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Monday, January 30, 2012

दुरूस्तीकरण ऑफ 'वैवाहिक स्थिति'

      कल्पना करें कि अचानक आपकी जीवन संगिनी को कोई आपकी पत्नी मानने से ही इन्कार कर दे तो ? आप लाख समझायें कि भई यही है मेरी श्रीमती जी लेकिन सामने वाला मानने के लिये तैयार न हो तो ?


    यह हाल ही में तब हुआ जब मैं आधार कार्ड बनवाने के लिये अपने घर के पास ही बने एक केन्द्र पर पहुंचा। वहां दो निर्दिष्ट डॉक्युमेंट चाहिये थे किसी के कार्ड बनाने के लिये। बच्चों के कार्ड बनाने के लिये उनका जन्म प्रमाण पत्र या स्कूल से बोनाफाइड सर्टिफिकेट पर्याप्त है बशर्ते पिता को पहले ही आधार कार्ड मिल गया हो या मिलने लायक डॉक्युमेंट सही पाये गये हों। मेरा आधार कार्ड करीब चार महीने पहले ही ऑफिस के पास लगे एक केन्द्र में आराम से बन गया था। उसके रेफरेंस नंबर के साथ बच्चों का भी आधार कार्ड बन गया लेकिन पत्नी का आधार कार्ड बनने की जब बारी आई तो एक डॉक्युमेंट कम पड़ता दिखा। पत्नी का वोटर कार्ड तो था, लेकिन रेशन कार्ड में नाम दर्ज करना रह गया था। दरअसल मेरे एक दूसरे फ्लैट के रेशन कार्ड में नाम ट्रांसफर करने के लिये पत्नी का नाम देने की कवायद चल रही थी और उसी दौरान रेशन कार्ड में पत्नी का नाम नहीं था।

  ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारी ने तब पत्नी के नाम बैंक पासबुक की मांग की, जबकि हम दोनों का ज्वायंट अकाउंट था। वह अड़ गया कि पत्नी के नाम अकाउंट होना चाहिये। मैंने मुस्कराते हुए कहा – "यार किसी महिला के साथ मेरा अकाउंट है तो जाहिर है पत्नी ही होगी, कोई दूसरी तो होगी नहीं"।  लेकिन शायद उसे मुझ पर विश्वास न था या हो सकता है तकनीकी रूप से यह कागजात पर्याप्त न थे। पैन कार्ड की बात हुई तो वह भी मौके पर नदारद। तभी एक ने कहा कि आपका मैरिज सर्टिफिकेट हो तो भी काम चल जायगा। लेकिन गँवई विवाह तो कागजों पर दर्ज नहीं किया जाता था, सो अब तक मैंने भी रजिस्टर नहीं करवाया था। जरूरत ही नहीं पड़ी। जौनपुर के एक मंदिर की दीवारों पर तो लिखा भी देखा था – विवाह कोई कानूनी बन्धन नहीं बल्कि जन्म जन्मांतर का अटूट बन्धन है जिसे बहुत कुछ सह कर निभाया जाता है। इस हिसाब से जानता हूं कि श्रीमती जी मेरे लिये ही बनी हैं और मैं श्रीमती जी के लिये। कम से कम इस जन्म में तो हमारा जन्म-जन्मांतर बुलंद है। लेकिन सरकारी काम तो सरकारी है। बंदे को मैरिज सर्टिफिकेट चाहिये था। उसके बिना आधार कार्ड नहीं बनना था । नतीजतन उस वक्त मेरे पहले से बने कार्ड के साथ-साथ बच्चों के कार्ड तो बन गये (रसीदी रूप में ) लेकिन श्रीमती जी का कार्ड न बन सका। उधर श्रीमती जी के मन में कुछ और शरारत चल रही थी। घर पहुंचते ही कह बैठीं – "आज से आप अपना इंतजाम अलग कर लिजिये"।

- क्यों ?

