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Sunday, July 1, 2012

बसावन की जेसीबी और बिजेन्नर मास्टर की कसक....(बमचक-9)

    इस बार की बमचक पोस्ट में गाँव में जेसीबी मशीन के आने की धमक है, एक तरह की 'सुलग' है तो किसी के जमीन की मालियत चकबंदी अधिकारी द्वारा कम लगाये जाने पर मची रार है जिसे सुलझाने के लिये लिखा गया एक दिलचस्प 'दरखास' ( सरकारी आवेदन पत्र) है ......बमचक सीरीज़ की कुछ पोस्टें पहले ही पब्लिश हो चुकी हैं...जिन्हें बमचक लेबल के साथ यहां पढ़ा जा सकता है,
     Disclaimer : बमचक - 9 की इस कड़ी में कुछ शब्द आम बोलचाल के हैं, जिनमें कहीं-कहीं असंस्कृत, अशालीनता एंवम्  भदेसपन की झलक है। अत: यह पाठकों के विवेक पर निर्भर है कि वे इस कड़ी को पढ़ें या नहीं

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       कभी-कभी गाँवों में सुबह की बैठकी चलती है। लोग गाँव के किसी ऐसे शख्स के यहां आ आकर बैठते हैं जिसका घर राह में पड़ता हो और जो सामाजिक रूप से कुछ रूतबा भी रखता हो। घर के राह में पड़ने का जियोग्राफिकल एंगल कुछ यूं है कि अक्सर लोग सुबह सवेरे इसी रास्ते काम के लिये निकलते हैं। किसी को कचहरी जाना है, किसी को स्कूल तो किसी को खाद भण्डार। कोई रिश्तेदार के यहां रिश्तेदारी निभाने जा रहा है तो कोई न्यौता हंकारी के लिये कुछ इंतजाम करने जा रहा है। ऐसे में राह में पड़ने वाला प्रतिष्ठित घर एक जरूरी पड़ाव के तौर पर इस्तेमाल होता है। जरूरी पड़ाव इसलिये कि कहीं कोई राय बात लेनी हो तो प्रतिष्ठित घर के सदस्यों से राय बात ली जा सकती है, कहीं कुछ कम बेसी हो तो ठीकठाक कराया जा सकता है। और फिर बमचकपुर में परधान के घर के अलावा और कौन सा घर होगा जो ऐसी हैसियत रख सके। और फिर उनके घर में पढ़े लिखे बीजेन्नर मास्टर जी हैं। उनके पिता परधान जी के नाते कुछ और लोग भी आ जुटते हैं।

    आज ऐसी ही एक बैठकी में बलीमुख जी आये हैं। बलीमुख जिनके नाम का शाब्दिक अर्थ है कि बन्दर की शक्ल वाला, लेकिन आज तक बलीमुख जी ने इस शब्द का अर्थ अपने हिसाब से लगाया है। बलीमुख यानि बजरंगबली के मुख वाला। उसी नाम का असर है कि इनके द्वार पर एक छोटा सा बजरंगबली का मन्दिर है। बलीमुख जी जब तक गाँव में रहते हैं रोज नहा धोकर बजरंगबली जी को जल चढ़ाते हैं। मंगलवार के दिन बाकायदा लड्डू भी चढ़ाते हैं। लेकिन ऐसे मंगलवार वर्ष में केवल दो तीन ही आ पाते हैं और बाकी के मंगलवार बजरंगबली जी इस इंतजार में बिता देते हैं कि बलीमुख जी को दिल्ली में कब छुट्टी मिलती है। काहे से कि वे वहां किसी अधिकारी की गाड़ी चलाते हैं। साल में दस पन्द्रह दिन की छुट्टी बहुत रोये गाये मिलती है। बलीमुख जी मनाते रहते है बजरंगबली जी से कि उनके अधिकारी को कुछ अक्ल दें, कुछ दया माया भरें और उनकी छुट्टी महीने भर खींच दें लेकिन बजरंगबली जी ठहरे स्वामीभक्ति के प्रतीक। जब वे अपने लिये रामजी से छुट्टी न मांग सके तो भला तो अपने भक्त को क्यों कर विपथगामी बनायें। सो ऐसे ही रस्साकशी चलती रहती है। बलीमुख जी छुट्टी मांगते रहते हैं, अधिकारी रखड़ा रखड़ा कर देते रहता है और बजरंगबली जी उसी गोल्डन पिरियड में बलीमुख जी के छोटे से मन्दिर में कुछ दिनों के लिये प्राण प्रतिष्ठित हो उठते हैं।

