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Sunday, May 13, 2012

नौटंकी टशन......

     इस बार गाँव जाने पर शादियों का मौसम चल रहा था और उसी के साथ मौसम था शादियों में होने वाले विभिन्न मनोरंजन कार्यक्रमों का। अभी गाँव पहुँचे दूसरा ही दिन था कि छत पर रात में सोते समय रात के ढ़ाई बजे कहीं से कुड़कुड़ीया नगाड़ा आदि बजने की आवाज आई। आँख खुल गई। ध्यान दिया तो यह कहीं नौटंकी के नगाड़े की टनटनाहट थी। तुरंत पास ही पड़े सेल फोन से चचेरे भाई को फोन लगाया। हांलाकि एक आवाज देने पर बंदा सुन लेता, वहीं दीवार के उस ओर आंगन में मच्छरदानी लगाकर सो रहा था लेकिन रात के ढ़ाई बजे आवाज देना अजीब लगा, जबकि गाँवों में आवाज लगाकर किसी को उठाना आम बात है। किसी की भैंस ने खूँटा उखाड़ लिया या किसी के खेत में नीलगायें आ गईं, या कोई और पशु ही खेतों में घुस आये तो आवाज लगाया ही जाता है ताकि खेत मालिक का नुकसान न हो लेकिन यहां मेरी कौन सी खेती बरबाद हो रही थी।

      सो भाई साब ने रात के ढ़ाई बजे मेरा फोन आश्चर्य से देख तुरंत उठाया कि बात क्या है ? मैने कहा – चल यार नौटंकी देखने जाना है।

क्या ?

हां यार नौटंकी देखने जाना है। चल फटाफट बाईक निकाल।

       भाई साब ने फोन कट किया और मच्छरदानी से निकल छत की ओर नजर डाली जहां मैं चांदनी रात में खड़ा था। आंखें मलते भकुआए चेहरे के साथ भाई साब ने एक बार फिर मेरी ओर देखा, मैने इशारा किया चल, देर हो रही है। इसके साथ ही मैं खुद जल्दी जल्दी सीढ़ियां उतर कर नीचे आ गया। अंदर कमरे में जाकर टॉर्च की रोशनी में कपड़े पहनें। पैरों में चप्पलें डाल, मोबाइल साथ ले चल पड़ा। उधर भाई साब अब भी भकुआए से मेरी ओर खटिया पर बैठे बैठे ताक रहे थे। मैंने कहा – चल यार मुझे रास्ता नहीं पता वरना मैं खुद चल देता। एक तो कच्चे पक्के पगडंडियों के रास्ते हैं, पता नहीं किस ओर से आवाज आ रही है, किस गाँव में हो रही है नौटंकी।

     अब भाई साब धीरे-धीरे उठे। पता नहीं, मन में क्या-क्या सोच रहे थे कि – इतना तेच ‘नच-देखुआ’ मैं कब से बन गया । बाहर निकलते समय अम्मा की आंख खुल गई। शायद वे हम दोनों की बातचीत के समय से ही जाग रही थीं। अंदर मच्छरदानी से ही उन्होंने धीमी आवाज में पूछा – कहां जा रहा है ? मैंने थोड़ा सकुचाते कहा – यहीं पास ही नौटंकी देखने। शायद यह सोचकर कि गाँव में घूमने फिरने ही आया हूँ कुछ कहा तो नहीं लेकिन एक तरह की मौन सहमति सी मिली।

     अगले ही पल मोटरसाईकिल की हड़हड़ाहट हुई और हम दोनों कच्ची पगडंडियों वाले रास्ते की ओर चल पड़े। भाई साब से पूछा – अरे यार, पता तो है न किस गाँव में है नौटंकी ?

       जवाब मिला – इतनी जल्दी भूल गये क्या ? शाम को उन्हीं के न्यौता करने गये थे तो छेना, रसगुल्ला चांपे थे अब पता पूछ रहे हो ?

