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Tuesday, May 15, 2012

जियत बाप से दंगम-दंगा.... (बमचक-1)


                                                                  ‘बमचक’

Disclaimer : कहनाम है सतीश पंचम का कि  ऐसे लोग इस पोस्ट को न पढ़ें जो कुछ ज्यादा ही शुचितावादी हों....'गाली-गलौज' देख 'नकर-नकर' करते हों, साहित्य और शुचिता की दुहाई देते हों। ऐसे लोगों से अनुरोध है कृपया कहीं जाकर कुछ और पढ़ें।

(1)

     मई की तपती दुपहरी में आम के पेड़ के नीचे मनोहर लोहार खटिया बीनने में तल्लीन हैं। उसके आस-पास गाँव के बच्चे जमा हैं। कुछ की नज़रें ऊपर टंगी हैं कि कब तेज झोंका चले और एकाध पका आम गिरे। बगल में ही एक कुतिया अपने अगले पंजों से कच्ची मिट्टी को खोद-खादकर नम मिट्टी में जगह बना आंखें बंद कर सोने की कोशिश कर रही है। ऐसे ही रमणीय माहौल में  प्राईमरी के मास्टर श्री बिजेन्नर नाड़े वाली पट्टेदार चड्ढी पहने, पैंट को उतार कर कांधे पर रख,  बनियान आधे पेट तक चढ़ाये हवा लेते हुए खटिया बुनते मनोहर के पास पहुँचे और पूछा – "हो गया मनोहर " ?

“बस हुआ ही जाता है। और इस्कूल से आय रहे हैं” ?

“हां, आया तो हूं लेकिन परधान नहीं दिख रहे” – मास्टर बिजेन्नर अपने पिता को बाकि गाँव वालों की तरह परधान ही कहते हैं। इस मामले में बिजेन्नर सचेत रहते हैं कि कोई उन्हें अपने पिता को बाबूजी कहते न सुन ले।

“आये तो थे यही खटिया बिनवाते समय बकिर उन्हें जाना पड़ा चमटोली में पंचाइत के लिये” – मनोहर ने रस्सी का फेंटा पटिया की ओर से लाते हुए कहा।

“ये क्यों चले गये वहां। ये तो खुदै ‘बकचोद’ हैं बइठे हैं उहां पंचाइत करने। ये नहीं कि कायदे से आकर नहा खाकर घर पड़े रहें, चले गये पंचाइत करने। एउ मरदे कौनो अर्थ के नहीं हैं”।

“अरे तो चले गये त का हुआ। चहेंटुआ कि लड़की का छुटी-छूटा का मामला था”।

“अरे तो यही मिले थे फरियाने के लिये। न गये होते बइठ के खटिया-खांची बिनवाते। हो देख रहा हूँ कुदार का बेंट ढिल्ल हो गया है, वही ठीक करवाते, न चले गये वहां पंचैती करने”।

मनोहर मुसकराने लगा। उसकी मुसकराहट से पता चल रहा था कि वह मास्टर बिजेन्नर के द्वारा अपने पिता के प्रति व्यक्त विचारों से वह काफी हद तक सहमत है। वैसे भी काम करने वाला मजूर अपने मालिक से सहमत हो जाने में बड़ा तेज होता है। जानता है कि असहमति जताने पर थोड़ी देर और भचर-भचर सुनना पड़ सकता है और मास्टर बिजेन्नर के बारे में प्रसिद्ध है कि वे बोलते समय अपनी आवाज में नमनीयता लाने के लिये मुंह से ‘जल-कणिकाओं’ की यदा-कदा फुहार भी करते हैं जिससे सामने वाला उनके इस धाराप्रवाह ‘बोलैती’ से भावविभोर तो नहीं लेकिन ‘थूकविभोर’ जरूर हो जाता है और मनोहरा यही बचाना चाहता था।