      अबकी बार बलीमुख जी को अपने गाँव की जमीन और उसकी चकबंदी प्रक्रिया से थोड़ा टेढ़े गुजरना पड़ा। उनकी किसी उपजाऊ जमीन की मालियत सर्वे के दौरान कम लगाई गई और नतीजतन जमीन की पैमाइस में कमी-बेसी हो गई। उसी के सिलसिले में गाँव के परधान जी के यहां बलीमुख जी पहुंचे हैं। परधान जी तो नहीं मिले, किसी के पंचैती के सिलसिले में गये थे लेकिन बिजेन्नर मास्टर जरूर मिल गये। हीरालाल यादव भी वहीं बइठे मिले। राम-रहारी के बाद बिजेन्नर मास्टर ने हालचाल पूछा और फिर आवश्यक लिखा-पढ़ी शुरू हुई। लड़के से कागज कलम अंदर से मंगाया गया। लिख उख कर बिजेन्नर जी अपनी उसी चिर-परिचित शैली में बलीमुख जी से रूबरू हुए -

    “हां त मर्दे बलीमुख, ये आबेदन पत्र लिख दिया हूँ, पढ़ कर सुना भी देता हूँ, धियान से सुनो, फेर से न बोलूंगा... इसमें लिखा है कि –

महोदय,

हमारा धनहा खेत का लेखपाल जी गलत पैमाइस किये हैं, उसकी मालियत तीस पैसे लगाये हैं ओ भी जानबूझकर ताकि हमारे परोस में रहने वाले अंगनु पुत्र चेपरूराम ग्राम बमचकपुरा, मौजा – टेढ़ूआना को दे दिया जाय। आपको जानकारी में हो कि मैं गाँव में ज्यादा रहता ओहता नहीं, हमारे बच्चों को मालियत, पैमाइस आदि के बारे में जेयादा जानकारी नहीं है, औरतीया भी पढ़ी लिखी नहीं है। इसी बात का फायदा उठाकर लेखपाल श्री नन्हूं मियां ने अंगनु के इसारे पर हमारे खेत की मालियत कम दिखाई है। इसलिये आपसे निवेदन है कि हमारा खेत की पैमाइस फिर से कराई जाय, मालियत तनिक गत के लगाई जाय।


एक विसेस निवेदन है कि शीघ्रता करें क्योंकि हमारा दस तारीख तो डिल्ली का टिकट है। मैं आप ही के बिभाग अधिकारी श्री भगौती प्रसाद जी के यहां डराईबर हूँ । बहुत मोसकिल से किसी तरह छुट्टी मिल पाया इस काम के लिये। अत निवेदन है कि जल्द से जल्द लेखपाल श्री नन्हूं मियां को आवशुक सुधार हेतु कहा जाय।




बलीमुख कनौजिया पुत्र खोखी कनौजिया
ग्राम - बमचकपुर
मौजा – इंगुरी
ब्लॉक - अझोरहा
इलाहाबाद

“सही है न” ?

“अरे आप लिखे हैं तो सहीये होगा, बकि अधिकारी जी आदेस जारी करें तब न” ?

“अरे आदेस काहे नहीं करेंगे, लंड़ऊ समझे हो क्या ? देख लेना सबसे पहले तुम्हारे खेत की मालियत सुधारी जायेगी। और तुम्हारे वो अधिकारी भगौती परसाद को कम समझे हो क्या” ?