- "कानून मुझे आपकी पत्नी नहीं मानता, तब मैं क्यों आप की गुलामी करूं, खाना बनाउं, कपड़े धोउं, घर संभालू.....आप अब अपना इंतजाम कर लिजिये, अब से मैं आजाद हूं" :) 

श्रीमती जी की बात सुन मुझे भी चुहल सूझी – ठीक है तुम्हारी जैसी मर्जी, मैं भी आजाद हूं। ढूंढता हूं एकाध दूसरी।

- और ये जो तीनों बच्चे हैं वे ? उसी दूसरी वाली के पास रखेंगे ?  :)

- तुम जानों, आजादी तुम्हें चाहिये। तुम ही रखो अपने पास। मेरी गुलामी पसंद नहीं तो लेई जाओ जहां जाना चाहती हो।

- मैं क्यों ले जाउं। बच्चों के आधार कार्ड पर आपके ही कार्ड का रेफरेंस नंबर दर्ज है, कानूनन आप ही इनके सब कुछ हैं, पिता हैं। मेरा तो कोई वजूद ही नहीं है। अब तो मैं सरकारी तौर पर आपकी और आपके बच्चों की कुछ नहीं हूं..... बता देती हूं, हां :) 

   यह स्थिति वाकई मौजूं रही। शाब्दिक ही सही लेकिन श्रीमती जी ने चुहलबाजी में ही बाजी मार ली कि तकनीकी रूप से मैं अपने बच्चों का अभिभावक हूं, सारी जिम्मेदारी मेरी बनती है। उपर से लगे हाथ घोषणा भी कर दी है - "अब मैं आजाद हूँ"  :) 

   यह चुहल यहीं शांत न हुई। भोजन परोसने के दौरान भी श्रीमती जी छेड़ने से न मानीं – “लिजिये, न जाने किस मोह माया से परोस दे रही हूं न वरना मैं चाहूं तो कानूनी रूप से आपको न खाना दूं, न पानी .... मैं आपकी हूं ही कौन”   :)

     यह चुहल  काफी देर तक चलती रही। उधर नेट पर सर्च करना शुरू किया कि विवाह के इतने सालों बाद यदि रजिस्टर करवाना हो तो क्या क्या डॉक्युमेंट लगेगा, क्या क्या कवायद होगी। उसी दौरान पता चला कि उस पंडित की गवाही लगेगी जिसने विवाह कराया था, तीन लोगों की गवाही लगेगी। शंका हुई कि कहीं वह पंडित जी होंगे भी या नहीं, फिर सोचा और कोई हो या न हो अपने अरविंद मिश्र जी को ही ले जाकर खड़ा कर दूंगा कि यही थे जो मेरा विवाह करवाये थे, लेकिन वाकई लगता है कि विवाह का सर्टिफिकेट होना बहुत जरूरी है। पासपोर्ट आदि में तो मस्ट है। बाकी और भी कई बातों के लिये यह अति-आवश्यक भी है। ईश्वर न करे कभी कुछ किसी एक को दुख दर्द हो जाय तो सरकारी काम में हर जगह ऐसे सर्टिफिकेट मांगे जायेंगे, हर जगह वो सारे प्रूफ मांगे जायेंगे जो एक दूसरे को एक दूसरे का साबित करें। मंदिर की तख्ती भावनात्मक रूप से अपनी जगह सही है लेकिन व्यवहारिक रूप से सरकारी कागजात तो पूरे करने ही होंगे। आधार कार्ड का दूसरा डॉक्युमेंट यानि पैन कार्ड तैयार है। श्रीमती का कार्ड अब बन जायगा। लेकिन मैरिज सर्टिफिकेट भी बनाना जरूरी है, वरना श्रीमती जी की घोषणा कपाल पर बम की तरह गिरती रहेगी : )

  फिलहाल  जुट गया हूँ उस पंडित को ढूँढने जिसने मेरा विवाह कराया था, दो तीन गवाहों को भी ढूँढ़ना पड़ेगा, फोटू शोटू, निमंत्रण पत्रिका की एकाध बची खुची कापी नत्थी करनी होगी, लब्बो-लुआब यह कि अभी  इस कानूनी रूप से 'कुँवारे बाप'  की  कवायद लम्बी चलनी है.....ओ पण्डित जी....अरे तनिक सुनिये तो....अरे सुनो यार :)

- सतीश पंचम

24 comments:

kshama said...

