सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, December 30, 2012

मर्ज़ कहीं और, इलाज कहीं और.....

      अभी दिल्ली में हुए वहशीपन की शिकार पीड़िता की राख ठंडी न पड़ी थी कि दिल्ली में ही एक और बस में नाबालिग से छेड़छाड़ की घटना उजागर हुई। इस मामले में भी एक शराबी कंडक्टर की भूमिका बताई जा रही है। सवाल ये उठता है कि जब अधिकतर मामलों में शराब एक मुख्य कारक है, वजह है तो क्यों नहीं सरकार शराब पर पाबंदी लगा देती ? आखिर कब तक आबकारी से मिलने वाली रकम की लालच में लोगों से, समाज से इस तरह के खिलवाड़ करती रहेगी ? एक सीमा होती है सहन करने की। लेकिन सरकार वह नहीं करना चाहेगी, लोगों की जान की कीमत पर भी नहीं। आखिर देश का विकास जो करना है।

   उधर संसद का विशेष सत्र बुलाये जाने की मांग की जा रही है। ममता बैनर्जी चाहती हैं कि बढ़ते बलात्कार पर चर्चा हो। सुषमा स्वराज चाहती हैं कि चर्चा हो। और भी दो-चार महानुभाव चाहते हैं कि चर्चा हो, बहस हो। रेपिस्टों को फांसी दी जाय, उन्हें सरेआम सजा दी जाय। लेकिन वे सिर्फ उपर ही उपर देख रहे हैं। उस विषवृक्ष के जड़ की बजाय पत्तियों को तोड़कर ही संतुष्ट हो जाना चाहते हैं ये मानकर कि हम ने तो फांसी की सजा मुकर्रर कर दी है, अब ये समाज को देखना है कि वो अपनी तईं नैतिक रहे, ढंग से रहे। लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये नैतिकता केवल जनता की ओर से ही अपेक्षित है या सरकार की भी इसमें कुछ भूमिका होगी ? एक तरफ तो सरकार राजस्व की ललक में शराब की मंजूरी देती है, उससे हो रहे फायदे बटोरती है और दूसरी ओर शराबीयों को खुले छोड़ देती है कि जाओ पियो। लेकिन पीने के बाद जो हालात बिगड़ते हैं उसके लिये सरकार क्या करती है ? बहुत हुआ तो रोड चेकिंग की खानापूर्ति की, थोड़ा सा चालान वगैरह काट दिया। कैमरे वगैरह ले जाकर मीडिया को खुश भी कर दिया कि देखो हम सतर्क हैं लेकिन जब इसी शराब की झोंक में दिल्ली जैसा हादसा होता है तो यही सरकार बगले झांकती नजर आती है। उस वक्त उसका विकास, उसका राजस्व सब खोखला साबित होता है। उस वक्त रूदन शुरू होता है कि हम उसकी कुर्बानी बेकार नहीं जाने देंगे। हम कड़े कानून बनायेंगे, हम बलात्कारियों से सख्ती से निपटेंगे। मीडिया भी अपनी ओर से खानापूर्ति कर देता है कहकर कि सरकार को कड़े कानून बनाने चाहिये। फिल्म इंडस्ट्री भी आगे आकर कहती है कि जो हुआ बुरा हुआ। सरकार को कड़े कानून बनाने चाहिये। सख्त से सख्त सजा देनी चाहिये। लेकिन हर कोई असल बात गोल कर जाता है। उसे केवल विषवृक्ष की पत्तियों की छंटाई से ही तात्कालिक सूकून मिलता है लेकिन उसकी जड़ों में मट्ठा डालने की कोई नहीं सोचता।

    पूरी उम्मीद है कि दिल्ली के गुनहगार फांसी पाएंगे, पूरी उम्मीद है कि नये कानून बनेंगे ( वह भी इतना हो हल्ला मचने पर ही सही ), लेकिन ये उम्मीद मुझे बिल्कुल नहीं है कि सरकार शराब पर पूर्ण पाबंदी लगायेगी। उसे विकास चाहिये, किसी भी कीमत पर चाहिये भले ही उसकी झोंक में दिल्ली जैसा कांड होता रहे। फिर ये तो दिल्ली थी, दूरदराज के इलाकों में क्या होता होगा शराब के नशे में किसे खबर। वहां के हालात तो और संगीन होंगे लेकिन वही बात कि राजस्व चाहिये। तो जब राजस्व की ही इतनी ललक है तो फिर समाज को नैतिकता और उच्च मानदंडों की घुट्टी पिलाना बेमानी बात होगी। केवल हवा-हवाई।


 यदि सचमुच बदलाव की इच्छा है सरकार में, लोग खुद को स्वस्थ समाज में देखना चाहते हैं तो सबसे पहले इस नामुराद शराब पर पाबंदी लगाई जाये। भले इसके बदले राजस्व का नुकसान उठाना पड़े, कुछ बड़ी से बड़ी परियोजनायें रोकनी पड़ें लेकिन समाज से बढ़कर, देश से बढ़कर तो कोई परियोजना नहीं हो सकती। फिर ये तो ऐसी गंभीर बीमारी हो गई है कि जिसे बहुत पहले ही विनष्ट कर देना था, समूल उखाड़ फेंकना था लेकिन राजस्व की लालच में सरकारें इतनी अंधी होती गईं कि इस ओर ध्यान देना ही छोड़ दिया और आज नतीजा सामने है।

     अब शायद लोग सवाल करें कि सभी बलात्कार शराब की झोंक में नहीं होते, फिर शराब पर ही पाबंदी क्यों ?  वो इसलिये कि जरूरी नहीं कि चीजें प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ी दिखे हीं। कुछ बातें अप्रत्यक्ष और अवचेतन के तौर पर भी घटित होती रहती हैं और ऐसी हर बुराई अपना कुछ न कुछ अंश समाज में बिखेर कर ही रहती है चाहे जिस रूप में भी हो। फिर यदि हमें अपने बच्चों को, बेटियों को, बहनों को सुरक्षित रखना है तो इस तरह के कदम उठाने ही होंगे वरना तो केवल बातें ही बातें होंगी , नारे ही नारे लगाकर जी को ठंडा किया जाता रहेगा कि हमने तो अपनी ओर से फांसी का कानून पास कर दिया, हमने तो अपनी ओर से कड़े कानून बना दिये। जरूरत  विषवृक्ष के टहनीयों की छंटाई की नहीं, उसके जड़ों को नेस्तनाबूद करने की है। जब तक इस तरह की सोशल सर्जरी वाले कदम न उठाये जायेंगे, हम यूं ही नारे लगाते रहेंगे, यूं ही जंतर-मंतर पर बैरिकेड्स गिराते रहेंगे, बातों का हुजूम पैदा करते रहेंगे, मंसूबे बांधेंगे, मुट्ठियां भींचेंगे और नेताओं के बहकावे में आते रहेंगे।

   उम्मीद करता हूं कि देश में सख्त कानून तो बनेगा ही लेकिन साथ-ही साथ सामाजिक उत्थान के लिये, सोशल प्योरिटी के लिये शराब की पाबंदी जैसे कदम भी उठाये जायेंगे। उम्मीद....बस उम्मीद।

- सतीश 

स्थान - कानून बनाने वाली जगह से चौदह सौ किलोमीटर दूर।

समय - वही, जब एक राज्य की मुख्यमंत्री अपने राज्य में शराब की पाबंदी से होने वाले नुकसान की भरपाई  के लिये विशेष पैकेज की मांग करे और उसे जनता की ओर से जवाब मिले - "मैडम, आपके राज्य की जनता शराब न पीकर सच्चरित्रता की ओर बढ़ रही है, अच्छाई की ओर उन्मुख हो रही है। इसे आप नुकसान भले मानें, हम उसे सरप्लस प्रॉफिट मानते हैं जिसकी बराबरी कोई पैकेज नहीं कर सकता....चाहे वह पैकेज कितना भी बड़ा क्यों न हो".

  अफसोस, न तो इस तरह की सोच वाली सरकारें हैं न तो वैसी जनता है कि शराब को तज सके। नये साल में देखिये कैसे झूमते हैं लोग :(

Monday, December 24, 2012

अजगरी सिस्टम......अजगरी धार


       पिछले कुछ दिनों से युवा छात्र-छात्राओं पर चल रहे सरकारी दमनचक्र के दृश्य देख बार-बार आँखें नम हो रही हैं। एक ओर से प्रदर्शनकारी खदेड़े जा रहे हैं तो दूसरी ओर से फिर आ डटते हैं। लगातार आँसू गैस के गोले छोड़े जा रहे थे लेकिन नौजवान थे कि डटे रहे। पूरी ताकत से लाठी भांजते पुलिसिये तड़-तड़ लाठी बरसाते रहे लेकिन युवा थोड़ी देर के लिये तो पीछे हटता लेकिन फिर तनकर खड़ा हो जाता मानों कहना चाहता हो- मार कितना मारना है, और तभी दूसरा पुलिसिया आकर लाठी जमा देता

  इधर मैं सोच रहा हूं ये नौजवान क्या कहकर घर से निकले होंगे, अपने माता-पिता से किस तरह कहे होंगे कि पापा पोस्टर बनाने हैं पैसे दो, आज पोस्टर कलर लेना है विरोध जताना है पैसे चाहिये। कुछ युवा अकेले रहते होंगे, साथियों संग रूम शेयर करते होंगे, युवतियां अपने शहर से दूर आई होंगी पढ़ने, घर से खरचे के लिये कुछ पैसे मिले होंगे, कैसे... उन्होंने अपने पर्स से रूपये निकाले होंगे कि आज पोस्टर बनाना है, उस पर स्लोगन लिखना है......कि आज सरकार को उसकी औकात बता देनी है कि उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराना है। कुछ बच्चियां अपने घरों में कहकर निकली होंगी बिट्टू मम्मी से कहना मैं लेट आउंगी आज कॉलेज में प्रेसेंटेशन है...... निखिल तू मम्मी को कह देना मैं निमिषा के साथ जा रही हूं देर हो जायेगी.....उधर निखिल मुस्करा कर रह जाता होगा, उसे पता होगा कि उसकी प्रिया दीदी आज मोर्चा लेने जा रही हैं सरकार से, वॉटर कैनन से, आँसू गैस से, लाठीयों से। दोपहर तक माता-पिता चिंतित होंगे कि मेरी बेटी भी कहीं इस प्रदर्शन में शामिल तो नहीं हो गई। कहीं मेरा बेटा भी तो इन प्रदर्शनकारियों में शामिल नहीं है ? स्वाभाविक है कि माता-पिता अपने बेटे बेटियों के लिये चिंतित होंगे लेकिन अंदर ही अंदर फक्र भी महसूस कर रहे होंगे।
 
     इधर विशूअल्स में देख रहा हूं कि पहले दिन वॉटर कैनन के जरिये पानी की मोटी धार से छितरा जाने वाला युवा अब जैसे जान गया है कि ये पानी ही तो है, इससे क्या डरना। अब युवा उन वॉटर कैनन को देख भाग नहीं रहे थे बल्कि पीठ पानी की मोटी धार पर आने दे रहे थे और  अपना मुँह दूसरी ओर फेर ले रहे थे मानों मुंह फेरकर सरकार से अपनी नाराजगी जताना  चाहते हों, कि हम अब तुम्हारे दमनचक्र से वाकिफ हो चुके हैं, कि हमने भी पानी की तेज धार को झेलना सीख लिया है। इधर पानी की मोटी अजगर सी धार आती उधर युवा गोल घेरे में इंडियन क्रिकेट टीम की तरह आकर सिर से सिर मिलाकर बांहें एक दूसरे की ओर जोड़ खड़े हो जाते, अब पानी की धार उन नवचट्टानों से केवल टकरा टकरा कर रह जाती और पास खड़े नौजवानों की टोली ताली पीट-पीटकर पानी की अजगरी मोटी धार झेलते उन युवाओं का उत्साह बढ़ाती, रह-रहकर सरकार को धिक्कारती रही। उधर पुलिसिये रह-रहकर थक जाते, फिर सुस्ताते, फिर लाठी भांजते। पानी का टैंकर खत्म होने आता, दूसरा टैंकर लगा दिया जाता। इन युवाओं का जोश-खरोश देख दिल से उन्हें धन्यवाद देने का मन कर रहा है। उन युवतियों, उन कॉलेजयीन छात्र-छात्राओं का आभार प्रकट करने का मन कर रहा है जो घर से सच या झूठ या जैसे-तैसे बोलकर निकले हैं कि आज अपनी आवाज को सरकार तक पहुंचा कर रहना है।

   लेकिन देखने में ये आया कि कुछ राजनीतिक मंशा पाले लोग भी उन युवाओं के बीच पहुंच गये। वे उफान पर पहुंचे प्रदर्शन को अपने पक्ष में मोड़ने की चाहत लिये उन युवाओं के बीच आने लगे और फिर तो वही हुआ जिसकी आशंका थी। विशुद्ध रूप से स्वत:स्फूर्त उपजा आंदोलन अब राजनीतिक मंशा पाले लोगों की गिरफ्त में आने लगा और देखते ही देखते जो आंदोलन नौजवानों और सरकार के बीच का था अचानक ही हिंसक हो गया क्योंकि प्रदर्शन अब नौजवानों का रह ही नहीं गया। वो तो सत्तालोलुप, येन-केन प्रकरेण लाईमलाइट में रहने वाले लोगों की गिरफ्त में आ गया था। सो यहीं से नौजवानों के इस आंदोलन का दरकना शुरू हुआ और कई पुलिसवाले जख्मी होना शुरू हुए। लेकिन सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री पहले इन नौजवानों के सामने आकर खुद नहीं मिल सकते थे जो स्थिति बिगड़ने के बाद बयान दे रहे हैं कि ये नहीं होना चाहिये था वो नहीं होना चाहिये था ?  क्या जरूरी था गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच फुटबॉल की तरह युवाओं को लुढ़काना जो कि पहले से ही आहत है और अपनी मांग पुरजोर तरीके से, संयमित ढंग से अभिव्यक्त कर रहे हैं ? क्या उसके सामने जाने की प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को उतनी भी हिम्मत नहीं बची थी कि उनके कुछ प्रतिनिधियों से सीधे मिलकर, सीधे दो टूक बात कर सकें, उनकी बात सीधे सुन सकें ?  नहीं जानता था कि प्रोटोकॉल, महिमाबखान, अबोव द मार्क, वीवीआईपी का चोगा इतना बोझिल और अपने आप में इतना जड़त्व लिये है कि अपने स्थान से हटने को तैयार ही नहीं।

   उधर कुछ युवा सोनिया गाँधी से मिले लेकिन वे भी केवल गोल-मोल बातें सुन सुनाकर हटा दिये गये। गृहमंत्री पुलिसियों द्वारा लाठी भांजना एक ओर से दुर्भाग्यपूर्ण बताते रहे दूसरी ओर पुलिस बाकायदा लाठी बरसाती रही, पानी की मोटी अजगरी धार पटकती रही नौचट्टानों पर। नौजवान मार खाते रहे, ठंड में भीगते रहे लेकिन डटे रहे। इसी बीच लाईमलाइट के लालायित लोग भी उन्हें गिद्ध की तरह नोंचने आ पहुंचे। उनके आंदोलन के श्रेय को अपनी ओर खसोटने आ गये और नतीज़ा हमारे सामने है। जो युवा घर से फिक्रमंद माता-पिता से कहकर आया होगा कि जा रहा हूं अच्छे काम के लिये आंदोलित होने वह अचानक हिंसक भीड़ का हिस्सा अनचाहे ही बना दिया गया। जो बच्चे अपने रूम-मेट से पैसे उधार लेकर पोस्टर आदि का जुगाड़ किये होंगे या कॉलेज के पुराने पोस्टरों को पलटकर लिखे होंगे अब वे खुद को ठगे से महसूस कर रहे होंगे। लेकिन इतना मैं जरूर समझता हूं कि उनके मन में सूकून होगा कि उन्होंने अपनी पवित्र भावना से सरकार को अवगत करा दिया। उन्हें अपनी बात पहुंचाने का दम-खम दिखाया। वहीं लाईमलाइट में रहने के आकांक्षी लोगों द्वारा आंदोलन में आ जुड़ना भले नकारात्मक बात हो लेकिन यह अपने आप में आंदोलन की सफलता ही कही जाएगी कि ऐसे लोगों को भी चाहे-अनचाहे जोड़ने-जुड़ने के लिये बाध्य कर दिया। ऐसी युवाशक्ति के जज्बे को मैं प्रणाम करता हूं।


-          सतीश यादव

स्थान पानी की मोटी अजगरी धार झेलते नव-चट्टानों से चौदह सौ किलोमीटर दूर

समय वही, जब प्रिया आँसू गैस से बचने के लिये गीला दुपट्टा अपने मुंह पर लपेटने को हो और तभी उसकी नजर सामने वॉटर कैनन से निकलते पानी की मोटी धार झेलते अपने छोटे भाई निखिल पर पड़े........

