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Sunday 8 January 2012

चुनावी आचार संहिता से पनप सकता है 'बूतक साहित्य'

     क्या मस्त जलवे हैं इस बार हो रहे पाँच राज्यों में होने जा रहे चुनाव के.....बॉलीवुड के सारे मसाले कूट-कूट कर डले हैं.....एकदम चौचक अंदाज में......इतने कि बिल्लो जो कभी गुलज़ार के कहने पर इस्क में ‘डली भर नमक’ डालने की बात कर रही थी, उसकी भी दाल फीकी पड़ जाय। जहां एक ओर बाबूसिंह कुशवाहा को लेकर दिलचस्प फिल्म चल रही थी, आरोप प्रत्यारोप लग रहे थे, विपक्षी पार्टीयां हाथ सेंक रही थीं, ताप रही थी, कुछ हाथ धो रहे थे वहीं क्लायमेक्स में आते आते बाबूसिंह कुशवाहा की चिट्ठी ने डैमेज कंट्रोल की भूमिका फिल्मी अंदाज में निभाई और अब तो उस फिल्म का तात्कालिक रूप से धीरे-धीरे पाटक्षेप सा हो गया लगता है, आग बुझ सी गई लगता है। हां, जब तक चुनावी माहौल रहेगा, रह रहकर कुशवाहा एपिसोड की राख कुरेदी जाना लाज़िमी है, आखिर राख ठहरी,  हाथ धोने के लिये काम तो आनी ही है :)

          दूजी ओर एक और बानगी देखिये कि चार बजे शाम अभिषेक मनु सिंघवी की प्रेस कांफ्रेंस हुई कि चुनावों के दौरान लेवल प्लेइंग होना चाहिये, मायावती और उनके हाथी की मूर्तियों को ढंकना चाहिये ताकि मतदाताओं पर उसका चुनावी असर न पड़े और उसके कुछ देर बाद टीवी पर ख़बर फ्लैश हो गई कि चुनाव आयोग ने मूर्तियों को ढंकने का फैसला कर लिया है। अब देखिये कितने क्विंटल तिरपाल और प्लास्टिक की शीट खप जायेगी। हो सकता है इसी बहाने किसी बंद होने की कगार पर पहुँचे प्लास्टिक कारखाने, प्लायवुड कंपनी याकि पैकिंग मटेरियल इंडस्ट्री को कुछ जीवनदान मिल जाय।

          वैसे भी इस तरह के एतिहासिक फैसले आगामी राजनीतिक, सामाजिक एंव आर्थिक जीवन के लिये नज़ीर का काम करते हैं। राजनीतिक क्षेत्र में जहां इस फैसले से राजनेताओं में संदेश जायेगा कि इस तरह के ‘सदा-ठाड़’ चुनाव चिन्हों के निर्माण से जनता में चिन्ह उनके अवचेतन मन तक पहुंचाया जा सकता है वहीं सामाजिक क्षेत्र में यह बदलाव होगा कि शिल्पकार पुन: अपना वह सम्मान अर्जित कर सकेंगे जिन्हें राजे-रजवाड़ों के अवसान के चलते खोना पड़ा था। लुहारों को फिर से भरपूर काम मिलने लगेगा क्योंकि शिल्पकार अपनी छेनी, हथौड़ी उनके पास ही बनवाने ले जायेंगे। फिर जब सब कुछ तैयार हो जायेगा तो चुनावी आचार संहिता अपना रंग दिखायेगी और उन निर्माण स्थलों को ढंकने का काम शुरू होगा। ढेर सारे प्लायवुड लगेंगे।

     विज्ञापन एजेंसियों को अपने विज्ञापनों को नये ढंग से प्रसारित प्रचारित करने का मौका मिलेगा। चलता रहे....चलते रहे वाले विज्ञापन का कथानक बदल कर कुछ यूं होगा कि उनके प्लायवुड ने मायावाती की मूर्तियों से लेकर फलांवती तक को हर चुनाव में ढंका है। अलां चुनाव से लेकर फलां और ढेकां तक के चुनावों के दौरान प्लायवुड काम आता दिखाया जायेगा। एक ओर मूर्तियां सजी होंगी तो दूजी ओर प्लायवुड रखे दिखेंगे जो कि उन्ही पत्थरों की मूर्तियों से मजबूत आंधी-पानी को झेलते हुए दिखाये जायेंगे।