     मुझे अपनी सोच पर हंसी आई। शाम के समय उसी जगह हम दोनों कन्या पक्ष हेतु दहेजा करने गये थे। लौटानी में डेरा-शामियाना उतर रहा था, वहां की मैंने रूककर मोबाइल से तस्वीरें भी लीं थी। बातों ही ही बातों में अपना मोबाइल रखने के लिये टी-शर्ट की उपरी जेब की ओर हाथ बढ़ाया तो वहां जेब ही नहीं थी। थोड़ा इधर उधर टटोला तो पता चला कि टी-शर्ट जल्दीबाजी में उल्टी पहन ली थी। भाई साब को कहा थोड़ा गाड़ी रोकना तो। उन्हें लगा शायद मैं लघु-शंका वगैरह के इरादे से हूँ। गाड़ी साईड में लगाई गई और मैने उतरने की बजाय उस पर बैठे बैठे ही टी-शर्ट उतारना शुरू किया तो भाई साब ने पूछा क्या हुआ कोई कीड़ा वगैरह तो नहीं घुस गया कपड़े में। हेडलाईट की रोशनी में कीड़े पतंगे बहुत आते हैं। मैंने उन्हें आश्वस्त किया, नहीं यार, कीड़ा वगैरह कुछ नहीं, टी-शर्ट उल्टी पहन लिया हूँ।

         अब भाई साब ने हंसते हुए कहा – इतने तेज नच-देखुआ कब से बन गये यार कपड़े तक का खयाल नहीं। मोटरसाईकिल फिर स्टार्ट की गई। जैसे-जैसे नौटंकी का शामियाना नजदीक आ रहा था नगाड़े और कुड़कुड़िया की आवाज और करीब आती जा रही थी। मोटरसाईकिल शामियाने के ठीक बगल में रोकी गई। वहीं पास ही नजर पड़ी जहां कि आग जलाकर एक तबले के आकार का वाद्य गरमाया जा रहा था। यह कुड़कु़डीया थी जिसके चमड़े को गर्मा कर ताना जाता था और नगाड़ा-उस्ताद के पास बदला जाता था ताकि उसकी आवाज से माहौल गरमाया रहे।

         मैंने देखा वहां काफी भीड़ थी। जो बाराती थे वे टेन्ट हाऊस से लाये गये खटियों पर पसरे थे, कुछ उठंगे थे तो कुछ सो गये थे। कुछ आस-पास के नचदेखुआ आगे स्टेज के पास जमीन पर अपनी चप्पलों को उतार उसी पर बैठे थे। किसी के पास लाठी भी थी। इन जमीनी नच-देखुओं में कुछ बच्चे थे, कुछ युवक कुछ बुजुर्ग। उधर स्टेज पर किसी डाकू और उसकी प्रेमिका अंजू का पार्ट खेला जा रहा था। होरमोनियम मास्टर जोश में था। हर डॉयलॉग पर एक लय बढ़ा देता और फिर अचानक ही नगाड़ा-उस्ताद की घम् की आवाज के साथ थम जाता।


     अंजू बना किरदार एक लड़का था जो कि साड़ी वगैरह पहन, सिंगार करके कुछ-कुछ किन्नरों की मानिंद नजर आ रहा था। उधर अंजू की बहन मंजू का भी किरदार कोई लड़का कर रहा था। रह रहकर जोकर उन लोगों की आपसी बातचीत में शामिल होकर हास्य उत्पन्न कर रहा था। यहां गौर करने लायक बात है कि जोकर पूरे नौटंकी के दौरान पक्ष और विपक्ष दोनों की ओर से बोलता है, बतियाता है और दर्शक उसकी इसी पाला बदल और तात्कालिक ह्यूमर मिश्रित संवाद अदायगी का, उसके चुटकुलों का खूब आनंद लेते हैं। मसलन एक दृश्य था जिसमें अंजू का विवाह एक कोढ़ी से होता है। अंजू का पिता अपनी बेटी को कुछ नहीं दान-दहेज में देता तो जोकर स्टेज पर आकर कहता है ये लो दस रूपये जिसे मैंने तुम्हारे पिता के यहां से चुराये हैं औऱ जाकर यहीं पास ही के फलां बाजार से चना-लाई खरीद लेना और दोनों जन गाते-खाते जीवन व्यतीत करना लेकिन मेरी रोजी में ‘गोजी’ (लाठी) मत डालना।


         जोकर के इस संवाद आदायगी पर बारात से ही कोई बंदा निकलकर स्टेज की ओर आता है और सौ-पचास या दस-बीस जैसा बने रूपये जोकर को अपना नाम-पता बताकर दे जाता है। जोकर उस नाम को माइक में बोलकर सुनाता है कि अलां गाँव के सिरी अनिल यादौ जी अंजू और कोढ़ी के विवाह से खुस्स होकर सौ रूपईय्या इनाम दिये हैं, इनका ‘सुकिरिया’। अगले ही पल जोकर फिर अंजू और कोढ़ी से संवादरत हो जाता है।