( मैंने बहुत व्यथित होकर यह पोस्ट लिखा। कई बार मन में आया कि इसे कहानी की शक्ल में लिखूं जहां कोई बेटी अपने पिता से इसलिये बचना चाहती है क्योंकि उसके पापा लाठी चार्ज करते हुए उसकी टोली की ओर बढ़ रहे हैं तो कोई भाई इसलिये हूजूम में चुपके से शामिल है कि कहीं उसकी दीदी पर लाठी पड़ने को हो तो वह तुरंत आगे बढ़ झेल ले.....लेकिन अंत में यही फैसला किया कि इसे कहानी की बजाय जस का तस ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में लिख देता हूं....कम से कम मन का गुबार तो निकले) 

Friday, December 7, 2012

देश बऊराना एफडीआई चौक.....

     देख रहा हूं एफडीआई को लेकर देश बऊरा गया है.....सरकार तो सरकार विपक्ष भी खुद के बऊराने पर गर्व कर रहा है। छुटुआ मुटुआ का तो कहना ही क्या। ये बऊराने की बजाय  चर्राना ज्यादा पसंद करते हैं। मुलायम और माया को ही देख लिजिए। जिस मुद्दे को लेकर लोकसभा से वॉकआउट कर दिये राज्यसभा में आते ही वॉक-इन कर लिये। एक वॉक आउट हुआ तो दूसरा इन हो लिया। मुद्दे पर इतनी विकट स्टैंडिंग लिये कि खुद सरकार हंसने- मुस्कराने से बचती रही कि कहीं दोनों बुरा न मान जांय। वैसे भी सहायता करने वाले की हंसी नहीं उड़ानी चाहिये, ऐसा शास्त्रों में लिखा है। किस शास्त्र में लिखा है ये अभी खोज का विषय है। फिलहाल इतने से ही संतुष्ट हुआ जा सकता है कि अगाध ठंड के मौसम में सरकार और विपक्ष जहां बऊराये थे वहीं ये दोनों चर्राये थे, और क्या खूब चर्राये। गज्जब।
   
    वैसे इस आपाधापी में एक और घटना हुई जिस पर कि लोगों का ध्यान कम ही गया। वो घटना रही अन्ना द्वारा केजरीवाल को सत्ता का लोभी बताना। लोग पढ़े और पढ़कर हट लिये। सरकार तो सरकार अब भाजपा भी अन्ना और केजरीवाल को भी पढ़कर हट लेती है, जैसे उनके लिये ये रोज की खबर सी हो मसलन टेम्पो और ट्रक में भिडन्त, बाईक सवार चोटिल, बैलों को ले जा रहा ट्रक पलटा वगैरह वगैरह। लेकिन कुछ समय पहले यही केजरीवाल और अन्ना थे जिनके प्रत्येक कदम पर सरकारी निगाहें लगी रहती थीं। एक छोटा सा बयान आया नहीं कि कैबिनेट की कड़ाही तिड़बिड़ा उठती थी। मानों गर्म तेल में पानी का छींटा पड़ गया हो। तब विपक्ष के तौर पर भाजपा भी बहुत प्यारी सखी बन कर  अन्ना और केजरीवाल से हां सखी, बोल सखी किये रहती थी। अब जब केजरीवाल और अन्ना के रास्ते जुदा हो गये हैं, केजरीवाल की राजनीतिक पार्टी बन गयी है तो वही भाजपा जो चल सखी, हां सखी कहते नहीं अघाती थी अब केजरीवाल के नाम से ऐसे बिदकती है जैसे केजरीवाल ने भाजपा के आसन्न प्रेमी को हड़पना चाहा हो। कहां तो वह गाहे-बगाहे सखीरूपी टीम के जरिये प्रेमिल सत्ता पाने हेतु चोरी-छिपे चिट्ठी भिजवाती थी, अपने लोगों को अन्ना के आंदोलनों में शरीक करवाती थी और कहां ये केजरीवाल आये कि भाजपा के सखी-सखा भाव को ठेंगा दिखा दिये। कुछ दो चार खुलासे भी कर दिये। अब न तो वह बहनापा रहा न तो यारी-दोस्ती। सो सरकार भी खुश है कि चलो जोड़ी-पाड़ी खुद ही सलट गये, एंटी इन्कम्बैंसी के चलते हमारे वोट घटेंगे तो विपक्ष के भी वोट बटेंगे। अगेन वी विल्ल रॉक। सो, सरकार भी अब टीम अन्ना, भाजपा, रामदेव को लेकर ज्यादा सीरियस नहीं है। जो चाहती है करवा लेती है। भले ही आर्म ट्विस्टिंग का आरोप लगे या लेग पूलिंग का। 

    खैर, एफडीआई जी को लाया जा रहा है। देश को आगे बढ़ाया जा रहा है। जहां देश नहीं बढ़ना चाहता वहां लाठी से कोंच कोंच कर आगे ठेला जा रहा है। इस ठेलमठाल में जनता समझ नहीं पा रही कि देश को ठेल ठेलकर कहां ले जाया जा रहा है। कहीं ज्यादा ठेल दिये तो देश एकदम आगे सरक जायगा। फिर पता नहीं उसका घर देश की सीमा में ही पड़ेगा कि किसी नो मेन्स लैंड पर ? ईश्वर जी जानें। वैसे सुना है ईश्वर जी भी आरटीआई के चलते परेशानी में फंसे हैं। चित्रगुप्त ने उन्हें गुप्त रूप से ऐसे आरटीआई के बारे में सूचित  किया है जिसमें किसी ने पूछा है कि ईश्वर जी का यात्रा व्यय वाला वाऊचर कितने का आता है, उस पर टैक्स लगता है या नहीं ? यदि टैक्स लगता है तो कितना और यदि नहीं लगता तो उन्हें फ्री फंड में संसार की यात्रा करने का अधिकार किस कानून के अंतर्गत दिया गया है ?

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मेरे दूसरे ब्लॉग  'Thoughts of a Lens' से



    यह फोटो आज सुबह ही ऑफिस जाते वक्त मोबाइल से लिया जिसमें पीछे की दीवार पर वही अलबेली बातें लिखी हैं कि अरबों का घोटाला हुआ, इतने का उतना हुआ और रास्ते के ठीक दूसरे सिरे पर एक शख्स सो रहा है। वहीं दीवार की ओर ही थोड़ा ध्यान से देखेंगे तो तस्वीर के एक हिस्से में तेज उजाला भी पड़ रहा है जिसमें से किसी नेता का पोस्टर पर बना मुस्कराता चेहरा सड़क पर सोये शख्स को देख रहा है। वस्तुत: यही हो भी रहा है।

    - सतीश यादव

Wednesday, November 28, 2012

गाँवों में साहित्य की ऊभ-चूभ


     बहुत ही दिलचस्प ढंग से गाँवों में साहित्य की स्थिति पर श्री विवेकी राय जी द्वारा लिखा गया यह लेख जब पढ़ने लगो तो लगता है जैसे तीन चार दशक पीछे पहुंच गये हैं। हांलाकि अब भी साहित्यिक रूप से गाँवों में स्थिति कुछ वैसी ही है लेकिन हाल फिलहाल लोग बीएड आदि करके टीचर बनने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे हैं। शिक्षितों की संख्या भी बढ़ी है लेकिन साहित्य की स्थिति अब भी जस की तस है बल्कि और बदतर। तो लिजिए पढ़िये विवेकी राय जी के लिखे उस मजइत लेख का दिलचस्प अंश।

                   'हमारे गाँवों के साहित्यिक नवरत्न'

    बहुत कठिन सवाल है उन लोगों का जो गाँवो में रहते हैं। बौद्धिक स्तर क्या है और साहित्यिक संस्कार कैसा है ? अपने गाँव को देखता हूँ तो चोटी पर दिखाई पड़ते हैं। सत्तर वर्षीय दूखनजी जो अपने परिमित साहित्य पर अपरिमित विश्वास के बल पर नये पढ़े-लिखे लोगों को ललकारते रहते हैं। उनकी सबसे प्रिय पुस्तक प्रेमसागर है जिसे वे मारे आदर के रामायन कहते हैं। उन्हें गर्व है कि उन्होंने पूरा हनुमान चालीसा और बारहखण्डी जवान थे तभी कंठाग्र कर लिए और मनोरंजन भजनमाला, दानलीला, बृहत इन्द्रजाल और राशिमाला आदि को अनेक बार बांचकर छोड़ दिया है।

  इनके मित्र हैं घूरा साहु। ये और दूखनजी दोनों मिलकर रामचरित मानस का खूब अर्थ करते हैं। इन लोगों का विश्वास है कि यदि कविता में राम का वर्णन नहीं है तो वह कांव-कांव है। लेकिन, घुरा साहू दूखन से कुछ आगे हैं। कल्याण पत्रिका मंगाते हैं। गीता और उपनिषद भी रखते हैं। स्नान के बाद देवताओं की तरह रामायण पर जल छिड़ककर धूपदानी घुमा देते हैं। रामायण के बाद इनका अनमोल ग्रंथ है निरमल दास का विचारसागर। दुनिया का सारा ज्ञान इसमें भरा बताते हैं। भक्तमाल, ब्रजविलास और महाभारत भी कभी-कभी बांचकर सुनाते हैं। नित्य पाठ चलता है रामचरितमानस का। वास्तव में साहुजी गंभीर प्रसंगों की भी सुबोध, सटीक और प्रमाणयुक्त व्याख्या कर लेते हैं।
  ऐसा लगता है कि साहित्य के नाम पर यह रामायण ही गाँवों में शेष है। इसका प्रभाव पढ़-अपढ़ सब पर है। साहित्य का स्वाद तो लोगों को मुनाफे में मिलता है, मूल वस्तु है धर्म। इस धर्मप्राण देश के गाँवों में धर्म का संस्कार ऐसा मन-प्राण पर छाया है कि इससे रिक्त साहित्य का वहां कोई मूल्य नहीं। गोदान भागवत के आसन पर नहीं बैठ सका और न साकेत का रामायण की तरह वाचन-गायन ही संभव हुआ। निरक्षर रामटहल राय को रामचरितमानस का एक-एक प्रसंग जबानी याद है। सैकड़ों चौपाइयों का मुहावरों की तरह बात-बात में प्रयोग करते हैं।
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 आगे विवेकी जी लिखते हैं कि,

गाँव स्थित नये पढ़े-लिखे लोगों में अध्यापक, लेखपाल, बाहर से नौकरी छोड़कर आये लोग, फाइनल परीक्षाओं में फेल लोग और साधु-सन्त आदि ही प्रमुख हैं। मानसिक दृष्टि से इनमें सोलहवीं से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक के लोग हैं। चमनलाल लेखपाल उपन्यास की परिभाषा यों करते हैं, उपन्यास उसे कहते हैं जिसमें पहले लिखी जाने वाली बात बाद में लिखी जाय और बाद में लिखी जाने वाली बात पहले लिखी जाये. इनके लिये दुनिया की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है चन्द्रकान्ता। उसी ने पढ़ने की चाट लगायी और अब तो भोजन से भी जरूरी इनके लिये उपन्यास है। उनके उपन्यास मांगने पर पूछिए कि कैसा उपन्यास चाहिये तो एकमात्र उत्तर है, कुशवाहा-कान्त-का-सा । जिन नये उपन्यासों में विचारों का घात प्रतिघात है अथवा जिसकी भाषा कुछ असाधारण है जैसे दिव्या, बाणभट्ट की आत्मकथा, शेष प्रश्न, नदी के द्वीप और वयं रक्षाम इत्यादि उन्हें वे दूर से सलाम बोलते हैं। एक दिन खेद प्रकट कर रहे थे कि ब्लेक सीरीज के चवन्नी-अठन्नी सीरीज के निकलने वाले जासूसी उपन्यास जाने क्या हो गये ?  मुन्शीजी का प्यार किस्सा चहार दरवेश, आल्हा-खण्ड, हातिमताई, भरथरीचरित्र, तोता-मैना, सदावृक्ष सारंगा, सिंहासनबत्तीसी और बैतालपचीसी से भी अभी पहले जैसा है।
  इनका एक महान कार्य सदा याद किया जायगा। चन्द्रकान्ता पढ़कर सुनाते सुनाते अपने मित्र सीताराम में किताब पढ़ने की इच्छा भड़का दी। नतीजा यह हुआ कि अक्षरांध सीताराम चन्द्रकान्ता और उसी तरह के उपन्यास खेत, खलिहान, बाजार, शहर, कचहरी और यहां तक कि भैंस चराते हुए भी लेकर घूमने लगे। कोई पढ़ा-लिखा आदमी कहीं मिल गया तो बंचवाकर सुनते। मेरे यहां भी बंचवाने के लिये एक दिन गमछे में अकबर-बीरबल विनोद और बड़ा जोगीड़ा संग्रह बांधकर लटकाये आये थे। बाद में उन्होंने स्वंय पढ़ने का अभ्यास कर लिया। अब वे ऐसी किस्सा-कहानी की पुस्तकें खोजते हैं जो सरल भाषा में सरल ढंग से लिखी गई हों।
   वास्तव में यह सरल ढंग ही आज कठिन है।   
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वीर बहादुरजी की माता जिस किताब का पाठ शिवालय पर बैठकर करती हैं वह निरक्षर लोगों के लिए गीता प्रेस से छपी एकमात्र पुस्तक है। मूल्य दस पैसा है। सारे पन्नों में मोटे अक्षरों में सीता-राम सीताराम लिखा है। पाठ करने वाला बस उंगली रखता चला जाये और उच्चारण करता जाये। वीर बहादुरसिंह की पत्नी श्रीमती कलावती देवी गाँव की सबसे अधिक पढ़ी-हुईऔरत हैं और उनकी झांपी में नैहर से मिली पुस्तकों में गोपालगारी, ननद-भौजाई का झगड़ा, हनुमानचालीसा, सोरठी, सुन्दरकाण्ड. मेलाघुमनी, भजनमाला, मकईबहार, स्त्रीसुबोधिनी, रामचरितमानस सटीक और फिल्मी गीत-संग्रह प्रमुख हैं।

 अब सब मिलाकर हिसाब बैठा लीजिए कि गांवों का बौद्धिक स्तर क्या है।

                                                                                -          विवेकी राय

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पुस्तक जुलूस रूका है (रिपोर्ताज संकलन)
प्रकाशन नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली
मूल्य 20/- (संस्करण 1977)

Monday, November 5, 2012

अमां कायदे से पेश आओ....

