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Sunday 8 April 2012

'परमा'

        फिल्म इंडस्ट्री में कुछ फिल्में ऐसी भी बनी हैं जो कि मॉस ऑडियेन्स को शॉक ट्रीटमेंट देती हैं, एक तरह के रूटीन ट्रैक से हटकर सीधे ‘अरे ये क्या’ वाले भाव जनरेट करती हैं। सन् 1984 में बनी राखी गुलज़ार अभिनीत बंगाली फिल्म ‘परमा’ ऐसी ही फिल्म है। हाल ही में इसका हिंदी वर्शन देखा और कुछ पल के लिये ‘धंस’ सा गया।

फिल्म एक घरेलू महिला के अनायास बन उठे अवैध रिश्ते को कैमरे की नज़र से दिखाती है जिसे परत दर परत देखते हुए मन में अजीब सी ‘कचोट’ महसूस होती है। फिल्म में राखी ने 40 वर्षीय एक उच्च मध्य वर्ग की घरेलू महिला ‘परमा’ का रोल निभाया है जिसका जीवन बच्चों की स्कूली देखभाल करने, भतीजे, देवरानी, सास आदि के दैनंदिन कामों में बीतता है। सास को समय भर भोजन कराना, पति के कपड़े लत्तों का ख्याल रखना, धोबी से हिसाब किताब करना ऐसे तमाम काम करना जिसे कि घरेलू महिलायें करती हैं। बीच बीच में परमा अपनी हमउम्र महिलाओं की चाय-बैठकी आदि में भी आती-जाती रहती है। वे महिलायें भी उच्च वर्गों से ताल्लुक रखती हैं। कोई सिगरेट पीती है तो कोई और गुण बटोरे है। किसी का डिवोर्स हो गया है तो किसी को विदेश घूमने की जल्दी है।

      परमा में भी कई गुण है। वह सुरूचिपूर्ण है, सितार बजाना जानती है, अंग्रेजी बोलना पढ़ना जानती है। लेकिन घर के तमाम कामों के बीच उसे सितार आदि के लिये समय ही नहीं मिल पाता । इसी बीच दुर्गा पूजा के दौरान परमा के भतीजे का एक फोटोग्राफर मित्र राहुल आता है जो दुर्गा पूजा के दौरान घर भर की तस्वीरें खींचता है। तस्वीरें खिंचवाने के दौरान उसकी नजर परमा पर पड़ती है जो चालीस की उम्र की घरेलू महिला होने के बावजूद अलग ही आकर्षण रखती है। दुर्गा पूजा खत्म होती है और तमाम खेंची गई तस्वीरें राहुल घर वालों को दिखाता है। लोग आश्चर्यचकित होते हैं राहुल की इस खूबसूरत फोटोग्राफी पर। कुछ समय बाद राहुल इच्छा जाहिर करता है कि वह घरेलू महिलाओं की फोटोग्राफी सीरिज़ बनाना चाहता है और उसके लिये परमा को फोटोग्राफ करना चाहता है।

राहुल की फोटोग्राफी से पहले से प्रशंसक परमा के पति को कोई आपत्ति नहीं होती। वह इजाजत दे देते हैं और लंबे समय के लिये बिजनेस टूर पर चले जाते हैं। राहुल घर में आकर परमा की फोटो खेंचना शुरू करता है। कभी धोबी वाले का बिल देते हुए तो कभी कोई काम करते हुए। इस बीच परमा बच्चों को स्कूल लाती ले जाती है, सास को समय पर दवायें देती है, खाना खिलाती है। सभी के स्कूल जाने, काम पर जाने के बाद राहुल परमा की फोटो खिंचना शुरू करता है।

एक दो दिन बाद दोपहर में परमा से घर के बाहर चलकर फोटो खिंचवाने के लिये कहता है। परमा अपनी सास से इजाजत ले गाड़ी में बैठ कलकत्ता शहर में किसी अलग थलग सी जगह पर जाती है। कुछ कुछ वह भी राहुल की ओर खिंचना शुरू हो जाती है। उधर परमा को राहुल की नज़रों में एक किस्म का आकर्षण सा नज़र आता है, कहीं कुछ हो होवा न जाय इस डर से चिंतित वह अपने भतीजे से कहती है कि अपने मित्र को आने से मना कर दे क्योंकि वह इन सब से असहज महसूस कर रही है।

