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Sunday, June 17, 2012

देस बटुरा रेलवई के डिब्बे में - बमचक-7

Disclaimer : बमचक सीरीज़ में कुछ शब्द अश्लील, गाली-गलौज वाले, अपठनीय भी हो सकते हैं, अत: पाठकों के अपने विवेक पर है कि बमचक सीरीज़ पढ़ें या नहीं।

(बमचक सीरीज़ की कुछ पोस्टें पहले ही पब्लिश हो चुकी हैं...जिन्हें बमचक लेबल के साथ यहां पढ़ा जा सकता है )

बमचक - 7 ( देस बटुरा रेलवई के डिब्बे में )

       तन्मय प्लेटफॉर्म की ओर आगे बढ़ ही रहा था कि बगल से गुजरते यात्री के सामान से टिक्क टिक्क की आवाज आने लगी। ध्यान दिया तो यह उस यात्री की लोहे की हरी पेटी थी जिसे सिर पर रख बगल वाला यात्री चल रहा था। हरे रंग की पत्रे वाली पेटी पर रंग बिरंगे फूलों की चित्रकारी थी। यह टिक्क टिक्क की आवाज उसी टीनहे पेटी के दबने से आ रही थी। एक पल को तन्मय के जेहन में अमेरिकन टूरिस्टर का विज्ञापन आ गया….और हंसी भी आई कि हम टूरिस्टर भी ढूंढते हैं तो अमेरिकन जबकि एक से एक रंगीन पेटीयों वाले इंडियन टूरिस्टर चलते फिरते मिल रहे हैं और वो भी टिक्क...टिक्क...टिक्क...टिक्क।

“ए रूक.....जाता किदर.....तेरे को रूकने को बोला तो सुनने को नईं आता क्या”

    अपनी सोच में आगे बढ़ता तन्मय एक पल को इस आवाज को सुन ठिठका कि कहीं उसे ही न बुला रहा हो कोई लेकिन फिर बिना कोई ध्यान दिये आगे बढ़ चला।

“अरे ए तेरे कोइच बुलाता मय.....”

     अबकी तन्मय ने पलटकर एक नज़र उस ओर देखा....साथ चल रहे दूसरे यात्री ने भी पलटकर आवाज की दिशा में देखा कि कहीं सम्बोधन उसके लिये न हो । यह एक पुलिसिया था जो डंडा फटकारते उस गरीब से दिखने वाले तन्मय के बगल में चल रहे यात्री से कह रहा था। बहुत संभव है यह यात्री अनरिजर्व्ड यात्रियों की कतार में खड़ा होने जा रहा हो । अनरिजर्व्ड यानि ‘चालू’ क्लास. पता नहीं किस बंदे की दिमाग की उपज थी यह ‘चालू क्लास’ कैटेगराइजेशन बाकि तो क्या एसी, क्या स्लीपर सभी ओर चालूगिरी समान रूप से विद्यमान है, फिर इस अनरिजर्व्ड कैटेगरी को ही ‘चालू’ क्यों कहा जाता है जानने वाला जानें. समझते देर न लगी कि अब यह पुलिसिया उसके टीन की रंग बिरंगी पेटी को सबके सामने खुलवायेगा, कुछ ऐसी वैसी चीज के नाम पर उसे परेशान करेगा और फिर दस पांच लेकर छोड़ देगा। चूंकि अभी गाड़ी आने में काफी समय था इसलिये दूर से यह माजरा देखने में कोई हर्ज न था। मजदूर यात्री ने अपने सिर पर रखे बाकस को पुलिसवाले के कहने पर उतार दिया। फिर शुरू हुई कीच-काच।

“तेरे को बुलाया तो सुनने में नहीं आता क्या” ?

“हमको लगा आप दूसरा किसी को बोलाय रहे हैं”

“दूसरा किसको बुलाएन्गा” ?

“अरे और भी त लोग हैं न तो....”

“ज्यादा बकवास नईं...क्या लिया है पेटी में” ?

“कपड़ा है साहेब”

“कपड़ा और क्या” ?

“कपड़ा ही है और कुच्छ नहीं है”

“खोल”

“अरे बहुत मोसकिल से भरे हैं साहेब खोलेंगे फिर रखेंगे आखिर क्या फायदा” ?