       ऐसा माना जाता है कि चार हजार वर्ष पूर्व अर्थात प्राच्य काल में ढिल्लीका एक राजनैतिक महाक्षेत्र बन चुका था। वहां से प्राप्त तत्कालीन अभिलेख दर्शाते हैं कि तत्कालीन राजनीतिक दल एक दूसरे पर "कहकर" एहसान जताने से भी नहीं चूकते थे। ऐसे ही एक अभिलेख में उल्लिखित है कि एक विदेशी आक्रमण के दौरान जब एक पक्ष सत्तापक्ष में था और दूसरा विपक्ष में तब कुछ ऐसी अंदरूनी चीजें घटित हुई थी कि तब के विपक्षी दल ने सत्ता पक्ष का साथ दिया था। कालांतर में जब वही विपक्ष सत्ता में आ गया तब उसने प्रथम पक्ष को अपने उस एहसान का याद दिलाया कि कैसे उसने विदेशी आक्रमण के समय, मुश्किल वक्त पर उसका साथ दिया था. अत: वह उस एहसान को न भूले और कायदे से पेश आये. इस प्रकरण से स्पष्ट है कि विदेशी आक्रमण के समय एकजुट होना चार हजार वर्ष पूर्व एहसान अथवा उपकार की श्रेणी में आता था।

( ईसवी सन् 6012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश )

- सतीश यादव

Saturday, November 3, 2012

अपह्त हुएला गुरू एवम् तत्कालीन चिलगोइंया


    पुरातत्वविदों के अनुसार ढिल्लीका नामक स्थान से उत्खनन के दौरान एक ऐसा अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसमें कि किसी गुरू के अपहृत किये जाने का उल्लेख है। इतिहासकारों का मानना है कि अपह्रत गुरू सम्भवत: किसी ऐसे शिष्य के गुरू थे जो कि  योगाभ्यास के द्वारा अपना और अपने अन्य गुरू-भाईयों का भरण-पोषण किया करता था। कालांतर में उस शिष्य की अभिरूचि योगाभ्यास की ओर कम, तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रमों की ओर ज्यादा हो गई। शिष्य में अचानक पनपी इन अभिरूचियों से संभवत:  गुरू नाराज हो गये और उन दोनों के बीच खटपट शुरू हो गई।

   वहीं दूसरी ओर विदेशी इतिहासकारों का मानना है कि संपूर्ण विश्व में चार हजार वर्ष पूर्व अचानक ही गुरूओं पर ढेर सारी आफतें आई थी। पुराने गुरू धीरे धीरे लुप्त होते जा रहे थे और नये गुरूओं की आवक घट सी गई थी। ऐसे में किसी नामी-गिरामी शिष्य के गुरू का अपह्रत हो जाना लाजिमी है।
 
   वहीं एक अन्य अभिलेख जिसे कि हरिद्वार नामक स्थान से उत्खनन में मिला है, से पुष्टि होती है कि उल्लिखित शिष्य की राजनीतिक आकांक्षा एंव बड़बोलापन कालांतर में बढ़ जाने से तत्कालीन शासन व्यवस्था ने बल प्रयोग किया था और उस कार्यवाही में शिष्य को एक महिला के रूप में भेष बदलकर, भागकर अपनी जान बचानी पड़ी थी। अभिलेखों के कुछ स्थानों पर पलस्तर उखड़ जाने से इतिहासकार यह नहीं जान पाये हैं कि तत्कालीन सुरक्षा रक्षकों ने दाढ़ी-मूंछ वाली इस महिला को देख किस रूप में प्रतिक्रिया दी थी किंतु कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उस शिष्य का महिला के वस्त्रों में पाया जाना दर्शाता है कि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था पुरूष और महिला में भेद नहीं करती थी, सभी से एक समान व्यवहार किया जाता था। इस मत की पुष्टि उत्तर प्रदेश के लखनऊ नामक स्थान पर पाये गये एक भित्तिलेख से होती है जिसके तृतीय सोपान में विवरण दिया गया है कि वहां का कोई पुलिस अधिकारी अपने पुलिसिया कार्यकाल के दौरान ही वर्दी पहने हुए मांग में सिंदूर भर, लिपस्टिक लगा, नाक में नथुनी पहन अपनी कुर्सी पर बैठता था। इस अधिकारी को कालांतर में वृक्ष से अपना ब्याह रचाते और नारीसुलभ गीत गाते भी पाया गया। इन प्रमाणों से स्पष्टत: यह इंगित होता है कि भारत में चार हजार वर्ष पूर्व नर-नारी में विभेद नहीं होता था, उन्हें समान दृष्टि से देखा जाता था।  

 (ईसवी सन् 6012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश )


- सतीश यादव

Friday, November 2, 2012

स्कॉर्फि़याना फ़रमान

     आजकल खापों के फरमान ढेर सारे सुनने में आते हैं। लड़कियों को जीन्स नहीं पहनने देना चाहिये। यदि कोई लड़की जीन्स पहने मिल जायेगी तो उसके गाँव के मुखिया को जुर्माना भरना पड़ेगा। फिर एक और फरमान आया कि लड़कियों को मोबाइल नहीं रखना चाहिये इससे वे बिगड़ती हैं और अभी हाल ही में फिर यह फरमान सुनने में आया कि लड़कियां स्कॉर्फ से मुँह ढंककर न चलें क्योंकि स्कॉर्फ उनके घर से भागने में सहायक है।  यदि स्कॉर्फ मुंह न ढंकें तो कोई भी लड़की पकड़े जाने के डर से नहीं भागेगी। 
  खैर, ये सारे फरमान ठहरे। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के फरमान सिर्फ हरियाणा ही में सुनाये जाते हैं, देश के बाकी जगहों पर भी इस तरह की चीजें देखने में आती हैं। अभी दो महीने पहले जब मैं अपनी लदाख यात्रा के दौरान करगिल से आगे द्रास की ओर बढ़ रहा था तब एक जगह मन हुआ कि कुछ नाश्ता कर लिया जाय तो आगे बढ़ें। आलू पराठों की दुकान दिखी और गाड़ी साईड में लगाकर हमलोग बैठ गये। इसी बीच मैं अपने बाकी के साथियों को ढाबे पर ही छोड़ वहां चहलकदमी करते हुए एक दूसरी दुकान जा पहुंचा। वहां दुकान के बाहर एक पोस्टर लगा था जिस पर कि हिजाब से संबंधित बातें लिखी थीं। पोस्टरों पर MIAC संगठन का नाम हाथ से लिखा था। थोड़ा बहुत समझने की कोशिश की तो पता चला कि इसमें महिलाओं के लिये इंस्ट्रक्शन थे कि किस तरह उन्हें खुद को ढंकना चाहिये, किस तरह से रहना चाहिये आदि आदि।
 
     तात्पर्य यह कि चाहे हरियाणा हो या कश्मीर, हर जगह इस तरह के फरमान देने वाले संगठन मौजूद रहते हैं। पंजाब में भी आतंकवाद के दौर में कुछ पोस्टर बंटे थे जिनमें महिलाओं लड़कियों के लिये हिदायत रहती थी कि वे बिंदी न लगायें, अपने आप को ज्यादा मॉडर्न न दिखायें।

    खैर, ये सारे फरमान पहले भी सुनाये जाते रहे हैं, तब जबकि नख से शिख तक ढंकी हिरोइनों का दौर था और अब भी जब पूनम पांडे आदि का दौर है। देखते हैं जमाना आगे जाकर किस करवट बैठता है ।  फिलहाल तो फरमान सुनाने वाले, सुनने वाले और उन्हें अमल में लाने वालों के बीच एक अजब सी रस्साकशी चल रही है। जितनी ही जोर से लोग महिलाओं को पर्दे में रहने को कहते हैं उतनी ही जोर से पूनम पांडे, राखी सावंत, शर्लिन चोपड़ाएं अपने अवतरित होने की मुनादी करती हैं। मध्यवर्ग पहले से मध्यम मार्ग पर है। न ज्यादा आगे जाना चाहता है न ज्यादा पीछे। तमाम असंतुष्टियों के बावजूद इतने में संतुष्ट है यही क्या कम है।

 - सतीश यादव 

Wednesday, October 31, 2012

"मस्ताभिलेख" उत्खननम्

     हाल ही में हुए उत्खननों से कुछ ऐसे अभिलेख मिले हैं जिनके बारे में इतिहासकार मानते है कि इन अभिलेखों में तीन हजार वर्ष पहले के किसी तोता-मैना प्रेम-प्रसंग का वर्णन है। वहीं दूसरी ओर कुछ लिपि विशेषज्ञों का मानना है कि यह उस काल के दो तोतों के बीच हुआ कव्वाली टाईप सवाल-जवाब है इससे ज्यादा कुच्छ नहीं।

    वहीं इस तोता-मैना प्रेम प्रसंग को लेकर एक अन्य विशेषज्ञ का कहना है कि अभिलेख के द्वितीय सोपान में
 मैना के नाम के आगे कुछ रकम दर्ज है लेकिन उस जगह से प्लास्टर उखड़ जाने के कारण असल कीमत पढ़ी नहीं जा सकी है।

   वहीं दूसरे इतिहासकार का मानना है कि शून्यों की संख्या और उखड़े हुए प्लास्टर के क्षेत्र को कैलिपर से नापा जाय तो कुल आठ शून्य और बैठेंगे। इस लिहाज से असल कीमत पचास करोड़ है। 



   दूसरी ओर एक अन्य वरिष्ठ इतिहासकार का मानना है - चूँकि तीन हजार साल पहले शून्य की कोई कीमत नहीं थी, कोई कितनी भी संख्या में शून्य लगा सकता था इसलिये उखड़े हुए प्लास्टर के बराबर शून्य गिनना और उस आधार पर मैना की कीमत बताना उचित नहीं। अपने बात की पुष्टि के लिये इतिहासकार महोदय ने तीन हजार साल पहले के घोटालों का उदाहरण दिया जिनमें लोग कहीं भी कभी भी भक्क से मुँह खोलकर कह देते थे- पचास हजार करोड़ के घोटाले हुए, सत्तर लाख करोड़ के घोटाले हुए।

   उधर समाजशास्त्र के विशेषज्ञों का मानना है कि उस दौर में इतनी महंगाई नहीं थी। इसलिये हो सकता है कि मैना की कीमत पचास रूपये से ज्यादा न हो लेकिन चारणों द्वारा मैना की कीमत बढ़ा चढ़ाकर बताई गई हो।

    इसी दौरान स्टूडियो में बुलाये गये पक्षी विशेषज्ञ श्री बहेलिया सिंह "ठठेर" का मानना है कि मैना की कीमत पचास रूपये से लेकर पचास करोड़ तक हो सकती है बशर्ते पता हो कि मैना का प्रेमी वह तोता आखिर करता क्या था, उसकी हैसियत कैसी थी, कुछ काम-धंधा भी करता था कि ऐसे ही बैठा रहता था :)

( ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश :)


- सतीश यादव

Tuesday, October 23, 2012

इतिहास-फितिहास....उत्खनन-फुत्खनन

Photo: Satish Pancham

    हाल ही में हुए पुरातात्विक उत्खननों कुछ ऐसे अभिलेख मिले हैं जिनसे पता चलता है कि तीन हजार वर्ष पहले भारतीय राज्यव्यस्था से जुड़ा कारोबारी वर्ग अपने वाहन चालक एंव नौकरों तक के नाम अपनी कंपनीयों की रजिस्ट्री कराता था, यही नहीं उनके नाम किसी गगनचुंबी इमारत में डूप्कलेक्स कक्ष भी पंजीकृत करवा देता था। अपने अधिनस्थों, नौकरों, वाहन-चालकों के प्रति इतना सहृदय होना भारत के स्वर्णिम इतिहास को दर्शाता है। 

    वहीं कुछ विद्वान इस तरह से ड्राईवरों, नौकरों के प्रति दर्शाये गये सहृद्यता को बड़ी बात नहीं मानते क्योंकि यह तीन हजार वर्ष पहले बहुत आम बात थी। कई लोगों ने अपने कारोबार में अपने नौकरों, ड्राईवरों, रसोइयों को हिस्सेदार बनाया था। संभवत: यही कारण है कि कइयों के मंत्रिमंडल या लगुए-भगुए समूह में शामिल लोगों को आम बोलचाल में किचन कैबिनेट कहा जाता था। उन "किचनैटों" का मुख्य कार्य केवल और केवल नेता-स्वामी की सेवा करना था, उसके हाथ-पैर दबाना था, बदले में नेता पूरी की पूरी कंपनी उनके पते पर रजिस्टर कर देता था। इस लिहाज से देखा जाय तो भारत का तीन हजार वर्ष पूर्व का काल किसी सतयुग से कम नहीं था, बल्कि सतयुग की कल्पना ही भारत के तीन हजार वर्ष पूर्व के मनोहर हालात को देखकर की गई थी :-)

(ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश)