           एक कठिनाई यह होगी कि ऐसे लोग मिलने मुश्किल हो जायेंगे जो इन मूर्तियों को चुनावी आचार संहिता के दौरान ढंकने का काम करते हों। पता चला जिस एजेंसी को मूर्तियां ढंकने का ठेका मिला अगली बार सरकार बदलते ही उस पर गाज गिरे कि तूमने हमारी मूर्तियों को क्यों ढंका। बेचारे ऐसे मूर्ति ढंकने वाले मन ही मन डरे सहमें जा रहे होंगे कि कोई विपक्षी पार्टी वाला उनमें जोश भरने की कोशिश करेगा मानों अगली बार वही चुन कर आने वाले हों। कोई बंदा हीरानंद ‘सोज़’ की तरह कह भी देगा कि –

जनाजे वालो  ना  चुपके  कदम  बढ़ाये चलो
उसी का कूचा है तक करते हाये हाये चलो


         ऐसे में हो सकता है चुनावों के कई चरण होने से पर्दादारी लंबी चले। कभी जिले स्तर का चुनाव तो कभी नगर निगम का चुनाव तो कभी कुछ तो कभी कुछ। ऐसे में रोज वहां से गुजरने वाले जिन्हें आदत पड़ गई थी ऐसे बूतों को देखने कि पर्दादारी से आज़िज आकर सिद्दीक देहलवी जी की तरह शायराना तबियत से कहें –

उलट दे ऐ सबा (हवा) तू ही नक़ाब-ए-रूख को चेहरे से
कभी  तो देख  लें  हम  भी  ज़रा  सरकार  की    सूरत

        हद तो तब होगी जब उस शायराना राही की बात सुन हवा प्लास्टीक शीट्स को यहां वहां से छितरा दे और मूर्तियां कहीं-कहीं से झलकने लगें। ऐसे में अर्श मल्सियानी की तरह कोई विपक्षी पार्टी का शायर फिकरा न कस दे कि –

है देखने वालों को संभलने का इशारा
थोड़ी नक़ाब आज वो सरकाये हुए हैं

       फिलहाल यह तो शुरूवाती कठिनाईयां होंगी, आगे जाकर ऐसे ‘मूर्ति-ढंकैतों’ को लोग सहज ढंग से बाकी ठेकेदारों की तरह अंगीकार कर सकेंगे। ‘मूर्ति-ढंकैत’ आज इस पार्टी की प्रस्तर मूर्तियों को ढंकेंगे, कल उस पार्टी की मूर्तियों को ढंकेगें, जिससे राजनेताओं में देर-सबेर यह संदेश जाएगा ही कि मूर्तियां ढंकने वालों में और शम्शान में चिता जलाने वालों में कोई फर्क नहीं है। उनके सामने जो भी आता है उससे वे समभाव से व्यवहार करते हैं। हो सकता है कैरियर के नये आयाम खुल जांय। Sculpture, Mural, Painting, आदि के साथ साथ ‘Hide-Art’ या ‘छुपम-छुपाई आर्ट के नये कोर्सेस सिखाये जांये। उनमें बताया जाय कि हाथी वाले Sculpture को किस कपड़े से ढंका जाय तो उनके लंबे समय तक संरक्षण में आसानी होगी, बंदर वाले प्रस्तर किस ढंग से ढंके जांय तो उनके रंग-रूप को नुकसान न पहुँचे। राजनेताओं की मूर्ति हो तो कितना ढंकना चाहिये आदि आदि।