     इस पूरी कवायद में एक चीज गौर करने लायक रही कि लोग उन संवादों पर ज्यादा लहालोट होते हैं जो स्थानीय बातों को मिलाकर देशज अंदाज में बोले जाते हैं मसलन जोकर द्वारा लाठी की बजाय ‘गोजी’ बोलना और स्थानीय बाजार का नाम लेना दर्शकों को नौटंकी से जोड़ने में सहायक रहा।

      इसी बीच मैंने अपना मोबाइल कैमरा चालू कर कुछ तस्वीरें लेनी शुरू किया। कुछ अच्छी कुछ खराब। तभी मन किया कि अंदर ‘सिंगार खोली’ में दाखिल हुआ जाय। वहां के माहौल का जायजा लिया जाय। देखा जाय कि नौटंकी कलाकारों की जीवन शैली कैसी है, क्या होता है अंदर। बतौर राइटर भी मेरे लिये यह जिज्ञासा बनी थी क्या पता कुछ कंटेंट हाथ लगे।

          यही सोच मैंने भाई साब से कहा यार मुझे ‘सिंगार खोली’ में जाना है। नौटंकी मालिक से बात कर। गौरतलब है कि नौटंकी कलाकारों के चेंजिंग रूम को ‘सिंगार खोली’ कहा जाता है जिसमें परदे हटाकर झांकना या नजरें सटाना अभद्रता मानी जाती है क्योंकि वहां लड़का अपने कपड़े बदल लड़की का रूप धरता है, लाली पौडर, ब्लाऊज आदि पहनता है और ऐसे में कोई वहां ताके तो वह ठीक नहीं माना जाता।

       भाई साब ने मेरी बात सुन थोड़ा हैरानी जताई और कहा – जो कवर करना है यहीं कवर करो उधर अंदर क्या ‘माल-पूआ’ धरा है। जाहिर है वो आशंकित थे कि कोई परिचित यदि देख लेगा तो न जाने क्या सोचे। मैंने कहा - कुछ नहीं थोड़ा तफरीह करके आता हूँ। कहते-कहते मैं ‘सिंगार-खोली’ की तरफ बढ़ गया। इतना जरूर ध्यान रखा कि अंधेरे का सहारा ले आगे बढ़ा जाय। उधर कुछ तस्वीरें लेने के दौरान ही नौटंकी कलाकार जान गये थे कि कोई नौटंकी प्रेमी है।

     सिंगार खोली के बगल में सेनापति की पोशाक में बीड़ी फूंकते एक कलाकार के करीब जाकर कहा – आ जाऊं। बंदा समझदार था, तुरंत बोला – हां, हां क्यों नहीं। अंदर ले जाया गया। कुछ कलाकार जमीन पर सोये थे, कुछ तैयार हो रहे थे। मंजू बने कलाकार को देखा जोकि अब भेष बदलकर डाकूओं के साथ मिलने जाने का पार्ट खेलने जा रहा था। मैंने उसकी तस्वीर ली। इधर उधर की कुछ और तस्वीरें लेने के बाद ‘सिंगार खोली’ से बाहर आ गया।

    भाई साब खिन्न होकर मेरी ओर ताक रहे थे। मैंने पूछा क्या हुआ ?

“अरे यार तुम गाँव-ओंव की बात समझ नहीं रहे क्या ? वो साला चन्नरवा वहीं बाराती है, कल को शोर कर देगा कि सिंगारखोली में घुस कर ये लोग टाईम पास कर रहे थे। और कोई लेडी डांसर होती तो चलो मान भी जाता कि उनका फोटू वगैरह लिया जा सकता है अंदर घुसकर जो देखेगा तो यही समझेगा कि लड़के हैं मौज ले रहे हैं लेकिन ये क्या कि लड़के का फोटू ले रहे हो....लोग गलत मतलब निकालेंगे”

   भाई साब की बात सच थी। लोग खबरें फैलान में देर नहीं लगाते। इसका तोड़ कुछ यूं रहा कि अगले दिन सुबह भाई साब ने मेरी मासूमियत को सबके सामने कुछ यूं बयां किया  – “ये मरदे बहुत बेकार आदमी हैं। गाँव देस की रीत रिवाज समझते हैं नहीं, बस चले गये कैमरा उठाकर सिंगारखोली के अंदर। उधर साला चन्नरवा बारात में बैठा सब देख रहा था, कल को देखना सबको बात फैलाएगा कि फलाने के घर के लड़के ‘लौन्डाबाजी’ कर रहे थे”

- सतीश पंचम

15 comments:

Arvind Mishra said...

