सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, April 21, 2012

सिनेजगत में अलग मुकाम रखती फिल्म - 'यादें' (1964)

         अक्सर माना जाता है कि भारत में एक्सपेरिमेंटल फिल्में कम बनती हैं, लोग पसंद नहीं करते या उन्हें बनाने के पीछे उद्देश्य केवल अपने क्रियेटिव मन की क्षुधा शांत करना होता है जो कॉमर्शियल फिल्म मेकिंग के दौरान अतृप्त महसूस करता है। इन बातों में बहुत हद तक सच्चाई तो है लेकिन अकेले फिल्म निर्माण क्षेत्र में ही ऐसा नहीं है, ऐसे कई और भी क्षेत्रों में देखा जाता है कि लोग अपनी क्रियेटिविटी को पॉपुलर वेव से बचाकर रखते हैं, बाजार से हटकर सोचते हैं और दुनियाँ के सामने एक नायाब कृति पेश करते हैं।

       सुनील दत्त निर्देशित 1964 में बनी फिल्म ‘यादें’ उसी क्रियेटिविटी और अनूठेपन की बानगी दर्शाती ‘ब्लैक एण्ड वाइट’ जमाने की एक खूबसूरत कृति है। ‘यादें’ जिसमें कि शुरू से अंत तक केवल और केवल सुनील दत्त नजर आते हैं। एक घर में, कभी किचन में नजर आते हैं, कभी ड्राईंग रूम में, कभी बेडरूम में तो कभी बाथरूम में केवल और केवल सुनील दत्त। साथ होती हैं केवल वे आवाजें जो बाहर से टेलीफोन के रूप में होती हैं या संस्मरण के रूप में कही गई बातें जिनके खोने-छूने, समझने-बूझने, लड़ने-डरने की मनोव्यथा से गुजरता एक शख्स जो शुरू से अंत तक बस बांधे रहता है। ‘यादें’ एक ऐसे शख्स की कहानी है जिसका भरा-पूरा परिवार है। एक पत्नी है दो बच्चे हैं। आपसी लाग-डाट है, अनिल अनूगूँज है और उन तमाम दुनियावी बातों के अलावा पति-पत्नी में होने वाले ‘झगड़ों का वितान’ है।

             फिल्म जब शुरू होती है तो हम देखते हैं कि कैमरा पूरे घर में जैसे टहल रहा है, परदों के हवा से हिलने की गति निहार रहा है, फोकस कभी घड़ी की सूईयों पर ठहर रहा है तो कभी फूलदान पर तो कभी सीढ़ियों को लो-एंगल से कैमरा दिखाता ही जा रहा है...दिखाता ही जा रहा है। फोन की घंटी बजती है औऱ कैमरा फोन पर जूम-इन करता है। घंटी लगातार बज रही है लेकिन कोई उठाने नहीं आ रहा। कैमरा अब बेचैन हो गया। वो जल्दी-जल्दी कभी हिलते परदों पर नज़रें घुमाता है तो कभी दरवाजे पर तो कभी कहीं और... मानों उसे भी बेचैनी हो कि फोन उठाये कोई। और फोन की घंटी अचानक बंद हो जाती है। थोड़ी देर की खामोशी के बाद किसी के आने की आहट सुनाई देता है और कैमरा दरवाजे की ओर ताकता है....तभी प्रवेश करता है एक शख्स जिसका नाम अनिल (सुनील दत्त) है। गुस्से में तमतमाया अनिल चिल्लाकर पूछता है – इस घर में कोई है या नहीं, कहां चले गये सब के सब। और फिर कैमरा अनिल पर फोकस करता है, उसके हाव-भाव दर्शाता है। उसकी बेचैनी और कुंठा को पल-पल दर्शाये चले जा रहा है। घर में किसी को न पाकर बेचैन अनिल सोफे पर गिर जाता है और इसी के साथ कैमरा जैसे खुद भी थककर अनिल की थकन का साथ देते हुए नीचे की ओर आ बैठता है।