  - सतीश यादव

Monday, October 22, 2012

नेट भरोसे मिथकीय जानकारीयाँ


     अमूमन मैं मंदिरों में भीड़भाड़ के समय जाने से कतराता हूँ और वह भी जब किसी देवी आदि का मंदिर हो तो बहुत ज्यादा। वजह, वहां होने वाले बेवजह के तामझाम और बहुत ही मूड़ खराब कर देने वाली भक्तों की धमाचौकड़ी। पता चला हाथ जोड़कर हम आँखें मूने ईश्वर का ध्यान कर रहे हैं तभी पीछे कोई महिला केश खोले झूमने लगे, हुश्श, हुश्श की आवाज निकाल कर शरीर में देवी आने का कार्यक्रम शूरू कर दे तो पूरा मूड ऑफ हो जाता है, कहां ध्यान पूजा आदि के लिये आये थे और इधर ये शुरू हो गईं हैं।  फिर जब मौका नवरात्रों का हो तो देवी भक्त कुछ ज्यादा ही उत्साहित हो जाते हैं औऱ ऐसे ऐसे कान फोडू शोर करते हुए माता की भेंटे
गाते हैं कि मन करता है घर पर ही रहते तो अच्छा था, नाहक मंदिर आये।


ब्रम्हा जी द्वारा Oracle के माध्यम से सम्बोधन के अभिलेखीय प्रमाण :-)
      इस शनिवार छुट्टी के दिन श्रीमती जी के साथ मंदिर में सुबह-सुबह पहुंचा। पूजा-ध्यान के बाद मंदिर में यूं ही नजरें घुमाई तो मंदिर में दीवारों पर कुछ पेपर चिपके नजर आये। इधर श्रीमती जी पूजा-आदि में व्यस्त थीं तो जिज्ञासावश उन पर्चों की ओर बढ़ गया। देखा तो नौ दिनों के नवरात्र पर दिनों के हिसाब से विवरण दर्ज था। पहला दिन फलां होगा, दुसरा दिन फलां होगा, इस दिन की यह महिमा है। उस दिन की यह महिमा है। इस दिन फलां रंग के कपड़े पहनने चाहिये आदि आदि। मैंने थोड़ा गौर से देखा तो उन पर्चों में से कुछ को पहले गूगल ट्रांसलेटर के जरिये इंग्लिश से हिन्दी में ट्रांसलेट किया गया था और कुछ पर्चों को किसी वेबसाइट से सीधे लेकर प्रिंट लिया गया था। इन पर्चों को देख पढ़ने की इच्छा हुई कि देखें आखिर गूगल ट्रांसलेटर क्या कहता है। कुछ पंक्तियां पढ़ते ही लग गया कि भइया ये अपने बस की बात नहीं है, ये किसी देवभाषा में लिखा गया है, इसे वही लोग पढ़ सकते हैं। बानगी देखिये कि लिखा गया है - "अंतत: एक Oracle के माध्यम से भगवान ब्रम्हा ने सम्बोधित किया". आगे का कंटेंट आप चित्र बड़ाकर ही देख ले तो बेहतर होगा, उस पूरे पेज के टैक्स्ट
यहां शब्दश: रखना बड़ा बोझिल लगा.

    बहरहाल, इन पर्चों से इतना तो पता चलता है कि नेट पर उपलब्ध जानकारीयों का इस्तेमाल इस तरह से धार्मिक आयोजनों में भी होने लगा है। यह जितना अच्छा है, उतना ही खराब भी है क्योंकि नेट पर जो कुछ भी कंटेंट हैं वो सही है या नहीं इसे जानने की कोई आसान विधि नहीं उपलब्ध है। सो पुष्टि के अभाव में हो सकता है कि कालांतर में ढेरों बनते बिगड़ते इतिहास की तर्ज पर ये जानकारीयां भी समय के साथ बिगड़ती-ढहती आगे बढ़ें। बिगड़ती-ढहती इसलिये कह रहा हूं क्योंकि मैं खुद कई बार फेसबुक पर समकालीन किसी मुद्दे को इतिहास की चादर ओढ़ाकर व्यंग्य, चुटकी आदि लेते रहता हूँ। यह इतिहास का ओढ़ाना मुझे जहां एक ओर आनंद देता है, समकालीन लोगों पर कटाक्ष करने का सुकून देता है तो वहीं मन ही मन यह शंका भी उत्पन्न करता है कि जो इतिहास हम पढ रहे हैं कहीं वह भी मेरे तरह व्यंग्य या हास्य का पुट देकर तो नहीं लिखा गया है.

    एक उदाहरण देखिये कि जब हरियाणा में बढ़ते बलात्कार का कारण चाऊमीन बताया गया तो क्या स्टेटस मैंने फेसबुक पर ठेला था -

       भारत के उत्तरी दिशा में एक स्थान के उत्खनन से कुछ ऐसे अभिलेखीय साक्ष्य मिले हैं जिनके बारे में विशेषज्ञ मानते हैं कि अभिलेख के द्वारा उस समय प्रचलित हिन्दी भाषा में लोगों को आगाह किया गया है कि तीखी, चटपटी "चाऊ और मीन" न खाया जाय क्योंकि उससे विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण बढ़ जाता है और लोग अनियंत्रित होकर सामने वाले पर झपट पड़ते हैं। 

वहीं विशेषज्ञ इस अभिलेख की सत्यता पर सवाल उठाते हैं क्योंकि जिन दिनो चाऊ और मीन को बलात्कार का मुख्य कारण बताया गया था ठीक उन्हीं दिनों समकालीन बंगाल प्रांत की एक शासिका के अभिलेखीय प्रमाणों में कहा गया है कि लोगों द्वारा अपने बच्चों को खुला माहौल देने के कारण इस तरह के विपरीत लिंगी आकर्षणों की संख्या बढ़ जाती है और बलात्कार आदि की घटनायें काबू में नहीं रहतीं। 

उपर्युक्त दोनों ऐतिहासिक अभिलेखों में हांलाकि बलात्कार के कारण अलग अलग बताये गये हैं, तथापि इन अभिलेखों से उस दौर के शासकों द्वारा अपनी जनता प्रति चिंता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। 

वहीं, उत्खनन से कुछ ऐसे लोक-ग्रंथ भी निकले हैं जिन्हें इतिहासकार कथा-कहानी से ज्यादा महत्व नहीं देते। ऐसी ही एक कथा में वर्णन है कि चाऊ और मीन नाम के दो भाई चीनी भूभाग से देशनिकाला देने पर हरियाणा नाम की जगह पर आये और तरह तरह के उत्पात करने लगे। कालांतर में चाऊ उसी प्रदेश का गवर्नर बना और मीन लाट साहब।

( ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश :)

ऐसा ही एक स्टेटस तब लिखा था जब गुजरात में एक नेता ने टोल टैक्स देने को लेकर हवा में बंदूक लहराई थी

 लोथल और धौलावीरा जैसे एतिहासिक स्थलों के करीब हाल ही में हुए उत्खननों से एक ऐसी बंदूक मिली है जिसके बारे में वैज्ञानिक मानते हैं कि इसे तीन हजार साल पहले किसी टोल टैक्स नाके पर किसी वीआईपी द्वारा हवा में लहराया गया था। अभिलेखों में साक्ष्य हैं कि टोल नाके पर उस बंदूक लहराने वाले वीआईपी शख्स के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह टोल के पैसे चुका सके। इस बात से पता चलता है कि तीन हजार साल पहले भारतवर्ष में इतनी ज्यादा इमानदारी थी कि चुने हुए जनप्रतिनिधि बड़ी मुश्किल से अपना घर खर्च चला पाते थे, जैसे तैसे वे इमानदारी के पैसों से ही जनता की सेवा भी करते थे लेकिन एक भी पैसा गलत ढंग से नहीं कमाते थे।

( ईसवी सन् 5012 की इतिहास की उत्तर पुस्तिका के अंश :)

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   उपर्युक्त उदाहरण से मन में यह शंका आना स्वाभाविक है कि कहीं जो कुछ हम लोग इतिहास के नाम पर पढ़ रहे हैं वो भी इसी तरह मनमौजियत के अंदाज में तो नहीं लिखा गया था। बहरहाल मंदिर के  ट्रांसलेशन वाले पर्चों को कल को कोई सदा सर्वदा भारत का ही गौरवगान करने वाला शख्स  इतिहास के थैले में झांकेगा तो यही कहेगा कि Oracle डेटाबेस ब्रम्हाजी के जमाने में भी था। उसी डेटाबेस में सभी के कर्म-सुकर्म अपडेट होते रहते थे।

 - सतीश यादव

Monday, October 15, 2012

अनकंट्रोल्ड प्रेस कान्फ्रेन्स



Note : यह हल्का-फुल्का लेख केवल समझदार वयस्कों के लिये है, रंग-बिरंगा झंडा फहराने वाले कतिपय वयस्क-गण इस लेख से तनिक दूरी बनाये रखें :-)
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"श्रीमान जन्गी जी, आप बताइये इन पत्रकारों को कि क्या आपको परिवार नियोजन के लिये हमारी एनजीओ से कोई कंडोम मिला था या नहीं मिला था" ?

"मिला तो था एक पैकेट लेकिन हम कहे जब खतम हो जायगा तो फिर मिलेगा...."

"देखा....देखा.....देखा.....फिर मिलेगा......यही है सच्चाई......आप लोग नाहक बात बनाते हैं"

"लेकिन आपने जिन्हें कंडोम दिया वे तो बूढ़े हैं, उनकी प्रजनन वाली उम्र तो नहीं लगती" .

"यह जाँच का विषय है, आप चाहे तो जाँच करा लिजिये कि वे अभी इस उम्र में भी सक्षम हैं या नहीं.....हो जाने दें जाँच".

"उन्हीं से क्यों नहीं पूछा जाता, जन्गी जी आप के कितने बच्चे हैं" ?

"आठ".

"क्या परिवार नियोजन का कंडोम काम नहीं आया" ?

"आया , बहुत काम आया".

"देखा...देखा...काम आया कह रहे हैं और आप पत्रकार लोग बस बाते बनाते हो".

"लेकिन जब आपको कंडोम दिया गया था इनकी एनजीओ की ओर से तब आठ बच्चे कैसे हो गये" ?

"अब हम कइसे बतायें कि कैसे हो गये".

"हमारा कहने का मतलब है कि क्या कंडोम घटिया क्वालिटी का था" ?

"घटिया तो नहीं हां, एक दिन से ज्यादा नहीं चलता था".

"माने, आप क्या उसे पूरा दिन पहने रहते थे" ?

"हां, पहनता था".

"अरे आप को पता है आप क्या कह रहे हैं, कंडोम भला कोई पूरा दिन पहने रह सकता है, कहीं नेताजी किसी आगल पागल को तो नहीं पकड़ लाये" ?

"देखिये अब ये जन्गी जी का मन है कि वे कंडोम दिन भर पहने रहें तो ये उनकी मर्जी है, आप हम कैसे रोक सकते हैं.... ये जन्गी जी दिमागी रूप से स्वस्थ हैं औऱ भला चंगा काम करते हैं"

"जन्गी जी, आप क्या काम करते हैं" ?

"मैं रन्दा मिस्त्री हूं, लकड़ीयों पर रन्दा चलाता हूँ उन्हें "पलेन" बनाता हूँ"

"पिछली बार आपको कंडोम का पैकेट कब मिला था" ?

"एक महीना पहले".

"कितने थे एक पैकेट में" ?

"यही कोई तीस पैंतीस होंगे बकि हम तीन ही दिन में खतम कर देते थे".

"हांय, आप ऐसा क्या ...मेरा मतलब है कि ऐसा कौन सा....आई मीन...ऐसा कैसे हो सकता है कि तीन दिन में तीस कंडोम खत्म हो जांय" ?

"अरे एक दिन में दस काम में लेते थे तो तीन दिन में तीस न हुए".

"आप एक दिन में दस कंडोम कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं" ?

"अरे हभई उनकी मर्जी, वो चाहे जितना खतम करें, मुद्दे की बात है कि हमने कंडोम वितरण अपने एनजीओ के जरिये किया था, मसला समाप्त".

"तो भी ये कैसे संभव है कि एक शख्स दिन में दस दस कंडोम यूज करे....क्या पता बाजार में ले जाकर बेचता होगा...जंगी जी क्या आप उन कंडोम्स को बाजार में लेजाकर बेचते थे" ?

"नहीं, हमको खुदै कम पड़ जाता था तो हम बाहर क्यों बेचेंगे".

"आखिर आपको कम कैसे पड़ जाता था...हम लोग जानना चाहते हैं" ?

"देखिये पांच "कन्नोम" इस हाथ की उंगली में पहनते थे और पांच "कन्नोम" इस हाथ की पाँचों उंगली में पहनते थे और वही पहनकर रंदा चलाते थे तो हाथ सुरच्छित रहता था".

"ओह तो क्या आप ......." ?

"देखिये अब आप लोग ज्यादा निजी सवाल पूछ रहे हैं, मुद्दा यही था कि कंडोम का वितरण हुआ था या नहीं हुआ था, जंगी जी की बात से साबित होता है कि कंडोम का वितरण हुआ था, अब प्रेस कान्फ्रेंस समाप्त करता हूँ".

"नहीं नहीं आप को जवाब देना पड़ेगा, आप को जवाब देना पडेगा कि कैसे जंगी जी कंडोम को उंगलियों में पहन कर रन्दा चलाते थे.....क्या आप के एनजीओ ने दस्ताने नहीं बांटे थे यदि नहीं तो ऐसा क्यों" ?

"देखिये ये हमारा विषय नहीं है, अब यह बांटने के बाद कौन कैसे इस्तेमाल करता है हम कैसे बतायें" ?

"नहीं आपको बताना पड़ेगा मंत्री जी, आपको बताना ही पड़ेगा".

"डोन्ट पॉइन्ट फिंगर एट मी...डोन्ट पॉइन्ट फिंगर एट मी..."

"नहीं आपको बताना पड़ेगा..."

"जन्गी जी से पूछिए...."

"जन्गी जी आपको किसने बताया था कि कंडोम को उंगलियों में पहनना चाहिये" ?

"अब वही एक मैडम और एक डॉकटर साहेब आये थे, मैडम तो नहीं लेकिन डाकटर साहब उंगली में पहिनके बता रहे थे तो हम समझ गये थे"।

"देखिये, आपके एनजीओ ने जो डॉक्टर भेजा वो भी सही नहीं था, उसने गाँव वालों को गलत जानकारी बताई".

"देखिये, ये जाँच का विषय है, आप जाँच करा लें कि हमारे डॉक्टर कैसे गाँव में डेमो देते हैं या कैसे दे सकते हैं लेकिन मूल बात यही है कि कंडोम का वितरण हमारे एनजीओ की ओर से हुआ था और इसमें कोई भी....मैं फिर कहता हूँ कि कोई भी धांधली नहीं की गई...जिसे शंका हो, वो कोर्ट जा सकता है, उसकी जाँच कराई जा सकती है...अरे आप अब ....जी ? .... अरे बच्चे लोग गाँव में कंडोम को फुग्गा बनाकर उड़ा रहे हैं तो इसमें हम क्या कर सकते हैं, जाइये आप गाँव में जाकर पता किजिए.....जाइये जाँच कराईये...."

