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Sunday, July 15, 2012

धुन्ध भरी सुर्खी.....

    इसे मैंने हाल ही में फेसबुक पर शेयर किया था  बुक लवर्स ग्रुप के अंतर्गत जिसमें कि किताबों को पसंद करने वाले लोग जुड़ते हैं। वहां शेयर करने के बाद लगा कि इसे ब्लॉग पर भी होना चाहिये इसलिये यहां भी शेयर कर रहा हूं। वैसे हाल-फिलहाल का देख रहा हूं कि पहले मैं ब्लॉग पर लिखने के बाद ही पोस्टों को फेसबुक पर शेयर करता था लेकिन आजकल उल्टा हो गया है। फेसबुक पर पहले लिख लेता हूं फिर ब्लॉग पर शेयर करता हूं.......लगे हाथ इस बदलाव का भी जायजा ले लूं  :-)

 खैर, आप भी नोश फरमायें उस फेसबुकिया स्टेटस का बजरिये - Book Lovers Group (BLG)

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   आजकल गोविंद मिश्र की कृति धुंध भरी सुर्खी का पठन-पाठन चल रहा है जो कि मूलत गोविंद मिश्र जी के लंदन यात्रा पर लिखा ट्रैवलॉग है। इस ट्रैवलॉग के कुछ हिस्से बेहद दिलचस्प हैं। 1979 के संस्करण में उनके लिखे एक वाकये पर मेरी नजर टंग गई जिसमें उन्होंने ब्रिटेन में हुई एक लेखकों की चिलगोजई गोष्ठी के बारे में लिखा था। उसे पढ़ते हुए लगा कि 1979 से 2012 के बीच के इन 34 वर्षों में भले दुनिया कितनी भी बदल गई हो, ब्लॉग आ गये हों, फेसबुक ट्वीटर आ गये हों, लेकिन लेखकीय चिलगोजइयां अब भी जस की तस चलती हैं। तनिक उनके लिखे उन पन्नों का जायजा लें। गोविंद जी लिखते हैं -


         मुझे देखकर क्लेटन ने “हैलो गबिंद” कहा और मुझे एक लड़की की बगल में बैठने का इशारा किया – शी इज आलसो अ विजिटर। मुझे हलकी सी हैरत हुई जैसे मैं गोष्ठी में शामिल होने नहीं बल्कि कोई तमाशा देखने आया था और दर्शकों के कोने में बैठा दिया गया था। मैं सोचता था कि वह उपस्थित लोगों से मेरा परिचय करायेगी, लेकिन मैं मात्र एक दर्शक था। लड़की और मैं फुसफुसाहट में बात करने लगे कि क्लेटन ने कुछ स्कूल मास्टरनी की तरह हमें चुप रहने का इशारा किया – “वी आर डिस्कसिंग अ वेरी इंपोर्टेंट इशू, यू नो” ?

           मैं दत्तचित्त होकर सुनने लगा। वे एक संग्रह छापने की बातचीत कर रहे थे – कविताएं फलां तारीख तक कमेटी ऑफ एडिटर्स के सामने हों, इस तारीख तक प्रेस में जायें और इस तारीख तक छप जायें – ये सब बातें तो थी हीं, कौन टाइप करेगा, कौन स्टैपल करेगा ये बातें भी हो रही थीं। सारा वातावरण इतना औपचारिक और गंभीर था कि मुझे तकलीफ महसूस होने लगी। मजा यह था कि ज्यादातर निर्णय क्लेटन खुद ले रही थी और बाकी लोगों को तामील के लिये सुना रही थी। फैसले वह नोट भी करती जाती थी क्योंकि कार्यवृत्त के रूप में उन सदस्यों के पास भी भेजना था जो मौजूद नहीं थे।


    इतना समझ में आ रहा था कि वे अपनी ही मेहनत और पैसे से कोई संग्रह निकालने वाले थे। बचत के खयाल से टाइप और स्टैपल करने का काम भी खुद ही करना चाहते थे। एक दूसरी बात जो मैंने और मौकों पर भी गौर की थी वह थी अंग्रेजों की छोटे से छोटे ब्यौरे में जाने की बात। ये लोग एक-एक ब्यौरे को पहले से ही तय कर लेते हैं और इसीलिए चाहे वह प्रशासन में हों चाहे किसी और जगह, जहां भी किसी सिस्टम या प्रक्रिया का बयान मिलेगा तो उसमें छोटे-से-छोटे डिटेल के लिए भी कोई न कोई गाइड-लाइन तय की हुई मिलेगी।