     उधर खूँटे से बंधी भैंस बों-बों चोकर रही थी। मास्टर बिजेन्नर को गुस्सा आ रहा था। एक तो अभी-अभी मोटरसाईकिल चलाकर आया हूं, तिस पर बाप जी गायब हैं, लड़के भी दिख नहीं रहे, औरत अपनी पतोहू के साथ भीतर टिन्न-पिन्न किये है और इधर ये भैंस भी चोकर रही है। एक नज़र हौदे के पास बों-बों करती भैंस को देख मास्टर बोले – “ई ‘छिनरिया’ अऊरौ गरमान बा”।

    यहां भैंस के लिये ‘छिनाल’ का सम्बोधन मास्टर बिजेन्नर के पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी होने का प्रमाण है। उनका मानना है कि रात-बिरात जब देखो यह भैंस अपना खूंटा उखाड़ कर दूसरे के खेतों में मुँह मारने चली जाती है, कई बार खूंटा मजबूती से गाड़ा गया, बड़े गाँठ वाला बांस का खूंटा जमीन तक धंसा कर गाड़ा गया लेकिन यह भैंस है कि उस गंठीले खूंटे को भी उखाड़-पखाड़ कर दूसरे के यहां मुंह मारने चली जाती है कुछ वैसे ही जैसे कोई विवाहिता अपने मंडवे तले बंधी गाँठ को भूल यहां वहां मुंह मारती है, ऐसे में भैंस को छिनाल की उपमा न दी जाय तो क्या दी जाय ?

       गौर करने वाली बात यह है कि मास्टर बिजेन्नर किसी को गरियाने के मामले में सदा से ही सार्वभौमिक निरपेक्षता अपनाते आये हैं। वे पशुओं को भी उतनी ही सहजता से उपमा अलंकारों से नवाजते हैं जितनी सहजता से आदमी-औरतों को। कभी कभी तो निर्जीव और सजीव में भी भेद नहीं करते। जमीन ऊसर है तो उसकी नाप-जोख के समय ‘झंटही’ और ‘लंड़ही’ कहने से उन्हें गुरेज नहीं है। खेतों में बोने के लिये बीज ठीक नहीं लगा तो उस बीज को ‘बुजरी’ जैसी शब्दावली से नवाजना बिजेन्नर बखूबी जानते हैं। गँवई जीवन का ज्यादातर काम वे ऐसे ही उपमाप्रद अनुप्रास अलंकारों की जद में करते आये हैं।

    तभी भीतर से मास्टर बिजेन्नर के लिये बुलावा आया कि यहां आकर नहा खा लिजिए, वहां क्या कर रहे हैं। खटिया में ओन्चन हिंचता मनोहरा की समझ नहीं आ रहा था कि अभी तो यही बात मास्टर बिजेन्नर अपने बाप के लिये कह रहे थे और अब वही बात उनके लिये कही जा रही है। शायद इस घर में नहाना-खाना पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा हो। उसी वक्त कहीं भद्द से कुछ गिरने की आवाज आई। पलटकर देखते न देखते बच्चे उस ओर लपक लिये। एक आम चूकर गिर गया था। लेकिन बच्चे खुश होने की बजाय मुंह बनाकर रह गये थे क्योंकि वह आम दिखने में आम जैसे तो था लेकिन चिचुका-सूखा हुआ वैसे ही जैसे गाँव के ज्यादातर लोग हैं। मास्टर बिजेन्नर अपवाद हैं। वे चिचुके हुए नहीं, बल्कि सुग्गा कटवा आम हैं, ऐसा आम जिसके बारे में माना जाता है कि तोते ने चखा है और मीठा है....... भले ही उसे किसी कौवे ने ही क्यों न गिराया हो।


(जारी.... )


- सतीश पंचम



12 comments:

रविकर फैजाबादी said...

विज्जेनर नर-श्रेष्ठ है, ज्यों बरदन में सांढ़ ।
गाँव-रांव का क्लेश है, दुर्बल जन में चांड़ |
दुर्बल जन में चांड़, गालियों का है ज्ञाता |
जीव-जंतु क्या बाप, खेत निर्जीव अघाता |
ऐसे ग्यानी पुरुष, भरे हैं घर में पानी |
घर अन्दर महराज, हाल होते कुतियानी ||

Arvind Mishra said...

ग्राम्य जीवन और गवईं मानुषों के मनोभावों का सटीक चित्रण ....

