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Tuesday, June 26, 2012

अग्निबाज क्लासेस

     जैसे ही  खबर आई कि दिल्ली के किसी सरकारी आफिस में आग लगी है, सारे के सारे न्यूज चैनल अपनी ओवी वैन को लेकर चल पड़े मंत्रालय की ओर, पता चला कि हल्की फुल्की आग है, संभाल लिया गया। सुनते ही कुछ के चेहरे मुरझा गये। मन ही मन एकाध तो गरिया भी रहे थे - हुंह ये भी कोई आग है, एक बित्ते भर की जगह पर सुलग कर रह गई। लेकिन आगजनी की इन बढ़ती घटनाओं से इतना जरूर पता चल रहा है कि कई लोग मना रहे होंगे कि “हे अग्निदेवता, जैसे सबका भला किये वैसे हमरा भी भला करो एकाध चैंबर वैंबर और जला दो, हाथी दफ़्तर..... खजूर दफ़्तर  ...समझ रहे हो न....”

      उधर इन अग्निकांडों से सरकारी सांडों में अजब सी खुशी देखी गई। जो पक्ष में हैं वे भी खुश जो विपक्ष में हैं वे भी खुश। इस धींगामुश्ती में उद्देश्य यही है कि जनता तक संदेश पहुंचे और उसी रूप में पहुंचे जिस रूप में पहुंचाना चाहते हैं। विपक्षी कह सकते हैं कि सरकार ने अपनी नाकामी छुपाने के लिये मंत्रालय को दिन-दहाड़े लाक्षागृह की तरह जलवा दिया। खड़े-खड़े फूंकवा दिया। उधर सरकार कह सकती है कि हम तो जांच के अंतिम दौर में थे लेकिन आग लग गई। अब फिर से जांच बैठानी पड़ेगी लेकिन अभी तो मंत्रियों के बैठने तक के लिये कुर्सी टेबल नहीं है, जांच तो दूर की बात है। सहयोगी दलों या आपस में न बन पा रहे नेताओं की जूतमपैजार भी जमकर होगी। जिस किसी को इस अग्निकांड से सबसे ज्यादा लाभ होता दिखेगा वह माईंडगेम खेलते हुए और जोर से चिल्लाकर कहेगा – “मेरा दफ्तर ही सबसे बुरी तरह क्यों जला ? जबकि वहीं बगल में फलाने ढेकाने जी का ठीक से क्यों नहीं जल पाया, यह घोर अलोकतांत्रिक है, इस पर कड़ी जांच होनी चाहिये”।

   उधर सुनने में आया है कि यह आग वाला फंडा पाकिस्तान में भी आजमाने की कोशिशें हो रही हैं। कई विशेषज्ञ पासपोर्ट वीजा की लाईन में लग लिये हैं। अपने अपने आकाओं की ओर से डांट भी सुन चुके हैं कि इतना बेहतरीन आईडिया दिया क्यों नहीं अब तक। किस बात के पैसे लेते हो। जाओ भारत जाकर आओ और देखो आग कैसे लगानी चाहिये, खामखां तुम लोगों की काहिली के चलते अपने पीएम बदलने पड़े। पहले बताये होते तो हम भी कुछ जुगाड़ करते। उधर अंदरखाने में बातें जो निकलकर आ रही हैं वे कहती हैं कि आगजनी की घटना जानबूझकर पाकिस्तान को चिढ़ाने के लिये की गई ताकि उसे नीचा दिखाया जा सके। पूरा इंतजार किया गया कि जरदारी हटें और फिर ......।

