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Tuesday, January 3, 2012

पार्टी हैकमान...v/s....रोन्दडू नेता की श्रीमती जी !

पार्टी हाईकमान के सामने

- आप को चुनाव का टिकट चाहिये.... ठीक है हम इस पर विचार करेंगे लेकिन क्या आप बता सकते हैं कि आप मंत्री होते हुए भी सरे बाजार क्यों रो रहे थे।


- बस रूलाई आ गई थी सर, क्या करता, बहुत संभाला लेकिन रहा नहीं गया। अंत में बुक्का फूट ही गया।

- लेकिन बुक्का फूटने के बाद भी आप गमछे में रूपये बटोर रहे थे ?

- नहीं जी ऐसी बात नहीं, वो तो मैं लोगों के बीच अपने प्यार को बटोर रहा था।

- तो क्या आजकल प्यार गमछे में मिलता है ?

- जी, आजकल जमाना ही ऐसा है। वो गाना नहीं सुने थे, सजन जी दिलवा मांगे हैं...गमछा बिछाय के.....ही ही .....तो हम अपना गम उसी गमछे के छोर पर न्योछावर कर दिये थे औ पबलिकिया का हम बहुत सहानूभूति बटोरे, आप तो देखे ही होंगे टीवी पर।

- और क्या क्या बटोर सकते हैं ?

- जी, कुर्सी, दरी से लेकर प्रदेश सरकार तक बटोरने की काबलियत है हमारे अंदर ।

- केन्द्र सरकार क्यों नहीं ?

- वहां आप जैसे हैकमान लोग होंगे कि हम जैसे दरी-जाजिम बटोरू लोग कहां पार पायेंगे...ही ही...।

- सो तो ठीक है, लेकिन जनता में आपके रो देने से की छवि रोन्दड़ू की बनेगी उसका क्या ?

- रोन्दड़ू कौन नहीं है, बताइये....वहां पारलेमेन्ट में कुछ समय पहले देखा था एक भगवा स्वामी बड़ी जोर-जोर रो रहे थे.....आजकल उन पर साध्वी के साथ लटपटिया जाने का आरोप है...अखबरवा में तो पढे ही होंगे ।

- फिर भी....छवि तो छवि है.....रोवनहे उम्मीदवार को लेकर हमारी नाव कहां तक खेई जा सकती है।

- सर एक बार मौका त दिजिए....जइसे रोय गाय के गमछा में पइसा रूपिया बटोरे वइसे वोटवो बटोर देंगे....आप बस एक चांस दिजिए।

- लेकिन...

- सर एक ही चांस.....हार गये तो आप का कुछौ नहीं बिगडेगा...हमारा बगद जायेगा....औरतीया घर में घुसने नहीं देगी ।

- अरे...यार तुम फिर रोने लगे ।

- सार जी......हैकमान जी....हम द्रवित हो रहे हैं....कृपया इसे रोना न कहिये।

- ठीक है, आप को हम चुनावी टिकट देंगे लेकिन एक बात है.....रोने को तो रो लिये लेकिन हारने पर तुम्हारा गमछा तुम्हें ही ओढ़ाकर दुलहिन की तरह बारात निकालेंगे....इहौ जान लो।

- सरत मंजूर सरकार...आपका पैरवा कहां है.....तनिक चरण रज छूने का मन कर रहा है :)

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घर में
- ए जी, कल आप काहे रो रहे थे, मुखमंत्री जी ने आपको मंत्री पद से हटा दिया इसीलिये ?

- अरे नहीं रे, वो मुखमंत्री होगी अपने घर की होंगी.....हम तो अपने लिये सहानूभूति बटोर रहे थे ।

- तो क्या सहानूभूति ऐसे बटोरा जाता है ?

- उ का है कि राजनीति और प्यार मोहब्बत में सब करना पड़ता है ।

- त का हमसे पियार करने में भी रो दिजिएगा ?

