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Thursday, May 17, 2012

सरग क तरई.....बमचक -3

बमचक – 3

    परधान जब सरोखन के यहां जाने के लिये तैयार हो रहे थे तो धोती कुछ मैली दिख रही थी। दूसरी धोती लाने के लिये पोते को कहा तो भीतर से पतोहू की आवाज आई – "दूसरकी धोती कल राहठा में बझ गई थी, निकालते समय हिंचा गई".

परधान ने चुपचाप धोती सरियाना शुरू किया, मैली तो मैली कम से कम देंह तो ढंकेगी। उधर सरोखन लकड़ी के चौकी पर बैठा परधान को अगोर रहा था। परधान के कई बार कहने पर भी उसने कलेवा नहीं किया, बार-बार रट लगाये था कि उसकी बूढ़िया भूख्खल है तब तक एक दाना अंदर नहीं उतरेगा। करेजा धधक रहा है अब तक।

परधान ने ज्यादा जोर देना ठीक न समझा। अंदर से पता नहीं क्या रूखा-सूखा आये। कल तो 'निराल' करेले की सब्जी से भेंट हुई थी, न प्याज न कुछ जबकि घर में सबको पता है करेले की तेलउंस  भुजिया में मजगर पियाज और  कमतर  करेले के 'सवदगर' खवइया हैं परधान।

   उधर बिजेन्नर मास्टर भी हग-मूत के दतूअन पानी करके लुंगी में गीला हाथ पोंछते आ गये थे।

"का हो सरोखन ? क्या हाल है" ? – परधान को इस वक्त अच्छा नहीं लग रहा था बेटे द्वारा इस तरह दुखियारे से पूछना। टोक दिये – " वो गयादीन गेहूँ की दंवाई के लिये कह रहा था, कब कहूँ" ?

"कह दिजिए जब आना हो आये, कौन बड़ा 'ओथुवा' है कि...."

"कौन बड़ा 'ओथुवा' वाली बात नहीं...कोई रहना चाहिये न घर पर, कौन बोझ थमायेगा, कौन बोरा सइंतेगा, कहां क्या सब देखना पड़ेगा न कि मास्टरी है चार लाईन खींच दोगे तो हो गया – ‘क’ से कईसे" ?

सरोखन बाप बेटे के इस कलकान के लिये तैयार न था। कहां तो आया था अपनी परेशानी लेकर औऱ ये बाप-बेटा ककहरा पढ़-पढ़ा रहे हैं।

तभी सड़क से जाते लक्खन यादौ दिखे। परधान को धोती पहनते देख करीब आकर जैरमी किये – "जै राम परधान".

"जै राम भईया जै राम....शहर की ओर जा रहे हो क्या" ?

"हां, तनि बिट्टी के गंवहीयवा बेमार है, उसी को देखने जा रहा हूँ".

"कौन बड़की वाली का कि छोटकी" ?

"वही छोटकी वाली जो गुलहरी में की गई है".

"वो वाला दामाद तो कहीं फर्नीचर में काम करता था न" ? परधान ने धोती की कांछ सहेजते पूछा।

"हां, वही"

"क्या हुआ है उसे" ?

"पता नहीं, एकाएक बेहासी आ गई, बोतल पर बोतल चढ़ रही है.... हमरे 'परदीप क माई' त काल्हु से अन्न न छुई है"

परधान सोच में पड़ गये कि एक ये है जो दामाद की तबियत को लेकर भूखी पियासी है और एक ये सरोखन है जो पतोहू के कलकान को लेकर भूखा है। यानि जो जहां है अपने में परेशान ही है।

लक्खन यादौ ने परधान की तंद्रा तोड़ी यह कहते कि – "परदीप क माई आधी रतिये हमको उठा दी कि जाओ दामाद का हाल-चाल लेते आओ, पता नहीं बिटिया कइसे सपरी होगी".

