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Tuesday, February 14, 2012

बलटिहान बाबा

Disclaimer - यदि इस लेख से किसी की प्रेमिल भावनाएं आहत होती हैं तो इसकी जिम्मेदारी उस शख्स की पत्नी की होगी.........पति तो वैसे भी गैरजिम्मेदार माने जाते हैं : )
बहरहाल आप लोग अपनी अपनी सीट बेल्ट बाँध लें क्योंकि यह विलेज फ्लाइट सीधे गंवई पगडंडी पर रीठेल अंदाज में दौड़ने वाली है.......जिसमें हिचकोले भी हैं....मौज भी है.... और एक किस्म का सौंधापन भी है।


- Satish Pancham

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        आज सदरू भगत वैलेंटाईन डे मना रहे हैं। एक नई नीली रंग की पट्टेदार चढ्ढी, उस पर सेन्चुरी मिल वाली परमसुख छाप धोती, सफेद रंग का कुर्ता, एक नया अँगोछा कंधे पर रख यूँ चले, मानों समधियाने जा रहे हैं। धोती में नील इतना ज्यादा लगवा लिये थे कि लगता था बसपा का बैनर ही कहीं से झटक लाये हैं और वही पहन-ओढ कर निकले हैं। इधर रमदेई भी आज पूरे फॉर्म में थी। नई-नई साडी को बिना एक बार भी पहने धो-कचार कर धूप में सूखा रही थी, जानती थी नई साडी एक-दो बार धोने से कपडे का बल टूटता है और पहनने में नरमाहट बनी रहती है।

       बगल वाली जलेबी फुआ ने टोक भी दिया था, काहे नया लूगा को धो रही हो, पहन लो एसे ही....लगेगा बियाह वाली साडी है। चलोगी तो लूगा खसर-खसर बोलेगा सो अलग। तो जानते हैं रमदेई ने क्या कहा - अरे नई साडी खसर-खसर बोलती है इसिलिये तो धो-कचार कर धोती का खसरपन कम कर रही हूँ। मैं तो नहीं पहनती लेकिन मेरे बुढउ मानें तब न। बोल रहे थे हम लोग बलटिहान बाबा को मनायेंगे।

    बलटिहान बाबा ? वो कहाँ के बाबा है ? जलेबी फुआ ने अचरज से पूछा।

 अरे जैसे हमारे बरम बाबा, हरसूबाबा, डीह बाबा हैं न, वैसे ही अंगरेज लोगन के बलटिहान बाबा ।

अच्छा, तो उनके लिये ही पूडी- कढाई चढाने की तैयारी हो रही है ।

हाँ, वह सब तो करना ही पडेगा। कढाही चढेगी, परसाद बंटेगा। बाकी सब भी काज-करम होगा। अब तो देखो बलटिहान बाबा कहाँ तक पार लगाते हैं।

 सब पार हो जायेगा बहिनियाराम, सब पार हो जायेगा। बस बलटिहान बाबा पर भरोसा रखो।

    रमदेई और जलेबी फुआ की बातें चल ही रही थीं कि सदरू भगत टहकते-लहकते आँगन में आ पहुँचे। देखा जलेबी फुआ पहले ही से बैठी हैं। रमदेई अलग कपडों को उपर-नीचे अलट-पलट कर सुखा रही है, ताकि कपडे जल्दी सूख जायें। एक गठरी में सिधा-पिसान बाँधा जा रहा है ताकि पूडी-उडी का इंतजाम हो, कढाई चढे। थोडे पुआल भी लिये जा रहे हैं ताकि आग जलाकर कढाई देने में आसानी हो। थोडी देर के लिये सदरू भगत को लगा कि औरतें न हों तो तर-त्यौहार का पता ही न चले। वो तो चार औरतें मिल बैठ कर बोल-बतिया लेती हैं, थोडी लेनी-देनी कर लेती हैं तो पता चलता है कि कोई त्यौहार है। एसे समय बच्चों की कचर-पचर अलग चल रही होती है। किसी का पाजामे का नाडा नहीं खुल रहा तो किसी की सियन खुल गई है। इन्हीं सब बातों में सदरू भगत मगन थे कि बाहर पंडित केवडा प्रसाद की आवाज सुनाई पडी।

अरे भगत......अंदर ही हो क्या ?

  अरे पंडितजी। आइये- आइये। कहिये , कैसे आना हुआ। सदरू भगत आँगन से बाहर आते हुए बोले। आना क्या, बस जब से ये सुना कि तुम बलटिहान बाबा को कढाई चढाने जा रहे हो, हम तो दौडे चले आये। पानी भी नहीं पिया, पैर देख लो अभी भी धूल से अंटे पडे हैं।

हाँ, कढाई चढा तो रहा हूँ। सुना है बहुत पहुँचे हुए बाबा हैं। बहुत पढे लिखे कालेज के छोकरा-छोकरान तक उन्हें मानते हैं।