“तू फायदा बियदा मत सिखा चल खोल.....बोला वो करने का”

“अरे साहेब काहें परेसान कर रहे हैं कपड़ा है और कुच्छो नहीं है”

“तेरे को खोल बोला ना चुपचाप खोलने का”

    अब यात्री ने अपनी शर्ट के अंदर सीने के पास टटोल कर जनेऊ निकालना शुरू किया....एक छोर पर चाभी बंधी मिल गई।

“आईला हजार बारा सौ का चीज के लिये तू चाभी किदर किदर रखता है रे”

“अरे साहेब आप लोग खाली परेसान किये हैं...कह रहा हूं कुछ नहीं है” - रूआंसा होते हुए यात्री ने कहा.

“इदर नहीं, उदर टेबल पर लेकर चल.....”

      यात्री ने कहे अनुसार पेटी जमीन पर खोलने की बजाय बगल में रखे टेबल पर रखकर खोलना शुरू किया। तन्मय ने अनुमान लगाया कि इस मजदूर से दिखने वाले शख्स के पास कुछ ज्यादा माल-पानी तो होगा नहीं लेकिन जो कुछ भी होगा वह उसके लिये बहुत ज्यादा मायने रखता होगा। साल डेढ़ साल तक ठेला खेंचकर, सब्जी बेचकर, पेट काटकर उसने बचाकर रखे होंगे कुछ रूपये जिन्हें कपड़े की किसी तह में सिल दिया होगा। अंदर की पेट-जेब या पीछेवाली जेब का कोना। कहीं न कहीं हजार हजार की शक्ल में आठ दस गांधी छुपे होंगे।

        उधर पूछताछ शुरू हुई – “मोबाइल किसका है......पावती किदर है, मालूम नई चाइना मोबाइल नहीं चलता है....रोड से लिया तो भी पावती सकट लेना मांगता ना....कल को कोई टेररिस्ट अपना फोन यूज करके मार्केट में उसको बेच दिया अन चेकिंग में हाम लोग को ये फोन तेरा पास मिला तो तू तो गया ना बारा के भाव....देखो हाम आच्छे के लिये बोलता है.....और ये क्या सादी के वास्ते लेके जाताय क्या.....किसका.....लड़की का शादी है तो अइसा दागिना-बिगिना लेके जाता है क्या कोई.....च्छे....कइसा रे तुम लोग....ज्वेलरी वाला को बोलने का ना एक डिब्बा दो...ये अइसा क्या पेपर में बांध के सोने का चेन लेके जाता ए.....अरे जागा घेरेगा तो घेरने देना तेरा सामान तो सई रेगा.....लेके जाता सोने का चेन वो भी पेपर में बांद के.........ये चांदी का पायल किसका वास्ते ले जाता ....अउरत का वास्ते.... किदर रेती है तेरा अउरत.......गाव में रेती है मतलब फिर इदर तेरा काम कैसे चलता है.....आ...”

       उधर लोगों का हुजूम प्लेटफार्म पर आना शुरू हो गया था। अपने डिब्बे एस-2 के जहां लगने की संभावना थी उस ओर तन्मय ने बढ़ जाना ठीक समझा। रूककर इन पुलिसियों की नोच खसोंट देखने से यात्रा में मूड़ खराब होना तय था। वैसे भी समय कितना भी बदल जाये, यात्रा की प्रकृति अपने आदिम जमाने के अनुसार ही अब भी है। पहले भी लोग यात्रा करते समय रास्ते में चोर-चाईं के मिलने से आशंकित रहते थे, लूटेरों द्वारा डकैतीयों, राहजनी आदि के चलते अपना माल असबाब गंवा बैठते थे और अब भी लोग उसी तरह यात्रा के दौरान लूटे खसोटे जाते हैं। बदलाव बस इतना हुआ है कि उस दौर के कुछ लुटेरे अब के जमाने में वेश बदल कर कहीं खाकी वर्दी में तो कहीं काले कोट-सफ़ेद पैंट तो कहीं दलालों के रूप में आ गये हैं।

     निर्धारित स्थान पर जहां एस-2 डिब्बे के लगने की संभावना था वहीं सूटकेस रख तन्मय ट्रेन का इंतजार करने लगा। लोग लगातार चले आ रहे थे। किसी के पास सामानों की पूरी खेप थी, कोई केवल झोले के साथ आया था। देखकर आश्चर्य हुआ कि महिलायें यात्रा के दौरान भी चमचम करते सलमा सितारों वाली मोटी साड़ी पहनती हैं, हाथ भर भरकर चूड़ियां। और मांग में भरा सिंदूर पसीने से भले लथपथ हो माथे तक सरक आये लेकिन पाव किलो भरना जरूरी है।

