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Friday, May 18, 2012

कौन राह चलिहौ सरोखन ? .......बमचक-4


बमचक – 4

      परधान जी सरोखन के साथ कोईराना की ओर चल पड़े। चलते-चलते उन्हें महसूस हुआ कि जैसे प्लास्टिक के जूते में कोई कंकड़ आ गया है। रूककर पैरों में से सस्तहवा जूता निकाले, टेढ़ा करके झाड़े-झूड़े, एक छोटा कंकड़ निकल कर जमीन पर पहले से पड़े कंकड़ों में मिल गया।

 सरोखन को लगा कि शायद अपनी बात कहने का यह माकूल समय है. चलते चलते बोला – “देखा परधान” ?

“क्या” ?

“जिसको करकता है उसी को मालूम पड़ता है और दूसरा क्या जानेगा। आपके जूता में सिटका आया तो आपको महसूस हुआ तभी न जूता निकालकर सही किये”.

“वो तो मानी बात है सरोखन, मैं कहां मना कर रहा हूँ लेकिन ईहौ बात है कि अपनी इज्जत अपने हाथ होती है.... अब वो जमाना नहीं रह गया”.

“इतना तो मैं भी मान रहा हूं परधान, लेकिन क्या करूँ जियरा नहीं मानता। बताओ, मैंने क्या कमी की थी, अपनी जान से तो अच्छा-अच्छा ही खाया पहिनाया है। अब पतोहिया को ही जब अलग रहने का और अपने मरद की कमाई खाने का मन किया है तो कोई कितना थामे” ?

“तो कर दो अलग”

“ऐसे कैसे कर दूं अलग…. ये बड़का वाला ही नौकरी करता है, छोटा वाला तो वैसे ही है…..वो भी तो कमाने-धमाने लग जाय, हांथ-पैर ठीक से समथर हो जाय, तो कुछ मन करेर करके अलगा दूं..जाओ जिसे रहना है जाये चाहे जैसे रहे....”.

    तभी सामने से कोटेदार आते दिखे। सरकार की नजर में यह वो कोटेदार जी है जिन्हें लोगों के बीच मिट्टी का तेल कोटे के हिसाब से नापने और बांटने का लाइसेंस मिला है। ऐसी मान्यता है कि काम यह वही करते हैं नापने और बांटने वाला लेकिन ऐसे लोगों के यहां ही सप्लाई करते है जिन्हें अपने देश की मिट्टी से बहुत प्यार है, मसलन, हलवाई, दुकानदार, ठेठर मालिक, कैटरिंग वाला और ऐसे तमाम गणमान्य लोग। आम लोगों को के यहां जिस समय खबर आती है कि सरकारी मिट्टी का तेल आया है, उसके घंटे भर के भीतर पहुंचो तो तेल खत्म.

    कम्पटीशन की तैयारी करता एक लौन्डा कहीं से सुनकर आया था कि देखकर आया था पता नहीं लेकिन कह रहा था कि – “कोटेदार जी का कनेक्सन दो-दो सरकारों से है…..एक वो सरकार जो मिट्टी का तेल देती है और एक पीसी सरकार जो आते ही जादू से पूरा तेलवै गायब कर देता है”

         लोगों ने कई बार एतराज किया कि मिट्टी का तेल ज्यादा पैसे ले लो लेकिन दो तो सही. इस बात से साबित होता है कि बमचकपुर के लोग केन्द्र के उन योजनाकारों से भी आगे हैं जिनकी मंशा है कि घूस को लीगल कर दो लेकिन पब्लिक को सुविधा दो… इस तरह की नवीनता से आच्छादित अंकुरण जाहिर है गाँवों में ही होगा, शहर में तो अंकुआने के लिये कंक्रीट की जमीन बाधक होगी….क्या पता कोई अफसर बमचकपुर गांव होकर गया हो और लीगल घूस का आईडिया यहीं से उसने उठाकार प्रस्तावित किया हो…राम जानें सच्चाई क्या है.

     तभी कोटेदार ने करीब आकर जैरमी की तो परधान जी और सरोखन ने साथ-साथ जैरमी की.
“कहां जा रहे हैं परधान”?

“यहीं तनिक कोईराना से होकर आता हूँ”.

“हां, हो आइये, वहां भी जाना जरूरी है...कल रात इन्हीं के यहां से तो ढेर बेर तक टिनिर
पिनिर हो रहा था”.