Bahut maza aaya aapka aalekh padhte,padhte!

अजय कुमार झा said...

आपकी आपसी नोंक झोंक से परे ऑन सीरीयस नोट , ई कानूनवा को कंपलसरी किए हुए अभी ज्यादा समय नहीं बीता है और जहां तक मेरी जानकारी है कि उस तिथि के बाद से ही विवाह का पंजीकरण अनिवार्य है । उस तिथि से पहले के विवाह और उनके प्रमाणीकरन के लिए और भी विकल्प हैं । बहरहाल ..होम मिनिस्टर से पंगा ..महंगा ही पडता है देस को भी आऊर आपके हमरे जैसा भदेस को भी :)

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

ऐसा हुआ तो आधे हिन्दुस्तान को ही पंडित ढूंढने पड़ेगें। हमें तो चित्रगुप्त से पता करना पड़ेगा कि उपर किस मोहल्ले में हैं पंडित जी :)

Mired Mirage said...

हमें तो पक्का पता है कि हमारे पंडित जी गुजर चुके हैं. पासपोर्ट बनवाते समय, विदेश जाते समय तो एक एफिडेविट दिया था अब पता नहीं क्या करवाना पड़ेगा. वैसे एक बार जाकर रजिस्टर्ड विवाह( आपस में ही)भी करवाया जा सकता है. दो वर्षगाँठे मनाने को मिल सकती हैं.
घुघूतीबासूती

काजल कुमार Kajal Kumar said...

1. बहुत पहले मैंने एक नाटक देखा था जिसमें बात-बात में पति कहता है कि वैसे ही होगा जैसा मैं चाहूंगा क्योंकि मैं बच्चे का बाप हूं. पत्नी कहती है -"तुम्हें कैसे पता." And the husband goes into shell. नाटक चलता रहता है वह अन्तर्मुखी व दुखी होता चला जाता है. अंत में एक दिन पत्नी को पता चलता है कि सारी जड़ उसका कुछ वह कहना था जिसने उसे यूं ही बस चुहलबाजी में कह दिया था...☺
2. ...पर भूतनी के बंग्लादेशियों को तो ख़ुशी ख़ुशी कार्ड बांट रहे हैं.

संजय @ मो सम कौन ? said...

बोत मजे लेते रहे हो गुरू, अब पता चल रया है आटे दाल का भाव जब सुनने को मिला की 'हम आपके हैं कौन?' :)

Arvind Mishra said...

मुझे आप सरीखे युवाओं पर तरस आता है ..जो ऐसे पकडे जाते हैं जैसे ऊँघ से रहे हों ..महराज इस बार कोर्ट कचहरी पहुँच अपना मैरेज सार्टिफिकेट बनवाईये ...डिप्टी कलेक्टर साहब से नहीं तो विदेश का चांस मिलने पर भारी नौबत आयेगी ....मैंने अपनी प्रतापगढ़ पोस्टिंग दौरान ऐसे ही एक सज्जन का प्रमाण पत्र बनवाने में उनकी भारी मदद की थी -उनका बूढा बिचारा बाप तीन साल से दौड़ रहा था .......और जनाब अमेरिका में मौज काट रहे थे ..बीबी के साथ ...मगर नौकरी से हतः धोने की नौबत अ गयी थी ....बाकी काजल जी हमेशा की तरह इस बार बजा फरमा रहे हैं !

shama said...

Aap dono pati-patni ne is ghatna ko mazq kaa roop diya to theek hai warna badee koft hotee hai aise halaat me!

सतीश पंचम said...

Shama ji,

इस आधार कार्ड को लेकर हुए अनुभव से हम दोनों के बीच मजाक ही चल रहा था जिसे पोस्ट के रूप में लिख दिया गया है :)

Padm Singh said...