        तभी लोगों की गहमा-गहमीं ज्यादा बढ़ गई। तन्मय ने गाड़ी आने की दिशा में ध्यान दिया जहां के ओवरहेड वायर पर पीली झिर्री सी रोशनी आगे की ओर बढ़ती नज़र आ रही थी। सभी यात्री सतर्क हो गये। किसी ने अपना सामान हाथ में उठाया तो किसी ने आगे की ओर सरका दिया मानों ट्रेन रूकी और ये तुरंत अंदर घुसे। ट्रेन का इंजन अब नजर आने लगा था और फिर वह वक्त भी आया जब ट्रेन धड़-धड़ की धीमी होती आवाज के साथ निर्धारित स्थान पर आ लगी। उधर अनाउंसमेंट जारी था। “...जाने वाली ट्रेन प्लेटफार्म नंबर दस पर लग चुकी है....यात्रियों से निवेदन है कि....”।

     किसी तरह और लोगों के साथ तन्मय भी अंधेरे डिब्बे में अंदर पहुंचा। किसी के सामान का नुकाली हिस्सा पैर में चुभता सा लगा। पीछे की ओर गर्दन फेर कहना चाहा कि सामान जरा पीछे करो लेकिन उसके कहने से पहले ही जिस यात्री का सामान चुभ रहा था वह अपने से पीछे वाले यात्री को डपटने लगा – “अबे सामान पीछे कर, पैर को लग रहा है”। उस यात्री का यूं डपटना तन्मय के डपटने की लाइन और लेंथ से कहीं ज्यादा था, सो मुकाबला गैर बराबरी का देखते हुए तन्मय ने चुप रहने में ही भलाई समझी। अभी अंधेरे डिब्बे में लोग पैसेज के बीच ही सामान रख अपनी-अपनी सीट तलाश रहे थे कि कुछ लोगों को राष्ट्रकुल की तरह वाद-विवाद का मौका मिल गया। जिनकी ध्वनि और कंपन स्तर कुछ इस उंचाई पर था कि पीछे से चढ़ रहे यात्री जो सामान सिर पर लिये खड़े थे वे चुपचाप खड़े रहे कि पहले उनका निपट लेने दो। तन्मय ने ध्यान दिया तो बतकही कुछ यूं चल रही थी।

“आपका कौन सा सीट नंबर है दिखाइये” ?

“यही तीस और बत्तीस है लेकिन हम क्यों दिखायें टिकट पहले आप दिखाइये”

“अरे भई अभी कन्फर्म हो जायगा कि आप ही हैं टिकट पर कि हम हैं”

“अरे यार तीन महीना पहिले टिकट निकारे हैं और कह रहे हो कि…..”

“अरे तो हम कहां कह रहे हैं भईया कि आज ही निकाले हो, हम भी तो वहीं तीन महिना पहले का टिकट निकारे हैं”

“देखिये यही है तीस और बत्तीस”

“अरे यार तुम गलत डिब्बे में आ गये हो, ये एस-टू है और आपका टिकट एस-थ्री में है”

“तो ये डिब्बा....अरे रजिन्नरवा साले यही देखा था रे....उठा उठा सामान ....कह रहा था देख कर बइठना...यही पढ़ाई किये हैं डिब्बा तक नहीं चीन्ह पाते”

“अरे चलो यार रास्ता तो छोड़ो पढ़ाई निहार रहे हो...देख रहे हैं सामान लेकर लोग खड़े हैं इहां ये फरियवा रहे हैं”

“अरे आन्हर हैं दिखाई नहीं देता था कि कौन डिब्बा में चढ़ रहे हैं”

“अरे आप तो आन्हर मत बनो, आपका सामान छूआ रहा है हमें”

“अरे पैरवा उपर कर लिजिए तो हम यहां सामान रख दें”

“अरे आराम से भईया तनि समथर हो जाने दो...”

“ए बिट्टी वहीं रख सामान हां, तीस अउर एकतीस है”

“ए नरायन...चूतिया नाहीं त इहां आवा यार टार्च देखावा....उहां लांड़ चाटै खातिर खड़ा है....”

