

अनूप शुक्ल said...

देख त खैर क्या पायेंगे। झुट्ठै कह दें कहो तो कि देखते हैं। :)

Vivek Rastogi said...

हम तो अब डाऊनलोड भी नहीं करेंगे, देखेंगे कैसे :)

Satish Chandra Satyarthi said...

पहली बार सूना इस फिल्म का नाम.. देखता हूँ नेट पर उपलब्ध है या नहीं..

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