   मैं काफी ऊब रहा था। मेरे पास बैठी हुई लड़की भी बोर हो रही थी। वह बी.ए. की छात्रा थी और साहित्य में शौक की वजह से मेरी ही तरह पहली बार यहां के सर्किल में आयी थी। काफी निराश थी कि यहां आलपिन और स्टेपल की बातें चल रही थीं। हम कागज पर लिख-लिखकर एक दूसरे से बातें कर रहे थे।


    मुझे अपने देश की ब्यूरोक्रेसी याद आयी। मेरे सामने वह देश था, जिसने हमारे ऊपर यह ब्यूरोक्रेसी लादी थी। क्लेटन अपने घर में एक छोटा-मोटा दफ्तर खोले बैठी थी।


  मुझे प्यास महसूस हुई। आदतन उठ कर मैं खुद ही चला जाता और ढूँढकर पानी ले आता, लेकिन अब मैं सजग हो गया था। बगल की महिला से कहा, उसने किसी औऱ से और उसने क्लेटन से कहा। क्लेटन कुछ तंग-सी होती हुई उठी और एक गिलास किचन से पानी लाकर मुझे थमा दिया – और फिर अपने पोज में आ गई।


      तभी हमें एक फार्म भरने को दिया गया, टाइप किया हुआ। उसमें हमें नाम, पता वगैरह भरना था। कोई डेढ़ घंटे बाद साहित्य का नंबर आया। माहौल सारा कुछ वही रहा, सिर्फ क्लेटन ने पहली चर्चा के कागज़ एक तरफ सरका दिये। उसी ने आज की मीटिंग का अध्यक्ष बताया। अध्यक्ष वही सज्जन थे जो मुझे नीचे से लिवा लाये थे – मिस्टर फ्रैंक। अध्यक्ष ने जायजा लिया- “आज पढ़ने की कितनी चीजें हैं। एक लेख और कुछ कवितायें। आज क्या पढ़ा जाय” ? क्लेटन का सुझाव था- लेख। लेख अध्यक्ष का था ‘आयरिश लोक-धुनें’। फ्रैंक पढ़ने लगे। उदाहरण देते समय टेप-रिकार्डर का इस्तेमाल करते थे। इस बीच क्लेटन रजिस्टर में कुछ भरने में लगी हुई थी, शायद हमारे भरे हुए फार्मों को वहां उतार रही थी।


      लेख अच्छा था, यों कि उसको तैयार करने में काफ़ी मेहनत की गई थी। लेकिन बहस में ये बातें ज्यादा हुई कि लेख को इतवार के रेडियो में दिया जा सकता है या अमुक पत्रिका में छपाया जा सकता है। बहस के बीच में ही क्लेटन कागज पर लिखने लगी – कौन चाय लेगा, कौन कॉफी और कौन स्कवाश। वहां अब तक उपस्थित आदमी दस ही थे। लेकिन उसने बाकायदा कागज पर हिसाब लगाकर चाय, कॉफी, स्कवाश- फिर उनके भेद-विभेद, बगैर चीनी की चाय, नींबू की चाय, दूध की चाय, चीनी का स्कवाश – यह सब लिखा और फिर पर्चे को लेकर किचन में चली गई। मैंने दूर से देखा कि वह पर्चे को सामने रखकर सोचती हुई सारी चीजें तैयार करने में लगी हुई थी।


             एक सज्जन ने कविता पढ़ी – “विंड बिफ़ोर द रेन”. वड्सवर्थियन कविता थी। मैंने इस बीच सामने के तीन-चार लोगों से अपना परिचय दे डाला और कहा कि मैं उनके बारे में भी जानना चाहता हूँ। जिस कवि ने कविता पढ़ी थी उसने सुझाया कि इस बारे में मुझे क्लेटन से बात करनी चाहिए।