“मानें” ?

“माने ये कि अधिकारी बर्ग हमारी-तुम्हारी बात एक बार सुनें या न सुनें लेकिन ऊ लोग का आपस में बहुत छनता है। एक को दूसरे से कब काम पड़ जाय कोई नहीं जानता। अरे हम तुम तो बहुत होगा तो हल-फाल, भईंस-गोबर इसी को लेकर टिन्न पिन्न किये रहेंगे और जरूरत होगा तो सील-लोढ़ा की नाईं ले-देकर एक दूसरे से काम चला लेंगे लेकिन अधिकारी बर्ग का बात सील-लोढ़ा से थोड़ों न चलेगा। उनका महकमा फइला रहता है। आज इहां हैं तो कल उहां। का पता कल को यह अधिकारी वहां आ जाय और वह अधिकारी इहां आ जाय। तब आपस में समझ बूझ के न रहना पड़ता है” – बिजेन्नर मास्टर ने अपना ज्ञान का पसेरी लुढ़काते हुए कहा।

“बात तो आपक ठीकै है, लेकिन ई न हो कि हम उहां डिल्ली जांय और अंगनु पइसा ओइसा खिलाय के मालियत अपने मन का रखा लें”

“अरे बकचोदई न सोचो, अइसे-कइसे मालियत गड़बड़ लगायेंगे, हम लोग हैं न। जाओ ठाठ से डिल्ली और जाते-जाते कचहरी में बिंदेश्वरी जी होंगे ओकील, उनसे मिल लेना काम में कहीं अड़चन आये तो हमारा परिचय बता देना”

“तो अभी इस दरखास के बाद क्या ओकील से भी मिलना पड़ेगा” ?

“मिल लेना, और अइसा थोड़े है कि तुम लिख कर दे दिये और अधिकारी महोदय तुरंत पढ़ते साथ कुरसी छोड़ कर खड़े हो जायेंगे और कहेंगे आओ भाई बलीमुख, पहले हम आपका ही काम कर दें। अरे कागज-ओगज का काम है, टाइम लगता है”

“हम ओ नहीं कह रहे, माने हमारा कहनाम है कि ओकील का कौन काम, दरखास तो हम चकबंदी अधिकारी को न दे रहे हैं”

“अरे यार फिर वही बकचोदई वाली बात कर रहे हो...अरे जब तुम्हारी दरखास बनेगी तो उस दरखास के साथ पूछा जायगा कि जमीन तुम्हरी है इसका क्या साबूत है, तब ओकील बिंदेस्वरी जी नोटहा ‘कसम कागज’ पर लिख कर देंगे नहीं तो कचहरी में कहां से कसम खाने के लिये गंगाजली पाओगे....सो अइसे ही कागज पर कसम धराया जायगा कि तुम ही हो बलीमुख कनौजिया बल्द खोखी कनौजिया हो और तुम्हारी ही है जमीन”

“लेकिन हम कसम काहें खायेंगे, हमार पुरखा पोरनीया की जमीन, उहो बदे कसम खाय के कहना पड़े त एतना कागज पत्तर, खसरा खतौनी का कौन फायदा” ?

“अब ई सब सरकारी काम है, जेयादे घिचिर-पिचर करोगे तो लांड़ चाट के काना हो जाओगे ये जान ल्यौ.....”

“अरे यार डिल्ली में रहते हो, डराईबरी करते हो एतना त मलुमै होगा कि मर मुकदमा, कोरट-कचहरी का क्या हाल रहता है, एकदम से असूझ अस बतिया रहे हो मालूम पड़ता है पहिली बार ओथुआ में आये हो.....ऊ का नांव से….” – इतनी देर बाद हीरालाल यादव ने दोनों की बातचीत में हिस्सा लिया।

“अरे उ तो हमहूं जानते हैं भईया बकि गांव देस का मामिला तनिक अलगै न होता है”।

“कोच्छ नहीं, चुप मार के जाओ, औ जहां घटेगा-बढ़ेगा परधान जी, बिजेन्नर माहटर, सब लोग तो हैं न” – हीरालाल ने बलीमुख जी को इत्मिनान धराया।

