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Thursday, December 29, 2011

हे सखी.......मांग ले मांगटीका :)

- मेरे पति तो लोकपाल होने जा रहे हैं सखी, अबकी मैं तो उनसे झुमका लूंगी।


- अभी हुए तो नहीं न, जब हो जांय तब जरूर लेना....और  मेरे पति भी कहां लेखपाल होने जा रहे हैं, वो भी तो बड़े.....

- तो तुम क्या लोगी उनसे झुमका कि कंगना ?

- सखी, न तो मैं झुमका लूंगी न कंगना, मैं लूंगी कम्पनी में हिस्सेदारी ।

- सो तो मैं पहले ही ले चुकी हूँ, मेरे पति को मुझ पर इतना विश्वास है कि उन्होंने न सिर्फ अपनी कम्पनी में मुझे हिस्सेदार बनाया बल्कि मेरे रिश्तेदारों की कम्पनी का हिस्सेदार बना दिया सखी।

- तब तो तुम बड़े आनंद से रहती होगी सखी, किसी बात की कमी न होती होगी ?

- अरे कहां, कोई कम्पनी में हिस्सा हो तो चल भी जाय, जब सोलह सत्रह कम्पनीयों में हिस्सेदारी हो तो मुश्किल हो जाती है सखी ।

- हां, सो तो है।

- अच्छा सखी, क्या तुम्हारे पति ने अब तक तुम्हें कहीं कम्पनी में हिस्सेदार नहीं बनाया ?

- कैसे बनाते, पहले इमानदार जो थे ।

- तो क्या वे अब बेईमान हो गये हैं ?

- नहीं, अब उन्हें तुम्हारे लोकपाल पति का डर सताने लगा है सखी ।

- तो क्या हुआ, मैं अपने पति से कहकर तुम्हारे पति को भी लोकपाल बनवा दूंगी ।

- नहीं, अब वे बुढ़ौती में और किसी चीज की चाह नहीं रखते, कह रहे थे कहीं से जुगाड़ लगाकर राज्यपाल बन जाऊं तो बुढ़ौती आराम से राजभवन में कटे। तुम बगइचे में फुलवारी निहारना, मैं गार्डन में छतरी लगाकर उसके नीचे आराम कुरसी पर अखबार पढ़ूंगा, सामने ही प्लेट में अंगूरों के गुच्छे पड़े होंगे, और....

- तो क्या राज्यपाल हो जाने से आराम ही आराम हो जाता है सखी ?

- हां, कुछ ऐसा ही समझो।

- ऐसी सुविधा मेरे लोकपाल पति को क्यों नहीं मिली सखी ?

- वो इसलिये कि तुम्हारे पति का ओहदा संवैधानिक नहीं है सखी जबकि मेरे पति का ओहदा संवैधानिक है

- आग लगे उस कमलहे पार्टी वालन को जो लोकपाल संवैधानिक नहीं होने दिया, हाथ वाले तो जी जान से लगे थे लोकपाल को संवैधानिक करने में, एक बार संवैधानिक हो जाता तो......

- वो देखो तुम्हारे पति आ रहे हैं, अंगूर के गुच्छे लिये हुए..... मैं चलती हूँ।

- कहां हैं अंगूरों के गुच्छे, वो तो फाइलें हैं।

- ध्यान से देखो.....वो फाइलें नहीं, अंगूरों के गुच्छे ही है, आज उनसे तुम कंगना, झुमका, नौलखा हार चाहे जो मांगोगी दे देंगे।

- ऐसा क्यों ?

- क्योंकि अब तक उनकी स्थिति उहापोह वाली थी.....लेकिन अब वे आधिकारिक रूप से असंवैधानिक हो चुके हैं......अंगूरों के गुच्छे भले ही टेबल पर रखी प्लेटों में फबते हों लेकिन फलते हमेशा ऐसे ही 'कलमी ओहदों' पर हैं......आज भले लोग इमानदारी की पकौड़ी छान रहे हों......लेकिन जब चारों ओर से यह बिल उल पास हो जायगा, तब  हरियाली छा जायेगी सखी....आज नहीं तो कल जब  कलमी अंगूरों का मौसम आयेगा  तो देखना यही लोग 'बाड़ फाँद' जाएंगे........और हां,...........आज अपने मन की साध पूरी कर लेना.......झुमका, कंगना, बिछुआ, मांगटीका  : )

- सतीश पंचम

Sunday, December 25, 2011

साहित्यिक सौगात.....

