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Thursday, June 7, 2012

'राजशौचालय' रॉक्स डूड

“हे अमात्य, क्या तुम बता सकते हो कि हमारे इस अभेद्य दुर्ग में हाज़त आदि का क्या प्रबन्ध है” ?

“हे राजन्.....मैं खुद इस बारे में अपनी ओर से चिंतित हूं.....”

“चिंतित होने से क्या होगा अमात्य, हाज़त चिंता करने से मिट तो नहीं जाती”

“आपकी बातों से मैं पूर्ण सहमत हूं कल संध्या बेला राजमाते ने भी यही प्रश्न मुझसे किया था कि दुर्ग में शौचालय और मुत्रालय की क्या व्यवस्था है”

“तो क्या कहा तुमने अमात्य” ?

“राजन....अब मैं आपको क्या बताउं.....जब भी मैं दुर्ग में शौचालय निर्माण की बात करता हूं राजपुरोहित अडंगा डालने लगते हैं”

“क्यों” ?

“उनका कहना है कि दुर्ग की स्वच्छता और शुचिता के लिये शौचालय निर्माण दुर्ग के भीतर नहीं बल्कि बाहर हो”

“ऐसा शायद उन्होंने अपनी पुरोहिताई के निहितार्थ कहा होगा”

“मुझे भी ऐसा ही लगता है राजन”

“तो राजपुरोहित रोज सुबह शाम अपनी हाज़त को कैसे निपटाते हैं”

“जी वो जलपात्र लेकर दुर्ग की दीवार पर बैठते हैं”

“तो क्या वहां स्वच्छता और शुचिता बाधित नहीं होती”

“उनका कहना है कि दुर्ग की दीवार पर वे इस तरह बैठते हैं कि सम्पूर्ण पीत तत्व बाहर की ओर गिरे..... दुर्ग के भीतर की ओर नहीं”

“ये क्या बात हुई अमात्य” ?

“जी उनका मानना है कि इसके कई लाभ हैं”

“मसलन” ?

“मसलन यही कि – पीत तत्व दुर्ग की दीवार से बाहर की ओर गिरने से दीवारों पर अलग से सुरक्षा खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ती

“वो कैसे” ?

“दरअसल शत्रु सेनाओं द्वारा आक्रमण होने पर सीढ़ी या रस्सी के जरिये पहले दुर्ग की दीवार ही फांदी जाती है, यदि पीत-तत्व दुर्ग की दीवार पर आच्छादित हो तो शत्रु सेनायें दुर्ग में प्रवेश करने में कठिनाई का अनुभव करेंगी....उनके सैन्य अधिकारीयों को दुर्ग में प्रवेश करने से पहले पीत-तत्वों से आमना सामना करना पड़ेगा जोकि हमारे लिये सैन्य तैयारी में अतिरिक्त समय देने में सहायक होगा”

“लेकिन तब क्या होगा अमात्य जब राजपुरोहित दुर्ग के बाहर की ओर अपना पृष्ठभाग रखकर पीत-तत्व गिरा रहे हों और शत्रु सेनाएं भाला लेकर चोंक दें”

“सो तो राजपुरोहित जाने राजन कि ऐसे में उनकी क्या रणनीति होगी”

“खैर, उसके बारे में फिर कभी सोचेंगे परंतु ये सब तो युद्धकाल की बाते हैं, शांतिकाल में क्या होगा”

“लेकिन हर कोई तो शौचालय के लिये दुर्ग की दीवार का इस्तेमाल नहीं कर सकता, राजरानी हैं, राजकुमार-राजकुमारीयां हैं, दासीयां हैं उनके लिये तो कुछ न कुछ करना होगा”

“उनके लिये अलग से दुर्ग के एक ओर स्थान निर्धारित है राजन, यहां तक कि राजशौचालय के निर्माण हेतु राज्य भर में डुगडुगी पीटवा दी गई है... प्रस्तर शिल्पकारों के लिये आवेदन मंगाये गये हैं”

“तो क्या प्रजा के लिये राजशौचालय की कोई योजना नहीं है”

“वो कैसे हो सकती है राजन....फिर तो राजा और प्रजा में कोई भेद ही नहीं रह जायेगा”

“परंतु ईश्वर ने तो बिना राजा-प्रजा के भेदभाव के सभी लोगों को दैहिक निपटान की प्रकृतिगत चाहत दे रखी है”

“वो तो ईश्वर जाने राजन कि उन्होंने ऐसा क्यों किया....परंतु राजा-प्रजा में कुछ तो भेद होना चाहिये न” ?