- सतीश पंचम

Tuesday, October 9, 2012

देशज "बइठऊकी"

- अरे तो क्या उसका दामाद कुछ काम धंधा नहीं करता क्या, अरे तो देख ताक कर बियाह करना था ना, बताओ इतने बड़े घर की लड़की है और मरद बहेतु निकल गया.....अरे तो देख तो रही हूँ कि दमाद को बार बार टीबी पर बता रहे हैं कि कर्जा खाया था किसी का......

- अरे तो ऐसा दामाद भी नहीं होना चाहिये कि कुल करजै कर डारे

- दुरभाग है, देखो कैसे बीतता है लड़किया का, बीपत तो बड़ी भारी है

- अरे वो बिमला का आदमी नहीं, वो भी तो करजै कर डारा था न, आखिर में देखो कलकत्ता में डरैबरी कर रहा है

- अरे तो एतना जलदी डरायबरी थोडौ न मिल गया था, पहले खलासी बना था बिमला का आदमी, चार पांच साल खलासी था बाद में हाथ सफा होते होते डरैबर हो गया

- देखो, क्या लिखा है, ओइसे टाई ओई लगाकर दिख तो रहा है टीवी पर, कोट भी पहिरा है, मोंछ भी है, सब कर्जा करके इतना बन ठन के दिख रहा है, खुद के कमाई का पहिनता तो न जाने क्या करता

- अरे कोई कह रहा था कि कर्जा नहीं लिया किसी दोस्त ओस्त ने दिया था

- अइसे ही दे दिया था ?

- नहीं, अइसे ही क्यों देगा, कोई पागल है जो पइसा अइसे ही दे देगा दोसदारी के नाम पर.

- सब लोग तो कहते हैं दिया था, बिना सूद लगाये

- ये तो बहुत नई बात सुन रही हूं, भला कोई दोसदारी में इतना कैसे लुटा देगा, ऐसा कभी सुना तो नहीं

- सुना क्यों नहीं, किसन भगवान और सुदामा का नहीं सुनी थीं, वो भी तो दोसदारी में दे दिये थे, वइसे ही आज भी है, भारत को अइसे ही परंपरा मानने वाला देस नहीं कहते

- तो क्या ये दामाद सुदामा की तरह दरिद्र था ?

- वो तो उसके लोग ही जानें लेकिन अब तो टीवी पर दिख रहा है जो वही बता रही हूं , देखो कैसे आँख फाड़ के देख रहा है टीवी में से, जइसे अबहीं बाहर आ जायेगा..... एतना गुस्सईल दमाद है कि बस

- अरे अइसे ही लछमिनिया का पाहुन भी था, बियाह के टैम जब सब दे दवा लिया तो कहने लगा भैंस चाहिये दहेज में वरना खाना न खाऊंगा

- तब ?

- तब क्या, बहुत मनाने-चोनाने के बाद अंत में एक बैल दिया तो माना

- भैंस क्यों नहीं दिये ?

- भैंस देने पर लछमिनिया को ही दुहना पड़ता, अब बैल ले गया है तो खुद ही जांगर ठेठायेगा.....

- ऐ बिट्टी, देख दाल बह तो नहीं रही, तनिक चूल्हा धीमा कर तो :-)

  - सतीश पंचम

(फेसबुक पर इस पोस्ट को आंशिक रूप से पोस्ट किया था )

Monday, October 8, 2012

कैसी जुल्मी बनाई तैंने नारी कि मारा गया ब्रम्हचारी.......चित्रलेखा रॉक्स डूड :-)


 कल शाम बरसाती मौसम में फिर से चित्रलेखा फिल्म देखी. मन लहलहा उठा। क्या गजब की फिलॉसफी, क्या गजब की अदाकारी, क्या गजब गीत-संगीत...अपन तो मुग्ध हो गये. इस फिल्म पर पहले भी पोस्ट लिख चुका हूं , वही पोस्ट अब फिर रि-पोस्ट कर रहा हूं।

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   मेरे यहां आज दुपहरीया आसमान में काले काले बादल जमा हो रहे थे। कुछ काले, कुछ श्यामल, कुछ उजले तो कुछ बेहद मटमैले। कुछ का आकार दैत्यों जैसा था तो कुछ पहाडों के होने का भ्रम दे रहे थे। एकाध को देख लग रहा था मानों कहीं आसमान में कोई आग जलाई गई है और उससे उठता धुआँ , उससे उठते गुबार ने समूचे आसमान को ढँक लिया है।

            अभी थोडी ही देर हुई थी कि बारिश झमाझम होने लगी। लोग जो यहाँ वहाँ आ जा रहे थे तपाक से किसी दुकान की शेड आदि में जाकर खड़े हो गए। बाईक से जाने वाले बाईक साईड में लगा वहीं कहीं किसी छत के नीचे खड़े हो गए। कुछ लोग उपर से गुजरते पुल के नीचे बाईक खड़ी कर बारिश से बचने लगे। धीरे-धीरे वातावरण में ठंडक आ गई। और आज यही वक्त था जब मैं अपने घर में फिल्म चित्रलेखा देख रहा था।
    
       चित्रलेखा....एक ऐसी फिल्म जो अपने आप में बेजोड़ है..अपने कथानक के कारण, अपने सुमधुर संगीत के कारण, अपने संवादों के गहरे भाव के कारण। और कॉस्ट्यूम............वो तो बस देखते ही रह जांय। सामंत बीजगुप्त का रंगभवन, नर्तकी चित्रलेखा का साज श्रृंगार, उसके बालों में शिवजी की तरह लगा आधे चाँद की आकृति,फूलों और बेलबूटों से सजे बाग. ....किस किस की तारीफ की जाय। हर एक फ्रेम अपने आप में बेजोड़।देखते ही लगता है कि राजा रवि वर्मा के बनाई तस्वीरें चल-फिर रही हैं।

          भगवती चरण वर्मा जी की कहानी पर आधारित यह फिल्म एक नर्तकी चित्रलेखा के इर्द-गिर्द घूम रही है जो मदिरा पान कर रही है, सज धज,..... साज-श्रृंगार में डूबी रहती है और सामंत बीजगुप्त से प्रेम कर बैठी है।

         इधर बीजगुप्त का विवाह किसी और से तय है लेकिन वह खुद चित्रलेखा के प्रेमपाश में हैं। इसी दौरान एक ब्रह्मचारी श्वेतांक का आगमन हुआ जिसे कि उसके गुरू ने सामंत बीजगुप्त के पास पाप और पुण्य का भेद जानने भेजा है। श्वेतांक को अपने ब्रह्मचर्य पर बड़ा घमण्ड है। रह रह कर वह महल की स्त्रियों को याद दिलाते रहते है कि मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ। मुझे मत छूओ। ब्रहमचर्य नष्ट न करो।

       तब उसके गुरू भाई सामंत बीजगुप्त समझाते हुए कहते हैं कि - ब्रह्मचारी श्वेतांक, तुम्हें किसी स्त्री को नहीं छूना चाहिए। ऐसे ही एक बार श्वेतांक रूपसी चित्रलेखा के सामने पड़ जाने पर उसका रूप देखते ही रह गए मुँह खुला का खुला। तब, सामंत चित्रगुप्त चित्रलेखा से उसका परिचय कराते हुए कहते हैं कि - ये हैं ब्रह्मचारी श्वेतांक, मेरे गुरू भाई।

  श्वेतांक ने सुधारा - ब्रह्मचारी नहीं........बाल ब्रह्मचारी।

 चित्रलेखा ने कटाक्ष करते हुए कहा - मेरा तोता भी ब्रह्मचारी है, बाल ब्रह्मचारी।

    अभी पाप और पुण्य को समझने का यह खेल चल ही रहा है कि चित्रलेखा ने एक दिन अकेले में अपने कोमल कोमल और नरम बतियों में श्वेतांक को उलझा कर उससे मदिरा पान का आग्रह किया....बावले श्वेतांक ने हिचकते हुए ही सही मदिरा पी ली ।  उसी वक्त सामंत बीजगुप्त का आगमन हुआ...श्वेतांक लज्जित.....ब्रह्मचर्य पर आँच.....अब क्या करें।

 आहत श्वेतांक सामंत बीजगुप्त से कहते है - स्वामी, मैंने पाप किया है। आज मैंने मदिरापान किया है। सामंत बीजगुप्त ने समझाते हुए कहा कि मदिरापान में कोई पाप नहीं। मैं तो रोज मदिरा पीता हूँ। लेकिन श्वेतांक का यह कहना कि मैं मदिरापान के बाद खुद को अपराधी महसूस कर रहा हूँ - सामंत बीजगुप्त को यह कहने पर बाध्य किया कि - यदि तुम किसी काम को करने के बाद अपराध महसूस करते हो तो वह कार्य अवश्य पाप है।
जाओ प्रायश्चित करो।

   और उसी वक्त पास बैठी चित्रलेखा के चेहरे के भाव बदल गए ....वह भी तो नर्तकी बन, अपने रूप जाल में फांस कर जो कुछ कर रही है कहीं न कहीं उसमें अपराध है। सामंत बीजगुप्त का यह कहना कि जिस काम को करने से मन में अपराध बोध हो वह पाप है.....चित्रलेखा को गहरे तक भेद गया।

      ऐसे में ही सन्यासी कुमारगिरी का आगमन हुआ जो चित्रलेखा को समझाने के लिए आए कि वह सामंत बीजगुप्त का पीछा छोड़ दे और यशोधरा से उनका विवाह हो जाने दे। फिल्म में सन्यासी और एक पतित नर्तकी के बीच पाप और पुण्य को लेकर हुए संवाद बहुत गूढ़ अर्थ लिए हैं और उन बातों को देख सुनकर पता चलता है कि कितनी मेहनत की गई है संवादों के लेखन में और तब तो गजब ही असर आता है फिल्म में जब चित्रलेखा अपने विरोध में खड़े सन्यासी कुमारगिरी को पाप और पुण्य का भेद समझाते यह गीत गाती है कि -

 सन्सार से भागे फिरते हो
भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना ना सके
उस लोक में भी पछताओगे

ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या
रीतों पर धर्म की मोहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को
कैसे आदर्श बनाओगे

ये भोग भी एक तपस्या है
तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचेता का होगा
रचना को अगर ठुकराओगे
सन्सार से भागे फिरते हो

हम कहते हैं ये जग अपना है
तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जनम बिता कर जायेंगे
तुम जनम गँवा कर जाओगे

       पूरे गीत को सुनते हुए महसूस हुआ कि गीतकार साहिर लुधियानवी जी ने कितनी गहराई से सांसारिक जीवन और व्यवहारिक जीवन के द्वंद्व को अपने गीतों के जरिए पेश किया है।

     उधर दिन बीतते गए और राज-रंग में डूबी, सामंत बीजगुप्त के प्रेम में गोते लगाती चित्रलेखा का मन धीरे धीरे अपराध बोध से ग्रस्त होने लगा। उसे लगने लगा कि यशोधरा जिससे सामंत बीजगुप्त का विवाह तय हुआ है उसके प्रति वह अन्याय कर रही है। सन्यासी कुमारगिरी की कही बातें उसे अब भी मथ रही होती हैं कि वह पाप कर रही है...। और एक समय आता है कि चित्रलेखा सब कुछ छोड़ छाड़ कर कुमारगिरी के गुफा में जा  पहुँचती है। सांसारिक जीवन का त्याग कर देती है।
 
     कुमारगिरी पहले तो अपने मठ पर किसी महिला साधक के होने पर ही आपत्ति जताई और कहा कि वह उन्हें अपनी शिष्या नहीं बना सकते। लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे। महान साधक और तपस्वी कुमारगिरी के यहाँ एक स्त्री ?

   लेकिन चित्रलेखा ने तब सन्यासी कुमारगिरी को चुनौती देते कहा -  क्या इसी तपस्या और ध्यान के बल आप मुझे पतिता मानने लग गए थे जिसमें इतनी भी सामर्थ्य नहीं कि एक स्त्री को अपने यहाँ आश्रय दे सके। मजबूरन कुछ सोच कर सन्यासी कुमारगिरी नर्तकी से सन्यासन बनी चित्रलेखा को अपने यहाँ रहने देने का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

       लेकिन, चित्रलेखा ने सन्यास भले धारण कर लिया हो....रूप तो उसका वही था,लावण्य तो उसका वही था। कुमारगिरी का ध्यान भटकने लगा.....तप, जप सब उन्हें अपना मन एकाग्र करने में सहायक न रहे। ईश्वर भक्ति से ध्यान बार बार चित्रलेखा के सौंदर्य की ओर भागता था। और एक दिन सन्यासी कुमारगिरी अपने आप पर काबू नहीं रख पाए और चित्रलेखा के मानमर्दन पर तुल गए।

    वह उसे बताते हैं कि आज सामंत बीजगुप्त का विवाह यशोधरा से हो गया है.....अब वह वापस नहीं लौट सकती....चित्रलेखा ने प्रतिरोध जताया लेकिन सन्यासी कुमारगिरी पर तो वासना ने अपना कब्जा कर लिया था...... चित्रलेखा को बलात् अपने शयनागार में ले जाकर पटक दिया...वासना की आग में रतिक्रीडा को आतुर कुमारगिरी के तप और सन्यास का चोला तार तार होने को उद्दत हो उठा। ऐसे में ही कुमारगिरी के एक शिष्य ने संदेश पहुँचाया कि सामंत बीजगुप्त ने भी राजपाट छोड दिया है और यशोधरा का विवाह श्वेतांक से हो रहा है जो कि अब बीजगुप्त के कहने से नया सामंत बनाये गये है।

     वस्तुस्थिति को जानकर सन्यासी कुमारगिरी को धिक्कारते हुए चित्रलेखा अपने बीजगुप्त से मिलने चल पड़ी और इधर सन्यासी कुमारगिरी की चेतना वापस लौटी.....वह क्या करने जा रहे थे....इसी झूठे जप और तप का बहुत मान था उन्हें......। अपने साथ हुए इस घटना से कुमारगिरी आहत हो आत्महत्या की ओर अग्रसर हुए तो उधर चित्रलेखा और बीजगुप्त का सुखद मिलन हुआ।

     फिल्म की जान है इसके गीत जो गहरे भाव लिये हैं। श्वेतांक के रोल में महमूद बहुत आकर्षित करते हैं तो सामंत बीजगुप्त के रोल में प्रदीप कुमार। चित्रलेखा के रूप में मीना कुमारी ने बहुत ही ज्यादा असरदार भूमिका अदा की है। भव्य चित्रण और क्लासिक फिल्मों के नजरिए से देखा जाय तो चित्रलेखा एक उत्कृष्ट फिल्म है।

  एक गीत जो बहुत ही ज्यादा सुमधुर और मन्नाडे की आवाज में गाया गया, वह है ब्रह्मचारी श्वेतांक के जरिए यशोधरा के प्रेम पाश में पड़ने पर गाया गीत -



लागी मनवा के बीच कटारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी
कैसी ज़ुल्मी बनायी तैने नारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी

ऐसा घुँघरू पायलिया का छनका
मोरी माला में अटक गया मनका
मैं तो भूल प्रभू सुध-बुध सारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी ...