राग दरबारी.... राग केदार...राग मल्हार.....राग... 
         नहीं जानता था कि जिस फेसबुक को मैं इतना सशंकित नज़रों से ताकता था वह कभी ऐसा भी खूबसूरत उपहार दे जायगा। जी हां, मैं अपने लिये इसे उपहार ही कहूंगा। हुआ यूं कि अभी इसी हफ्ते फेसबुक पर था कि जाने माने साहित्यकार सूरज प्रकाश जी का स्टेटस अपडेट देखा जिसमें उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर की थी कि वे अपने चार हजार किताबों के संग्रह को लोगों के बीच बांटना चाहते हैं, उन पाठकों के हाथों में समर्पित करना चाहते हैं जो कि साहित्य में रूचि रखते हैं, या जिन्हें पठन पाठन अच्छा लगता है। बस फिर क्या था मुझे तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई। किताबें.....किताबें.....किताबें... ओह मैं तो सोच कर ही रोमांचित हो उठा। कहीं धर्मवीर भारती, कहीं निर्गुण, कहीं गोविंद, कहीं रेणु, कहीं राजेन्द्र यादव, तो कहीं विवेकी राय.......कितना तो दिलचस्प......कितना तो सुखकर। लेकिन तभी सूरज प्रकाश जी के स्टेटस पर आगे नजर पड़ी, लिखा था - किताबें लेने वाले अपने यहां से थैलीयां लेकर आएं। पढ़ते ही सूरज जी से चुहल करने का मन हुआ और मैंने लिखा - बोरा चलेगा क्या ? तात्पर्य - हम जैसे 'किकी' ( किताबी कीड़े) को थैली भर किताबों से कहां संतोष होने वाला है, हमें तो बोरा भर किताबें चाहिये :)

       खैर, प्लान बना डाला। 24-25 दिसंबर की तारीख तय की थी सूरज प्रकाश जी ने किताबें पाठकों के हाथ सौपने हेतु। बात ही बात में रश्मि रविजा जी को भी सूरज प्रकाश जी की उस पोस्ट का लिंक थमा दिया जिसमें उन्होंने अपने द्वारा संग्रहित किताबें पाठकों को देने की इच्छा जाहिर की थी। नियत समय पर सूरज प्रकाश जी के घर की ओर चल दिया। उनके सोसायटी में पहुंचने पर गेटकीपर के रजिस्टर में अपना नाम-फोन नंबर आदि दर्ज किया और लिफ्ट की ओर बढ़ा। पता चला कि वे फर्स्ट फ्लोर पर ही रहते हैं। सो सीढ़ियों से ही चल पड़ा।

       दरवाजे पर पहुंचते ही बेल बजाई, दरवाजा सूरज प्रकाश जी ने ही खोला। दुआ-सलाम हुई और तभी नज़र भीतर की ओर गई। कई लोग दिखे जो किताबों का बंडल बांध रहे थे, समेट रहे थे, गिन रहे थे। कोई कह रहा था - "अरे तेवारी, इहौ लेय ल्य हो" ! मन में कहीं हूक उठी कि शायद मुझसे पहले ही ढेर सारे 'किकी' पहुँच कर किताबें समेंट चुके हैं, लेकिन नहीं, ....मैं गलत था। वे लोग किताबें लेने जरूर आये थे लेकिन एक सीमा तक ही ले जा सकते थे और वही बांध बूंधकर ले जा रहे थे। असल भंडार तो अंदर खाने में था जहां सोफा से लेकर अलगनी, जमीन और ताखे तक किताबों से अटे पड़े थे।