देवेन्द्र पाण्डेय said...

जौनपुर कS माटी बड़ी उपजाऊ अहै। केहसे का लिखवाय दे, तोहार माछ! कछु कहा नाय जाय सकत। बहुत जबरदस्त लिखें हैं।

ई 'तोहार माछ!' जौनपुर कS एक मास्टर साहब हमसे कहत रहें, हर बात मा। एकर अर्थ हम इहे समझत रहे कि 'तोहार कसम' कहत हैंन, दूसर कौनो अर्थ होय तS हमें नाहीं पता।

प्रवीण पाण्डेय said...

एक क्षेत्र मं प्राप्त ज्ञान को दूसरे में बिना भेदभाव प्रयोग करने की हमारी परम्परा पुरानी है।

मनोज कुमार said...

नहीं पढ़ा, कहीं और जाकर कुछ और पढ़ते हैं। :)

रविकर फैजाबादी said...

त्वरित टिप्पणी से सजा, मित्रों चर्चा-मंच |
छल-छंदी रविकर करे, फिर से नया प्रपंच ||

बुधवारीय चर्चा-मंच
charchamanch.blogspot.in

काजल कुमार Kajal Kumar said...

पोस्‍ट पढ़ कर फि‍र शुचितावादी हो गए

Roushan Mishra said...

likhai me tani jaldi kareain

अनूप शुक्ल said...

इतनी पवित्रतावादी पोस्ट के लिये ऐसी-वैसी बातें करते हैं! :)

veerubhai said...

ये तो कथानक के अनुरूप जन भाषा है यहाँ अटपटा कुछ नहीं है सब कुछ सहज सरल अपनी जुबां बोलता .परिवेश की बुनावट पात्रों के हुलिया से बोलती है .बढ़िया चित्रण .

M VERMA said...

बहुत आत्मीय पोस्ट. कुछ शब्द जिन्हें बचपन में सुन रखा था जैसे 'ओन्चन' इस पोस्ट में पढ़ा जो अब गाँव से भी गायब हो गया है.
गाली-गलौज पढ़ने आया था, कहीं मिली नहीं

RS Madhukar said...

एक बार जो १३ वर्ष की आयु में गाँव से निकले तो वापस नहीं जा पाये अतिरिक्त किसी ”परोजन” या फिर किसी आत्मीय की “मरनी करनी” के. स्कूल, कॉलेज और तत्पश्चात ऑफिस और बच्चों की शिक्षा दीक्षा में ऐसे उलझे कि और कुछ याद रखने का अवसर न मिला. पिता जी की आकांछा थी गाँव के “इस्कूल” में मास्टर या पटवारी बनूँ. लेकिन बन गया बड़ा साहब. कभी कभी लगता है कि संभवतः पिता जी की आकांछा पूरी हो गयी होती तो अच्छा होता. गाँव का बचपन याद आता है. लेकिन पिछले पचास वर्षों के प्रवास और परिब्रजन के अंतराल में सब कुछ बदल गया है. मैं भी और गाँव भी. अब जब कि भारत सरकार सेवा रूपी कैद से आजाद हूँ, बेटे अपनी अपनी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं विकल्प है कि पुनः गाँव में जा कर रह सकूं. लेकिन जब गया तो पाया कि गाँव वह गाँव नहीं है जिसकी स्मृतियां मैंने संजो रखी हैं. सम्भवतः मैं स्वयं ही गाँव के योग्य नहीं रहा – मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से. मैंने पाया कि गाँव मेरा सपनो का गाँव न रह कर महानगरों की एक घिनौनी, अधपकी और सस्ती अनुकृति बन कर रह गया है. जातीय विभाजन, छुद्र स्वार्थ, अंग्रेजी माध्यम के घटिया स्कूल जिनके मास्टर अवधी में अंग्रेजी बोलने का प्रयत्न करते हुए हिंदी भी भूल गए है गाँव के पर्याय है. लेख पढ़ कर अच्छा लगा. बचपन में सुने शब्द यथा “गदेला”, “ओन्चन” आज भी सुनता हूँ तो कहीं अन्दर तक छू जाते हैं. - Madhukar Dwivedi

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