“अरे तो बोलो साइड हो जाने को....कि थून्ह अस खड़े रहोगे वहीं पर....”

“अरे लाइट नहीं है डिब्बा में और...”

“पबलिकियै चूतिया है तो गौरमेंट का करी...यही अभी दूसर कौनो साउथ वाली टरेन होती तो मार कर लेती पबलिक और टेसन मासटर ससुर हाथ जोड़ के लाइट देता”

“अरे चुप रहो आर....फालतू बोलत हय...अबहीं चढ़तैं हैं सब लोग तबले गौरमेंट एनकर लाइट ठीक करै आई”

“आप कहां तक जा रहे हैं” ?

“इलाहाबाद तक”

“अरे त हमहूं ओहीं लग्गैं ......चलिये चल चला जाई”

“अरे ये सामान आपका है...” ?

“हां हमारा ही है”

“अरे तो रास्ते से हटाइये न”

“हटा रहे हैं भईया तनिक सबको हटने तो दो”

“अरे तो समान हटाएंगे तब न हटेंगे लोग कि अइसे ही”

“काहे गरमिया रहे हो...कह रहा हूं समनिया हटा लेते हैं त ....”

“अर्र रज्जा लाईट आय गई”

“ए तनि हाउ बटनिया दाबा त”

“हां, अरे पंखा वाला हां ओही....आंय नहीं चल रहा, अरे रेलवई वाले जो है न...टिकट का पइसा ले लेंगे और सुबिधा के नाम पर लांड़ चटा देंगे...यही तो है.....हांय, अच्छा उ साइड वाला बटन है.....तब्बै....कहूं चलता काहें नाईं बा........अब तनिक गाड़ी चली तब हवा तनी-मनी लग्गी....”

“अरे भाई साहेब समनवा त हटाकर उहां रख दिजिए”

“अरे इहां कहां ये हमारी सीट है”

“अरे तो हमारी भी त सीटिया है न यार.... हम कहां कपारे पर ढोईं....नीचे सामान रखने के लिये तीनों बर्थ वाले हकदार हैं....थिरी टीयर क मतलबै हौ कि तीनऊ टीयर वाले समान रक्खंय..... अरे तो ज्यादा सामान थोड़ो है....”

“अरे यार ये डराम ओराम कहां से ले जा रहे हो यार.......बड़े छुछमाछर हैं” यार....बताओ...डराम इहां बम्मई से ढोय के ले जा रहे हैं उहां इलाहाबाद में डराम नहीं मिलता....का कहा जाय”

“भाई साहब आप को जब सोना हो सो लिजिएगा अबहींये से काहें बीच वाली बरथिया खोल रहे हैं, देखिये आठ बजे रात तक बइठने का अलाउ रहता है उसके बाद आप सो जाइये कोई कुछ नहीं बोलेगा........नीचे वाला बर्थ का अइसे ही नियम है भाई”

    ....... और तन्मय ने इन तमाम अखिल भारतीय आवाजों के बीच अपनी 68 नंबर की निचली सीट पा ही ली”

लेकिन अभी कहां.....अभी तो सीट के और दावेदार भी तो हैं......”

“भाई साब...ये आपकी सीट है क्या.......” ?


- सतीश पंचम

( जारी....)

8 comments:

राजेश उत्‍साही said...

बमचक की चकचक पढ़कर रेल यात्राएं याद आ गईं।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सही चल रही है रेल

प्रवीण पाण्डेय said...

एक रेल यात्रा और न जाने कितना कुछ देखने को..पढ़कर लगता है कि ट्रेन में टहल रहे हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

एक रेल यात्रा और न जाने कितना कुछ देखने को..पढ़कर लगता है कि ट्रेन में टहल रहे हैं।

संजय @ मो सम कौन ? said...

'बमचक' का कवर पेज मस्त लग रहा है:)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

:)

सुज्ञ said...

बमचक रेलयात्रा लाईव!!

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

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बेहतरीन रचना पंचम दा, मजा आ गया,समय मिले तो वार्ता पर भी पधारिए। हमारी पोस्ट आपका इंतजार कर रही है।

केरा तबहिं न चेतिआ,
जब ढिंग लागी बेर



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♥ शुभकामनाएं ♥
ब्लॉ.ललित शर्मा
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