           इस बीच राहुल आता है और उसे सामने देख अपनी असहजता भूल जाती है और वैसे ही बच्चों के स्कूल जाने के बाद दोपहर में अपनी सास से इजाजत ले बाहर फोटोग्राफी के बहाने जाती है। अपने मायके के उजाड़ खंडहर से घर में वह राहुल के साथ फोटोग्राफी के इच्छा से जाती है जहां परमा की विधवा मां उनका स्वागत सत्कार करती है। खंड़हर की उपरी मंजिल में खिड़की खोलने के दौरान कबूतरों की फड़फड़ाहट को चमगादड़ों का उत्पात जान कर परमा अचानक ही राहुल के साथ आलिंगनबद्ध हो जाती है। वहां परमा को एहसास होता है कि कुछ गलत हो गया है। भतीजे की उम्र का यह तेईस चौबीस साल का युवक उससे यह सब करना ? परमा घर आकर अकेली रोती है, बिलखती है। इस बीच कुछ और वक्त गुजरता है और किसी न किसी बहाने राहुल और परमा एक दूसरे के सम्पर्क में आ ही जाते हैं। अब दोनों में अवैध रिश्ता बन जाता है। राहुल और परमा एक जगह जाते हैं तो मजाक ही मजाक में राहुल परमा को अपनी पत्नी बताता है। परमा के यह बताने पर कि उसके घर में एक श्यामल रंग का पौधा था जो बचपन से प्रिय था लेकिन नाम नहीं पता है, राहुल उसे वही पौधा बाजार से खरीद कर देता है।

        इधर जब तक परमा का पति बाहर रहता है तब तक दोनों के बीच खूब रिश्ता चला। इस बीच राहुल बातों ही बातों में परमा से कहता है कि वह विदेश में अपने फोटोग्राफी प्रोजेक्ट के सिलसिले में जा रहा है। परमा उदास हो जाती है। इस बीच परमा अपनी एक तलाकशुदा सहेली से राय लेती है कि क्या करना चाहिये ? बच्चे बड़े बड़े हैं। भतीजे की उम्र का प्रेमी है राहुल। क्या किया जाय ? तलाकशुदा सहेली उसे जो कुछ कच्ची-पक्की राय देती है उसके आधार पर परमा निर्णय नहीं ले पाती। उधर राहुल विदेश जाता है और उसका पति घर आता है। अब परमा को एहसास होता है कि कुछ गड़बड़ हो गई है। एक दिन परमा के पति के हाथ में एक मैगजीन लगती है जिसमें पीठ उघाड़े हुए परमा की तस्वीर छपी होती है। उसे देखकर परमा के पति को माजरा समझ आ जाता है कि उसके न रहने पर यहां क्या क्या गुल खिला है। अब वह अपनी पत्नी का घरेलू बहिष्कार करना शुरू कर देता है। उससे अपना बिस्तर अलग कर लेता है, अपने कपड़ो को दूसरे कमरे में रखवा देता है और बच्चों को होम वर्क करवाने का जिम्मा खुद लेता है। कह भी देता है कि ऐसी पतित औरत से अपने बच्चों को नहीं पढ़वाना चाहता। परमा इन सब बातों से अंदर ही अंदर ग्लानि अनुभव करने लगती है। उसे घरवालों का बर्ताव बर्दाश्त के बाहर लगता है। घर की महिलाओं की बातें सुनकर उसे अंदर ही अंदर अपने आप पर शर्म आने लगती है कि उसने ये क्या कर दिया। परमा का बेटा अपनी मां के इस बदले रूप से सन्न रहता है। उसे रात में नींद नहीं आती। अपने चचेरे भाई से पूछता है कि मां को क्या हो गया है लेकिन चचेरा भाई उसे चुपचाप सोने की सलाह देता है। अंदर ही अंदर वह भी परेशान रहता है कि काकी मां ने ये क्या कर दिया।

        उधर परमा अंदर ही अंदर कभी टूटती है तो कभी इस विश्वास में जीती है कि उसका राहुल उसे उबार लेगा। लेकिन तलाकशुदा सहेली से पता चलता है कि राहुल का विदेश में कहीं अता पता नहीं है। वह युद्धग्रस्त देश की फोटोग्राफी करने गया था और अब कहां है किसी को कुछ नहीं पता। सुनकर गहरे अवसाद के बीच गुजर रही परमा बाथरूम में आत्महत्या की कोशिश करती है लेकिन घरवालों द्वारा बचा ली जाती है। सिर पर लगी गहरी चोट के कारण उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। अब घरवालों का रवैया परमा के प्रति कुछ नरम हो जाता है लेकिन मन में गांठ वैसी की वैसी बनी रहती है। इलाज के दौरान परमा को डॉक्टर सलाह देता है कि आपकी शारिरिक बीमारी का इलाज तो हो गया लेकिन मानसिक बीमारी का थोड़ा सा इलाज करना जरूरी है ताकि आपके अंदर जो अपराध बोध है उसे खत्म किया जा सके। डॉक्टर की बात सुनकर परमा कहती है उसे कोई अपराध बोध नहीं है। परमा की बात सुनकर उसके पति को धक्का सा लगता है। अंत में परमा यह बताकर सभी को आश्चर्य-चकित कर देती है अब वह नौकरी करना चाहती है, अपने दम पर रहना चाहती है। कोई भी छोटी-मोटी नौकरी करके वह खुश रह लेगी।