       अंदर रश्मि रविजा जी दिखीं किताबें चुनते हुए। उनसे यात्रा के दौरान सम्पर्क में था तो पता ही था कि वे वहां पहुंच गई हैं। हाय हैलो के बाद मैं भी लग गया किताबें चुनने में। कहीं बिमल मित्रा की किताब दिखी कहीं कृष्णा सोबती, कहीं कमलेश्वर तो कहीं धर्मवीर भारती। एक ओर सोफे पर विश्वप्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद करीने से सजे थे तो अलगनी पर परसाईं सजे थे। फर्श पर भी किताबें कुछ इस तरह से सजाकर रखीं गईं थी कि लेखकों के नाम पढ़ने और किताबें चुनने में आसानी हो। मैं जोरशोर से जुट गया। हर किताब लगती कि इसे भी ले लूं....उसे भी ले लूं लेकिन सब तो नहीं ले सकते थे। औरों को भी तो मिलनी चाहिये। यही तो ध्येय था सूरज प्रकाश जी का कि उनकी पढ़ी किताबें, औरों को भी मिलें, औरों तक वह ज्ञान, वह आनंद पहुंचे। सो किताबों का चयन बेहद कठिन हो गया। कुछ पन्ने पलटते, पढ़ते, फिर किताब रखते, सरकाते।

सोफे पर हिमालय.....
       दूसरी ओर सूरज प्रकाश जी बेहद व्यस्त थे। वे किताबें चुनने वालों को उनकी इच्छानुसार यथाशक्ति सहायता कर रहे थे। कोई कुछ किताब मांगता कोई कुछ। कई बार किताबें होने के बावजूद नहीं मिलतीं,ऐसे में सूरज प्रकाश जी भी कुछ परेशान दिखे। उनका परेशान होना लाजिमी था क्योंकि पिछले कई दिनों से वे अपने बदन पर लगे दर्द निवारक पट्टे के बावजूद किताबें तरतीब से सजा रहे थे ताकि पाठकों को ज्यादा ढूँढना न पड़े। लेकिन वहां इतना अंबार था कि जब चाहो तब किताबें मिलती ही नहीं थीं। पाठक के चले जाने के बाद न जाने कहां से प्रकट हो जातीं मानों कहना चाहती हों मैं यहीं तो थीं, याकि वे किताबें खुद ही सूरज जी के घर से न जाना चाहतीं थीं। इसी तरह किताबों की छुपम छुपाई बड़ी देर तक चलती रही।

      इन तमाम किताबी सेलेक्शन्स के बीच कुछ अलहदा चीजें भी देखने में आईं। एक सज्जन किताबें यह कह कर चुन रहे थे कि स्कूली बच्चों के लिये ले रहे हैं। सूरज जी की नजर पड़ी तो वह किताब मुक्तिबोध की थी। भला बच्चे कब से मुक्तिबोध पढ़ने लगे ? ऐसे में सूरज जी का झुंझलाना स्वाभाविक था कि ऐसे कैसे लोग हैं जिन्हें बच्चों की किताबें और बड़ों की किताबों में फर्क ही न मालूम पड़े। दरअसल व्यक्तिगत तौर पर किताबों के लेने की संख्या सीमित थी लेकिन लाइब्रेरी के तौर पर लेने पर संख्या दस गुना थी और इसी का लाभ उठाते हुए सज्जन जी दिखे। जो भी हाथ आया उठाते चलें। ऐसे ही वक्त पर वहां सुनी उस आवाज का अर्थ समझ आता है जिसमें बोला गया था - "अरे तेवारी, इहौ लेय ल्य हो" !