कोई चंचल कोई मतवाली है
कोई नटखट, कोई भोली-भाली है
कभी देखी न थी,
 ऐसी फुलवारी कि मारा गया ...

 बड़ी जतनों साध बनायी थी
मेरी बरसों की पुण्य कमायी थी
तैने पल में, भसम कर डारी कि
मारा गया ब्रह्मचारी ...

 मोहे बावला बना गयी वाकी बतियाँ
मोसे कटती नहीं हैं अब रतियाँ
पड़ी सर पे बिपत अति भारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...

मोहे उन बिन कछू न सुहाये रे
मोरे अखियों के आगे लहराये रे
गोरे मुखड़े पे लट कारी-कारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...

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तो यह रही मेरी दुपहरीया की समयावली.............आसमान मे दलबंदी करते काले काले बादलों की घटाटोप के बीच फिल्म चित्रलेखा की देखवाई।

- सतीश यादव

Friday, October 5, 2012

The मध्यवर्ग

   रोज देखता हूँ कि मेरे ऑफिस में कार्यरत एक लड़की सुबह और शाम ऑफिस बस से आते और जाते बुर्का पहनती है। सुबह घर से आयेगी तो बुर्का पहनकर बस में चढ़ेगी और फिर पीछे की सीट जो अक्सर खाली रहती है वहां जायेगी और बुर्का उतार उसे तह कर बैग में रखेगी और फिर आगे की सीट पर आकर बैठ जायगी। यही क्रम शाम के समय जाते वक्त भी दोहराया जाता है। 

   इस लड़की का यूँ बुर्का बदलना पहले कुछ मुझे अजीब सा लगता था कि इतना भी क्या लजाधुर होना कि कार्यस्थल के लिये निकलो तो घर से बुर्का पहन कर, सारा दिन बिना बुर्के के काम करो और ऑफिस से शाम घर लौटो तो घर पर बुर्का पहनकर। लेकिन अब तो जैसे आदत सी हो गई है। लेकिन एक सवाल मन में जरूर खटकता है कि इस लड़की को घर वालों से इतनी पर्देदारी करनी पड़ रही है, जबकि बाहर वाले सहज भाव से हैं। उनसे कोई पर्देदारी नहीं।

     मध्यवर्ग की शायद यही दोहरी मानसिकता, लजाधुर होने और नये जमाने के साथ चलने की इच्छा सबकुछ गड्डमगड्ड कर देती है।
हमकदम :राखी गुलज़ार और परीक्षित साहनी सुबह-सुबह ऑफिस के लिये निकलते हुए

     एक फिल्म आई थी हमकदम। राखी गुलजार और परीक्षित साहनी मुख्य किरदार थे। जिसमें दिखाया गया था कि एक शहरी मध्यवर्ग किस तरह ऐसी ही परिस्थिति से दो-चार होता है। पूर्णतः घरेलू किस्म की पत्नी राखी को जब नौकरी मिलती है तो पहले तो वह समझ ही नहीं पाती कि कैसे वह बाहर निकले, कैसे लोगों से बात करे, कैसे क्या हो। इधर घर पर उसके सास ससुर रहते हैं जिनके सामने हमेशा वह सिर ढंक कर ही रही है, अब बाहर भी सिर ढंक कर कैसे निबाह हो। धीरे-धीरे नौकरी करते हुए पत्नी खुलना शुरू होती है, घर से निकलती है तो सिर पर पल्लू रखकर। ऑफिस पहुंचती है तो वाशरूम में जाकर चेहरा ठीक करती है, लिपस्टिक लगाती है, साड़ी ठीक पहनती है और फिर काम पर जुट जाती है। घर पहुंचने से पहले फिर वही उल्टा शुरू होता है। सिर पर पल्लू, लिपस्टिक पोंछाई और नॉर्मलीकरण।

     यह परिस्थिति देख अपने मध्यवर्गीय विडंबनाओं पर जहां कोफ्त होती है वहीं इन महिलाओं के जज्बे को सलाम करने का मन होता है कि घर और बाहर की दोहरी भूमिकाओं को वे किस खूबी से निबाह ले जा रही हैं।
उम्मीद करता हूँ कि मेरे ऑफिस में कार्यरत यह लड़की शायद आते जाते बुर्का पहनना छोड़ देगी या
क्या पता कोई और भी ज्यादा परंपरावादी परिवार में इसका विवाह हो उठे और फिर घर बैठने का फरमान सुना दे इसका पति तो ?    :(

  मध्यवर्ग बड़ा अजबै वर्ग है कम्बख्त ....।

- सतीश पंचम

(अभी दो दिन पहले ही फेसबुक पर यह स्टेटस अपडेट किया था,  वही स्टेटस पोस्ट के रूप में है )

Sunday, September 23, 2012

चच्चा से भेंट

    यदि आपने शोले देखी हो तो उसमें एक सीन है कि जब अमिताभ बच्चन बसंती और धर्मेंद्र की शादी की बात करने बसंती की मौसी के यहां जा बैठते हैं और लगते हैं अपने दोस्त का गुणगान करने। यह पोस्ट उसी सीन से प्रेरित हो लिखी गई है।

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- अरे बेटा बस इतना समझ लो कि मिलीजुली सरकारी अर्थव्यवस्था देश के सीने पर पत्थर के सिल की तरह है। बस किसी तरह यह सरकार खेंच ले जाऊं तो चैन की सांस लूँ। ये गठबंधन की मजबूरियां, ये सहयोगियों के चोंचले, ये जनता की बेकसी,  ये श्रीमती जी की सहेलियों द्वारा कसी जाने वाली फब्तियाँ, अब क्या क्या संभालूं, किन किन को ढोऊँ ?

- हां सच कहते हो चच्चा, बडा बोझ है आप पर

- लेकिन बेटा, इस बोझ को तो कोई कुँएं में यूं ही फेक तो नहीं देता न। बुरा नहीं मानना, इतना तो देखना ही पडता है कि देश चलाने के लिये पैसे कहां से लाये जांय, सरकार के खर्च कहां से जुटाए जांय, तमाम योजनायें कैसी चलाई जांय, अब पैसे तो पेड़ पर नहीं उगते न बेटा ?

- पैसों वाले पेड़ का तो ऐसा ऐसा है चच्चा कि एक बार तमाम घोटालों पर सख्ती दिखाई जाय, तमाम घोटालेबाज पकड़ में आ जांय, उनसे ही सारी घोटलपंती की रकम वसूली जाय तो पैसों वाला पेड़ एक नहीं बल्कि पूरा का पूरा बगीचा ही उग आयेगा, और फिर बेवजह एफडीआई पर इतना जोर देने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, यूं रसोई गैस, पेट्रेल डीजल के दाम बढ़ाकर नाहक जनता पर बोझ डालना क्या अच्छी बात है ?

- तो क्या अभी मैंने अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिये जो कदम उठाये वे खराब हैं, प्रिवेंटिव चीजें तो करनी ही पड़ती हैं न बेटा, लोग तो पशुओं से बचाव के लिये बाड़-ओड़ भी लगाते हैं, वो भी तो कुछ सोचकर ही करते हैं, फिर ये तो इकोनोमी का मामला ठहरा, इसे यूं ही तो नहीं छोड़ सकता ना ?

- नहीं नहीं ये मैंने कब कहा चच्चा कि इकोनॉमी को उसके हाल पर छोड़ दो, अर्थव्यवस्था की मजबूती तो बहुत जरूरी है लेकिन इस तरह रोज रोज दाम बढ़ाना भी तो ठीक नहीं, आम जनता तो वैसे भी दबी कुचली है

- तो क्या मैं अत्याचारी हूं , जनता को दबा कर रख रहा हूँ ?

- नहीं नहीं चच्चा, ये मैंने कब कहा....... लेकिन चच्चा जनता चीज ही ऐसी है कि अब मैं आपको क्या बताउं

- तो क्या जनता बेवकूफ है, नासमझ है ?

- छी छी छी चच्चा, वो और नासमझ ......ना ना ...अरे वो तो बहुत समझदार और सुलझे हुए विचारों वाली है। लेकिन चच्चा एक बार जब अपनी पर आ जाय तो फिर अच्छे बुरे का कहां होश रहता है, जिसे मन में आता है वोट देती है, जिसको मन आए गरियाती है। अब चुनावों के वक्त कोई किसी की उंगली तो पकड़ नहीं सकता ना ?

- ठीक कहते हो बेटा, मन माफिक मौजी जनता वो, कार्टून बनाकर छेड़-छाड़ करे जनता वो, उलूल जूलूल गरियाये जनता वो, अनाप-शनाप वोटिंग करे वो, लेकिन उसमें उसका कोई दोष नहीं है।

- चच्चा, आप तो मेरी जनता को गलत समझ रहे हैं। वो तो इतनी सीधी और भोली है कि आप तो उन्हें छोड़ केवल घोटालेबाजों को पकड़िये, उन्हीं से दाम वसूलिये, फिर देखिये ये सब्सिडी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, घोटाले की रकम से ही समस्या हल हो जायेगी और समय आने पर जनता की सब्सिडी की लत और टैक्स में छूट पाने की आदत भी जल्द ही छूट जाएगी।

- अरे बेटा, मुझ चच्चा को समझा रहे हो। ये सब्सिडी और टैक्स में छूट की आदत आज तक कभी छूटी है जो अब छूट जाएगी ?

- चच्चा आप मेरी जनता को नहीं जानते। विश्वास किजिये, वो इस तरह की कैफियत नहीं रखती। वो तो कम से कम में गुजारा कर लेती है। बस एक बार एफडीआई वापस हो जाय, दामों में रोलबैक हो जाय तो वो ढंग का कमाने खाने लगेगी

- ओह, बस यही एक कमी रह गई थी। तो क्या जनता अब भी भूखी-बेकार है, कमाती धमाती नहीं, बिल्कुल फजूल बैठी रहती है ?

- तो इसमें कौन सी बुरी बात है चच्चा, इस तरह की फजूलियत तो बडे-बडे उंचे लोग तक करते हैं. बडे बडे सरकारी आयोजनों में इसी तरह की फजूलियतें दिखती हैं, अपने योजना आयोग की आंकड़ेबाजीयों को ही देखिये, करोड़ों खरच करके सर्वे होता है और अंत में बताया जाता है अफसरों के जरिये कि छब्बीस रूपईय्या वाला अमीर होता है और उंचे खानदान से होता है।

-अच्छा तो बेटा ये भी बताते जाओ कि ये तुम्हारी गुनवान जनता किस खानदान से है, उसका प्रदेश कौन सा है, उसकी बोली-भाषा कैसी है ?

-बस चच्चा उसके खानदान का सर्वे होते ही आप ही को सबसे पहले बताउंगा। फिलहाल तो इसे देश की जनता ही समझिये।

- एक बात की दाद दूँगा बेटा कि भले ही सौ बुराईयां हैं तुम्हारी जनता में लेकिन तुम्हारे मुंह से उसके लिये तारीफ ही निकलती है।

-अब क्या बताउं चच्चा, मेरा तो दिल ही कुछ ऐसा है। तो मैं ये रोलबैक पक्का समझूँ।

- पक्का ? भले सरकार गिर जाय, भले पीएमम पद चला जाय लेकिन मैं ऐसी जनता के लिये जिसे दशकों से सब्सिडी और सस्ते अनाज पाने की लत लग गई हो अपने फैसले से नहीं पलटूंगा. एफडीआई वापस नहीं होगी
- क्या बताउं चच्चा, नहीं जानता था कि एफडीआई बैकबोन की तरह ही इतनी ज्यादा जरूरी है, वरना इस देश से अंग्रेजों को हम भगाते ही नहीं, आखिर उन्होंने कौन सा इतना बुरा किया था. खैर, जैसा आप चाहें,

- चाय तो पीकर जाओ बेटा, तुम्हारी चच्ची ने बनाये हैं

- अब क्या चाय पीऊं चच्चा, आपने तो सारा मूड़ ही बिगाड़ दिया, अब किसके दर जाऊँ, सोचा था भाजपा वाले कुछ करामात दिखायेंगे लेकिन उन लोगों को केवल पसेरी भर बोलना आता है, और जगह जगह छींटना, देखे नहीं उनके लोग भी किस तरह कर्नाटक में कोयला का खेल खेले, कुछ फर्क नहीं है आप दुन्नू में.

- तो जब सब कोई भ्रष्ट है तो किसी और का समर्थन करने की बजाय तुम अपने चच्चा का ही समर्थन क्यों नहीं करते,

- करना ही पड़ेगा चच्चा, जब साईकिल और हाथी की सवारी आप एक साथ गाँठ लिये हो तो मेरी क्या बिसात

- तो मैं तुम्हें अपना वोटर मान लूँ, तुम्हारा वोट पक्का ?

- ऐसे कैसे पक्का, पहले आप मुझे सिलेंडर का कोटा नौ से बारह किजिए, फिर सोचूंगा

- तुममे और दीदी में कोई फर्क नहीं है, वो भी तो सिलेंडर का कोटा बढाकर मांग रही है

- इतने पर भी मुझमें और दीदी में बारह सिलेंडरों का फर्क है

- हां, लेकिन तुम तो अपने लिए मांग रहे हो जबकि दीदी सबों के लिये मांग रही है, इतने स्वार्थी कब से हो गये, मुझे देखो मैं अपने लिये नहीं देश के लिये सोच रहा हूं, विश्वास न हो तो अपनी चच्ची से पूछ लो

- अब क्या पूछना-पुछवाना चच्चा, चलता हूँ, घर पर किन्नर दो बार आकर पूछ-पछोर गये हैं कि सिलिंडर की डिलीवरी कब हो रही है ...कम्बख्त सिलिंडर न हुआ लल्ला हो गया....गैस एजैंसी के बुकिंग क्लर्क तक से उनकी सांठ-गाँठ हो गई है, वही उनको इन्फार्मेशन देता है कि आज उनके यहां सिलिंडर की डिलीवरी हुई है आज उनके यहां......नाचने गाने के बाद किन्नरों को बधावा न दो तो वो

 अपने कपड़े उतारने लगते हैं, आपको तो कुछ झेलना पड़ता नहीं, झेलना
 तो हम जैसों को पड़ता है

- अरे बेटा झेलना तो मुझे भी पड़ता है, देखा नहीं कैसे भरे हॉल में एक ने शर्ट उतार दी थी अपनी

- तो क्यूं ऐसे फैसले लेते हैं कि किन्नर से लेकर वकील तक कपड़े उतारने पर तुल जांय

- बेटा, अब क्या तुम्हें समझाऊं, इस देश को चलाने के लिये बहुत कुछ सहन करना पड़ता है, कैसों कैसों का समर्थन लेना पड़ता है, न चाहते हुए भी बिना मन का बोलना पड़ता है, कांटों का ताज है यह कांटो का ताज.

