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Monday, January 2, 2012

जाड़ों की नर्म धूप में..... औन्धे पड़े रहें कभी.... लोकपाल लिये हुए :)

     सभी जान रहे हैं कि लोकपाल तो केवल बहाना भर है, असल मामला तो राजनीतिक उठा पटक है जिसमें कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। भाजपा पूरे मामले में अन्ना को सामने लाकर गेम खेल रही है तो कांग्रेस भी बिगड़ैल सांड़ की तरह जैसा मन आये वैसा बर्ताव कर रही है। जान तो अन्ना भी रहे हैं कि उन्हें राजनीतिक दांव पेंच में शिखंडी की तरह इस्तेमाल किया जा रहा हैं,  लेकिन इसके अलावा उनके पास चारा भी तो नहीं है। बाबा रामदेव का हाल सब देख ही रहे हैं, जरा सा टेढ़े क्या चलने लगे वही लोग जो उनके शिविर में आकर सांसों के आरोह अवरोह दुरूस्त करते रहे थे, लगे   बाबा को ही दुरूस्त करने।

        खैर, ये सब तो होना ही था,  चालें राजनीतिक ही सही लेकिन एक ठहराव को तोड़ती लग रही हैं, वरना तो एक वक्त ये भी था कि लोग कहते पाये गये - कांग्रेस के सिवा कोई और है ही नहीं जो देश चला पाये। एक तरफ वो तमाम क्षेत्रीय पार्टीयां हैं जो अपने ही हितों में उलझी हुई हैं, न तो उन्हें अपने प्रदेश को छोड़ बाहर का सोचना है न उन्हें इसकी जरूरत महसूस हो रही है। बंगाल में ममता अपनी चालें इस तरह चलती हैं कि केन्द्र पर असर बना रहे, सरकार कुछ नेगेटिव स्टेप न उठाने पाये तो वहां पंजाब में अकाली दल वाले वैसे ही अपने को सिकन्दर मान रहे हैं। उधर कश्मीर का तो हाल और भी अलहदा है। भाजपाईयों की यदा कदा होने वाली चैं-चैं से पता चलता है कि वहां कश्मीर में कुछ ऐसा हो गया है या वैसा वहां की सरकार सोच रही है वरना तो वहां की खबरें पूरे देश में ऐसे परोसी जाती हैं मानों वह कोई अलग हो गया शराबी टाइप पारिवारिक सदस्य है, अब अलग होकर जैसे चाहे वैसे रहे, खर्चा-पानी बराबर मिलता रहेगा बस अनाप शनाप पी-वीकर सीन न क्रियेट करे। पिये और शांत रहे। असम और पूर्वोत्तर की हालत भी कुछ ऐसे ही है। वहां के राज्यों को तो ऐसे ट्रीट किया जाता है जैसे कि गाँव के अंतिम छोर पर बसा कोई घर हो जो तभी नजर आता है जब कोई उस ओर जाये या वहां का कोई बाशिंदा गांव के बीचोबीच आये, वरना तो उसे एक तरह से गाँव बाहर ही मान लिया जाता है।

             इन तमाम अलहदा परिस्थितियों के बीच दक्षिण पर नजर डालें तो वहां भी मामला भिंडी है। उत्तर भारत में  सपा और बसपा के बारे में तो सोचना ही क्या, एकदम लल्लनटॉप भिड़ंत चलती है दोनों में। कई बार तो दोनों में कनटाप भी छिड़ जाता है। ले देकर बची भाजपा और कांग्रेस। दोनों ये बातें अच्छी तरह जानते हैं कि पूरे देश में यदि कोई पक्ष विपक्ष है तो यही दो हैं और इन्हीं में से एक देश की बागडोर संभालेगा। ऐसे में अन्ना को परिस्थितियों की नजाकत समझ आ रही है। गड़बड़ ये हो जाती है कि टीम अन्ना के सदस्य कभी कभी खुलकर कांग्रेस के विरोध में हो जाते हैं, ऐसे में जाहिर है दूसरे पवित्र पक्ष के रूप में भाजपा ही नजर आती है जोकि खुद भी न जाने कितने तरह के स्कैंम में भूमिका निभा चुकी है। कर्नाटक का खनन मामला अभी ताजा ही है। ऐसे में बात वही आ जाती है कि भ्रष्टाचार तो सबने किया लेकिन उनमें भी कौन कम भ्रष्टाचारी है। चुनना उन्हीं में से है। इसे भी नैतिकता और सदाचार का नया पैमाना ही समझिये जो अब धीरे धीरे भारतीय राजनीति में घुल सा गया है।