- अरे रोने का क्या कहती हो, कहो तो गा भी दें...बजा भी दें।

- अच्छा हटिये, पड़ोसन कह रही थी बबलू के पापा रो रो कर वोटवा मांग रहे थे।

- कहने दो, उसे का मालूम राजनीति में ये सब होता रहता है, कोई खुल्ले में रोता है कोई कमरे में।

- और वो शर्मा जी की चसमे वाली सीरीमती जी, पूछ रही थी कि कुसुम की अम्मा, काहे कुसुम के पापा रो रहे हैं, कुछ डांट ओंट दी हो क्या ?

- अरे सरमाईन का क्या ली हो.... बिना चार लात लगाये सुबह अपने पति को वो उठाती नहीं....बात करती है।

- अरे फिर भी, आप को अपना नहीं तो मेरा तो ख्याल करना था....बुक्का फाड़ के रो रहे थे।

- अरे तो रो लिये तो कौन बड़ा गुनाह कर लिये, मार इहां उहां हल्ला मचाई हो ?

- हल्ला न मचायें तो क्या करें, मिसराईन भी कह रहीं थी कि कुसूम के पापा को कुछ हो गया है क्या जो रो रहे हैं ?

- अब तुम पूरे मोहल्ले का नाम गिना डालो।

- अरे अभी तो यदुवाईन, पंडाईन, गुप्ताईन का बकियै है।

- भाड़ में जांय तूं और तुम्हारी पड़ोसिन, तनिक  अंखियां द्रवित क्या हुई  सब की सब पूछने लगीं।

- पूछें न त का करें, मरद आदमी कभी रोता है भला ?

- हमारी मरदानगी पर संका मत करो।

- हम काहें संका करेंगी....हम को मालूमै है...एक दू ठौ और रक्खे हो बंगला छवा के।

- अब तुम हद से आगे बढ़ रही हो।

- अरे ज्जाईये.....उसी लहुराबीर वाली के साथ हद पद गाईये....इहां नहीं.....वो भी जान गई होगी कि कितना बड़ा मरद मिला है कि सरे बाजार रो रहा था।

- देखो मेरा हाथ उठ जायेगा।

- हथवै न उठेगा.....आइये तो देखूं तनिक.....ए कुसूमी....जा तनिक गुप्ताईन...पंड़ाइन...मौरियाईन सबको बुला ला तो....तनिर ओ लोग भी त देखें कि कितना बीर बहादुर मरद है जो औरतीया को मार रहा है।

- देखो मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं...चुनावी मौसम है...पोजिसन खराब मत करो ।

- देखिये....फिर रोने लगे.....हे भगवान....कहां चली जाउं....ए कूसूमी.....रूक जा रे...मत जा। फिर से गुप्ताईन पूछने लगेगी ठोड़ी पर हाथ रखकर.......कुसूमी के पापा को मारी-ओरी हो क्या ? डांट-ओंट
 दी होती, इतना मारने-पीटने की क्या जरूरत थी :)


- सतीश पंचम

9 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सही है। :)

Padm Singh said...

जबर्दस्त... कुसुमी के पापा पोजीसन सही कर दिए महराज :)

संजय @ मो सम कौन ? said...

अमां यार रोने भी नहीं दोगे क्या?
इस रुदन कांड से सिद्ध होता है कि भूतपूर्व हाईकमान इतना तगड़ा है नहीं, वरना तो जबरा मारे भी है और रोने भी नहीं देता। रोने की लिबर्टी तो थी ही न..

प्रवीण पाण्डेय said...

टिकट बड़े ही मँहगे हो गये हैं अब तो..

नीरज गोस्वामी said...

जबरदस्त...आपका लेखन बेजोड़ है

नीरज

ajit gupta said...

भैया हंसते-हंसते हमारे भी आंसू तो आ ही गए। बहुत ही जोरदार रहा।

Arvind Mishra said...

बड़े प्रपंची हैं भाई ई सब नेतवन .घडियाली आंसू बहाने में माहिर .....

anshumala said...

हमारे यहाँ कहावत है जहा जाये राधा रानी वह बरसे पत्थर पानी ! पहले खुद रोये और अब जिस पार्टी में गये है उसे भी रोने के मुहाने ला दिए है रोनू नेता न निगले जा रहे है न उगले जा रहे है बी जे पी से |

shilpa mehta said...

:)
जय हो :)

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