अभी उन लोगों की बातचीत चल ही रही थी कि दूर से ही पीले रंग की जेसीबी आती दिखी। कुछ कुत्ते जेसीबी मशीन देख भूंकने लगे। बहुत संभव है कभी उन कुत्तों के पूर्वजों ने साईकिल देखकर भी ठीक ऐसी ही भूंकैती फानी हो जैसी कि उनके वंशज अब जेसीबी देखकर फाने हुए हैं।

“ई हथीनी जइसन मसीनिया छिनार अउरौ हड़हड़ करके कान खाय जाती है” – हीरालाल यादव ने कान खुजलाते कहा।

“किसके यहां जाय रही है” ? – बलीमुख ने जिज्ञासा जाहिर की।

“अलोपी के यहां, बंगला काट कोठी बनवा रहे हैं सरऊ” – बिजेन्नर मास्टर ने पिच्च से थूकते हुए कहा।

“गाँव में बंगला काट कोठी बनाकर क्या करेंगे, इहां कउन आ रहा है देखने उनका बंगला बंगूली” – हीरालाल ने बिजेन्नर मास्टर की ओर से अगाही मारनी चाही।

“अरे जानते नहीं, जिसके ढेर पइसा हो जाता है, अइसे ही निसरता है”

“हां, ऊ जियाउद्दीनवा को नहीं देखे एक्कै साल सउदिया गया था पइसा झोर के रख दिया” – हीरालाल ने जानकारी में विस्तार दिया।

“सउदिया नहीं आर, बोरनियो गया था, तुम्हारे लिये जो जाता है सब सउदियै जाता है” – बिजेन्नर मास्टर ने फिर से पिच्च से थूकते हुए कहा।

“अए जब जिनगी भर गांव में ही रहना है तो हमारे लिये तो जइसे बम्मई ओइसे कलकत्ता बोरनियो जांय चाहे सऊदिया, गये तो गाँव से बाहर ही” – हीरालाल खीं खी कर हंस दिये।

“अरे तो सही सही बोलोगे कि उसी में जोते रहोगे, हर बरधा है” – बिजेन्नर मास्टर की इस बात पर बलीमुख भी हंसे बिना न रह सके जोकि अब तक अपनी चकबंदी प्रक्रिया में खोये थे।

“अरे ये तो सुगरीव चला रहा है जेसीबीया को, एकवा डराईबर कहां गया” ? – हीरालाल ने कहा

“गया होगा कहीं....न छोड़छाड़ के भाग गया होगा कहीं और” – बिजेन्नर मास्टर तकिये पर ओठंगते हुए बोले।

इसी दौरान जेसीबी नजदीक आ पहुंची

“कहां जा रहे हैं खरबोटना लेकर” ? – हीरालाल ने उंची आवाज में पूछा।

नन्हूं मियां के इहां, घर बनवा रहे हैं – कहने के साथ डराईबर ने जेसीबी रोककर बंद कर दिया। हड़-हड़ हड़-हड़ की आवाज अचानक बंद हो गई। कुत्ते जो भूंक रहे थे अब भी भूंके जा रहे थे और होते-होते अंत में उनका भूंकना सम पर आ गया। शायद समझ गये हों कि ज्यादा भौंकने पर मिलने वाला तो कुछ है नहीं, फिर क्यों बेकार में भूंकना।

“अरे त दूसरका डराईबर नहीं आया” ? – बलीमुख जी ने अपनी चिंता को डराईवर की चिंता से काटना चाहा।

“उसके आँख में बिलनी हो गई है, कह रहा था झराने जाना है” – सुगरीव ने स्टेयरिंग पर निहुरे-निहुरे ही कहा।

“अच्छा-अच्छा...त कितने का तय हुआ है जेसीबीया का ‘कंटराज’ ” ? बिजेन्नर मास्टर ने हिसाब किताब जानना चाहा। वैसे भी इस तरह का सवाल वहां मौजूद लोगों में से बिजेन्नर मास्टर ही पूछ सकते थे, और लोग जेसीबी का टायर निहार लें वही बहुत है।

“आठ सौ रूपिया घंटा”

“हुँ....... आठ सौ रूपिया घंटा पर अलोपी तैयार हुए” ?

