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Wednesday, April 4, 2012

'ख़बरफ़रोश' !

      बड़ी अजीब बात है। टीवी पर खबरों में बताया जा रहा है कि 16 जनवरी 2012 के दिन भारतीय सेना की दो टुकड़ियां दिल्ली की ओर कूच कर गईं थी। यह वही दिन था जिस दिन वी. के. सिंह उम्र विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट गये थे, अलां हुआ था, फलां हुआ था। विशेषज्ञ बताते दिखे कि भई ये तो सेना का रूटीन अभ्यास था कि कोहरे में कैसे सेना जल्द मूवमेंट करती है। कैसे क्या संभालती है, बस उसी की कवायद थी, इसमें इतनी चिंता कैसी ? लेकिन नहीं..... चिंता उस बात की नहीं है कि कवायद रूटीन थी या नहीं, बल्कि चिंता इस बात की है कि ये खबरें लीक कौन कर रहा है ? विशेषकर तब जबकि राजनीतिज्ञों की टुच्चई अपनी हदें घटिया साजो-सामानों से जाकर जनरलों के हटने-हटाने तक पहुंच जाय, देश के गोपनीय पत्राचारों तक को अखबारों में छाप दिया जाय।

    आखिर इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर जब आई कि सेना की फलां नंबर की टुकड़ी ने मूवमेंट किया था तो इसकी खबर देने वाला भी तो कोई अंदरूनी सूत्र होगा। क्या गारंटी है कि इसके अलावा और कोई सूचना बाहर लीक नहीं हुई है, क्या गारंटी है कि रक्षा-भवन में वह जासूस अब भी नहीं बैठा है ?


     खैर, अब तो इस मसले पर राजनीति खूब हो रही है। सेना, जोकि अब तक विशेष परिस्थितियों में ही बाहर निकलती थी या उससे सम्बन्धित बातें लोगों तक पहुंचती थी, इस सब में नाहक बदनाम हो रही है, वह भी केवल जनरल और राजनीतिज्ञों की आपसी कड़ुवाहट के चलते। उल्लेखनीय है कि यह वही भारतीय सेना है जो अधिकतर अपने बैरको में ही बने रहने के लिये जानी जाती है, जनता के बीच खुलकर तभी बाहर आती है जब बहुत दुश्कर कश्मीर जैसे हालात हों। संभवत: बशीर बद्र का एक शेर सेना की इसी फितरत और हाल फिलहाल के राजनीतिक टकरावों के हालात को बखूबी बयां करते हैं जिसमें वे लिखते हैं कि -

मैं यूँ भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ
कोई   मासूम   क्यों  मेरे  लिये बद-नाम हो जाये

      यहां बात चाहे जनरल वी.के. सिंह की उम्र विवाद में छलकी मासूमियत की हो या हथियारों की खरीद फरोख्त में हुई धांधली की, सेना के मूवमेंट करने की बातें आखिर बाहर कैसे आ रही हैं ? गनीमत है कि सेना के कूच की यही खबरें ढाई महीने बाद फ्लैश की जा रही हैं। कहीं यही खबरें उस दौरान फ्लैश हुई होतीं जब जनरल वी. के. सिंह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे तो समझा जा सकता है कि कितनी अफरा-तफरी मचती। उस वक्त एक या दो टुकड़ी की ही खबर फ्लैश होती लेकिन अफवाहों के जरिये यह बात दो टुकड़ी के मूवमेंट तक ही सीमित रहती इसमें संदेह है। ऐसे में शेयर मार्केट क्रैश हो सकता था, लोग बदहवास होकर बैंकों से अपनी जमा-पूंजी बाहर निकाल सकते थे या फिर और कुछ भी घट सकता था। लोग कहेंगे शेयर मार्केट का क्रैश होना कौन सी नई बात है वो तो क्रैश होता ही रहता है। नहीं, गौरतलब है कि सामान्य दिनों में क्रैश होने में और 'कूप' के अंदेशे में क्रैश होने में काफी फर्क है। सामान्य दिनों का क्रैश व्यावसायिक घटनाओं के आलोक में आगे उबरने की गुंजाइश लिये होता है लेकिन तख्तापलट के दौरान मामला अनिश्ति होता है जिससे एक छोटे से समयांतराल में ही कंपनीयों के नाहक पलायन या बैंकरप्ट होने जैसी घटनाओं से माहौल नकारात्मक बन सकता है।