मज़ाक मज़ाक मे सीरिअस कर दिया भाई...खैर है अभी तो अपने गृह मंत्रालय तक खबर नहीं पहुँची है :)
लगता है अब शादी कर ही लेनी चाहिए बच्चे भी बड़े हो गए हैं

.....पर भूतनी के बंग्लादेशियों को तो ख़ुशी ख़ुशी कार्ड बांट रहे हैं????????

सतीश पंचम said...

पद्म जी,

काजल जी ने उन लोगों की ओर इशारा किया है जो खुद के देश के लोगों को तरह तरह से कागजी कार्यवाही में उलझाये रहते हैं लेकिन बांग्लादेशी शरणार्थियों को अवैध या किसी और तरीके से कार्ड बांटे चले जा रहे हैं। यहां मुम्बई में भी राशन कार्ड लीगल तरीके से रहने वालों के पास भी नहीं मिल पाता लेकिन बांग्लादेशियों के पास जरूर मिल जाता है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अरे इसमें तो आपके अगले बेस्टसेलर "अपनी पत्नी को कानूनन ग़ैरकानूनी कैसे बनायें - पीडित पति के लिये एक गाइड" के बीज छिपे दिख रहे हैं। बधाई हो!

रश्मि प्रभा... said...

मान लेता पत्नी तो इन ख्यालों का क्या होता ! हंसने का मौका मिला , एक दूजे को चिढ़ाने का - अच्छा लगा

प्रवीण पाण्डेय said...

बात तो भाभी जी की सच है, आपको खाना न दें तो भी आप कुछ नहीं कर सकते हैं। आप एक बार प्रक्रिया बता दें तो हम भी कर लेंगें।

अतुल प्रकाश त्रिवेदी said...

ये आधार तो आपको निराधार कर दे रहा है . वैसे गांधी सिनेमा में उस समय विवाह कानून में लाए बदलाव पर कुछ संवाद याद आ गए - "क्रिश्चियन विवाह के अलावा कोई विवाह वैध नहीं माना जायेगा इस क़ानून की नज़रों में हमारी माताएं और पत्नियां वेश्या हैं और यहाँ उपस्थित हर मर्द हरामजादा " ऐसा ही कुछ जिस पर एक पात्र ने चुटकी भी ली थी - इसने नब्ज़ पकड़ ली है .

आपने भी .

नीरज गोस्वामी said...

बहुत रोचक पोस्ट...सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो...???

नीरज

ajit gupta said...

जब तक आपका आधार तैयार नहीं हो आप पत्‍नीश्री को अपनी प्रेमिका माने।

Abhishek Ojha said...

हा हा. तब हम बाल पंडित रहे होंगे :) कहिये गवाह माना जाएगा तो. बस हमारे आने का किराया दे दीजियेगा दक्षिणा में. :)

रंजना said...

विवाह के बारह वर्ष बाद पासपोर्ट बनाने के चक्कर में विवाह को रजिस्टर्ड करना पड़ा...पतिदेव की बड़ी इच्छा थी कि गवाह बेटे को बनायें, पर समस्या यह थी कि वह बालिग न था..वर्ना उसी को बनाते...

सही बात है भाई, कानून माने तो आप जिन्दा, न माने तो खुद को ज़िंदा साबित करना भी जब दुरूह होता है, तो बाके की क्या कहें..

निरामिष said...

रोचक व्यंग्य!!

Udan Tashtari said...

हा हा!! बनवा ही लो मैरिज सर्टिफीकेट लगे हाथ....

राजेश उत्‍साही said...

आधर ने तो आधा ही कर दिया। बहरहाल आपकी इस पोस्‍ट से बातों बातों में ही बहुत काम की जानकारी मिल गई ।

राजेश उत्‍साही said...

आधर को आधार पढ़ें।

GYANDUTT PANDEY said...

अरे बाप रे! यह पोस्ट पत्नीजी से कैसे ब्लॉक की जा सकती है, कोई यह बताने का कष्ट करे।

हमारे पास भी कोई सर्टीफिकिट नहीं है। और हमारी पत्नीजी भी ऐसी धमकी देने में पूर्ण सक्षम हैं!

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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