  इधर ट्रैक-टू डिप्लोमेसी वाले गवैये-बजनिये भी हैरान हैं कि भारतीय पक्ष ने आईडिया शेयर करने में कंजूसी दिखाई जबकि द्विपक्षीय समझौतों में ये बात खुलकर कही गई थी कि एक दूसरे की स्टेबिलिटी और सुविधा का खयाल रखा जायगा ताकि अमन कायम रहे। लेकिन भारत ने अपनी ओर से समझौते के अनुसार कुछ भी शेयर नहीं किया और स्थिर पाकिस्तान अस्थिर हो उठा। प्रधानमंत्री बदल उठे। पॉलिटीकल फ्रंट पर यह अच्छा संदेश नहीं है। कुछ ट्रैक-टू डिप्लोमेसी वाले दबे छुपे कह बैठे कि जैसे क्रिकेट में खेलभावना जैसा कुछ होता है वैसा पॉलिटीकल फ्रण्ट पर भी कुछ होना चाहिये।

 उधर सचिव स्तर के अधिकारी आपस में बातें करते पाये गये कि वर्मा की कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट जिसमें उसके कदाचार का वर्णन था औऱ उसके खिलाफ जा सकती थी ... वह भी स्वाहा हो गई है। यादौ जी को कल कचौड़ी गली में ढेर सारी खरीददारी करते देखे गये तो एक बंदा लपट लिया।

“और यादौ जी, फाइल जलने की खुशी मना रहे हैं”

“अरे नहीं, हम तो तनिक...”

“मनाइये मनाइये, लेकिन आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि आपकी वो पम्पापुर वाली फाइल जली नहीं है, अब भी स्टोर रूम में छंटाई, बटोराई का काम चल रहा है। वहीं लाल रंग वाली आपकी फाइल अधखुली पड़ी थी”

“अरे तो...”

“अरे तो अरे तो मत करिये....अभी भी समय है.....एक झटके में वहां से फाइल खसकवाई जा सकती है, बस तनिक प्रेम ब्यौहार बनाइये तो...”

“अरे तो आप लोग अपने आदमी हैं...आप से क्या छुपाना...काम हो जाने दिजिए.....हम कहां भागे जा रहे हैं”

“भागने की बारी आपकी है यादौ जी, बोलिये डील करेंगे या स्वर्णिम मौके का लाभ न ले पाने वाले वंचितो में नाम लिखवाकर अमर होना चाहेंगे”

“कितने” ?

“यही कोई पांच पेटी। ज्यादा नहीं है, इतना तो आप एक्कै महीना में झोर कर रख लेंगे”

“लेकिन”

“लेकिन वेकिन कुछ नहीं, आपकी लाल फाइल जल उठी समझिये। नोट गिनिये तो आगे बात चलाऊं”।

“लेकिन ....”

“अरे अब भी लेकिन....एक आप ही नहीं हैं और लोग का भी फाइल सूखाया जा रहा है खुले में.....ज्यादे लेकिन करना हो तो हम चले आप लेकिन लेकिन करते रहिये....”

“ठीक है हम दे रहे हैं लेकिन हमारी फाइल लाल नहीं थी, वो तो नीली वाली थी, आप लोग कोई गलती तो नहीं कर रहे” ?

“यादौ जी, आपको क्या हम बेवकूफ लग रहे हैं। लाल फाइल नीली फाइल छोड़िये....अभी और जगह भी जाना है..ई फोन किसका आ गया ओह.......हां सर, जी सर....जी वो अपना ही आदमी है....लगाने दिजिए .....बहुत अच्छे से आग लगाता है.....हां हां पूरा बिसवास है....टरेनिंग हम ही दिया हूं उसको.....जी जी”

“तो आप लोग आग लगाने की ट्रेनिंग भी देते हैं क्य़ा” ?

