“अब फिर चलूं इस कलमुही साईकिल लेकर घिरिर घिरिर रेंगाते हुए” .
“तो क्या पहले नहीं जाते थे साईकिल लेकर ? किसने कहा था आपसे कि चुनाव लड़िये और साईकिल वाले से हारिये” ?
“तो क्या कोई कहे तभी चुनाव लड़ा जाता है” ?
“वो आप जानों, मना कर रही थी कि हाथी वाले के इहां से मत लड़िये चुनाव, लेकिन आप मानें तब न” ?
“तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे तुम्हें मालूम था कि हाथी हारेगा” .
“हाथी हारने वाला था या नहीं मैं नहीं जानती, लेकिन इतना जरूर जानती हूं कि यदि आप हाथी वाले से हारते तो इतना नकर नकर नहीं करते….. अभी साईकिल से हार गये तो रोज काम पर जाने से पहले साईकिल को गरिया देते हो कि इसी ने हराया, सोचिये कि आप को हाथी ने हराया होता तो क्या तब भी आप अपनी सईकिलिया को कोसते” ?
“मतलब” ?
“मतलब ई कि साईकिल बेचारी इसीलिये कोसी जा रही है कि आप उसी से हारे हो और वही आपके पास है, गाहे-बेगाहे सामने पड़ जाती है….. जो चुनाव चिन्ह हाथी से हारते तो कोसने के लिये हाथी कहां से लाते….. खुद का ठेकाना नहीं और कौसउवल के लिये हाथी पालियेगा” ?
“देखो गुलइची की महतारी, पहिले ही बहुत देर हो रही है, तुम अउर जियादे हमको न उलझावो”
“हम कहां आप को उलझा रहे हैं”
“एक तो हम मुखमंत्री नाहीं बन सके, और उपर से दतकेर्रा फाने हो”
“उत्तर परदेस का मुखमंत्री बनना आपके किसमतै में नहीं है तो क्या करोगे”
“अरे अइसे कइसे नहीं है – देख लेना एक दिन हम संकठा सिंह ‘हिलोर’ उत्तर परदेस का मुखमंत्री बनि के रहेंगे हां, बता देते हैं साफ”
“अरे जाइये, नाम संकठा और आये हैं मुखमंत्री बनने”
“देखो.....देखो तुम हद से जियादे आगे बढ़ि रही हो, भला क्या बुराई है हमारे नाम में” .
“हम काहें मुखमंत्री नहीं बन सकते” ?
“वो इसलिये कि आप के नाम में तीन ही अच्छर है… ‘सं’ ‘क’ ‘ठा’ और उत्तर परदेस का चलन है कि यहां वही मुखमंत्री बनेगा जिसके नाम में चार अच्छर हो”
“हांय....क्या बक रही हो” ?
“और क्या....देख लो...राजनाथ के नाम में चार अच्छर....मायावती....चार अच्छर....मुलायम चार अच्छर....और अखिलेस चार अच्छर” !
“तो क्या हम इसलिये मुखमंत्री नहीं बन पाये कि हमारे नाम में चार अच्छर नहीं है” !
“और क्या….. यहां तक कि कल्याण के नाम में एक अच्छर लंगड़ ही सही चार अच्छर का रिश्ता कायम है”.
“तुम्हारी बात पर बिसवास नहीं होता गुलईची की महतारी” .
“बिसवास करो न करो....तुमहारी मरजी….. देखे तो थे पांच अच्छर वाले जगदंबिका को एक ही दिन में उत्तर परदेस की कुरसी छोड़नी पड़ी थी”.
“हां सो तो है….. तो क्या कहती हो, नाम बदल दूं.....संकठा से संकठेस रख लूं” ?
“संकठेस रखिये कि लंठेस रखिये...हम जा रही हैं अदहन रखने...तुम्हारे पेट-पटौनी का इंतजाम करने........अउर हां, इतना जानती हूं कि उत्तर परदेसवा चार नाम वालों से चले न चले तुम्हारे घर की रसोई चार अच्छर वाले सिलिंडरै से चलती है..... बात बता दूं साफै-साफ......चलती हूं...न...”.
"अरे सुन तो गुलईची की महतारी....अरी मेरा नया नाम तो बताती जा.....अरी सुन तो....अरी....... " :-)
- सतीश पंचम
“तो क्या पहले नहीं जाते थे साईकिल लेकर ? किसने कहा था आपसे कि चुनाव लड़िये और साईकिल वाले से हारिये” ?
“तो क्या कोई कहे तभी चुनाव लड़ा जाता है” ?
“वो आप जानों, मना कर रही थी कि हाथी वाले के इहां से मत लड़िये चुनाव, लेकिन आप मानें तब न” ?
“तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे तुम्हें मालूम था कि हाथी हारेगा” .
“हाथी हारने वाला था या नहीं मैं नहीं जानती, लेकिन इतना जरूर जानती हूं कि यदि आप हाथी वाले से हारते तो इतना नकर नकर नहीं करते….. अभी साईकिल से हार गये तो रोज काम पर जाने से पहले साईकिल को गरिया देते हो कि इसी ने हराया, सोचिये कि आप को हाथी ने हराया होता तो क्या तब भी आप अपनी सईकिलिया को कोसते” ?