“तो क्या भेद करने के लिये दैहिक निपटान ही रह गया है” ?

“राजन आप तो नाहक चिंतित हो रहे हैं”

“नाहक नहीं हमें इसका उत्तर चाहिये अमात्य”

“है राजन, लोग वैसे भी अपने अपने जलपात्र लेकर दुर्ग के कोने-टीलों में स्थान ढूंढ ही लेते हैं राजन, हमें उनके लिये चिंतित होने की इतनी आवश्यकता नहीं है, वैसे भी जिसे लगी हो वह दुर्ग-अटारी नहीं देखता बस तुरंत ही ‘मुर्ग’ बन जाता है आप इस बारे में नाहक चिंतित हो रहे हैं”

“वैसे राजशौचालय के निर्माण हेतु कितने कार्षापण खर्च होने का अनुमान है” ?

“यही कोई मुट्ठी भर गेहूँ जितनी संख्या होगी”

“मुट्ठी भर गेहूँ में कितने दाने आते हैं अमात्य इसका भान भी है तुम्हें” ?

“सो तो नहीं पता राजन परंतु कोई यदि कल को पूछ बैठे कि राजशौचालय के निर्माण में मितव्ययिता बरती गई कि नहीं तो हम कह सकते हैं कि केवल मुट्ठी भर गेहूं की संख्या जितने ही कार्षापण लागत लगी है”

“हमसे भला कौन पूछेगा अमात्य...यहां के राजा हम हैं, सर्वेसर्वा हम हैं और कोई हमीं से हिसाब किताब पूछेगा” ?

“वही तो मैं कह रहा हूं राजन परंतु आप मेरी बात समझ नहीं रहे थे”

“क्या समझाना चाहते हो” ?

“यही कि आप इन सब क्षुद्र बातों को लेकर नाहक चिंतित हो रहे हैं, राजशौचालय बनने दिजिए, भव्य बनने दिजिए, प्रजा में से जिस किसी को हाज़त होगी खुद ही निपटान क्षेत्र ढूँढ लेगा”

“आप हमें बहका रहे हैं अमात्य, अभी कल ही गुप्तचरों ने हमें सूचना दी कि प्रजा में राजशौचालय बनाये जाने से असंतोष है, लोग दबी जुबान कह रहे हैं कि राजन जरूरत से ज्यादा खर्च कर रहे है”

“उन्हें कह लेने दिजिए राजन, वो तो बेचारे निरीह प्राणी हैं, प्रजाजन हैं..... उनकी बातों का भला क्या बुरा मानना”

“बुरा मानने जैसी बात है अमात्य हमने चाहे-अनचाहे समूचे राज्य को ही राजशौचालय बना दिया है, राजकीय अन्नागारों में भंडारण की समुचित सुविधा के अभाव में अनाज खुले में सड़ रहे हैं, राज्यकर्मी जहां चाहे वहां निर्माण हेतु कृषिभूमि को अधिगृहित कर रहे हैं, पगडंडियों को राजमार्ग को रूप में दर्शाते हुए राज्य-व्यय बढ़ा रहे हैं और इतने पर भी हम चिंतित न हों तो धिक्कार है हमें राज्यप्रमुख होने पर”

“राजन, वो सब दुर्लक्षित किजिए, कहां तक चिंतायें ढोयेंगे, ये सब आपको शोभा नहीं देता, वो देखिये राजमिस्त्री और राज-योजनाकार जी यहीं आ रहे हैं, कृपा करके उनके सामने अपनी चिंताएं मत व्यक्त किजिएगा, राजनीति कहती है कि कभी अपने मनोभावों को उन लोगों के सामने व्यक्त नहीं करना चाहिये जो किसी के ‘पीत-तत्व निकासीकरण’ जैसी योजनाएं बना सकते हों”

“ऐसा क्यों अमात्य” ?

