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Wednesday, May 16, 2012

सुबहदार सुबह.......बमचक-2

Disclaimer : बोर्ड बनवाने के लिये आर्डर दिया गया है, जैसे ही बनकर आ जायगा Disclaimer टांगा जायगा। तब तक आप लोग अपने 'रिक्स' पर पढ़ें :-)



 बमचक-2


      सुबह-सुबह जब गाँव के कोईराना की ओर से सरोखन मउरिया को अपने घर की तरफ आते देखा तो बिजेन्नर बो 'जर-बुतानी' - "ई एक ठो अउर निमहुरा आ रहा है परधान से मिलने, कौन कहे मुंह-गाँड़ धोकर परभूनाथ के दरसन करने के, कुदाल-खांची ठीक करने के...उ सब छोड़ के आ रहा है परधान का 'गाँड़ अगोरने'।

         उधर परधान जी घर के पच्छू ओर मच्छरदानी में काफी देर से जगे थे लेकिन उठने की शायद इच्छा नहीं थी या तबियत ही कुछ नरम। उधर सरोखन भी नम्मरी लखुआ। जानता था कि परधान जी की पतोहिया देखते मान जर-बूताएगी। सो कोशिश में था कि परधान उठें तो उन्हीं का संग साथ पकड़ दिशा-मैदान की ओर जाते-जाते बात कर ले। लेकिन जब देखा कि अभी तक परधान मच्छरदानी में से निकले नहीं हैं, ढुक्कूल खेल रहे हैं तो जिस रफ्तार से आया था उसी रफ्तार से वापस सड़क की ओर मुड़ चला। कुछ दूर आगे जाने पर महुए का पेड़ आया तो वहीं रूक गया। लेकिन कब तक रूके। एक तो रात से उसकी आत्मा सुलग रही है, बहू के 'दतकेर्रा' के चलते दून्नू परानी अपना भाग टोय रहे हैं। रात खाना रखा हुआ छोड़कर हट गये, अब 'नटई' जर रही है, पेट कुलबुला रहा है, मन का फेचकुर अलग। कुछ देर बैठे रहने के बाद सरोखन को लगा शायद अब परधान जी उठ गये होंगे। सो फिर एक बार उस ओर चल पड़ा। उपर छत पर सोकर उठते बिजेन्नर मास्टर ने सरोखना को आते देखा तो पत्नी को सुनाते हुए कहा - "ई सार अउरौ 'अंगरेज का चोदा' बना है.....इहां से उहां तक मारनिंग वाक कर रहा है । कौन कहे दतूअन पानी करने का, ई ससुर सुबहिये-सुबहिये अपना घर का दतकेर्रा लेकर दुआर खांच डाला है। ससुर इसके मारे हगना-मूतना तक दुसूवार है"।

           उधर सरोखना परधान जी के पच्छू वाले घर के करीब आया तो देखा परधान जी अपनी मच्छरदानी समेट रहे हैं। धीरे से धोती का एक छोर खुंटियाये हुए परधानजी के पास पहुंच जैरमी किया - "जै राम परधान"

"जै राम भईया जै राम...... का हो कईसन" ?

"परधान अब चलि के फैसला करवा दो........."

"काहें, अब क्या बात हुई" ?

"अब एक बात होय तो बताईं....जब कुल बातै बात ब त बतावा काव बताई"।

"अरे तबौ.."।

"ईहे खटिया छू के कह रहा हूं परधान जो सबेरे के बेला हम झूठ बोली.... हम दोनो बूढ़ा-बूढ़ी काल्ह से खाये नहीं हैं....खाली पतोहिया के चलते...." सरोखन ने झोलंगही खटिया को हाजिर नाजिर मानकर सचमुच छूकर दिखा दिया कि वह ईश्वर को मानता है, खटिया से लेकर कुकुर-बिलार तक में उनकी उपस्थिति को स्वीकार करता है।

"अरे तो क्या पतोह के झगड़ा-झुगड़ी के चलते खाना-पीना छोड़ दोगे.....आज कल तो हर जगह टन्न मन्न होता रहता है"

"नहीं परधान, अब सहा नहीं जाता, बूढ़ीया को कल रात पीढ़ा फेंककर मारी है जंतसार वाली पतोहिया ने, और कन्नपुर वाली में तो आपै न अगुआ थे, अब आप ही चलकर फैसला कराईये कि हम बूढ़ी-बूढ़ा रहें कि जहर खाय के मर जांय "


"अरे जहर काहें खाओगे भाई" ?

"त क्या करूँ" ?

"अरे अपने से मिलजुलकर रहो और क्या। अब कन्नपुर वाली का अगुआ था तो क्या चाहते हो जिन्दगी भर मैं तुम्हारे घर के रगरा-झगरा का हिस्सेदार हो गया" ?