        अब रही बात लोकपाल पर हो रही नौटंकी की, तो उस दिन संसद में सबने देखा कि हर किसी पार्टी ने वहां क्या क्या गुल खिलाया है। कांग्रेस तो अपने टूटहे फूटहे बिल को इस तरह पेश कर रही थी जैसे वह बड़ी मेहनत से बिल काढ़ कर लाई है और भाजपा बिल को ऐसे नकार रही थी जैसे कि दुकान में स्वेटर खरीद रही है....इसमें दो फंद कम हैं, उसमें वो वाला पैटर्न नजर नहीं आ रहा,  गढ़न ठीक नहीं है ब्ला...ब्ला। यहां दोनों के बीच एक तरह की धींगामुश्ती रही जिसमें कांग्रेस ने जानते हुए भी कि नंबर कम हैं फिर भी अपनी ओर से लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की मांग रखी, एक तरह से दिखावा किया, उधर भाजपा ने भी इस दांव को भांपते हुए अपना हठ जमाये रखा और नतीजा टांय टांय फिस्स। बहस गई तेल लेने। ऐसे में परिणाम वही हुआ जिसकी आशंका थी। लोकपाल लटक गया।

      उधर मुम्बई में चला अन्ना का आंदोलन कुछ अपनी खामियों से तो कुछ सरकारी दांव पेंच से फ्लाप सा हो गया। वही आंदोलन जिसने अभी कुछ दिनों पहले केन्द्र सरकार के हाथ पांव फुला दिये थे अब निढाल पड़ा था। सरकारी मंत्री संत्री तो तबर्रा बोल ही रहे थे, टीम अन्ना के सदस्य भी पीछे नहीं रहना चाहते थे। विरोध कुछ इस तरह हुआ मानों कांग्रेस ही है जो लोकपाल नहीं बनने दे रही जबकि प्रश्न के आलोक में कांग्रेस के साथ साथ भाजपा भी उतनी ही दोषी होनी चाहिये थी। लेकिन नहीं,  भाजपा कुछ इस तरह पूरे मामले में घुसी दिखना चाहती है मानों वह लोकपाल की परम हितैषी है और कांग्रेस ही सब गड़बड़झाला कर रही है। यदि भाजपा के मन में लोकपाल के प्रति इतना ही प्रेम होता तो संवैधानिक दर्जा देने के प्रश्न पर पक्ष-विपक्ष का भेद न रखते हुए वह आगे बढ़कर संवैधानिक दर्जा देने में शामिल हो गई होती लेकिन यहां तो प्रश्न पॉलिटिकल गेन का था, माइलेज लेना था।आसन्न चुनावों तक तवा गर्म रखना था, सो मामला लटका रहा। अब जब होगा तब होगा। फिलहाल बहस चालू रखा जाय। वैसे भी बहस करने में हम भारतीयों का कोई सानी नहीं है।

          एक बात और, जिस किसी को लगे कि मैं भाजपाई या कांग्रेसी हूं, कम्यूनिस्टाई हूं या सपा, बसपाई, तो स्पष्ट कर दूं कि मैं इन सभी पार्टियों से उतना ही दूर हूं, उतना ही सिनिक हूं जितना कि एक आम जन जोकि इन पार्टियों से अघा गया है। न उसे कोई शुचित नजर आ रहा है न कोई पवित्र, अपवित्र। सभी एक से बढ़कर घाघ और पोंगावाद के परिपालक लगते हैं। इसलिये जिन किन्ही महानुभाव को मेरे लेखों में कहीं कांग्रेसी झुकाव दिखे, या भाजपाई झलक दिखे तो इसमें मैं अपनी ही कमी मानूंगा कि अपनी बात को सही ढंग से सम्प्रेषित नहीं कर पाया, अभिव्यक्त नहीं कर पाया। बाकी तो लोगों ने फेसबुक पर ऐसे भी स्टेटस लगा रखे हैं कि जितने कांग्रेसी हों फ्रेण्डलिस्ट से हट जांय याकि जितने संघी-भाजपाई हो स्वंयमेव हट जांय, मानों सारी समस्या उन्हीं फ्रेण्डों की वजह से हो। हद है।

 अमां कभी सांसदों के अंदरखाने के हावभाव तो ऑब्जर्व करो यार। जो लोग संसद में एक दूसरे को पानी पी पीकर कोसते नजर आते हैं वे भी बहस के बाद गार्डन, बाग बगइचा में गलबहियां डाले नजर आते हैं, चाय पान पर एक दूसरे को टिप्पस देते नजर आते हैं और तुम हो कि इतने में ही उखड़ पखड़ ले रहे हो कि हट जाओ मेरे फ्रेण्ड लिस्ट से :)