“क्लासेस चलती है महराज क्लासेस। और फिर हम तो शिक्षाव्यवस्था में अगाध आस्था रखते हुए अपने चेलों को वेल ट्रेन्ड करते हैं, इतना कि एक दिन हमारे आफिस को ही उन चेलों ने आग लगा दी और कहने लगे कि सबने समय पर फीस दी थी। रिकार्ड ऑफिस जला उसमें हमारा क्या दोष। तो हमने उसी दिन जान लिया कि हमारी ट्रेनिंग परफेक्ट रही। अब ये चेले जिस भी प्रदेश में जाएंगे, आराम से कमा खा लेंगे। क्योंकि न घोटाले थमेंगे न उनकी जाचें रूकने वाली है, यह देश ऐसे ही चलता रहा है चलता रहेगा। इसे ज्यादा तेज चलाने की कोशिश करोगे तो सिंगुर की तरह औंधे मुंह गिर जायेगा और धीरे चलाने लगोगे तो नक्सली हिंसा में अपने विधायकों तक को बंधक बनवाना पड़ेगा। लेकिन यह मैं आपको क्यों बता रहा हूँ। आपको तो अपनी अधजली फाइल को ठिकाने लगाना है न....कहिेये करना है नहीं करना है”।

“करना है....वैसे क्या नाम बताया आपने अपने ट्रेनिंग इ्स्टिट्यूट का....” ?

‘पप्पू अग्नि संचालनालय’… वो क्या अपना ही दफ्तर तो है सामने, अभी कल ही ट्रेनिंग के दौरान जला दिया गया। बार बार बंगाल आने जाने में बहुत टाईम लग जाता और खरचा भी बढ़ जाता था। सो हमने इन्नोवेशन दिखाया और उसी खरचे में अपने ऑफिस को ही जलाकर लगे हाथ डेडिकेशन भी दिखा दिया। आज दूर दूर से लोग यहां ट्रेनिंग लेने आते हैं। अभी देखिये दू घंटा में फिर खड़ा कर देंगे। क्या है कि कम्पटीसन बहुत बढ़ गया है। हमारे अलावे और लोग इस फील्ड में आ गये हैं तो कमिटमेंट और डेडिकेशन तो दिखाना ही होगा। अब जो अपने ऑफिस तक जला देने में न हिचकिचाये उससे बढ़कर अग्निबाज भला और कोई क्या होगा……बड़ी मेहनत से यह साख बनती है”  :-)

   
- सतीश पंचम

13 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ज़बरदस्त अग्निबाज़ क्लासेस ..... सच हर जगह कोंपीटीशन है ....

रविकर फैजाबादी said...

बहुत खूब भाई जी ||

शेयर करते आइडिया, जल पाता ना ताज |
मंत्रालय मुंबई का, और न जलती लाज |
और न जलती लाज, बाज आ जाता पाकी |
आतंकी आवाज, आज ना रहती बाकी |
पंचम सुर में गाय, आज सर आँखों धरते |
मरते ना मासूम, अगर हम शेयर करते ||

अनूप शुक्ल said...

सब कुछ सुलग गया आग में। :)

Er. Shilpa Mehta said...

अब ऐसे व्यंग्य "satire " कहला सकते हैं | जो system की बुराइयों पर हों, किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं |thanks satish ji :)

anshumala said...

दुबारा जाँच क्या खाक बैठेगी बिठाने के लिए कोई तो कागज हो , सब सरकारी बाबु भी खुश उनके पुराने सारे रिकार्ड साफ |

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मस्त।:)

संजय @ मो सम कौन ? said...

सफलता की शत प्रतिशत गारंटी:)

रविकर फैजाबादी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

कमल कुमार सिंह (नारद ) said...

हा हा हा हा , जबरजस्त , बहुत बढ़िया कटाक्ष

प्रवीण पाण्डेय said...

अग्नि को साक्षी मान कर काण्ड जो किया था..

smt. Ajit Gupta said...

अच्‍छा व्‍यंग्‍य है। आग जितना ही धारदार है।

Dr (Miss) Sharad Singh said...

तीखा कटाक्ष ...

रवि शंकर प्रसाद Ravi Shankar Prasad said...

मानव सभ्यता ने आग का सही प्रयोग अब जा कर सीखा है...

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