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Thursday, January 5, 2012

'गुप्त' इच्छाओं की 'सुप्त' सामग्री :)

        दुनिया में तरह तरह के रोग होते हैं लेकिन कुछ रोग गुप्त रोग कहलाते हैं। गुप्त यानि कि जो छिपा हो, आड़ में हो, किसी को नज़र न आये। इस तरह के रोगों के लिये निदान हेतु, जड़ से खत्म करने के दावे वाले विज्ञापन यदा-कदा सड़कों के किनारे या किसी मकां के दरो-दीवारों पर चस्पां हुए हमें दिख ही जाते हैं कुछ उसी तरह जैसे फिल्मों के पोस्टर या राजनीतिक छुटभैयों के बैनर-बूनरों की तरह। पहली नज़र में देखने पर ये पोस्टर मन में अजीब सी कोफ्त टाईप की भावनायें उत्पन्न करते हैं लेकिन जब पढ़ने लगो तो उनके लेखन की शैली में एक किस्म की रंजकता होती है। सभी पोस्टरों के बोल-चाल, रोगों की नामावली और उन्हें ठीक करने के दावों को पढ़ने पर कुछ-कुछ नेताओं जैसा दावा मालूम पड़ता है- ये भी ठीक कर दूंगा, वो भी ठीक कर दूंगा, बस एक बार मौका दें :)


         अभी हाल ही में मुंबई के साकीनाका इलाके से गुजर रहा था। जरी-मरी इलाके में ट्रैफिक इतना स्लो था कि चाहो तो बस से उतर कर पान खा आओ, चाय पी आओ लेकिन क्या मजाल जो बस के पहिये का चक्कर पूरा हुआ हो। ऐसे में आप मजबूरन कभी एफ एम सुनते हैं, कभी बाहर ताकते हैं, कभी सहयात्री को तो कभी एफ एम वाले आर जे के चपड़-चपड़ से तंग आकर मेमरी कार्ड वाले गाने सुनने लगते हैं। लेकिन कितना सुना जाय, उसकी भी हद होती है। ऐसे ही हालात में नज़र जाती है बाहर के उन सूक्ष्म बातों पर जिनपर नज़र जाने के बावजूद जल्दबाजी में या यूं ही हम ध्यान नहीं दे पाते। अब ट्रैफिक पूरा जाम था, पिछले पन्द्रह बीस मिनट से तार बाजार के इलाके में फंसे पड़े थे तो ध्यान गया टेलीफोन के पैनल बोर्ड पर जो पोस्टरों से अटे पड़े थे। इन टेलीफोन के पैनल बोर्डों को मैंने जब कभी देखा है कोई न कोई कर्मचारी पुराने जमाने का रिसीवर लिये, दो वायर घुसेड़े हलू-हलू बोलते ही देखा है। वो तो भला हो मोबाइलों का जिन्होंने लैंडलाइन का इस्तेमाल कम करवा दिया वरना तो जिस रफ्तार से फोन फान की संख्या बढ़ी है, हर पैनल बोर्ड के आगे एक कर्मचारी झोपड़ी बनाकर रहता, वहीं रस्सी पर कपड़े सुखाता, नहाता धोता और लगे हाथ पान की छोटी सी दुकान भी खोल लेता :)

            खैर, अब जब टेलीफोन के पैनल बोर्ड काम में कम आते हैं तो उन पर पोस्टरों का कब्जा होना लाजिमी है। ऐसी ही जगहें पोस्टरों के लिये सबसे ज्यादा मुफ़ीद भी माने जाते हैं। फिल्मों के पोस्टर जिनमें अक्सर मार डालूंगा, काट डालूंगा, जीने नहीं दूंगा, कातिल हसीना जैसे नाम दिखते हैं तो कभी-कभी शीघ्रपतन, अंडवृद्धि, सूजाक, बवासीर जैसे विज्ञापन उन कातिल हसीनाओं से लोहा लेते नजर आते हैं। कभी कभी उन्हीं पोस्टरों के बीच राजनीतिक चाहत वाले छुटभैये नेताओं के पोस्टर भी नजर आ जाते हैं जो न सिर्फ अपनी तस्वीर चस्पां करते हैं बल्कि अपने राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरें भी लगाये रखते हैं जिनका ध्येय यह संदेश देना होता है कि राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के साथ गली मोहल्ले का यह नेता भी बैठता-उठता है। लेकिन मुसीबत तब हो जाती है जब भिन्न प्रकृति के पोस्टर इन पैनलों पर आसपास सटकर लगे हों या एक पर एक चस्पां कर दिये गये हों। ऐसे में होता यह है कि पढ़ तो रहे हैं शीघ्रपतन वाला पोस्टर लेकिन बगल में माननीय नेता जी का चेहरा दिखाई दे रहा है जो अभी अभी फलां प्रदेश में केन्द्र को हड़काते दिखे थे। बताइये, कितनी बड़ी विडंबना है कि जो नेता केन्द्र को हड़काता दिखता है उसके बगल में शीघ्रपतन वाला विज्ञापन दिख रहा है, जो नेता अमरीका रिटर्न है उसके बगल में सूजाक और तमाम बिमारीयों के नामों वाला पोस्टर चस्पां है :)