       चलिये, बहसों का अंत होना नहीं है, न हम थकेंगे बहस करते न वो थकेंगे.....बहस तो बहस है। फिलहाल आप वो मौजूं किस्सा पढ़िये जिसे अभी हाल ही में मैंने फेसबुक पर अपडेट किया था। सुबह-सुबह डिस्कवरी चैनल पर इजिप्त और नील पर कुछ प्रोग्राम आ रहा था और वहीं मैंने ये किस्सा गढ़ दिया। नोश फरमायें :)

      नील नदी के किनारे लोकपाल पर बहस करते आठ-दस नेता पाये गये। उनकी बेमतलब की बहस देख हजारों साल पुरानी एक ममी हिलने-डुलने लगी, अचानक मौसम गहरा सा गया, रेत के तूफान चलने लगे और एक चट्टान पिरामिड से खिसक कर आ गिरी। तभी वह ममी अपना ममत्व तोड़ कर बाहर आ गई और उन नेताओं से पूछा - क्या तुम्ही लोग लोकपाल पर बहस कर रहे थे ?


          उनके हाँ कहने पर ममी ने दुखी स्वर में कहा- काश, लोकपाल को लेकर ऐसी अंतहीन बहस हमारे समय में चली होती तो हम आज इस तरह ममी न बने होते....हमारे यहां तो बात ही बात में लोकपाल बन गया था........कम्बख्तों ने भ्रष्ट तरीकों से कमाये धन सहित हमें ठिकाने लगाने में कोई कोर-कसर बाकी न रखी, हमें ममी बनाने के बाद बगल में ही उन तमाम सोने चांदी जवाहरातों को भी रख दिये, और तो उपर से व्यंग्य के रूप में शिलालेख लिख मारे जिसे शब्दशः पढकर तुम्हारे इतिहासविद् तर्जुमा करते हैं कि 'हम महान थे'। बताओ, भला इससे बड़ा व्यंग्य आज तक लिखा गया होगा कि किसी शख्स को उसके कमाये धन-वैभव के साथ ममीकरण कर दिया जाय और कहा जाय कि 'ये महान था'।


काश लोकपाल पर कभी न खत्म होने वाली बहस हमारे जमाने में भी चली होती तो......।


      तात्पर्य, अन्ना हजारे जैसे लोग हजार सालों में एक ही आते हैं, :) फर्क यह रहा कि हम अब 'नुक्ता दर नुक्ता' बहस करना सीख गये हैं :)

अमृत्य सेन की किताब 'आर्गूमेटिव इंडियन्स' ऐसे ही नहीं लिखी गई थी :)

- सतीश पंचम

Image Courtesy : Google Image Search. 

8 comments:

दीपक बाबा said...

@कोई अलग हो गया शराबी टाइप पारिवारिक सदस्य


@ हम अब 'नुक्ता दर नुक्ता' बहस करना सीख गये हैं :)


pancham vachan = satya vachan.

Arvind Mishra said...

चलिए नए साल में तो यह फर्क दिखा कि आपने आलेख में बिंदियाँ नहीं लगाईं :)
यह कैसा निष्ठुर परिवर्तन ...बाकी अन्ना ,राजनीतिक पार्टी ,ममियों के साध आदि पर बेबाक विश्लेषण !

ajit gupta said...

सत्ता के गलियारों में सब एक हैं लेकिन हम यहाँ बहस कर करके जी हलकान करे जा रहे हैं और एक दूसरे पर गुर्रा भी रहे हैं, जैसे उनके वकील हम ही हैं।सर्दी के दिनों में गरम-गरम चाय सी लगी आपकी पोस्‍ट।

संतोष त्रिवेदी said...

नेताओं का वश चले तो वे लोकपाल की ममी बनवाकर उसमें ही फूल-माला चढा देंगे !

बकिया,कोई भी अपराधी नहीं चाहता कि जल्लाद को अपने गले का फंदा बनाने दें !

प्रवीण पाण्डेय said...

गोवा की मधुरिम धूप में तो लोकपाल का ख्याल तक नहीं आता है।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

रोचक ढंग से सही विश्लेषण। कुछ हुआ हो या न हुआ हो हम रोचक ढंग से बहस करना सीख गये हैं।

अनूप शुक्ल said...

असफ़लता यह बताती है कि सफ़लता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया। -श्री राम शर्मा आचार्य । :)

वाणी गीत said...

वर्तमान राजनीति का कच्चा चिट्ठा खोल दिया आपने !

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