“अरे तैयार नहीं होंगे ? अभी मनई मजूर गाँव में कहां मिल रहे हैं, सब बम्मई, डिल्ली निकल गये हैं खाने कमाने, जो हैं वो नरेगा में लग गये हैं, मनई मजूर मिले तब तो

अरे तो नेंई खोदाई में केतना मजूर लगेंगे, जो लगेंगे आठ दस, ससता ही पड़ेगा कि

अरे नहीं, अब ऊ जमाना नहीं है, मजूर लेते हैं कम से कम दू सौ रूपया रोज और खोराकी अलग से, औ दिन भर उसी में रेंगे-रेंगे करते हुए नेंई खोदने में ही दस दिन लगा देंगे। खोराकी में भोजन-पानी की तैयारी में घर क लईका बच्चा, मेहरारू सब सती होंगी सो अलग। एतना झंझट लेने से अच्छा है जेसीबी लगाय के खोदाय दो नेंईं जो काम दस दिन में होगा, आधे दिन में खोद-खाद के निपटा दो, न मनई मजूर हेरने का झंझट न उनके भोजन पानी का परबन्ध”

“हां, कह तो ठीक रहे हो लेकिन फिर भी आठ सौ रूपिया घंटा जियादा लगता है”

“अरे तो जेसीबीया तेल भी तो उतना पीती है बाबू साहेब, फिर दो लोग चाहिये अंगुरी दिखाने के लिये, इहां खोदो....इहां मत खोदो.... एक टेम-परवायरी डराईबर, कुल जोड़ जाड़ लो तो मजे क खरचा पड़ जाता है..... फिर जिसका जेसीबी है उसको रोज का साढ़े तीन हज्जार रूपिया देना ही है देना है चाहे छिनार जेसीबी खड़ीयै क्यों न रहे”

“अरे त हां लोहे का हाथी लेकर चलने पर लम्मा तम्मा टिकटिम्मौ त रहेगा ही”

“तब क्या...ओही सब में न खरचा लगता है कि अइसे ही झूरे थोड़ी मांग रहे हैं आठ सौ रूपिया घंटा”

“तो जेसीबी बसौना की ही है न” ?

“अरे अब ऊ बसौना.... बसौना नहीं रह गया.....अब बसावन सेठ बन गये हैं, गुड़गाँव में रहते है, अब बड़वार मनई हो गये हैं। अइसन आठ गो जेसीबी है उनके पास, रोज का साढ़े तीन हजार जोड़ ल्यौ तो केतना हुआ, आठ तियाईं चऊबीस औ चार ऊ जोड़ि ल्यौ....अट्ठाईस हजार रोज का उसको निराल किराया मिल रहा है, तबले दू जेसीबी अऊर खरीदने जा रहे हैं”।

“पइसा वाली पारटी है भाई .....”