          फिर शुरू होता है अनिल की खीझ और खिन्न मन:स्थिति का दौर जिसमें अनिल अपनी पत्नी को जी-भर कर कोसता है, उसे तमाम अंट-शंट बातें अकेले ही कहता रहता है। कैमरा फिर सक्रिय होकर अनिल पर नज़रें टिका देता है। कांच के डाइनिंग टेबल पर रखा दूध गुस्से में अनिल गिरा देता है और फैला हुआ दूध कांच की टेबल पर उस गुस्से और तमतमाहट का प्रतीक बन जाता है जिससे अनिल गुजर रहा है। कांच के डाइनिंग टेबल के नीचे लगा कैमरा उस छितराये दूध के बीच से अनिल का चेहरा दिखाता है जो अपनी पत्नी द्वारा बच्चों सहित घर छोड़ देने पर पल-पल बेकाबू होता जा रहा है। अनिल घर की तमाम चीजें उलट-पुलट कर देता है, अपने पुरूषत्व को दर्शाते हुए बड़बड़ाता है कि – क्या समझती है, मैं उसके बगैर नहीं रह सकता ? रह लूंगा। लेकिन इस गर्वेक्ति में भी कैमरा अनिल के चेहरे से वह थोथा भाव पकड़ ही लेता है। मानों कहना चाहता हो – मैं जानता हूं तुम झूठ बोल रहे हो। तुम अपनी पत्नी औऱ बच्चों के बिना नहीं रह सकते। वे तुम्हारी जिंदगी में इतने घुल-मिल गये हैं कि यदि चाहो भी तो नहीं निकाल बाहर कर सकते। और यहीं से शुरू होती है वो खट्टी-मिठी यादें जिनके जरिये अनिल अपने आप को अब अकेला महसूस करता है, अपने जीवन के सूनेपन की आशंका से अंदर ही अंदर हिल जाता है। उसे याद आता है कि कितना तो भरा-पूरा परिवार है उसका। सुंदर पत्नी है, बच्चे हैं लेकिन उसने कभी उनकी कद्र नहीं की। केवल अपने मन की करता रहा, अपने मन का जो चाहा सो कहते-सुनते रहा। कभी पत्नी की राय लेने या उसकी बातों को तवज्जो नहीं दिया। यहां तक कि अपने बच्चों की ओर से बेखबर रहा, और देखते देखते एक दूसरी महिला की ओर अपने मन को उछाल बैठा।

    नतीजा अब उसके सामने है। रोज-रोज का मनमुटाव, पति-पत्नि के झगड़े से होने वाला बच्चों पर असर इन सब बातों पर उसने कभी ध्यान नहीं दिया। उसे लगता रहा कि उसकी पत्नी उसकी है, वो भला उसकी हद से बाहर क्या जायेगी। लेकिन अब देखो, पत्नी चली गई है, बच्चे चले गये हैं और वह घर में अकेला है। कैमरा आगे भी अनिल के उन्हीं मनोभावों को बेहतरीन अंदाज में दिखाता चलता है। अनिल की निराशा, उसकी हंसी, उसके हत मनोभाव सारा कुछ कैमरा पल-पल दिखाये ही जा रहा है। कभी अनिल अपनी पत्नी के हेयरपिन को छूता है, कभी उसकी लिपस्टिक से अपनी हथेलियां रंग चूमने को होता है तो कभी कंघी में फंसे पत्नी के टूटे बालों के गुच्छों को सहलाता है। तमाम उन चीजों को छू-छूकर देखता है जो उसकी पत्नी से जुड़ी हुई थीं। रस्सी पर सूखते उसके कपड़े, बच्चों के कपड़े हर एक को छू-छूकर देखता है, महसूस करता है और देखते ही देखते फूट-फूटकर रोने लगता है।