सूरज प्रकाश

          खैर, अभी किताबों का चयन चल ही रहा था कि एक पाठक ने अलगनी पर रखी भगवद्गीता भी लेनी चाही। मुझे चुहल सूझी - हां ले लिजिए...इससे पहले की बैन हो जाय....भगवद्गीता ले ही लिजिए :) और भी ढेरों किताबें ली गईं। रह रहकर सूरज प्रकाश जी से पाठकों की बातचीत भी सुनने में आती जिससे पता चलता था कि किताबों के बारे में, साहित्य के बारे में लोग अब भी कितनी रूचि रखते हैं। तभी बात राहुल सांकृत्यायन जी पर चली जिनके बारे में सूरज जी ने बताया कि वे अपने दिमाग का आम इंसान के मुकाबले कई गुना बेहतर इस्तेमाल करते थे, उनकी बातें सुनना अच्छा लग रहा था। इस बीच काफी समय बीतता जा रहा था। हमारी चुनी हुई किताबें तय व्यक्तिगत संख्या से उपर जा रहीं थी। हर किताब लगती कि इसे अपना होना चाहिये लेकिन क्या करें। उधर रश्मि जी भी कई किताबें बटोर चुकीं थीं और उनकी संख्या भी तय संख्या से ज्यादा जा रही थी। सूरज प्रकाश जी से हमने इसकी चर्चा की तो उन्होंने कहा कोई बात नहीं - आप 'रून्गा' के तौर पर ले लिजिए....रून्गा यानि 'घेलुआ' जिसका अर्थ है कि खरीदी गई वस्तुओं के साथ एकाध वस्तु ग्राहक की मांग पर या दुकानदार द्वारा अपनी ओर से डाल देना। तो इस तरह 'घेलूआ' के समानार्थी शब्द 'रून्गा' से परिचय हुआ।
सूरज प्रकाश जी के साथ मैं, सतीश पंचम.... :)

        उधर समय तेजी से बीता जा रहा था, लोग आते रहे, किताबें चुनते रहे। सूरज जी बड़ी शिद्दत से उनकी सहायता करते रहे। मन में आया कि सूरज जी से पूछूं कि आपकी इन किताबों को हम लोग लिये जा रहे हैं तो आप को कुछ तकलीफ तो नहीं हो रही लेकिन यह सवाल कुछ वैसा ही लगा जैसा कि न्यूज चैनलों पर रिपोर्टर लोग किसी को दुख में देख पूछते हैं कि आपको कैसा लग रहा है। सो मन की बात मन में ही रखा। जानता हूं कि किताबों से भावनात्मक लगाव सभी में कुछ न कुछ रहता ही है, फिर सूरज जी के संग्रह को देख समझा जा सकता है कि वे कितने बड़े 'पुस्तक प्रेमी' हैं।
  

ये साथ गुजारे हुए लमहात की दौलत

             अभी कुछ समय पहले ज्ञान जी के ब्लॉग पर भी इसी बात को लेकर चर्चा उठी थी कि हिन्दी वाले अंग्रेजी वालों के मुकाबले अपनी हिन्दी किताबों से कुछ ज्यादा ही भावनात्मक लगाव रखते हैं। उन्हें रद्दी में जल्दी नहीं देते जबकि अंग्रेजी की किताबें रद्दी की दुकानों पर आसानी से देखी जा सकती हैं। यहां भी सूरज जी का वही भावनात्मक लगाव झलक रहा था। उन्होंने किताबें रद्दी में देने की बजाय उन्हें साहित्य रसिकों के बीच बांट देना उचित समझा। हां, इस बात का ध्यान जरूर रखा कि जो कोई भी किताबें ले जाय वह उन किताबों का नाम, विवरण, अपना फोन नंबर वहां रखी डायरी में जरूर दर्ज करे ताकि भविष्य में जब कभी उन्हें रेफरेंस के लिये या कभी पढ़ने की जरूरत महसूस हो तो उस पुस्तक प्रेमी से संपर्क कर सकें।