कालेज के छोकरा-छोकरान बाबा लोग को मानते हैं ? विसवास नहीं होता भगत। देखा नहीं था हरकिरत का लडका जो शहर में पढ रहा था, गाँव आया तो हम लोगों को पिछडा कह रहा था। कहता था कि क्यों पाथर को पूजते हो। कहीं पाथर पूजने से दुख दुर होते हैं। ये बाबा ओबा लोग कुछ नहीं होते बस बेकार के लोग होते हैं। और आज देखो, सब पढुआ-ठेलुआ लोग बलटिहान बाबा को एकदम मान ही नहीं रहे बल्कि उनके लिये मार भी खा रहे हैं। बदनामी झेल रहे हैं। हर जुलुम हँस कर झेल रहे हैं ।

सच कहते हो पंडितजी। मैं तो समझता हूँ कि जितना हम लोगों के देसी बाबा लोगन में शक्ति है, उससे कहीं ज्यादा विदेसी बाबा में शक्ति है। देखा नहीं, क्या बडे, क्या बूढे सब के सब बलटिहान बाबा को मान रहे हैं। सुना है वह एसे बाबा हैं कि उनके लिये गुलाबी रंग की चड्ढी का चढौवा लगता है।

अच्छा।

हां और क्या ? एसे वैसे बाबा थोडे न है।

लेकिन आज तक तो हम लोग अपने यहां चढावे में कोपीन अ लंगोट छोड कुछ चढाये ही नहीं हैं। लंगोट चढाते थे तो एक सिरा एक ओर बाँध देते थे और दूसरा दूसरी ओर। अब इ गुलाबी चड्ढी का चढावा कैसे चढेगा बाबा को।

बस वही मैं भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि बलटिहान बाबा का चढौवा गुलाबी चड्ढी कैसे अर्पित किया जाता है, कैसे चढाया जाता है।

अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि कुछ लोग भजन गाते हुए बगल से निकले -

बलटिहान बाबा, तेरो अजब है हाल
रे बाबा, तेरो अजब है हाल
मांगे न मोती, नाहीं हीरा
नाही मांगे गहना-गुरिया ,
मांगे चड्ढी-पुआल रे बाबा
तेरो अजब है हाल
रे बाबा......

- सतीश पंचम


नोट: सेंट वैलेंटाईन के लिये बलटिहान बाबा नाम ज्ञानदत्त जी द्वारा दिया हुआ है। विशु्द्ध देशज नाम है। आशा है वैलेंटाईन के विरोधक इस बलटिहान बाबा नामकरण से तमाखू के साथ पिपरमिंट का स्वाद पाएंगे :)

14 comments:

संतोष त्रिवेदी said...

:-):-)

GYANDUTT PANDEY said...

हा! हा! कढ़ैय्या/रोट के साथ बल्टिहान बाबा को गुलाबी लंगोट भी चढ़ता है। आशा है सदरू सिलवा लिये होंगे!

Vivek Rastogi said...

ऐ लो हमें आज पता चला कि बल्टिहान बाबा ज्ञानदत्त जी द्वारा प्रदत्त शब्द है, वरना हमें सतीश पंचम ही याद आते थे। जय हो बल्टिहान बाबा की।

Abhishek Ojha said...

:)

वाणी गीत said...

पत्थर पूजने से कौन भगवान् मिलते हैं , मगर बल्टिहान बाबा को पूजा जा सकता है ...
आधुनिकता के नाम पर वही सब अपनाया जा रहा है जिसका विरोध होता रहा ...अपसंस्कृति को आधुनिकता का नाम देने वाली गिरगिटी मानसिकता पर अच्छा तंज कसा है ...प्रेम का पर्व मनाने में ऐतराज़ कहाँ मगर प्रेम हो तब तो !!!!
पूरा लेख पढ़ते हुए लगा कि सचमुच कोई बाबा ही होंगे!

Rahul Singh said...

कौन न बन जाए, सदरू भगत के बलटिहान बाबा का भगत.

प्रवीण पाण्डेय said...

कल बलिटाहन बाबा का प्रताप देख आये बंगलोर में, चकाचौंध है अभी भी...

प्रवीण पाण्डेय said...

*बलटिहान बाबा

सञ्जय झा said...

dadda se sabhar apko abhar..........

jai ho.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मजेदार व्यंग्य लिखे हैं। पढ़े रहेन एहका, अभहिन तलक इयाद है। लेकिन ई बाबा जौने तेजी से ऊधाये रहेन अभहिन ले वैसे बना हैन कौनो ढेर तरक्की नाहीं कियेन। नवका छोकरा-छोकरी ओनका नाम लेई-लेई के मजा मारेन बाकी एक्को मंदिर-वंदिन नाही बनायेन! परसाद मिला तो परसादो क तिरस्कार कय रहा हैन:)

Shah Nawaz said...

कई महत्त्वपूर्ण 'तकनिकी जानकारियों' सहेजे आज के ब्लॉग बुलेटिन पर आपकी इस पोस्ट को भी लिंक किया गया है, आपसे अनुरोध है कि आप ब्लॉग बुलेटिन पर आए और ब्लॉग जगत पर हमारे प्रयास का विश्लेषण करें...

आज के दौर में जानकारी ही बचाव है - ब्लॉग बुलेटिन

Udan Tashtari said...

बलटिहान बाबा, तेरो अजब है हाल :)

सुमन'मीत' said...

वाह

Rakesh Ranjan said...

:)

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