        इन्हीं क्षणों में उसे घर की दीवारों पर बच्चों द्वारा बनाई आड़ी-टेढ़ी लकीरें दिखाई देती हैं। किसी में बच्चों ने शेर बनाया है तो किसी में कुछ बनाया है। उसे याद आता है कि बच्चों की इन हरकतों पर वह खूब गुस्सा होता था। दीवार खराब करना उसे अच्छा नहीं लगता था। एक बार तो उसने देखा बच्चों ने एक आड़ा टेढ़ा शेर बनाया और लिख दिया था कि – पापा शेर हैं। उसने नजरें घुमाई और दूसरी ओर देखा कि बच्चों ने दीवार पर एक और आकृति बनाई थी जिसकी बगल में उन्होंने लिखा था – मम्मी बकरी हैं। जाहिर है, बच्चे उन दोनों पति-पत्नी के बीच होने वाले झगड़े अच्छी तरह समझ रहे थे। ऐसे में जबकि उसे सावधान हो जाना था उसने पत्नी को तब भी तवज्जो नहीं दी और आज ये दिन देखना पड़ा कि बच्चों सहित पत्नी घर छोड़कर चली गई है।

        इधर निराश हताश अनिल अपने पत्नी और बच्चों पर किये अपने जुल्मों से आहत हो मौत को गले लगाने की सोचता है, फंदे पर झूल भी जाता है लेकिन तभी उसकी पत्नी बच्चों के साथ घर में प्रवेश करती है औऱ पति को इस हालत में देख जल्दी जल्दी फंदे से मुक्त करती हुई फूट-फूट कर रो पड़ती है कि वह तो थोड़ी देर के लिये बाहर गई थी बच्चों के साथ और उसने अपनी यह हालत बना ली। उसे मौत के मुंह मे पहुंचाने की जिम्मेदार वह खुद है। आपसी टंटे की वजह से वह खुद भी फांसी के फंदे पर झूलना चाहती थी, मरना चाहती थी लेकिन उसे बच्चों के मोह ने ही अब तक जिंदा रखा है। अब वह कभी अपना व्यवहार कठोर नहीं रखेगी।

        यहां यह देखना बहुत दिलचस्प है कि किस तरह ‘स्टिल कार्टून इमेज’ के जरिये सुनील दत्त ने अपनी कहानी में यादों को जिवित किया है। कभी कार्टून को हाथों से ही आगे की ओर सरकाया गया है तो कभी कैमरे का फोकस विशेष एंगल से सुनील दत्त और नारी चेहरे वाले कैरीकेचर से सटा दिया गया है। बैकग्राउण्ड में आवाजें बदल बदल कर आ रही है। कभी पुरूष की कभी स्त्री की तो कभी कोलाहल की। पार्टी का दृश्य तो औऱ भी दिलचस्प अंदाज में दर्शाया गया है जिसमें कैमरा केवल सुनील दत्त को फोकस कर रहा है लेकिन आस पास लगे गुब्बारों में चेहरे बना दिये गये हैं जो उन लोगों के प्रतीक हैं जो पार्टीयों में हवाबाज बोलीयां बोलते हैं। यहां कई बार जब कैमरा किसी कैरीकेचर पर फोकस करता है, कार्टून पर जूम-इन करता है तो वॉयसओवर में कभी देवानंद बोलते हैं तो कभी राजकुमार तो कभी कोई और नामी हीरो। लेकिन उनकी केवल आवाजें ही सुनाई देती हैं वे खुद नहीं। इन्हीं सब बातों से यह फिल्म अपने आप में नायाब कृति बन गई है जिसे फिल्म इंडस्ट्री में एक अलग मुकाम हासिल है।

       मेरी संस्तुति है कि Film writers को या सिनेमा के स्टूडेंट्स को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिये कि कैसे एक अकेला शख्स बिना किसी और किरदार को दिखाये पूरी फिल्म का निर्माण कर सकता है, कैमरों का कैसे बेहतर इस्तेमाल कर सकता है, डायरेक्शन को कैसे अलग ही लेवल तक पहुंचा सकता है। उल्लेखनीय है कि सुनील दत्त की इस ‘यादें’ फिल्म को Guinness Book of World Records में ‘World’s Fewest Actors film’ के तहत दर्ज किया गया है। फिल्म की कास्ट देखने पर लिखा हुआ आता है – Sunil Dutt & Others.