“मतलब” ?
“मतलब ई कि साईकिल बेचारी इसीलिये कोसी जा रही है कि आप उसी से हारे हो और वही आपके पास है, गाहे-बेगाहे सामने पड़ जाती है….. जो चुनाव चिन्ह हाथी से हारते तो कोसने के लिये हाथी कहां से लाते….. खुद का ठेकाना नहीं और कौसउवल के लिये हाथी पालियेगा” ?
“देखो गुलइची की महतारी, पहिले ही बहुत देर हो रही है, तुम अउर जियादे हमको न उलझावो”
“हम कहां आप को उलझा रहे हैं”
“एक तो हम मुखमंत्री नाहीं बन सके, और उपर से दतकेर्रा फाने हो”
“उत्तर परदेस का मुखमंत्री बनना आपके किसमतै में नहीं है तो क्या करोगे”
“अरे अइसे कइसे नहीं है – देख लेना एक दिन हम संकठा सिंह ‘हिलोर’ उत्तर परदेस का मुखमंत्री बनि के रहेंगे हां, बता देते हैं साफ”
“अरे जाइये, नाम संकठा और आये हैं मुखमंत्री बनने”
“देखो.....देखो तुम हद से जियादे आगे बढ़ि रही हो, भला क्या बुराई है हमारे नाम में” .
“हम काहें मुखमंत्री नहीं बन सकते” ?
“वो इसलिये कि आप के नाम में तीन ही अच्छर है… ‘सं’ ‘क’ ‘ठा’ और उत्तर परदेस का चलन है कि यहां वही मुखमंत्री बनेगा जिसके नाम में चार अच्छर हो”
“हांय....क्या बक रही हो” ?
“और क्या....देख लो...राजनाथ के नाम में चार अच्छर....मायावती....चार अच्छर....मुलायम चार अच्छर....और अखिलेस चार अच्छर” !
“तो क्या हम इसलिये मुखमंत्री नहीं बन पाये कि हमारे नाम में चार अच्छर नहीं है” !
“और क्या….. यहां तक कि कल्याण के नाम में एक अच्छर लंगड़ ही सही चार अच्छर का रिश्ता कायम है”.
“तुम्हारी बात पर बिसवास नहीं होता गुलईची की महतारी” .
“बिसवास करो न करो....तुमहारी मरजी….. देखे तो थे पांच अच्छर वाले जगदंबिका को एक ही दिन में उत्तर परदेस की कुरसी छोड़नी पड़ी थी”.
“हां सो तो है….. तो क्या कहती हो, नाम बदल दूं.....संकठा से संकठेस रख लूं” ?
“संकठेस रखिये कि लंठेस रखिये...हम जा रही हैं अदहन रखने...तुम्हारे पेट-पटौनी का इंतजाम करने........अउर हां, इतना जानती हूं कि उत्तर परदेसवा चार नाम वालों से चले न चले तुम्हारे घर की रसोई चार अच्छर वाले सिलिंडरै से चलती है..... बात बता दूं साफै-साफ......चलती हूं...न...”.
"अरे सुन तो गुलईची की महतारी....अरी मेरा नया नाम तो बताती जा.....अरी सुन तो....अरी....... " :-)
- सतीश पंचम



14 comments:
अच्छर महिमा अपरंपार:)
जैसे गाड़ी भी चार अच्छर के पेटरोल से चलती है, अच्छर पर खतरनाक विश्लेषण !
:)
एक और फ़िल्मी क की तर्ज़ पर एक स और जोड़ लेना चाहिए मसलन स्संकठा, क्या जाने बात बन जाए
:-):-)
हाथी पर भारी सायकल.
ओह नाम ने सारा गुड़-गोबर कर दिया। अब रोज गरियाओं सायकल को। धांसू।
ऊ नाम राखि लेव जौन तोहरे दादा गोहरावत रहेन- “संकठवा”
चउचक पोस्ट
:)
हा हा हा हा...बढ़िया व्यंग्य काढ़ा आपने..
वैसे यह वयंग्य रहिये कहाँ गया है, सच्चाई बनता जा है...
अब तो लगता है अगले लगन(चुनावी लग्न) में भरमार लग जायेगी पुराने जोगियों के नए नामों की...
सोनिया मैया आ राहुल बाबा कौन सा नाम रखेंगे ...??? अनुमान लगाइए...
चुनाव चिन्ह अपने आप में बहुत कुछ कहते हैं..
बहुत बढ़िया... क्या विश्लेषण किया आपने...
सादर.
इति श्री मुख्यमंत्री नामकरण पोस्टम~!
क्या बात है जी! क्या बात है! :)
kamal ka bhunsa kuutai karte hain satees bhai,hanste hanste pet me darad ho gaya.waise दतकेर्रा ka kya matlab hota hai?
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