लक्खन यादौ के बारे में प्रसिद्ध है कि वे कभी अपनी पत्नी को 'रेरी' मारकर नहीं बुलाते, हमेशा से ही परदीप क माई ही बुलाते हैं। हां, जब तक परदीप न हुआ था तब तक ‘सुनत हई रे’ वाली संज्ञा-सर्वनाम का इस्तेमाल करते थे, वो तो एक दिन कहीं परदीपवा के जन्मने पर अस्पताल में देखे थे डॉक्टर-डाक्टरनी को तो कुछ ये भी सहुरगर हो गये,..... बाकि इनकी पत्नी शायद दूसरी कद काठी की थीं। ‘परदीप क माई’ वाले संज्ञा-सर्वनाम के बाद उन्हें लगा कि उनका प्रमोशन हो गया है और लक्खन का डिमोशन। सो, स्वनिर्धारित पदवी लक्खन के लिये दे दी गई – ‘ईहे दहिजरवा’ जिसके पीछे की दंतकथा है कि विवाह के समय कबूली गई चान्दी की करधन लक्खन की पत्नी को बच्चा होने तक न दी गई। इस बात को लक्खन अपना ‘ताव’ मानते तो लक्खन की पत्नी अपनी दयानत कि उसी ने दया करके चांदी की करधन माफ कर दी। लेकिन कुछ न कुछ तो ‘मोमेन्टो’ छेकाना था, सो लक्खन यादौ के लिये पद्मविभूषण-पद्मश्री सरीखा टाईटल चुना गया ‘ईहे दहिजरवा’।

उधर सरोखन परधान को अगोर रहे थे कि चलें जल्दी, कहां बतकही में फंस गये। उधर बिजेन्नर मास्टर भी कब तक चुप रहते। लक्खन से पूछ बैठे – "तुम्हारा बड़का दामाद क्या करता है आजकल" ?

"सउदिया गया है".

"कंपनी बीजा पे कि आजाद वीजा पे" ?

"अब ई कुल तो नहीं पता कि कौन बीजा पे लेकिन है सउदिये में"

"अरे तो उसका भी हालचाल ले लो, कहां रहता है ? क्या करता है ? न पता चलेगा कि यहां से गया है ड्राईवरी वीजा पे और वहां जाकर ऊंट चरा रहा है तब ‘लांड़ चाट के काना’ हो जाओगे एतना जान लो".

 "अरे अइसी बात नहीं है, बराबर खबर लेते रहता हूँ, अभी बिट्टी आई थी तो ढेर सारा कपड़ा लत्ता लेकर आई थी। परदीप क माई के लिये चमकऊआ साड़ी लेकर आई थी औ हमरे लिये हे देख रहे हो कुरता औ धोती लाई थी ई सब सउदिया का पैसा है कि अउर कुछ"

"खुस्स हो न" ?

 "इसमें खुस्स होने वाली कौन बात है, सब जहां रहांय अच्छे से रहांय हम एतनै चाहिथै। अउर का सरग के तरई थोड़ौ न चाही" ?

"न सरग क तरई क्या चाहोगे देख रहे हो यही सरोखन, बहुत बड़कई हांके थे कि पतोहिया का बाप ओकील है, कचहरी में मर-मुकदमा होने पर जीउ दे देगा,  इहां  भेनसहर होतै, ककुर बिलार तक न उठे तभी से  दुआर खांच डारे हैं,  इहां से उहां ‘रउन’ लगा रहे है कि पतोहिया रंणुई, हो ढेकनवा फलुई"

   परधान ने और रूकना ठीक न समझा। अपने बेटे के भचर-भचर से जी छुड़ाना था सो चल पड़े सरोखन के यहां समझाईश देने ......


(जारी.....)


- सतीश पंचम

7 comments:

आशीष श्रीवास्तव said...

"कंपनी बीजा पे कि आजाद वीजा पे" ?

हम्म !

प्रवीण पाण्डेय said...

भाँति भाँति का वीजा और भाँति भाँति के परदेशी..

अनूप शुक्ल said...

चकाचक किस्सा है। आगे के इंतजार हैं। :)

संतोष त्रिवेदी said...

अइसे मौलिक किस्से हियैं पर मिलेंगे !

रविकर फैजाबादी said...

वाह-
बधाई -
भाई जी ||

Arvind Mishra said...

गजबै साहित्य रच रहे हो भैया !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बहुत बढ़िया। पढ़ रहा हूँ धीरे-धीरे...

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