        वहीं, आजकल के कॉर्पोरेट दौर में जहां फिल्मों का बजट करोड़ों का हो गया है, अरबों तक की लागत जाती दिख रही है यदि इस तरह की फिल्में बनाई जाये तो न सिर्फ खर्चों में कमी होगी बल्कि लागत वसूलने में भी आसानी रहेगी। सिरियलों के दो-चार कड़ियों के हिस्से जितनी लागत में बनने वाली ऐसी फिल्म से न सिर्फ लेखन, निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी आदि मांजने का मौका मिलेगा बल्कि नये ढंग से फिल्म इंडस्ट्री की बयार भी बहाई जा सकती है। लेकिन बात वही है कि कंटेंट इतना कसा हुआ रखना होगा कि दर्शक एकटक देखते रहें, किरदारों में उनकी दिलचस्पी बनी रहे और सबसे बढ़कर दर्शकों को महसूस हो कि हां, कुछ ऐसा देखा जिसे अब तक न देखा था।

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां की फिल्मी हस्तियां अपने केश सज्जा, रहन-सहन, वेशभूषा आदि से देश के करोड़ों लोगों को कंट्रोल करते हैं।

समय – वही, जब प्रोडयूसर फिल्म राईटर से कहे – “ऐसी फिल्म लिखिये जिसमें लागत कम हो, किरदार कम हों, रिटर्न अच्छा हो और दर्शकों की रूचि भी बनी रहे”।

राईटर छूटते ही कहे – “सीधे-सीधे कहिये न कि आप 'पॉर्न' बनाना चाहते हैं। उसमें मेरी राईटिंग का क्या काम” ?

और प्रोडयूसर उठते हुए कहे – “मैं ‘यादें’ बनाना चाहता हूँ.....जी भरकर 'तृप्त' होना चाहता हूँ” !

13 comments:

देवांशु निगम said...

नायाब फिल्म है, मैंने सुना है इसकी जब समीक्षा लिखी थी किसी रिपोर्टर ने तो लिखा था "परदे पर अकेला सुनील दत्त और हाल में अकेला मैं"
वाकई में ऐसी फ़िल्में बनना बहुत ज़रूरी है!!!

अजनबी -सत्य said...

बहुत ही अच्छा वर्णन है .....मैंने ये फिल्म नहीं देखी है ....किन्तु अब देखने की कोशिश करूँगा .....

rashmi ravija said...

इस फिल्म पर लिखी पोस्ट का इंतज़ार था..
बहुत सूक्ष्म अवलोकन है आपका....देखनी पड़ेगी ये फिल्म..

प्रवीण पाण्डेय said...

देखी नहीं है, पर मन पूरा बन गया है।

Arvind Mishra said...

एक ही किरदार ने पूरी फिल्म संभाल ली -वाह ! चुस्त पटकथा होगी तबतो !

bobby bha said...

is this movie available on net / torrent or any othersite.

सतीश पंचम said...

avbl on induna.com.....search with name on there site......it is showing - In Stock.

abhi said...

पोस्ट पढ़ने के बाद जो पहला काम किया है मैंने, वो ये फिल्म को डाउनलोड पे लगाने का है!!
इतनी अच्छी तरह से आपने इस फिल्म के बारे में बताया है की अब बिना देखा रहा नहीं जाएगा...
हाँ, इस फिल्म का जिक्र मैं सुन चूका हूँ..किससे ये याद नहीं!!

smt. Ajit Gupta said...

यह फिल्‍म नहीं देखी है। कभी टीवी पर आएगी तो अवश्‍य देखेगे।

रविकर फैजाबादी said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
बुधवारीय चर्चा-मंच पर |

charchamanch.blogspot.com

रंजना said...

उत्सुकता, चरम पर पहुंचा दी आपने...

देख पाने की पूरी जुगत साधुंगी....

इस रोचक व् बेहतरीन समीक्षा के लिए आपका आभार

दीपक बाबा said...

इस फिल्म के बारे में बहुत सुना है, पर कभी देख नहीं पाए,

जरूर देखेंगे,

बाय दी वे कहाँ हैं आप. बहुत दिन हो गए पोस्टआये हुए .:)

अनूप शुक्ल said...

शेर-बकरी का अच्छा किस्सा बयान किया। पिक्चर देखिये कब देख पाते हैं। :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.