“हां त वहीं जा रहा हूं”

“अरे त इनको सोचना चाहिये न कि अपुना से इज्जत बचाये बचती है और गंवाये जाती है… बताओ, क्या जरूरत थी बड़की पतोह को बाल पकड़कर मारने की”

“अरे तो उल्टा-पुल्टा बोलेगी तो मार नहीं खायेगी तो क्या”

“अरे वो जमाना गया सरोखन जब गाँड़ अरहर की पाती से भी ढंका जाती थी, आजकल सबके गांड़ै एतनी बड़ी बड़ी हो गई है कि भगवानौ परेसान हैं कि आखिर ये हो क्या रहा है....”

“बात मानता हूँ कोटेदार बकि.....”

    “देखो परधान जी, चाहे एक बात बोलूं चाहे दस बात....लेकिन कुल छोड़ के यही पूछता हूं कि सरोखन से अभी वो केस कर देगी बड़की वाली तो क्या ये थाम लेंगे ? तब तो फिर वहीं परधान के गाँड़ टोओगे कि चलो परधान गवाही दे दो कि हम सरीफ हैं.....बताओ.....उसका बाप ओकील, उसका भाई सरकारी बस में डराईबर...एक भाई एलएलबी फाइनल में पढ़ता ही है......अरे बता रहा हूँ.....भागने का ठिकाना नहीं मिलेगा”.

    परधान ने कोटेदार की बात को मोड़ने की कोशिश की। वैसे भी सरोखन फरियादी बनकर आया था, उसकी ओर परिस्थितिजन्य झुकाव रखना जरूरी था कुछ-कुछ वैसी ही परिस्थितिजन्यता जिससे आजकल न्याय व्यवस्था जूझ रही है, बड़े-बड़े लोगों के अतरंगी सामग्रीयों को तोपने ढंकने के लिये इस्तेमाल होती है। उनमें कर्ता और कारक का भेद मिट जाता है, साध्य भी कोई माने नहीं रखता....माने रखता है तो फरियादी की इज्जत और प्रसारण से राहत ताकि समाज में अमन चैन रहे, बच्चे न बिगड़ें। कुछ-कुछ इन्हीं परिस्थितियों से अब परधान जी गुजर रहे थे, भारतीय न्याय व्यवस्था के शीतल खंभे की मानिंद।

(जारी....)


- सतीश पंचम

11 comments:

अनूप शुक्ल said...

अंतरंगी अंग के इस्तेमाल में तो बमचक मचा के धर दी जी आपने तो।

अब अगले अंक का इंतजार करते हैं। तब तक आप अरहर की पत्तियों के वर्णन वाली पोस्ट लिखें।

Sidharth Joshi said...

आपने पकड़ लिया है। अब इंतजार रहेगा अगली किश्‍त का... :)

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

बढिया चल रहा है, गंवई साबर मंत्र का अच्छा प्रयोग है :))

संजय @ मो सम कौन ? said...

बी टी बैंगन की तरह बी टी अरहर पर भी शोध की गुंजाईश बनती है:)

हिमांशु । Himanshu said...

बमचक मच ही गई है! आज ही जाना इस परिघटना के बारे में! चारों एक साथ पढ़ता हूँ।

वाह, लेबल इसे उपन्यास बता रहा है...
मतलब आनन्द दीर्घजीवी हो!

प्रवीण पाण्डेय said...

अब तो दोनों सरकार तेल गायब करने के चक्कर में है...

कौशल किशोर मिश्र said...

घूस को लीगल कर दो लेकिन पब्लिक को सुविधा दो… ...

sab kuch legal ho gaya tab sarkar ke sarkari babu ka kiya kaam hoga ...

jai baba banaras...

Arvind Mishra said...

उस गाँव में मात्र पच्छ अंगों का ही जिक्र होता है कि कभी कभार आगे का भी !

सतीश पंचम said...

का अरविन्द जी,

अबहीं पिछले ही कड़ी में एक जन के लिये संदर्भ के दौरान अग्रांग का नामोल्लेख है :)

सुज्ञ said...

आनन्ददायक प्रस्तुति

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सामाजिक ताने बाने के बीच उभरते प्रगति के दंश को उकेरती, व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष करती जोरदार कहानी चल रही है..गज़ब!

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