“अरे नहीं, अब आप से क्या छुपा है, देखे तो रहे कि पहिले सब बसवना, बसवना कह कर दुरदुराये रहते थे, हम लोग के जइसे खेतिहर रहे....बाप मरा तो पट्टीदार लोग जर जमीन हथियाने के चक्कर में पड़े.....मार झगरा हुआ औ सरीकत से अपना हिस्सा पट्टीदारन को सस्ते में बेचकर गुड़गाँव चला गया। जो रूपिया कउड़ी मिला उसमें कुछ काम धंधा करना चाहा तो समझै न आवै कौन काम करे। तबले मायावतीया नहीं वो फानी थी आगरा में कोइरीडोर, बस उसी में उसका दिमाग खुला औ एक अधिकारी से जाकर मिला। कहा हमको कुछ काम दे दो। अधिकारी सब मालूमात हासिल किया कि कउन है कहां का रहने वाला है, केतना पइसा कउड़ी है इसके पास। जइसे ही पता लगा कि पट्ठे के बास पुसतइनी जमीन बेचने का पइसा है, तुरंत सलाह दिया कि जेसीबी निकारो। कोइरीडोर बन रहा है, तुमहारी जेसीबी के लिये तुरंत परमिसन मिल जायेगी, ठाठ से जाकर कमाओ खाओ। बस, कुछ लोन से कुछ ओन से जेसीबी निकार दिया। फिर तो बसवना वो बसवना नहीं रहे, बसवना कल्ले से बसावन सेठ हो गये। आज देखो तो जो पट्टीदार लोग उसका जमीन सस्ते में लिये थे अबहूं ओही खेत में रिहनी क सिहनी हो जा रहे हैं लेकिन उखाड़ नहीं पा रहे औ ई पट्ठा गुड़गाँव में खाली बइठे बइठे चानी काट रहा है”।

“अरे हां, त लछमी जिसके आनी रहती है अइसे ही आती है” – बिजेन्नर मास्टर को पहली बार अपनी सरकारी नौकरी में हीनता नजर आई। कहां तो पूरे महीने में बीस-बाईस हजार मिलता है और उसमें भी फन्न ओन्न काट उठता है, इधर कल का बसौना रोज अट्ठाईस हजार कमा रहा है। इस सोच-विचार के बीच कब जेसीबी स्टार्ट होकर चल पड़ी उन्हें पता ही न चला। बलीमुख और हीरालाल भी उठने की तैयारी में थे तबतक अंदर से नारीकंठ से आवाज आई – “आज इसकूल नहीं जाना है क्या कि वहीं बइठ कर कमाने का मन है”।

   बिजेन्नर मास्टर ने फिर से पिच्च से थूका और छत की ओर निहारते हुए बोले – “आता हूं अभी, काहे एतना जलदी मचाई हो...नासतवै न करना है”।

एक बार फिर राम-रहारी हुई, हीरालाल और बलीमुख उठकर चल पड़े अपने-अपने घर की ओर, हीरालाल मन ही मन सोच रहे थे – एक मैं हूं कल रात का बसिऔरा खाकर चला हूँ, और इहां नासता बन रहा है, गरम-गरम। नौकरी-पानी हो तो अइसी ही ठाठ वाली।

उधर बिजेन्नर मास्टर के सामने थाली आ गई थी – रोटीयां तो ताजी ही बनी थीं लेकिन तरकारी रात वाली आलू-पड़वल की ही थी रसेदार। एक कटोरी में चीनी पड़ी ललछहूँ दही आ गई। एक लोटा पानी। बिजेन्नर मास्टर ने भोजन देखते ही पूछ लिया – “अरे तो कल जो नेनुआं लाया था वो नहीं बना क्या” ?

“दूसरी तरकारी नेनूआँ बना दूं औ रात वाली तरकारी फेंक दूं घूरे में……”

“अरे तो काहे बिगड़ रही हो मैं तो बस पूछ रहा हूं ....यही बात कायदे से नहीं कह सकती थीं......” ?


- सतीश पंचम

(जारी....)

( चित्र :  मई-2012 में जौनपुर में 'हिंचा' था)

बमचक की पोस्टें - कड़ी दर कड़ी -  1   2    3   4    5   6   7    8    9

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

एकदम नये मैदानों की सैर..बमचक विचारों की..

अनूप शुक्ल said...

चकाचक जेसीबी कथा। न हो तो एक ठो निकाल लेव लोन-ऊन लेकर और चलाओ गांव में जाकर! ठाठ से कमाई होय। कायदे से मचे बमचक!

P.N. Subramanian said...

पिछड़े इलाकों के ग्राम्य जीवन का दुख़द परन्तु वास्तविक पहलू

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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