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Thursday, June 14, 2012

मुसाफ़िर चल तो सही......बमचक -6

Disclaimer : बमचक सीरीज़ में कुछ शब्द अश्लील, गाली-गलौज वाले, अपठनीय भी हो सकते हैं, अत: पाठकों के अपने विवेक पर है कि बमचक सीरीज़ पढ़ें या नहीं.....

Note:  बमचक सीरीज़ की पिछली पांच पोस्टें पहले ही पब्लिश हो चुकी हैं...पेश है कुछ हिडन पोस्टों के बाद अगली कड़ी - बमचक -6 )

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       तन्मय सीढ़ियां उतर ही रहा था कि तीसरे माले के सावंत अंकल ने सूटकेस देखते ही पूछा – “गाव को जाता क्या” ?

“हां”

“जाके आओ ...जाके आओ.... उदर भी जाके आना मांगता...थोड़ा हावा पानी आंग को लगेगा तो आच्छा हे”

“हां वो तो है......चलो मैं जाके आता”

“सांभाल के जाओ...अं...पिताजी को हामरा तरफ से नमस्कार बोलना....अं”

“जी..जरूर बोलूंगा....”

     बिल्डिंग से बाहर आते ही तन्मय की नजरें काली पीली टैक्सी ढूंढने लगी. एक टैक्सी आ तो रही थी लेकिन अंधेरे के कारण दिख नहीं रहा था कि टैक्सी खाली है या सवारी लेकर जा रही है. करीब आने पर टैक्सी रूकते ही तन्मय ने पूछा – दादर स्टेशन

"बैठो"

सामान रखकर अंदर बैठते ही टैक्सी खट से चल दी. तन्मय ने ध्यान दिया टैक्सी वाले के डैशबोर्ड पर यशोभूमि अखबार रखा है. तन्मय को याद आया कि अक्सर यह अखबार मुंबई के उत्तर भारतीय लोग पढ़ते दिखाई देते हैं जिसमें उत्तर भारत के छोटे शहरों कस्बों की बकरी मरने से लेकर मड़ई फूंक दिये जाने तक की खबरें होती है. प्रधानमंत्री की चीन यात्रा, राष्ट्रपति की अमेरिका यात्रा इन अखबारों के लिये संक्षिप्त खबरें होती हैं, मुख्य खबर होती है...जहरखुरानी के चलते वृद्ध दंपत्ति लुटा, गहरे गढ़े में गिरने से बछड़े की मौत वगैरह वगैरह.

टैक्सी वाले ने एफ एम रेडियो चला रखा था जिसमें किसी आरजे की चपड़-चपड़ चल रही थी. विषय था – मुंबई में किन्नर समुदाय से होने वाली ट्रैफिक समस्या

बाहर की ओर नज़र घुमाने पर तमाम दुकाने पीछे छूटतीं जा रही थीं. अंबिका मेडिकल स्टोर, अन्नपूर्णा स्टील, लक्ष्मी जनरल स्टोर, विवा टेलर.....।

“कहां घर पड़ेगा” ? – तन्मय ने टैक्सी ड्राईवर से पूछा

“भोपाल”

“लगते तो यूपी के हो”

“अरे तो यूपी और एमपी केतना दूरी है, सब बाजू-बाजू में तो है”

“हां सो तो है”

“आपका कौन घर पड़ेगा” ?

“इलाहाबाद”

“हम भी इलाहाबाद गये थे एक बार नहाने”

“कब” ?

“अअ् हो गये करीब बारह तेरह साल”

“अच्छा लगा इलाहाबाद” ?

“अच्छा तो जो था सो था लेकिन एक बात कहेंगे आप बुरा न मानियेगा”

“कहिये”

“आप लोग को देखा है कि केतना भी बड़ा आदमी हो जब गांव से आता है तो जरूर एक बोरा साथ में लेकर आएगा, और बोरा में क्या होगा – चावल, दाल, खटाई, अमचूर यही सब”

“हां वो तो है”

“आप बुरा मत मानना लेकिन हमने पिछले बीस बरीस में देखा है कि जो कोई गांव से आता है भले बीआईपी का आठ हज्जार का सूटकेस रखे होगा लेकिन साथ में एक बोरा सामान जरूर लेकर आता है, पता नहीं क्या अइसा होता है कि यहां नहीं मिलता गठियाये आते हैं”

“अरे भई, अपने खेत खलिहान की चीज होती है, घर की पैदावार होती है तो लिये आते हैं लोग, अचार हुआ, मुरब्बा हुआ, सिरका हुआ”

“वो चीज तो यहां से भी मिल जाती हैं”

“नहीं वो बात नहीं है”

“तो क्या बात है” ?