         दूसरी ओर गैर-वाजिब लाभ लेने वालों के लिये ऐसी अफवाहें संजीवनी का काम करती हैं। एक बार ऐसे तबके के मुंह खून लग गया तो हो सकता है जब तब तख्तापलट या ऐसी ही बातों का गुबार फैला दिया जाय और फिर जब तक धुंध छंटे सब कुछ लुट-पिट चुका हो। इसलिये सेना से संबंधित ऐसी खबरों को जहां तक हो सके अखबारों में छपने से रोका जाना चाहिये। कहने को तो हम कह सकते हैं कि पारदर्शिता जरूरी है, ये जरूरी है वो जरूरी है लेकिन उसकी वजह से जो ढिंकाचिका मचेगा उसका क्या ? जरूरी है क्या हर उस खबर को बाहर लाना जो धीरे-धीरे सेना को अंदर से तोड़ने लगे। इस तरह की खबरें साजिशन लीक करने का कहीं यही तो कारण नहीं कि सब कुछ भंडुल कर दो। साजिशकर्ताओं की नज़र में जिसको जैसा समझ आयेगा समझेगा, न समझे तो भी इस तरह की खबरों से किसी मजबूत दीवार की पपड़ी तो ढीली कर ही सकते हैं।
    
 अंत में भारतीय सेना के 16 जनवरी के उस मूवमेंट और उससे उपजी ख़बरनवीसी  पर शायर अनवर की वे पंक्तियां, जिसमें वे कहते हैं कि -

आकर  ख़राब  हैं   तेरे  कूचे  में  वरना   हम
अब तक तो जिस जमीं पे रहे, आसमां रहे

- सतीश पंचम

7 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

न जाने में कहाँ चमन फूँकने की साजिश रची जा रही हैं।

Arvind Mishra said...

आसार कुछ ठीक नजर नहीं आ रहे ....कुछ तो है जो ठीक नहीं है ...
लगता हमें अब निजी सुरक्षा की ज्यादा फ़िक्र करनी होगी -कोई भरोसा नहीं किसी का ..
कोई सुरंग वैगेरह खोदी जाय का ?

देवेन्द्र पाण्डेय said...

खबर सच्ची हो या बकवास लेकिन है चिंता में डालने वाली! सच्ची है तो है ही, बकवास है तो इसलिए कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर यह बकवास कौन कर रहा है? ...और क्यों?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

देशहित के विरुद्ध काम करने वालों पर जायज़ कानूनी कार्यवाही भी होनी चाहिए।

Vivek Rastogi said...

धुआँ दिख रहा है तो आग तो होगी ही, सांख्यवाद का महत्वपूर्ण नियम है।

smt. Ajit Gupta said...

कठिनाई यह हो गयी है कि आजकल प्रत्‍येक बात और घटना खबर बनने को बेताब है। क्‍या जरूरत थी उस अखबार को, ऐसी खबर छापने की। कल से बवाल मचा रखा है। तख्‍ता पलट हो जाता तो समझ आता कि हममें भी कुछ करने का माद्दा है।

अनूप शुक्ल said...

मीडिया अपने कयास लगाता रहता है। :)

जबलपुर में हमारे संस्थान की चार निर्माणियां हैं। लगभग रोज ही अखबार में कोई न कोई खबर छपती रहती है। ज्यादातार आंय-बांय-सांय। कल बात चली तो कहा गया कि कुछ खबरों का खंडन छपना चाहिये तो अंतत: तय हुआ कि क्या जरूरत है खंडन करने की! जब विभाग या मंत्रालय पूछेगा तो उसको स्थिति बताई जायेगी।

बाकी आप खुदै समझदार हैं!

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