      मुझे यह साहित्यकारों का गिरोह कम, लड़कों का स्कूल ज्यादा लगा - जो सिर्फ एक ही मुंह से बोलता और सुनता था। क्लेटन स्वंय एक साहित्यकार नहीं, एक पत्रकार थी – किस स्तर की, मुझे पता नहीं लेकिन शायद यहां लेखक उसे कहते हैं जो छपता है और कुछ भी लिखता है। यह भी दिखाई दे गया कि क्लेटन बहुत ही डोमिनेटिंग महिला थी – वह टाइप जो हर व्यक्ति को पहली मुलाकात से ही वैसे ही हांकने लगती है जैसे अपने पति को हांकती है। यह भी समझ आया कि वहां इकट्टे सभी लेखकों और कवियों की महत्वाकांक्षा प्रोफ़ेशन राइटर बनने की थी। प्रोफ़ेशनल राइटर का यहां मतलब है वह लेखक जो धड़ाधड़ पत्रिकाओं में छपता है और लेखों से खूब पैसे कमा सकता है – इसके लिये वह कुछ भी और किसी भी स्तर के लेखन के लिये तैयार होता है. हमारे यहां विशुद्ध और व्यवसायिक लेखन के बीच अब भी एक रेखा है – चाहे कितनी ही बारीक क्यों न हो पर जो अब भी साफ-सुथरी है – यहां वह नदारद है। फ्रैंक की एक-आध चीजें छपी थीं। जिनकी किताबें निकली थीं उनमें सिर्फ एक जॉन थे। उनका उपन्यास हाउस ऑफ हेट हाल ही में छपा है। जब हम चाय पी रहे थे तब मैंने क्लेटन से पूछा कि क्या वह मुझे इन लेखकों और इनके लेखन के बारे में खुद ही या लेखकों के द्वारा अलग-अलग जानकारी दिलायेंगी, तो उसने काफी सूखे ढंग से कहा, “गबिंद, दिस इज नौट अवर कस्टम, वी कॉल द विजिटर बाय फर्स्ट नेम”।


        मुझे हैरत हुई कि एक तरफ तो पहले नाम से पुकारना और दूसरी तरफ ये औपचारिकताएं – क्या खूब गठबंधन है। 10 बजे के करीब मैं उठकर चल दिया। वह सिर्फ क्लेटन का ही तमाशा था। या तो उसने उसे अपना धंधा बना लिया है या फिर यह सब उसकी कोई मनोवैज्ञानिक भूख मिटाता है। लेखक यहां आकर जुड़ गये होंगे, क्योंकि क्लेटन से उन्हें छपने-छपाने में मदद मिलती होगी।


         जाते समय क्लेटन मुझे सीढ़ियों तक छोड़ने आयी। मैने उससे फिर पूछा कि उसके क्लब के जो सदस्य उपस्थित नहीं थे उनके लेखन के बारे में भी अगर मुझे जानकारी मिल सके तो मैं इस सर्किल का परिचय हिंदी लेखन-जगत से भी करना चाहूंगा। क्लेटन ने कहा कि इसके लिये मुझे उन व्यक्तियों से अलग अलग समय लेकर मिलना चाहिए। वह खुद कुछ नहीं कर सकतीं, क्योंकि वह स्वंय एक लेखिका है। इस दिखावे और घमंड पर मुझे हंसी आयी। कोई ताज्जुब नहीं कि साहित्य की इतनी अच्छी परंपरा होते हुए भी अंग्रेजी का सामयिक लेखन आज कहीं नहीं है।


- गोविंद मिश्र

धुंध भरी सुर्खी ( 1979, Travelogue by Govind Mishra)

National Publishing House, New Delhi

4 comments:

अनूप शुक्ल said...

रोचक संस्मरण! सोचते हैं अपन भी निकल लें कहीं लंडन-फ़ंडन और ’गबिंद’ जी की तरह कुछ ट्रवलाग-फ़वलाग लिखें।

मजेदार!

संजय @ मो सम कौन ? said...

ये छपना छपाना,
ये छुपना छुपाना|
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.

प्रवीण पाण्डेय said...

एक संकेत है,
एक संदेश है,
कि हम न उलझ जाये तुम में,
राह का एक किनारा तुम सहेजो,
एक हम सम्हालें।

smt. Ajit Gupta said...

इसे ही कहते हैं बौद्धिकता।

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