       इस सामाजिक बदलाव के साथ-साथ साहित्यक क्षेत्र में भी नये नये आयाम जुड़ेंगे। शायर तो शायर बड़े बड़े आलोचक भी अपनी धार तेज करते नजर आयेंगे। गरीबी और तंगहाली से जूझती जनता के दर्द को देख आलोचक महोदय कहेंगे – ‘बूतक’ साहित्य को साहित्यिक विधा के रूप में अंगीकार करना हमारे साहित्यकारों की कमअक्ली का नमूना है। सुनते ही ब्लॉगर-फेसबुकिये ऐसे आलोचकों पर टूट पड़ेंगे। क्या कह रहे हो बुढ़ऊ, चुप-चाप बुढ़ौती में घर में पड़े नहीं रहते, पोते-पोतियों को नहीं खेलाते, बहू की बनाई चाय नहीं पीते, आकर सम्मेलनों में ‘बूतक’ साहित्य की आलोचना करते हो।

      खैर, आने वाले समय में चुनाव आयोग के इस फैसले से राजनीतिक हलकों में बड़े बदलावों की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। कोई कांग्रेसी चुनाव चिन्ह हाथ को लेकर सवाल उठा रहा है तो कोई हाथी को लेकर अपनी संवेदना जाहिर कर रहा है। देखते हैं यह नई बयार किस ओर ले जाती है राजनीतिक माहौल को। फिलहाल तो उन  छिपी राजनीतिक इच्छाओं और सरकारी खर्चे से अपने को सदियों तक संरक्षित कर लेने की मंशा पर काबिल अज़मेरी का शेर बहुत सटीक लग रहा है जिसमें वे कहते हैं -

ग़म-ए-जहां के तकाज़े शदीद (बहुत) हैं वरना

जूनूँ-ए- कूचा- ए-दिलदार  हम  भी  रखते  हैं।

- सतीश  पंचम

Image Courtesy - http://news.rediff.com/slide-show/2009/jun/06/slide-show-1-queen-mayas-palace-of-illusion.htm

10 comments:

kshama said...

Bahut rochak shaili me likhte hain aap! Maza aa gaya!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

राजकुमार जीवित होते तो यूपी जाकर ये कहने का मौक़ा ज़रूर मिलता उन्हें-"आपके पांव बहुत हसीन हैं इन्हें जम़ीन पर न रखिएगा..."

संतोष त्रिवेदी said...

@उलट दे ऐ सबा (हवा) तू ही नक़ाब-ए-रूख को चेहरे सेकभी तो देख लें हम भी ज़रा सरकार की सूरत.... बकिया तो सब नौटंकी हो रही है, यह शेर मस्त लगा !

ajit gupta said...

सतीशजी आनन्‍द आ गया। कोई ढक रहा है तो कोई उघाढ़ रहा है। क्‍या अंदाज हैं चुनावों के भी! वाह।

वाणी गीत said...

क्या- क्या ढकवाएंगे !!!

सञ्जय झा said...

bhratachar me doobi system hai....
sarkar ki surat kya hogi........??

jai ho.

प्रवीण पाण्डेय said...

इस हम्माम में क्या क्या ढकेंगे हुजूर..

देवांशु निगम said...

सतीश जी,
अपने यहाँ जब चुनाव में निर्दलीय लोग खड़े होते हैं तो उनको बड़े गजब गजब चुनाव चिन्ह मिल जाते हैं| जैसे :

१. ताला-चाभी
२. पतंग
३. रेल का इंजन
४. शीशा-कंघा...आदि

इनका क्या होगा? इस बार खिचड़ी पे पतंग उड़ाना मना होगा अगर किसी को वो चुनाव-चिह्न मिल गया तो :) :) :)
पतंगबाज संभल के रहें !!!!!

Arvind Mishra said...

वाह हजूर वाह...चुनावी मौसम को आपने अपने इन फड़कते शेरों से और भी जानदार बना दिया है ..हाय हम तो हुस्नये चेहरे की दीदार को तरस जायेगें... :)

BS Pabla said...

मूर्ति-ढंकैत :-)

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