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Wednesday, July 11, 2012

आसम वाला शताबुद्दीन....

कल दोपहर में न्यू बॉम्बे इलाके में एक जगह जाना हुआ और मौका ऐसा बन पड़ा कि दुपहर में काफी समय खाली बैठना पड़ा। उसी दौरान पास ही खड़े एक सिक्योरिटी गार्ड से मैंने बातचीत करनी शुरू की और फिर जब बातचीत का सिलसिला चल निकला तो बहुत कुछ जानने मिला। कल फेसबुक पर इस बातचीत को शेयर किया था आज ब्लॉग पर शेयर कर रहा हूं। बातचीत काफी दिलचस्प रही। आप भी नोश फ़रमायें।


"कहां से हो" ?


"आसम से"


"बढ़िया, लेकिन वो तो मुंबई से तो काफी दूर है".


"हां, पांच दिन लगता है जाने में"


"पांच दिन ! तो छुट्टी किस हिसाब से लेते हो" ?


"आने जाने का दस दिन अलग छोड़ के बोलना पड़ता है"


"मिल जाती है इतने दिन की छुट्टी" ?


"अभी मांगा नहीं"

"क्यों" ?


"तीन साल हो गया जबसे लगा तबसे छुट्टी नहीं लिया"


"क्यों" ?


"आइसे ही आभी जाएगा तो आएगा ही नहीं"


"वो क्यों" ?


"बस नहीं आएगा"


"तो क्या करोगे जाकर" ?

"देखेगा कुछ छोटा मोटा अइसा...."
......
....
.....
"तुम्हारा नाम क्या है" ?

"शताबुद्दीन"


"तो इतने दूर आने का कुछ खास कारण" ?


"थोड़ा कमजोरी था...."


"क्या" ?


"कमजोरी था अभी हो गया सब"

"हम्म....तो वापस जाओगे" ?


"हां आभी देखेगा"


"वैसे उस तरफ तो बोडो वगैरह का कुछ लफड़ा भी है ना" ?


"हां मैं तभी उधर ही था..पढ़ाई करता था"


"अच्छा....कौन सी क्लास" में ?


"मेरा इधर मैं मदरसा में था वो मदरसा होता है ना"


"हां हां.....तब" ?

"तभी उधर आर्मी वाला लोग मेरा इधर बोल के गया कि सब लोग छुप जाओ गोली चालने वाला है"

"फिर" ?


"फिर अइसा रात हुआ ना तब सब तेरफ से गोली चालू......हाम सब लोग आइसा जमीन में जागे बना के तीन दिन रेहा"


"तीन दिन ?


"हां उधर ही खाना सब सब"

"तो गोलीबारी कभी खतम हुआ" ?


"वो तो पहिले ही सुबह खातम हो गेया...लेकिन रात भर चला....बोडो वाला आर्मी को अन आर्मी वाला बोडो को....हाम डर के वजा से दो दिन छिपा था......तीसरा दिन आरमी वाला आया और बोला साब ठीक है..मैं तभी से घार छोड़ दिया"


"तो वहीं तो करीब में ही बांग्लादेश भी है"

"हां वो जैसा सामने का बिल्डिंग दिखता है ना उतना ही दूर पे बांग्लादेश है और इधर मेरा घर है"

"तो अभी घर वालों से कॉन्टेक्ट है" ?


"हां है..आभी जाने का है"


"कौन सी गाड़ी जाती है" ?


"नेई मालूम...इधर तिलकनगर सेई छूटता है उतना मालूम"

.....
.....
.....
 ( समय होता तो और बतियाता उस युवा सिक्योरिटी गार्ड से लेकिन कुछ ताजा-ताजा हुई पहचान और कुछ मेरे संकोच ने और कुछ पूछने से इन्कार कर दिया, फिर भी अच्छा लगा शताबुद्दीन से बात करना)
- सतीश पंचम

10 comments:

Vivek Rastogi said...

वाकई वापिस अपने घर जाना बहुत मुश्किल होता है, और जाना होता है तो आने का मन ही नहीं करता ।

अरुण चन्द्र रॉय said...

हजारो जिंदगियां ऐसी ही हैं... मुझे लगा मैं अपने कूड़े वाले से बात कर रहा हूं... वहीँ बंगलादेश बार्डर का है वो भी...

मुनीश ( munish ) said...

हिन्दी की विभिन्न बोलियों से आपका लगाव है जो अच्छा लगता है मुझे भी । इसे पर्दे पे लाइए साब ।

अनूप शुक्ल said...

जिंदगी कि कितने-कितने रंग होते हैं! :)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

दुनि‍या रंग रंगीली बाबा

प्रवीण पाण्डेय said...

जहाँ आते हैं, वहीं के होकर रह जाते हैं..

अजय कुमार झा said...

आपने पोस्ट लिखी ,हमने पढी , हमें पसंद आई , हमने उसे सहेज़ कर कुछ और मित्र पाठकों के लिए बुलेटिन के एक पन्ने पर पिरो दिया । आप भी आइए और मिलिए कुछ और पोस्टों से , इस टिप्पणी को क्लिक करके आप वहां पहुंच सकते हैं

संजय @ मो सम कौन ? said...

जा यार, अपने घर वापिस जा.

Abhishek Ojha said...

3 saal ! baaki par kuchh nahin.

smt. Ajit Gupta said...

समाज और परिवार से दूर रहकर कभी ये शोषित होते हैं और कभी अपराध की दुनिया में शरण लेते हैं।

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