“ऐसा इसलिये राजन क्योंकि ऐसे योजनाकार लोग ईश्वर की बनाई दैहिक योजनाओं तक को अपने हिसाब से विनियोजित, संचालित करने की क्षमता रखते हैं, यहां तक कि गरीबी-अमीरी जैसी बातों तक को अपने हिसाब से निर्धारित कर सकते हैं जबकि ईश्वर भी इस कार्य में सीधे दखल नहीं देते. ऐसे में समझ सकते हैं कि राज्य के योजनाकारों के सामने हमारी आपकी क्या स्थिति है”.

“तो क्या ये ईश्वर से भी उंचे लोग हैं” ?

“कुछ ऐसा ही समझिये”

“ठीक है, कल से इनके लिये भी हमारे भवन के बगल में योजना भवन बनवाने के लिये डुगडुगी पिटवाई जाये और विशेष रूप से राजपरिवार के लिये निर्धारित स्थान के आसपास ही उनके लिये भी शौचालय का निर्माण कराया जाय....वरना हो सकता है कल को इतने महत्वपूर्ण लोग राजपुरोहित की तरह दुर्ग की दीवार पर बैठ पीत-तत्व बाहर गिरा रहे हों और शत्रु पक्ष खुन्नस में आकर तोप का मुँह उनकी ओर कर दे”



- सतीश पंचम

16 comments:

देवांशु निगम said...

गुरुदेव आप धन्य हो !!!! :) :) :)

Er. Shilpa Mehta said...

:)

कौशल किशोर मिश्र said...

mast mast...
प्रजा के लिये राजशौचालय की कोई योजना नहीं है”

“वो कैसे हो सकती है राजन....फिर तो राजा और प्रजा में कोई भेद ही नहीं रह जायेगा”

jai baba banaras....

आशीष श्रीवास्तव said...

जय हो ! जय हो !! जय हो !!!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अबके देख कर आऊंगा ...

smt. Ajit Gupta said...

हे भगवान। अहलूवालिया को जरूर मेल कर देना।

दीपक बाबा said...

"जय जयकार हो" वाली पोस्ट.


पर इन सुसरों को अक्ल नहीं आएगी. :

प्रवीण पाण्डेय said...

अब बताईये, आवश्यक चीजों में भी इतना बवाल...

shekhar suman.. शेखर सुमन.. said...

बहुत खूब.... आपके इस पोस्ट की चर्चा आज 07-6-2012 ब्लॉग बुलेटिन पर प्रकाशित है ... विवाह की सही उम्र क्या और क्यूँ ?? फैसला आपका है.....
धन्यवाद.... अपनी राय अवश्य दें...

संजय @ मो सम कौन ? said...

नजर लागी M.S.,
तोरे टायलेट पर :)

अनूप शुक्ल said...

कल इसे देखा था! सोचा टिपियांयेगे भी लेकिन फ़िर लगा कि किसी निपटते हुये को टोंकना ठीक नहीं। दिव्य निपटान में तो और नहीं। :)

पिछ्ले साल जब राजस्थान गये थे घूमने तो कुछ महल देखे। महलों के वे भाग भी देखे जिनमे पहले की रानियों के निपटने की व्यवस्था होती होगी। लाइन से बने खड्ड टाइप के थे वहां जहां कभी भारत देश की रानी-महारानियां निपटती होंगी।

योजना आयोग के शौचालय के बारे में अभी तक तय नहीं कर पाये हम कि क्या कहें। इसलिये इस बारे में बयान सुरक्षित है। :)

abhishek shrivastava said...

jai ho pancham ji!apki jai ho.

वाणी गीत said...

धारदार व्यंग्य !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

जय हो...

राजेश उत्‍साही said...

लो भई अब तो आप लोगों को निपटने भी नहीं दोगे। उस पर व्‍यंग्‍य लिखेंगें और वो ऐसा धारदार।

Lalit said...

दिव्य निपटान पर दिव्य लिखान

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