- तो ठीक है आप कांटो का ताज पहनिये मैं चलता हूं..... ल्यौ गाने-बजाने की आवाजें भी आने लगीं, लगता है घर पर सिलिंडर आ गया है..... चलूं, जाने क्या-क्या गाये चले जा रहे हैं - सज रही गली मेरी सुन्हरी गोटे से....सज रही गली मेरी....

- सतीश पंचम

Saturday, September 22, 2012

ईसवी सन् 4012 की इतिहास की उत्तरपुस्तिका के अंश

     भारत में महिलाओं की राजनीतिक एंव सामाजिक स्थिति की सुदृढ़ता का पता इस बात से चलता है कि आज से दो हजार वर्ष पूर्व 21 सितंबर 2012 के दिन जब समूचा विश्व, शांति एंव समृद्धि हेतु विश्व शांति दिवस मना रहा था ठीक उसी दिन जुम्मे की नमाज के बाद बंगाल की एक शासिका ने अपने समस्त मंत्रियों को केवल अपनी एक आवाज में उनके पदों से इस्तीफा दिलवा दिया । यह घटना इस बात की तस्दीक करती है कि भारत में महिलाओं की स्थिति 2012 ई में गुप्तकाल और मौर्यकाल की अपेक्षा बहुत अच्छी थी। केवल इतना ही नहीं, एक शासिका ने तो अपने जीते जी अपने राज्य में मूर्तियां लगवाईं थी जिसके अवशेष अब भी यदा कदा कई स्थानों पर मिलते हैं। नखलऊ, जिसे पूर्व में लखनऊ कहा जाता था वहां से उस महिला की ढेरों मूर्तियां हाथ में पर्स लिये साबूत अवस्था में मिली हैं। इसके अलावा दक्षिण भारत में भी महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ थी। अभिलेखों में प्रमाण मिलता है कि जब जया नाम की महिला के यहां उसके विरोधियों ने छापेमारी करवाई तो उसके यहां से सैकड़ों जोड़े चप्पलों की प्राप्ति हुई जिससे पता चलता है कि दक्षिण भारत में महिलाओं के पहनावे में चप्पल पहनना तब तक शामिल हो गया था, लोग शौक से चप्पल पहनते थे।


( ईसवी सन् 4012 की इतिहास की उत्तरपुस्तिका के अंश :)

- सतीश पंचम

Wednesday, September 19, 2012

द ग्रेट इंडियन सिलेंडर गाथा



      इन दिनों रसोई गैस के सिलेंडरों हेतु बनाये सरकारी नियम को लेकर बड़ा हो-हल्ला मचा है. हर कोई कह रहा है कि सरकार द्वारा साल में केवल छह सिलेंडर सब्सिडाइज्ड रेट पर देना सातवें से लेकर आगे तक के सभी सिलेंडर अधिक दाम देने वाला नियम गलत है. भला ऐसे कैसे हो सकता है कि एक परिवार द्वारा केवल छह सिलिंडर ही साल में इस्तेमाल किया जाय. औसतन हर परिवार में महीने भर के लिये कम से कम एक सिलिंडर तो लगता ही है. इस बात पर हल्ला मचना था और मच भी रहा है. लोग समझ नहीं पा रहे कि कहीं सरकार साल को बारह महीनों से घटाकर छह महीनें में तो नहीं तब्दील करने जा रही. कई बड़े-बुजुर्ग इस आशंका से इन्कार भी नहीं कर रहे. उनका मानना है कि सरकारें पहले इस तरह के बदलाव करती रही हैं. मसलन जमीनों के एन्ड यूज के हिसाब से सरकारें किसी जमीन को योजना क्रमांक “झल्ला 1ओ” के तहत पट्टे पर देती है. लेकिन जैसे-जैसे आबंटित जमीन अपने एन्ड यूज से हटकर किसी अन्य यूज में तब्दील हो जाती है (मसलन स्कूल के लिये आबंटित जमीन मॉल में तब्दील हो जाय) तो सरकार उस जमीन को योजना क्रमांक “वल्ला 15 बी” से संलग्न कर देती है ताकि योजना की शुचिता बनी रहे.


      ऐसा ही कुछ कोयला आबंटन क्षेत्र में भी हुआ. कोयले की गुणवत्ता और उसके एन्ड यूज के हिसाब से जिस कोयले को बिजलीघर की भट्टी में जाना था वह कहीं और चला गया. यही वजह है कि भारत के फिल्मी गीतकार “झल्ला-वल्ला” जैसे प्रात: स्मरणीय गाने बनाते हैं जिनके बोल होते हैं, हमने समझा था गोल्डन जुबली जिसे, वो तो कोयला दिखाकर फुर्र हो गया, झल्ला-वल्ला.....झल्ला-वल्ला.

    किंतु सोचिये कि यही छह सिलेंडरों वाला नियम त्रेता युग में लागू होता तो क्या होता, पेट्रोल-डीजल के दाम तब बढ़े होते तो क्या होता. पता चले रावण कल से ही अपने पुष्पक विमान में ईंधन भरवा रहे हैं क्योंकि रात बारह बजे के बाद से मूल्यों में पांच रूपये की बढ़ोत्तरी होने जा रही है. इधर रावण पेट्रोल पंप पर ईंधन भरवा रहे थे, उधर उनकी बहन शूपर्णखा जंगल में राम-लक्ष्मण के पास विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुँच गई. जिस समय शूपर्णखा पहुंची, लक्ष्मण कंधे पर खाली गैस सिलेंडर लेकर कहीं जा रहे थे और सीता जी अपने पति राम जी से बोल चिंता जता रहीं थी कि आखिर वे कैसे रसोई बनायें, साल में केवल छह सिलेंडर ही सब्सिडाईज्ड रेट पर मिल रहे हैं, सातवें के लिये अधिक दाम चुकाने पड़ रहे हैं. राम जी सीता की बात सुन चिंतित थे कि उसी समय शूपर्णखा पहुंची थी. राम जी ने लक्ष्मण को रोककर कहा – "लखन, शूपर्णखा विवाह प्रस्ताव लेकर आई है, क्या कहते हो" ?

लक्ष्मण जी ने चुपचाप कंधे से खाली सिलेंडर उतारते हुए कहा – "मैं भला इस राक्षसी से कैसे विवाह कर सकता हूँ. शक्ल देखी इसकी ?  कितनी भयावह है".

लक्ष्मण की बात सुन शूपर्णखा और खुश हुई. संभवत: इंसानों में खूबसूरती को लेकर जो सराहनीय भाव है वैसा ही कुछ भाव राक्षसों में बदसूरती को लेकर हो.  जो जितना ज्यादा बदसूरत वह उतना ही अच्छा राक्षस माना जाता हो. सुंदरता का पैमाना ठहरा. क्या किया जा सकता है. यहीं देख लिजिए, भारत में स्त्रियों के पतले होंठ सुंदरता के लक्षण माने जाते हैं तो अफ्रीका में मोटे होठों वाली महिलाएं सुंदर मानी जाती हैं।

      उधर शूपर्णखा अब भी टल नहीं रही थी. तभी राम जी ने अचानक आदेशात्मक स्वर में लक्ष्मण से कहा – "लक्ष्मण, तुम शूपर्णखा से विवाह कर लो और एक नई कुटिया भी छवा लो. इस तरह हमें नियमानुसार सातवां सिलेंडर सस्ते दामों पर मिलने लगेगा. अभी प्रति परिवार छह सिलेंडर ही मिल रहे हैं, तुम्हारा परिवार बनते ही सातवें सिलेंडर की गुंजाइश निकल आयेगी"

    राम जी की बात सुन शूपर्णखा जी बोलीं – "आप सिलेंडरों की चिंता मत करें, मेरे भाई रावण के पास गैस सिलेंडरों की एजेंसी है, जितने चाहिये उतने हर महीने भिजवा दिया करेगा".

    शूपर्णखा की बात सुन राम जी हर्षित तो हुए लेकिन लक्ष्मण जी को लगा कि कहीं शूपर्णखा बरगला तो नहीं रही, क्योंकि उन्होंने सुना था कि रावण भले ही धनवान हो लेकिन है बड़ा कंजूस. जो शख्स पेट्रोल के दाम बढ़ने की बात सुनकर पहले ही अपने पुष्पक में ईंधन भरवाने लगे वो भला क्योंकर अपनी बहन के लिये गैस सिलेंडर मुफ्त में देने लगा. बात यहीं आकर फंस गई और लक्ष्मण जी ने आव देखा न ताव फट से उसके नाक कान काट दिये. नतीजा आप सभी जानते ही हैं. राम-रावण युद्ध हुआ. यह युद्ध भी इतना आसान नहीं रहा. कई ऐसे प्रसंग आये जब रावण ने इस युद्ध और उससे जुड़े खर्चों को लेकर मन ही मन अफसोस किया था।  विशेषत: तब जब हनुमान जी की पूँछ में आग लगाई जानी थी. महल के सारे कपड़े जब हनुमान जी की पूँछ में लपेट दिये गये तब आग लगाने के लिये पेट्रोल की जरूरत पड़ी. रावण ठहरा एक नंबर का कंजूस. पेट्रोल यूं किसी की पूँछ जलाने हेतु इस्तेमाल करने में आनाकानी करने लगा. देर होने लगी. उधर हनुमान जी पूँछ बढ़ायें जायें इधर पेट्रोल के दाम भी बढ़ते जांय. अंत में किसी तरह रावण राजी हुए और इससे पहले कि दाम और बढ़ें फटाफट पेट्रोल छिड़ककर कम दामों में ही आग लगवा दी गई. आगे की कथा तो आप लोगों को पता ही है.

    उधर कई विद्वजनों का मानना है कि कुम्भकरण जान बूझकर छह महीने सोता था ताकि नियमानुसार साल में मिलने वाले छह सिलेंडरों के वक्त ही वह जगा रहे और खाने-बनाने में कोई परेशानी न हो. इस लिहाज से देखा जाय तो कुंभकरण जितना पत्नी का ख्याल रखने वाला पति मिलना दुर्लभ है जो केवल इस कारण साल के छह महीने सोता रहे ताकि उसकी पत्नी को रसोई गैस के छह सिलेंडरों की चिंता में न घुलना पड़े.

    उधर सुनने में आया कि रावण के नाना रावण से नाराज चल रहे थे कि सारा दिन मंदोदरी संग रावण शतरंज खेलते रहते हैं ये नहीं कि गैस सिलिंडरों की समय पर डिलिवरी का ध्यान रखें. इस तरह तो एजेंसी हाथ से निकल जायगी. पीढ़ियों का बना-बनाया मुकाम टूटते देर नहीं लगेगी. उधर विभीषण भी रावण से खफा चल रहे थे कि भईया रिटेल में एफडीआई को लेकर कुछ कर नहीं रहे. खुद तो लंका संभाल रहे हैं लेकिन हमारी रीटेल वाली गुमटीयों पर आसन्न खतरे से अनजान बने हैं. मेघनाथ से जब विभीषण ने अपने मन की बात कही तो मेघनाथ उल्टे विभीषण पर चढ़ बैठे कि "एफडीआईयां आती जाती रहती हैं. उनको लेकर ज्यादा चिंतित होना हमारे राक्षसकुल की परंपरा के खिलाफ है. जाईये, जाकर दुकान संभालिये, देखिये कोई ग्राहक कुछ लेने तो नहीं आया"।

     बहुत संभव है विभीषण इन्हीं सब से उकता कर पाला बदल लिये हों. उधर बैद्य सुषेण भी अपने जेनेरिक दवाओं को लेकर रावण की बेखयाली और काहिली से तंग आ गये थे. विदेशी पेटेंट पर पेटेंट किये जा रहे थे और रावण थे कि बस सारा दिन – "हम हैं लंकेश, हम हैं, हम लंकेश, हम ये....हम वो" जैसे आत्मतोषी अट्ठहासी गर्जन किये रहते थे. रावण की इन्हीं गर्जनाओं को सुनकर एक दिन कुंभकरण ने नींद से उठकर कहा था – "भईया से कहो शोर कम करें, मेरी नींद में खलल पड़ रहा है"।



लल्ला मुस्काय ल्यौ.......
क्योंकि टैक्स कराहटों पर लगता है, मुस्कराहटों पर नहीं :-) 

    खैर, ये सब तो चलता ही रहेगा.  सुनने में आया है कि सरकार रसोई गैस की छह सिलेंडर की सीमा पर नरमी बरतने का मन बना रही है. यदि ऐसा है तो अच्छा ही है. लक्ष्मण जी सातवें सिलेंडर के चक्कर में  शूपर्णखा से विवाह करने से बच जायेंगे, सीता जी को रसोई हेतु परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी,  राम जी की मर्यादा पुरूषोत्तम की छवि भी बनी रह जायेगी. वैसे भी छवियों का बनना बिगड़ना इस बात पर निर्भर रहता है कि आप पर नियम कायदे किस करवट बैठते हैं. यदि सक्षम होंगे तो नियम कायदों के तहत ही छह सिलेंडर में काम चला लेंगे अन्यथा ब्लैक में लेने पर मजबूर होंगे, तब अपनी शुचिता और नैतिकता को ताक पर रख  बैकडोर से सिलेंडर चाहेंगे, सोर्स सिफारिश लगायेंगे. जिससे साबित होता है कि किसी देश के लोगों की नैतिकता-आदर्श आदि को डिगाना या उठाना सरकारों पर निर्भर है. चाहें तो सरकारी नियम को इस तरह बनायें कि सभी को आदर्श और इमानदारी के साथ जीने की सुविधा मिले या फिर  इमानदारी को बालपोथी के तहत स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबों तक ही सीमित रख दें और प्रति सातवें सिलेंडर पर बच्चों के पिता को कांखते और गृहिणियों को रसोई मेन्यू में एडजस्टमेंट करते देखा जाय. वैसे भी जहां सरकारें 26 रूपये में गरीबी अमीरी का फासला तय कर सकती हैं वहां सिलेंडरों की संख्या छह करना भी एक एहसान समझिये.

