सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, February 11, 2012

वार्ता और लाप

- रोया गया था


- नहीं रोया गया था

-आंसू आये थे

- नहीं आये थे

-मैंने देखे थे वे आंसू

-आंखों में कचरा भी जा सकता है

-कचरे वाले आँसू अलग होते हैं

-होते होंगे लेकिन वे आँसू नहीं थे

-तुम नाहक मेरी बात काट रहे हो

-काटने लायक बात कहोगे तो काटना ही पड़ेगा

-देखो यह ठीक नहीं, आंसू आये थे मतलब आये थे

-नहीं आये थे

-तुम समझते क्यों नहीं

-समझने की जरूरत भी नहीं है

-अच्छा छोड़ो, चाय पियोगे

-पिलाओगे तो क्यों न पिउंगा

-ए लल्लन, दू ठो .....और कैसा चल रहा है

-जैसा पहले चल रहा था

-तुम इतना उखड़े क्यों हो

-उखड़ने वाली बात करोगे तो उखड़ेंगे ही

-अब तक क्या उखाड़ लिया उखड़ कर

-चाय पिलाना हो तो पिलाओ, फालतू बात के लिये टाइम नहीं है

-लल्लन जरा जल्दी लाओ यार

-रहने दो लल्लन, अब हम चाय वहीं जाकर पियेंगे

-अमां रूको तो.....अरे रूको यार....ठीक है....जाना हो तो जाओ लेकिन उनसे इतना जरूर कह देना कि हमने रोने वाली बात 'रौ' में कह दी थी.........और 'रौ' राशन से नहीं मिलता बल्कि ब्लैक में खरीदना पड़ता है......ऐ बे लल्लनवा, साले तेरी चाय बीरबल की खिचड़ी है क्या बे जो दो दिन तक पके जा रही है......लाकर दे नहीं सकता था कच्चा पक्का.......देख वो जा रहा है तेरा  अंकल...... अभी जाकर कच्चा पक्का सुनायेगा वहीं..... औ तू यहीं चाय ही पकाते रह....।


- सतीश पंचम

11 comments:

संतोष त्रिवेदी said...

हम तो पी गए उन आसुंओं की चाय बनाकर !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मुन्ना लल्लन नाहक ही पिसा चला गया यूं ही बीच में...खरामां खरामां...

Shiv said...

हा हा हा मजेदार!

रश्मि प्रभा... said...

ऐसे वार्तालाप से बिना चाय रहना मंजूर है ...

प्रवीण पाण्डेय said...

रौ की तो सबकी अपनी खेती है, बाहर से कुछ भी नहीं मिलता है..

GYANDUTT PANDEY said...

यह तो अब ऑफीशियल है कि आंसू नहीं थे, इमोशनल था।
[इमोशनल बोले तो चाय जल्दी बन सकती है!]

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वार्तालाप, अश्रु-प्रलाप?

राजेश सिंह said...

मीठी और कड़क, एकदम मलाई मार के.

Arvind Mishra said...

बस चंद दिन और हैं....नाटकों और घडियाली आंसुओं के ....

Abhishek Ojha said...

:)

abhishek shrivastava said...

stish bhai maza aa jata hai aapkee lekhni pad kar, bahut teekhi chot marte hain aap, kashi ka assi ki badi charcha sun rahe hain aapke dwra, kahan milegi? padne ke liye man hulsa raha hai.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.