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Saturday, May 12, 2012

कारटून-फारटून....बतकूचन-फतकूचन

"तो क्या कहते हो" ?


"किस बारे में" ?

"वही कारटून प्रकरण पर".

"उसकी मां की आँख".

"बाप की क्यों नहीं" ?

"अंधा है".

"नाम क्या है उसके बाप का" ?

"कानून....."

"हाल ही में अंधत्व आया या जन्म से ही" ?

"जब से जनमा तब से".

"जन्म कब हुआ था" ?

"किसका" ?

"उसी कानून का".

"उसी से पूछो".

"पूछा था".

"क्या बताया" ?

"कह रहा था जिस दिन लोग कुछ जानने लायक हुए बस उसी रोज".

"कुछ बताया कि कहाँ जनमा था" ?

"बियांबान जंगल में...."

"कद-काठी में कैसा था ....मजबूत कि कमजोर" ?

"दोनों"

"मतलब"

"कमजोरों पर मजबूत हावी.... जैसे कमजोर हिरन पर शक्तिशाली शेर...जैसे निरीह खरगोश पर झपटमार कुत्ता.... "

"उस समय अकेला वही जनमा था या और कोई उसके साथ साथ जनमा था" ?

"कुछ और भी जनमे थे".

"कौन कौन" ?

"वकील , फैसलाकार, पुलिसिया..."

"सब के सब अंधे थे" ?

"अमूमन".

"वकील कैसा था" ?

"लंठ था".

"और फैसलाकार" ?

"महालंठ".

"पुलिसिये के बारे मैं नहीं पूछूंगा...उसे जानता हूँ ......वैसे करते क्या थे ये लोग" ?
"अंधत्व को पोषित करने में सहायक थे".

"आजकल क्या कर रहे हैं" ?

"अंधा-अंधा खेल रहे हैं".

"मतलब" ?

"एक को पिछले पांच छह साल से उसके ही  किताब में  छपता आया कार्टून नहीं दिखा".

"और दूसरा" ?

"दूसरे को अश्लील सीडी बिना देखे ही दिख गई और अच्छी तरह समझ भी आ गई जिस वजह से "उसने औरों के देखने पर रोक लगा दी".

"और तीसरा" ?

"उसे चोर दिखने पर भी दिखाई नहीं दे रहे... बहाने बनाता है कि चोर पकड़ूँ कि लड़की" ?

"तो क्या पहले चोर अच्छे से पकड़ता था" ?

"उसकी बातों से तो ऐसा ही लगता है".

"सुना गोली मारने की भी बात करता है" ?

"हां सुना तो मैंने भी है".

"तब तो उसे कुछ-कुछ दिखता होगा" ?

"हां, तभी तो निशाना  लगा पाता होगा".

"फिर अंधत्व क्योंकर" ?

"मजबूरी है".

"कैसी" ?

"समय की".

"समय भी तो अंधा होता है".

"हां बस चलता चला जाता है नहीं देखता कौन उसके साथ है कौन पीछे रह गया है".

"चलो अच्छा है कोई तो समय से है"

"हाँ.....वरना तो लोग एक कारटून तक समझने में साठ-साठ साल लगा देते हैं.....समय कहाँ तक रूके ऐसे लोगों के लिये ...."


- सतीश पंचम

13 comments:

अजय कुमार झा said...

हा हा हा हा ठीके कहे , ससुरे जब कार्टून समझने में साठ साल लगा देते हैं तो का कद्दू समझेंगे पिरजातंतर

sunil deepak said...

पर साठ सालों में भी कहाँ समझ आती है, न कार्टून की, न जि़न्दगी की! बहुत खूब सतीश जी.

प्रवीण पाण्डेय said...

क्या बतियाये हैं, सबको गले लगाये हैं।

Alok Mohan said...

अच्छी तफरी ली है सबकी

http://blondmedia.blogspot.in/

सञ्जय झा said...

.......
.......

pahli baar sibbal(bagarbilla) ne muafi mangi hai....


jai ho.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

:) ग़ज़ब!

कौशल किशोर मिश्र said...

"एक को पिछले पांच छह साल से उसके ही किताब में छपता आया कार्टून नहीं दिखा".

jai baba banaras..

राजेश उत्‍साही said...

और जब कार्टून समझते हैं तो खुद ही कार्टून बन जाते हैं।

Khushdeep Sehgal said...

सन १९४८ मे जब शंकर ने कार्टून बनाया था, क्या तब भी ऐसी ही तीखी प्रतिक्रिया सामने आई होगी...​
​​
​जय हिंद...

वाणी गीत said...

:)

Arvind Mishra said...

जो घर से लाये हैं उसे कब तक दबाये बैठे रहेंगें ?

मनोज कुमार said...

जनतंत्र कार्टून तंत्र मे न कहीं तबदील हो जाए।

अनूप शुक्ल said...

कार्टून समझने में भले साठ साल लगें लेकिन पोस्ट फ़ौरन समझ गये। खूब बतकूचन किये हैं !

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