- सतीश पंचम

Tuesday, September 18, 2012

वही इंद्रधनुष

      जीवन में ऐसा भी होता है कि किसी संग विवाह तय हुआ हो लेकिन कुछ कारणों से विवाह नहीं हो पाये. बाद में जब वही दोनों जन एक दूसरे को जाने-अनजाने मौका पड़ने पर सामने पड़ते हैं तो परिस्थितियां मन में कई अनजानी गांठे खोलती चलती हैं. उन्हीं बातों को लक्ष्य कर विवेकी राय जी ने एक कहानी लिखी.  पहले भी इस कहानी को कई बार पढ़ चुका हूँ लेकिन हर बार उसके नये नये Absracts सामने आ जाते हैं।  

       विवेकी राय जी, जिनके बारे में इतना बताना जरूरी है कि वे ग्राम्य जीवन के ऐसे रचेता हैं जो अपनी लेखनी के जरिए सब कुछ सामने लाकर धर देते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु जी के काल के लेखक सत्तासी वर्षीय वही विवेकी राय जी जिनके जीते जी ही उनके नाम पर सड़क भी है, विवेकी राय मार्ग – जो शायद भारत में एक हिंदी के लेखक के लिए प्रकट किए गये सम्मान के तौर पर नोबल पुरस्कार से कम नहीं है। इस कहानी से संबंधित बातें पहले भी पोस्ट में एक लिख चुका हूं. आज फिर से प्रस्तुत कर रहा हूं.

   प्रस्तुत कहानी वही इंद्रधनुष में एक शख्स है जिसका कि विवाह एक लड़की से पांच साल पहले होते होते रह गया……कारण जो भी रहे हों……लेकिन विवाह नहीं हुआ। बाद में उस लड़की का विवाह उसी शख्स के एक मित्र से हो गया। कुछ साल बाद किसी काम से वह शख्स अपने उसी मित्र के यहां आकर ठहरा जिससे कि उस लड़की का विवाह हुआ।


अब यहां इस शख्स के मन में आस पास की चीजों को देख एक अलग ही तरह के भाव आना जाना शुरू करते हैं …..वह सोचता है कि वह लड़की, वह स्त्री कहीं न कहीं से उसे ताक रही है…….एक तरह का उल्लास …… एक तरह का मनसायन……. कि इन्हीं से विवाह होते होते रह गया…..यही वह स्त्री थी जिससे विवाह होना था …..

इन्हीं सब बातों को बहुत खूबसूरती से दर्शाते हुए विवेकी राय जी लिखते हैं कि -
  
      पश्चिम ओर जिधर मुँह करके वह खड़ा था, ठीक उसके सामने एक बड़ा सा इन्द्रधनुष उग आया। उसे लगा, भीतर का इन्द्रधनुष बाहर कढ़कर टंग गया है। कहीं टूट नहीं, एकदम पूर्ण इन्द्रधनुष, आसमान की उंचाई को छूता हुआ, पूरे क्षितिज को घेरकर, सप्तरंगी निखार का तरल-ज्योति पथ।


    कोई सपना नहीं, कोई जादू नहीं, कल्पना नहीं, बिल्कुल ही सामने ……. नदी उस पार जिसे पकड़ा जा सकता है,ऐसा इन्द्रधनुष उग आया, बिना हल्ला गुल्ला किये।

   वह नदी भूल गया, नाव भूल गया। ……..पानी में खड़े खड़े चूड़ियों की खनखनाहट, मुक्त खिलखिलाहट और कंठवीणा के कुछ बोल गूंज गये। फिर एक बार गंगाजली प्रतिमा उसकी आँखों में लहरा गईं.
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   भोजन के लिए पीढ़े पर बैठा तो पीछे चुहान घर में, कोठिला के ओट के पीछे कुछेक क्षणों का समारोह हो गया और वही आर-पार का संग, लेकिन कितना जोरदार।


    वह कल ही वहाँ गया था। जरूरी काम था। नहीं तो भदवारी की शेष बीहड़ता में वह यात्रा नहीं करता। वहां पहुँचा तो अभी दिन था। दोस्त ने खूब खातिर की। उसे मालूम था कि ‘वह’ है और एक बड़ी थाली में उदारता के साथ भरकर ढेर सारी पकौड़ी आयी। तेल-मसाले में तर आम के अचार की एक बड़ी-सी सलगी फट्ठी और उसी तरह मिरचे का भी एक भीमकाय अचार। देख कर ही मारे मिठास के उसका मन भर गया।

वह उसके दोस्त की बीवी है। उसे वह अच्छी तरह जानता है। एकाध बार देखा भी है। खूबसूरती में जवाब नहीं, लम्बी, छरहरी, सोनगुड़िया। संयोग नहीं बैठा, कट गयी, नहीं तो उसकी शादी ‘उसी’ के साथ लगी थी। यह कोई चार-पांच साल पहले की बात है।

“थके होंगे ?" दोस्त ने पूछा था।

“बिल्कुल ही नहीं”। उसने जवाब दिया।


चित्र: मेरे निजी कलेक्शन से..

वास्तव में वह बहुत सुख अनुभव कर रहा था। दोस्त का वह गांव उस दिन बहुत हंसता लगता था। मित्र के दरवाजे पर रौनक बरस रही थी। मच्छरों के डर से ढेर-सी करसी एक जगह कोने में रखकर धुँआ कर दिया गया था। मोटा कड़ा धुआं गुम्मज बांधकर पहले तो बैठक में अंड़स गया और फिर बाहर फैलने लगा। बैलों का सारीघर बैठक से लगा था। उसमें भी धुआं भरा था और उसी बीच खिला-पिलाकर हटाये गये बैल आँख मूंदकर जुगाली कर रहे थे। उधर से धुएं से मिल एक अजीब-सी गीली-गुमसाइन गोबरही गंध बैठक में आ रही थी। मगर यह धुआं और गंध जब भी उसके नथुने पर धक्का देतीं, फिसल जातीं और वह कैसे आराम से बीड़ी दगाये पड़ा था।

इन सब बातों को याद करने में भी एक सुख था मगर सामने सवाल था नदी पार जाने का, नाव का। उस पार वाले आदमी ने स्वर उंचा कर पूछा, “अरे भाई, नाव का कहीं पता है ? ”

बस कहीं से आती होगी। उसने उत्तर दिया।

और कहीं नहीं आई तो ?

इस तो का उत्तर उसके पास नहीं था। …..……

    उसके दोस्त ने रात में भोजन के लिए जगाया तो उसे रोमांच हो आया। हवेली में घुसते उसे लगा कि हर चीज पर उसके आने की छाप है, दालान में एक अतिरिक्त चिराग रखा गया है। नये सिरे से झाडू लगा है। आंगन में जिस ओर पानी गिरता है, हाथ लगा दिया गया है ( पानी निकाल दिया गया है ) और बहुत साफ लग रहा है। एक ओर आंगन में एक जोड़ी खड़ाऊँ गुनगुने पानी के साथ रखा है। अनावश्यक चीजें हटा दी गई हैं।

     पैर धोते-धोते उसका मन एक जोड़ी आँखों पर अटका रहा। किसी न किसी ओर से निशाना बांधा गया होगा। चौके में आते-आते तो वह जैसे एकदम उड़ रहा था। चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी (लीपन-पोतन) जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी। पीढ़ा भी धो-पोंछकर साफ किया गया लगता था। लोटा-गिलास चमचम।

    पीढ़े पर बैठते ही साड़ी की खरखराहट, चूड़ियों की खनक और कुछ सांय से (धीमे से) कही गयी बात की आहट पीछे कोठिले की ओट से मिली। इसी बीच परसी-गई थाली दोस्त ने सामने कर दी। सोनाचूर की सुवास से तबीयत भर गई।

“आप भी बैठ जाइये न !” उसने कहा।

   संकोच झाड़कर अब उसके दोस्त भी एक पीढ़ा खींच बगल में कुछ उधर हटकर इस तरह बैठ गये कि आवश्यकता पड़ने पर चीजें भीतर से बाएं हाथ सरकाया करेंगे।

     लक्ष्मीनारायण हुआ और दो-दो हाथ शुरू ही हुआ था कि भीतर से ‘हाय राम’ फिर एक खिलखिलाहट और फिर ‘घी तो आग पर ही रह गया’, बहुत धीमें पर साफ सुनाई पड़ा। उसने जिन्दगी में पहली बार कोयल की आवाज सुनी थी। एक जिंदा रस।

   “तब यहां कौन तुम्हारा लजारू है, उठकर दे दो।" उसके दोस्त ने कहा। और जो आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

    न हाथ-पैर बजा, न शोर-हंगामा और एक घटना घट गई। दोस्त की बीवी ने नीले पाढ़ की चेक डिजाइन वाली हलके गुलाबी रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी। उसे यह रंग बहुत पसंद है। नीला और गुलाबी : विस्वास और भाव। उसने मन ही मन सोचा – अबकी धान उतरा तो ऐसी ही एक साड़ी अपनी बीवी के लिए खरीदेगा।

    भोजन समाप्त कर अंचवते-अंचवते वह एक निर्णयात्मक शब्दावली पर पहुंच चुका था – इंद्रधनुष में लिपटा चम्पा का ताजा फूल।

    इन्हीं सब विचारों से आलोड़ित वह कब सो गया पता ही न चला। अगले दिन कब वह दोस्त से विदा मांग बीहड़ बरसाती मंजिल तय कर वह नदी पर आ गया, यह भी पता न चल सका।
पछिवा हवा सिसकारी दे रही थी और हल्की ठंडक गुदगुदा रही थी। सवेरे ही सवेरे देव घिर आये। झींसी पड़ने लगी। वह कपड़ो को गीला कर देने के लिए काफी थी। उसने छाता तान लिया।

     उस पार तीन स्त्रियां थीं और एक पुरूष। ये लोग भी उसी की तरह प्रतीक्षातुर थे। नदी बहुत चौड़े पाट की नहीं थी, परंतु इस पार और उस पार में अंतर तो था ही। वक्त गुजारने के लिए उस पार वालों से बातचीत करना भी कठिन था। उसने देखा उस पार वालो के पास छाता नहीं है। पुरूष बेचैनी से नाव के लिए इधर-उधर ताक-झांक कर रहा है। उसे फुहार की तनिक परवाह नहीं है। वह साधारण कुर्ते धोती में एक किसान लग रहा है।

      अचानक वह चौंक उठा। वह स्त्री किसी काम से उठ गई तो उसकी आड़ में बैठी स्त्री की झलक साफ हो गई। वही चेक-डिजाइन, वही गुलाबी रंग, वही इंद्रधनुष, इंद्रधनुष के भीतर इंद्रधनुष, लेकिन यह दूसरा (इंद्रधनुष ) गठरी की तरह क्यों सिकुड़ा, धरती में गड़ा जैसा अतिसंकुचित क्यों। इसके भी कोमल कलाइयां होंगी, कलाइयों में चूड़ियां होंगी और चूड़ियों में खनक होगी। लेकिन वैसी खनक यहां कहां। वह तो पीछे दूर छूट गई, बहूत दूर जहाँ के धुले बागों के पत्तों में अजब सी तेज गाढ़ी हरियाली है, जहां की माटी में सुवास है। वह एक बार फिर गहरे में डूब गया और क्षण भर बाद वापस आया तो फिर वही मनहूस पानी।

      लेकिन अबकी बार उसे लगा कि यह नदी का पानी नहीं, सड़क है। सड़क की इस पटरी पर वह खड़ा है और उस पटरी पर एक सजीला समारोह है, जिसमें इंद्रधनुष के विशाल फाटक से होकर जाना है। रंगारंग ज्योति के ये दो सप्तरंगी खंभे गोल घेरा बनाते हुए आसमान में उठते-उठते पूरी उंचाई पर जाकर मिल गये हैं। अमरावती का फाटक, गोलोक का सिंहद्वार कि बैकुंठ की पवित्र पौर है ?

    उसने देखा इंद्रधनुष के फाटक के भीतर वह किसान बौने की तरह लग रहा है। वह बबूल का पेड़ एक मामूली झाड़ी की तरह लग रहा है। दूर-दूर के बगीचे मरकत प्राचीर की तरह लग रहे हैं। और वह नारी ? विशाल, गोल, रंगों के झिलमिल मेहराबी मंडप के बीच इंगुरौटी ( लकड़ी की पतली-लंबी सिंदूरदानी) की तरह लुढ़की है। कौन लूट रहा है कि लाज का ऐसा बचाव ? इंद्रधनुष धरती में धंस क्यों जाय ? पानी में खड़ा होकर वास्तव में उसका मछुआ मन दो पारदर्शी चंचल मछलियों की झलक के लिए छटपटा उठा।

    उसके मन में एक बात आयी मगर अपनी मूर्खता पर स्वंय हंस पड़ा। साड़ी की तरह साड़ी होती है, रंग की तरह रंग होता है और औरत की तरह औरत होती है। उस इंद्रधनुष को देखा और अब वह इसे भी देख लेगा, उसके भीतर से, उस फाटक से होकर गुजरेगा, दुनिया का एक खुशकिस्मत इंसान, लेकिन यह पानी ? इतनी देर बाद पहली बार वह क्षुब्ध हुआ।

          पानी चुपचाप बह रहा था। धरती पर सरकती यह चंचल धारा और आसमान में उभर आयी क्षणजीवी विविध रंगों की अचंचल मणि-मेखला ! उसने जोर से सोचा, उसे इसी दम उस पार जाना है। समय चूक न जाय।

            इंद्रधनुष आसमान में उसी-गम्भीर आवाज से छाया था। बल्कि उसके ठीक समानांतर उपर से एक और पतली धार की तरह हलके-हलके उभर आया । नीचे चेक डिजाइन और गुलाबी रंग का रहस्य उसी प्रकार अनखुला था। नाव उसी प्रकार लापता थी। अथाह पानी उसी प्रकार सामने लहरा रहा था। सब वही था, मगर कहीं कुछ जरूर बदल गया था। उसने बंडी और चादर लपेटकर सिर पर रखा। उसके उपर छाता, धोती से कसकर बांध, लंगोट पहने पानी में उतर गया और दो हाथ चलाया कि दूसरे किनारे की माटी मिल गई, लेकिन उसे सख्त अफ़सोस हुआ कि इंद्रधनुष सच्चाई नहीं है।

- विवेकी राय

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 तो ये थी कहानी ‘वही इंद्रधनुष’ । इसमें कितना अमूर्त है, Abstract है, यह शायद हर पाठक के लिए अलग अलग पैमाने पर होगा, लेकिन मेरे हिसाब से प्रस्फुटित तौर पर इस कहानी का Abstractism कहीं कहीं प्रखर हो उठा है जो शायद आप लोगों ने पढ़ते समय महसूस भी किया हो,

     जैसे, दाल में घी छोड़ने के समय .......आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

     इसी तरह एक जगह लेखक कहते हैं - चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी।

-  सतीश पंचम

साभार – 'कालातीत' ( पराग प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली)

लेखक – विवेकी राय

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