           अभी हाल ही में देखा कि बवासीर वाले पोस्टर की बगल में एक राष्ट्रीय पार्टी की सुश्री जी सिंहासन पर पसरी हैं। एक झटके में दोनों विज्ञापनों को एक साथ देखने पर लगता है जैसे विज्ञापन संदेश देना चाहता है कि बवासीर का इलाज होने के बाद आप भी कुर्सी पर इन्हीं की तरह पसर कर बैठ सकते हैं, तब वह साधारण कुर्सी जो अब तक आपको बैठते उठते चुभती थी, इलाज हो जाने के बाद सिंहासन जैसा अहसास दिला सकती है। वहीं एक और पोस्टर देखा जिसमें अण्डवृद्धि के विज्ञापन के साथ बगल में ही छुटभैये नेता का खिलखिलाता चेहरा था। दोनों पोस्टरों को एक साथ देखने पर लगता था मानों विज्ञापन कहना चाहता है कि अण्डवृद्धि का इलाज होने के बाद लोगों के चेहरे ऐसे ही खिले जाते हैं जैसे इस नेता का चेहरा खिला है। गर्मी, सूजाक या ऐसे ही रोगों वाले विज्ञापनों की गरिमा कैसे बढ़ जाती है यह उन ज्वाइन्ट पोस्टरों को देखने से पता चलता है।

    अफसोस यही रहा कि देर शाम रोशनी की कमी की वजह से उन पोस्टरों को कैमरे में क्लिक नहीं कर पाया वरना तो देखते कि कैसे फबते हैं जनप्रतिनिधि बवासीर वाली पंक्तियों के संग। काव्यात्मक ढंग से गा दिया जाय तो अच्छा खासा हिट गीत बन जाय। गनीमत यह रही कि पोस्टर चिपकाने वाले बालकों ने अण्डवृद्धि वाला पोस्टर पुरूष नेता के बगल में ही चिपकाया था (इतनी समझदारी दिखाई थी :)

      खैर, अब जब कभी गर्मी, सुजाक, शीघ्रपतन वाले पोस्टर दिखें तो नाक भौं न सिकोंडें, बल्कि उन पोस्टरों की कलात्मक शैली, उनकी रंजकता का आनंद लें। आखिर और किस पोस्टर में आपको इस तरह का ‘Logo’ मिलेगा जिसमें पाल वाली नाव में दो लोगों को बैठे दर्शाया गया हो और उनका  पता  लिखा हुआ मिले  -  सिनेमैक्स टॉकिज की टिकीट बुकिंग और कार पार्किंग गेट के बाजु में :)
(देखें चित्र)

              वैसे चुनावों की आचार संहिता से जान छुड़ाने का यह सस्ता और टिकाऊ उपाय हो सकता है, राजनेता अपने पार्टी के नाम पर तय संख्या से ज्यादा पोस्टर नहीं छपवा सकते लेकिन ऐसे क्लिनिकों के 'प्रचार सामग्री' पर भला चुनाव आयोग को कैसी आपत्ति होगी  जिनमें शख्स का पता ठिकाना ही नाव, पार्किंग और टिकट विंडों के बाजू में दर्शाया गया हो   :)

 - सतीश पंचम

8 comments:

आशीष श्रीवास्तव said...

शिवपालगंज के वैद्यजी का पोष्टर याद आ गया 'जीवन से निराश नवयुवकों के लिए आशा का संदेश!'

प्रवीण पाण्डेय said...

पता नहीं कितनी गुप्त दृष्टियाँ इन्हीं तीन तरह के पोस्टरों को ढूढ़ती हैं।

ajit gupta said...

गुप्‍त रोगों के पोस्‍टर सार्वजनिक स्‍थानों पर ही होते हैं। बढिया पोस्‍ट।

अन्तर सोहिल said...

एक दीवार पर बवासीर के लिये अर्शकल्प का विज्ञापन छपा था। अर्शकल्प नीचे की पंक्ति में बडा-बडा था। दूसरे प्रचार वाले नीचे की पंक्ति अर्शकल्प के ऊपर अपना विज्ञापन राठी टोर सरिया लिख गये। :)

प्रणाम

संतोष त्रिवेदी said...

कुछ गुप्त ऐसे ही खुले होते हैं,जिनको जानते तो सब हैं,पर चुपके-चुपके उनको भले लगते हैं !

...यह बात किसी से कहना मत....आप ही को बता रहा हूँ !

'दवाइयाँ ही दवाइयाँ,दरियागंज,पुरानी दिल्ली '

shama said...

Badee hee dilchasp shailee hai aapke lekhan kee! Maza aa gaya!

अनूप शुक्ल said...

इस पोस्ट में वो नहीं लिखा है जो आपकी पोस्टों में रहता है।

समय : वही जब सुप्त इच्छायें अंगड़ाई लेने लगती हैं।
स्थान: वहीं जहां शीघ्रपतन, नामर्दी और बबासीर के शर्तिया इलाज का पोस्टर सटा है जिसकी फोटो अंधेरे के कारण साफ़ न आ सकी।

Vivek Rastogi said...

ऐसे गुप्त पोस्टर हर शासकीय सार्वजनिक शौचालय में आराम से देखे जा सकते हैं।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

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