अब गाँव गिरांव में जो जो करतूत करके लौटे हैं तो इहाँ सफाई दे रहे हैं ..मुझे तो आपका लच्छन शुरूऐ से ठीक नहीं लग रहे हैं :)
हद है आप भी तनिक भी लाक शर्म नहीं है ....गवईं ग्रीन रूम में घुस गए ..
हम तो बहुत डेरा रहे थे जब तक आप गाँव में थे कि कौनों दिन कहीं मार मराय न जाएँ अपने संतोष जी ..रहत है सलामत मुम्बई पहुँच गए ...
यी खोली शब्द तो महाराष्ट्र का है और सिंगार तो समझ में आ रहा है -कहीं माडर्न नौटंकी का सम्बन्ध वहीं से तो नहीं है ?
और ऊ जोकर की बात याद दिला कर हंसा ही दिया आपने -बड़े पाजी होते हैं ससुरे दोनों और की चुगली करते हैं !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

फ़ेसबुक पर कुछ कुछ झलक तो मि‍लती रही थी आज समूचा एकसाथ पढ़क अच्‍छा लगा

संजय @ मो सम कौन ? said...

:))
सिंगार खोली में 'माल-पुआ' पाए कि नहीं?

एक नौटंकी हम भी देखने गए थे, बताएँगे कभी किस्सा|

दीपक बाबा said...

@ सिंगार खोली में 'माल-पुआ' पाए कि नहीं?

संजय बाऊ गर इनको माल पुआ मिले भी होंगे तो सरे बाजार थोड़े ही बताएँगे,

:))

प्रवीण पाण्डेय said...

हम तो नौटंकी बाहर से ही देखे हैं, कभी अन्दर जइबे नहीं किये हैं।

राजेश उत्‍साही said...

नौटंकी देखे बरसों बीत गए। उस समय नौटंकी में असली नचनिया किसी के पैसा न्‍यौछावर करने पर बड़ी अदा के साथ आंख मारकर शुक्रिया अदा करती थी।

PD said...

किरिपा करेंगे सीरी राम परभू !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मस्त है।
आप त बिलागिंग के चक्कर मा सनीसनी पत्रकार जस बहादुर होई गये हैं।
कौनो संपादक फिदा न होई जाये आप पर!:)

आशीष श्रीवास्तव said...

सीडनी गाँव के सिरी आसीस सीरीवास्तव जी नौटंकी चर्चा से खुस्स होकर एक ठो टिप्पणी इनाम दिये हैं, इनका ‘सुकिरिया’

सतीश पंचम said...

'मुंबईया टोला' के सिरी सतीश पंचम जी द्वारा टिप्पनी एवज में 'सिडनी गाँव' के सिरी आसीस सिरीवास्तव जी का सुकिरिया :)

सतीश पंचम said...

अरे भई सिंगारखोली में कौनो माल-पुआ नहीं मिला। इसी बात पर तो भाई साब से बतकही हो गई कि का गये थे उहां ? वरना तो मालपुआ होता तो भाई साब खुदै हमको बाहर खड़ा कर अंदर चल दिये होते :)

सतीश पंचम said...

देवेन्नर जी,

बिलागिंग के चक्कर में अब जान नहीं देता, ई सब तो अपनी एक ठो गंवई कहानी के लिये कंटेंट जुटाने में लगे थे। बिलागिंग की फसल से अब उतना मोह नहीं रहा कि उसके लिये खटनी करें :)

कौशल किशोर मिश्र said...

e t mardan nautanki tha ...u bees saal pahele wala nautanki ka kissa ka hani t aaibe nahi kiya ...

jai baba banaras....

अनूप शुक्ल said...

चकाचक पोस्ट है। खूब सिंगारटोली में मऊज किए बहाने से। :)

abhishek shrivastava said...

ganw ki yade tazi ho gayi.

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