“आप बुरा मत मानियेगा”

“नहीं नहीं कहिये कहिये क्या कहना है”

“दरअसिल यहां बम्मई की औरतें काम करना नहीं चाहतीं.....नहीं तो चाहती तो जो चीज गांव की औरतें बना कर दे रही हैं वही चीज यहां भी बना सकती थीं”

तन्मय के चेहरे पर हंसी खिल उठी. टैक्सी वाला बड़ा अनुभवी लग रहा था.

“अरे नहीं ऐसी बात नहीं, यहां कहां औरतें अचार पापड़ सुखाने के लिये जगह पायेंगी गांव में तो खुला छत है, खटाई, अचार, पापड़ जितना सुखाना होता है सुखाती हैं”

“नहीं साहेब, करने को तो एक खिड़की जेतना धूप में भी सूप रखकर औरतें अचार बना लेती हैं, केतना गुजराती मारवाड़ी को देखा उनके यहां सूप में रखकर ही अचार-पापड़ धूप में रख देते हैं और...लगता है आगे टराफिक है….दूसरे रास्ते से चलूं क्या” ?

“चलिये जहां से आपको जल्दी लगे”

“हां, नहीं तो शाम के धंधे के टाइम ट्रैफिक में ही अटक जाउंगा तो खाउंगा क्या....यही तो धंधे का टाईम है”

“तो क्या कह रहे थे तुम” – तन्मय को टैक्सी वाले की बातों में रस मिलने लगा था

“येही की औरतें जो गाँव में रहती आई हैं , यहां बम्मई में आकर नाजुक सुकुआर बन जाती हैं....अचार-पापड़ माल से खरीद लेएंगी और ......अ देखो इधर भी टरैफिक है....लगता है आज सब ओर जामै जाम है”

     स्टेशन पर उतर कर टैक्सी से सामान उतारते समय टैक्सी वाले ने बगल में सामान उतारते एक परिवार की ओर इशारा किया...”वो देख...मैं कहता हूं पक्का वो आदमी के सूटकेस में टाटा नमक और चन्द्रिका साबुन होगा”

“क्या” ?

“हां, लोग इहां से वो सामान भी ले जाते हैं जो गाँव में मिलता है...दिखाने के लिये....नहीं तो पता कैसे चलेगा कि बम्मई से आये हैं.......”

    तन्मय ने मुस्करा कर टैक्सी वाले को किराया पकड़ाया और चल पड़ा स्टेशन की ओर मन ही मन यह सोचते हुए – विदेशों में रहने वाले भी तो यहां आते समय वो चीजें ले आते हैं जो पहले से यहां मिलती हैं, उनके लिये बम्बई गाँव है. वहां का टैक्सीवाला भी हम इंडियन्स को देखकर इस टैक्सीवाले की भांति सोचता होगा....कम्बख्त आते हैं तो अचार और बड़ियां लादकर, इनकी औरतें जो अपने देस में खटती रहती हैं यहां लंदन-अमेरिका आकर नाजुक हो जाती हैं......

 और  तभी प्लेटफार्म पर अनाउंसमेंट सुनाई दिया - “यात्री कृपया ध्यान दें.....11211 मुंबई-वाराणसी सुपरफास्ट एक्सप्रेस थोड़ी ही देर में प्लेटफार्म नंबर दस पर आने वाली है....यात्रियों से निवेदन है कि ......”


(जारी....)


- सतीश यादव

7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

रेल यात्राओं में कितना कुछ ज्ञान मिल जाता है..

Abhishek Ojha said...

:) आपको छोड़ हम जिस टैक्सी से आगे गए थे... उससे भी खूब बात हुई थी ! बढ़िया।

सञ्जय झा said...

pathak-gan kripaya dhyan den 'musafir aur gari' ke agli sirij jo safed-ghar se nikalnewali hai....abhi jari hai......


jai ho.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

टैक्सी ड्राइवर के बहाने बड़ी मार्के की बात कह दी। जो सीधे कह न पाये वो कहानी में भिड़ा दिया।:)

सुज्ञ said...

कुछ भी कहे टैक्सी ड्राइवर, पर गांव की चीजों में कुछ तो दम है, एक स्वाद एक जायका एक परिशुद्धता। :)

anshumala said...

आप ने स्पष्टीकरण में कहा दिया की ना पढ़े तो नहीं पढ़ा ( क्या करे ऐसी आप की ऐसे ही एक पोस्ट को पढ़ने के बाद मुँह धोने पड़े थे क्या करे सुना नहीं गालियों को पढ़ा जो था ) सो नहीं पढ़ रहे है टिप्पणी हाजरी बताने के लिए नहीं की है आप को ये बताने के लिए की है की कुछ पाठक है जो पढ़ना तो चाहते है आप की पोस्ट पर आप की स्पष्टीकरण देख कर उन्हें बिना पढ़े जाना पड़ता है जो इतने दिन बाद आये थे :)

अनूप शुक्ल said...

आप भी झांसे बाज हो गये हैं। हम गाली-गलौज खोजते रहे और आपने पोस्ट खतम कर दी। अजीब बमचक है! :)

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