"नहीं वो बात नहीं परधान, सरीकत वाली बात है"

"तो वही सरीकत की बात तो मैं भी कह रहा हूँ"

    यह बातचीत अभी लंबी चलती लेकिन तभी पोता लालमणि घर के भीतर से लोटे में पानी भर कर लाया। परधान जी समझ गये कि सुबह-सुबह पानी भरा लोटा भेजना संकेत चिन्ह है बहू द्वारा कि - अपनी 'कलेक्टरी' को हटाकर कहीं और ले जाओ।

   परधान जी धीरे से लोटा उठाये और चल पड़े। पीछे-पीछे सरोखन भी चल पड़ा। वहीं उपर छत से यह नजारा देख बिरेन्नर मास्टर ने पड़ोसी छत पर बिस्तर समेट रहे लुल्लुर से कहा - "बताओ....क्या करें....परधानी ससुर किसी लायक रहने नहीं देती... देख रहे हो सबेरे-सबेरे चले जा रहे हैं सरोखन उनके गाँड़ के पीछे पीछे गाँड़ अगोरने। अरे आदमी अभी उठा है तो उसको सांस तो लेने दो कि पहले चल के तुम्हारा फैसला ही करवाये" ?

   उधर लुल्लुर का ध्यान कहीं और था। रात में कहीं तकिये के नीचे कुछ 'झिल्लीदार उत्पाद' रखा था लेकिन अभी मिल नहीं रहा था। न जाने कब कौन ले गया। मौके पर आँख खुली नहीं और अब देखो तो दस रूपये का वह 'झिल्लीदार उत्पाद' गायब। क्या पता बच्चों की महतारी ही न ले गई हो। लेकिन वह क्यों ले जाएगी। घर का कोई बच्चा भी तो छत पर नहीं आया था कि तकिया उठाकर छुट्टे पैसे के लालुच में कुछ ढूंढे।

   तभी नीचे से लुल्लुराईन का बोल फूटा - "उठे हो कि अभी और कुछ तुक-ताल भिड़ाना है"। लुल्लुर जी ने चुपचाप नीचे उतरने में ही भलाई समझी। सुबह-सुबह ही ये करकसा भवानी जो शुरू होगी तो पूरे गाँव-देस को जना देगी कि बिहान हो गया है।

     उधर बिरेन्नर मास्टर ने बीड़ी सुलगा ली कुछ उसी तरह जैसे बड़े आयोजनों के पहले कैंप फायर या जलते मशाल की परंपरा है। यह बड़ा आयोजन बिरेन्नर मास्टर के पाखाना जाने के पहले से शुरू होकर उनके लौटने तक चलता है। अमूमन इस दौरान पेप्सी की खाली बोतल भरना, खेत की ओर जाना, रास्ते में कोई भेंटा जाय तो जैरमी करना, कहां चोर आया था, भिंडी का भाव तेज है कि आलू का, किसके रिश्ते की बात चलाई जा रही है, कौन अगुआ, कल किसके यहां मार-झगड़ा हुआ इत्यादि-इत्यादि से लेकर खेत में कहीं आड़ ढूंढकर काँखने तक चलता है। वहां एक बार और बीड़ी सुलगाई जाती है, धुआँ व्योम में समाहित किया जाता है और व्योम अपने छुपने का ठिकाना ढूंढते हुए न चाहते हुए भी बार-बार उसी बमचकपुर में आने को मजबूर होता है जहां की यह कथन्नी है।


(जारी....)


- सतीश पंचम

11 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

चउचक बमचक।

पूरा न लिखा हो तो पहिले एक्के रौ में लिख डालिेए। फिर ई मूड मिजाज रहे न रहे।:)

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

भारी बमचक है।:)

sunil deepak said...

बमचक पुर की कथनी बहुत मोहनी है!

अनूप शुक्ल said...

बमचकपुर के आगे के किस्से का इंतजार कर रहे हैं। :)

प्रवीण पाण्डेय said...

क्रमशः में लिखकर अटक अटक कर साँस लेना सिखा रहे हैं।

संजय @ मो सम कौन ? said...

परधानी ऐसी ही चीज है, सौ बीघे का मालिक एक मित्र है उस दिन यही रोना रो रहा था कि बुरे वक्त में सरपंची ले बैठा और उस दिन सुबह सुबह सरोखन सरीखा एक आकर दालान में बैठ गया और पूछने पर शिकायत करने लगा की पडौसियों का कुत्ता उसकी छत पर हग गया है, चल के सफाई करवाओ| बापू ने सुबह सुबह दस बारह भारी भारी गालियाँ सुनाईं 'और कर सरपंची'

Padm Singh said...

जी करता है आपको दौड़ा के गले लगा लूँ... सच ऐसा खाटी लेखन तो प्रमचंद के पास भी नहीं ... गज़ब की हद है !!

Padm Singh said...

आप मुंबई मे रह के भी जवानी क्यों जाया कर रहे हो... फिलिम लाइन मे टराई मारो महराज...

सतीश पंचम said...

पद्म जी,

कहां प्रेमचंद से जोड़ रहे हैं महराज :)

जो दिखा वो लिखा..बस। जहां तक फिल्लिम उल्लिम की बात है, स्क्रिप्ट रजिस्टर करा ली है...इस मामले में आगे काम चल रहा है..देखें कब तक हल्ला बोल होता है :)

दिक्कत यही है कि स्क्रिप्ट के अंश और बमचक के अंश आपस में शार्ट सर्किट हुए जा रहे हैं :-)

सतीश पंचम said...

देवेन्द्र जी,

एक ही रौ में लिखने की बात पर मैंने भी सोचा लेकिन ज्यादा देर लिख नहीं पाया। हो सकता है मूड बने तो किसी दिन यह भी हो जाय :)

Arvind Mishra said...

गजब रजा गजब -झिल्ली क पता लगते हमहूँ के बतईये....पूरा गाँव ही उतार दिए इहाँ त
काहें इतना जल्दी भाग आये ?

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