     अस्पताल में मानसिक इलाज की उसी बातचीत के दौरान अचानक ही परमा को उस पौधे का नाम ‘कृष्ण-पल्लवी’ याद आ जाता है जिसे वह बचपन से लेकर अब तक याद नहीं कर पाई थी। फिल्म के अंत में पौधे का नाम याद आ जाना दर्शाता था कि परमा पूरे होशो-हवास में है और उसे अपने किये का कोई अपराध बोध नहीं है। वह अपनी नौकरी और अलग पहचान की बात पर अडिग है।

     फिल्म जहां एक ओर महिला के स्वतंत्र निर्णय लेने के दृष्टिकोण को मुखर होकर दर्शाती है तो दूसरी ओर पितृसत्तात्मक समाज की बाड़ को बेंधते हुए झटका भी देती है यह कहकर कि क्या गलती पुरूषों से नहीं होती ?

        फिल्म में कई जगह 40 वर्षीय घरेलू महिला परमा के 23-24 वर्षीय राहुल से अवैध सम्बन्ध को दर्शाते हुए कैमरे का एंगल इस तरह से मोड़ा गया है कि दृश्य बेहद बोल्ड हो गये हैं। खासकर 1984 के कालक्रम के हिसाब से इन्हें ‘अति-बोल्ड’ ही माना जायगा। यहां फिल्म का एक पहलू यह भी है कि अंत आते आते फिल्म को फेमिनिस्ट अप्रोच दे दिया गया है जिसमें महिला द्वारा अपने किये पर अपराध बोध न होना, अलग नौकरी, जीवन को नई पहचान, नई दिशा देने की मंशा परमा के मनोभावों के जरिये अभिव्यक्त हैं।

      फिल्म अंत में इस प्रश्न पर अनुत्तरित ही रही कि महिला के ‘बिना अपराध-बोध’ वाली व्याख्या में परिवार पर क्या असर पड़ सकता है। किशोर उम्र के बच्चे, अपनी मां के इस अतीत को जान क्या सामाजिक स्थिति रखेंगे ? उनकी इच्छायें, उनकी आवश्यकतायें किस स्वतंत्रता की भेंट चढ़ेंगी। व्यक्तिवादी सोच और संयुक्त परिवार के कशमकश को झकझोरती यह फिल्म देखने योग्य तो है पर अनुकरणीय नहीं।


- सतीश पंचम

16 comments:

rashmi ravija said...

सबसे पहले तो अपना रोना रो लूँ..पिछले बीस बरस से ये फिल्म देखना चाह रही हूँ...पर अब तक नहीं देख पायी...और आपने देख भी ली..इतना सारा लिख भी दिया :(

इतना तो याद नहीं था कि इसमें बोल्ड सीन भी हैं...पर अगर बोल्ड सीन नहीं होते फिर भी...विषय बोल्ड ही है...क्यूंकि स्त्री की इच्छा को ध्यान में रख कर फिल्म बनाई गयी है...एक बार शादी हो जाने के बाद...एक स्त्री..सिर्फ पत्नी-माँ-गृहणी ही नहीं रह जाती....उसमे कहीं एक स्त्री भी जिंदा रहती है...जिसे ना तो परिवार समझ पाता है...ना ही समाज.
राहुल की नज़र ..परमा को एक स्त्री के रूप में देखती है और फिर वो वर्जनाएं टूट जाती हैं.
परमा को शायद अपराध बोध इसलिए नहीं है क्यूंकि...उसने पहली बार खुद को एक माँ-पत्नी-गृहणी के रोल से अलग एक स्त्री के रूप में देखा....और उसे अपना यह रूप देख संतुष्टि ही मिली.

फिल्म अनुकरणीय ना हो..पर अगर कुछ सवालों को सोचने पर मजबूर कर दे तो यह फिल्म की सफलता ही कहलाएगी. परिवार पर भी असर नहीं पड़ेगा...अगर परमा जैसी परिस्थिति आने ही ना दी जाए और स्त्री को उसके हर रोल से अलग एक स्त्री के रूप में भी जीने का अवसर दिया जाए.
फिल्मे के डायरेक्टर का नाम जानने की भी इच्छा थी.

संजय @ मो सम कौन ? said...

नि:शब्द हैं गुरू..

सतीश पंचम said...

रश्मि जी,

Film की डायरेक्टर अपर्णा सेन हैं ।

सतीश पंचम said...

गुगल प्लस पर गिरिजेश जी का कमेंट -

"हिन्दी ब्लॉगरी को कम से कम फिल्मी जगत से ही कुछ सीखना चाहिये। बहुत अच्छा किये इसे शेयर करके"

- गिरिजेश राव

प्रवीण पाण्डेय said...

उस परुवेश और कालखण्ड के लिये यह फ़िल्म अति बोल्ड कही जायेगी।

Vivek Rastogi said...

किधर मिली ये फ़िलिम,

हम भी कई फ़िल्में देखना चाहते हैं, पर कहीं मिल ही नहीं पाती।

राजेश उत्‍साही said...

आज विवेक रस्‍तोगी से मिलना हुआ। बातचीत में आपका जिक्र भी आया। और आज ही इस पोस्‍ट पर नजर पड़ी। रश्मि जी की तरह परमा के बारे में बस सुनते रहे हैं, देख हम भी नहीं पाए। पर आपकी इस पोस्‍ट ने इसे ढूंढकर देखने की इच्‍छा जगा दी है।

सतीश पंचम said...

विवेक जी,

दरअसल मैं पिछले हफ्ते सायन में ही स्पर्श फिल्म की सीडी खरीद रहा था तो 69/- दाम दिखा। ध्यान से देखा तो एक पर एक फ्री ऑप्शन था। अंदर कौन सी दूसरी फिल्म होगी कुछ पता नहीं। फिर भी स्पर्श देखनी थी सो दाम देकर पैक खोल दिया। अंदर दूसरी सीडी 'परमा' की ही निकली।

सतीश पंचम said...

राजेश जी,

Shemaroo की वीसीडी में है। नेट पर induna.com पर जरूर मिलना चाहिये। बेहद दुर्लभ फिल्में भी induna.com पर मिली हैं मुझे। उन्हीं में से एक थी प्रेमचंद के दो बैलों की कथा पर आधारित फिल्म हीरा-मोती। जो कहीं नहीं मिली लेकिन इंडुना वालों के यहां मिली।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अब कॉमेडी के अलावा कुछ और देखकी हि‍म्‍मत नहीं होती...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

समीक्षा अच्छी लगी।

Arvind Mishra said...

पढ़ तो कल ही लिया था मगर बिजली चली गयी थी अतः कुछ कह नहीं पाया
और कहूं भी क्या निःशब्द हूँ ..आपने तफसील से पूरी पटकथा ही मानो साझा कर ली ..
इतनी ट्रेंड से हटकर एक रियलिटी फिल्म ..वाकई जिगर की बात है !

अनूप शुक्ल said...

पिक्चर के बारे में अच्छा लिखा। देखिये कब मौका मिलता है देखने का। :)

सवाल जायज हैं। स्त्री को भी एक इंसान के रूप में भी जीने का हक है।

सतीश पंचम said...

Film induna.com पर Available है -

Product ID लिंक यह रहा -

http://www.induna.com/1000004517-productdetails/

smt. Ajit Gupta said...

मैंने तो वास्‍तविक जीवन में ऐसी कितनी ही महिलाएं देखी है जो ऐसा सब करती है और कोई भी अफसोस उन्‍हें नहीं है। परिवार को भी सब मालूम है लेकिन फिर भी सबकुछ ठीक है। हमारे समाज में बहुत कुछ ऐसा है जिसे समाज सहजता से स्‍वीकार करता है क्‍योंकि अधिकांश लोग अपना परिवार टूटते हुए नहीं देखना चाहते हैं। एकाध महिला तो ऐसी भी मिली जिसने बड़े गर्व के साथ अपनी प्रेम कहानी सुनायी।

वाणी गीत said...

अपर्णा की इस नायाब कृति के बारे में पढ़ा पहले भी , मगर आपने बहुत विस्तार से लिखा !
बंगला साहित्य यूँ भी स्त्रियों के मामले में काफी उदार रहा है , बंधी बंधाई लीक से हट कर चलने वाली स्त्रियों के बारे में पढने , जानने के लिए बंगला साहित्य और फिल्मे आदर्श हैं!

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