हल्कू....झूरी.....महतो...धनिया....हामीद....चिमटा...
         वहीं एक और बात देखने में आई कि हर किताब पर सूरज जी एक विशेष स्टैम्प लगाने को कह रहे थे जिस पर सूरज प्रकाश जी के नाम, ईृमेल आई डी, फोन नंबर के साथ नीचे लिखा था कि - 'ये किताब पढ़ कर किसी और पुस्तक प्रेमी को दे दें' । इस स्टैम्प से सूरज जी के इस अनूठे प्रयास का महत्व पता चलता है जिसके जरिये उन्होंने अपनी किताबों के प्रति मोह-माया का त्याग करते हुए उन्हें पाठकों के बीच आगे भी फैलाने की चाहना रखी है । सूरज जी द्वारा किताबों के पठन-पाठन, किताबों के फैलाव, किताबों से भावुकता भरा बिलगाव देख मुझे महेन्द्र कपूर द्वारा गाया वह गीत बहुत शिद्दत से याद आ रहा है जिसे सुनते हुए लगता है कि यह गीत शायद ऐसे ही किसी लम्हे के लिये लिखा गया होगा जब कोई किसी से वक्ती तौर पर अलविदा होने को हो, बिछडा जा रहा हो और आगे कभी मिलने की उम्मीद भी रक्खे। यहां जिस अंदाज में किताबों से बिलगाव हो रहा है, उनसे फिर से कहीं नये सौगात के रूप में मिलने की उम्मीद रखी जा रही है, उनकी महक, उनके कशिश को पाने की इच्छा रखी जा रही है वह शब्दश: महेन्द्र कपूर के गाये उस गीत की याद दिला जाते है जिसमें वे कहते हैं -
हम जायें कहीं इनकी महक साथ तो होगी


अभी अलविदा मत कहो  दोस्तो
न जाने फिर कहाँ मुलाक़ात हो.....

        सचमुच, ये किताबें इसी तरह आगे भी एक दूसरे के यहां संचरित हों, पठन-पाठन हेतु फैलें तो कहीं न कहीं आपस में फिर से मिल ही जायेंगी। साथ ही इन किताबों से लिये हुए अनुभव, उनकी कशिश भी जुड़ती चली जायगी। आगे की पंक्तियां और भी बहुत कुछ कहती हैं जिनमें - चेहरे दर चेहरे से गुजरने की रवायत और महक को बखूबी उकेरा गया है.......।

ये चेहरे, ये नज़रें, ये जवां रूत ये हवायें
हम जायें कहीं इनकी महक साथ तो होगी


ख्वाबों में ही हो चाहे मुलाकात तो होगी

और अंत में गीत के बोल जैसे इन किताबों की सौगात के बारे में ही कह रहे हैं कि....
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी

ये साथ गुजारे हुए लमहात की दौलत
जजबात की दौलत, ये खयालात की दौलत
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी


बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी.....


         सूरज प्रकाश जी के इस अनूठे प्रयास की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। उम्मीद करता हूँ कि जो लोग हिन्दी सेवा का रात-दिन दम भरते हैं, साहित्य सेवा की भावना को निरंतर भुनवाते रहते हैं, डांय-डांय सम्मेलनों, कचर-सम्मेलनों में थोथे सम्मान, बजर-सम्मान ले-देकर  'दंतिल मुस्कराहटें' बिखेरते नजर आते हैं  वे भी सूरज प्रकाश जी के इस अनूठी पहल से प्रेरणा लेंगे और अपनी साहित्यिक सेवा को एक नये नजरिये से देखने का प्रयास करेंगे।


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसके सोसायटी के रजिस्टर में मैंने In-Time तो दर्ज किया लेकिन बाहर जाते वक्त पुलकित मन और किताबों के ओज़ में Out Time दर्ज करना भूल गया...... कागजी तौर पर मैं अब भी सूरज प्रकाश जी के घर में ही हूँ....उन किताबों के संग....बिनती....होरी....झुनिया....हल्कू जैसे पात्रों के बीच । ( जी हां, मैं सचमुच सूरज प्रकाश जी के सोसायटी रजिस्टर में आउट टाइम डालना भूल आया हूं :)

समय -   मिथिलेश्वर रचित 'बैराडीह की चंद्रावती' पढ़ने जैसा !

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Thursday, December 15, 2011

रागदरबारी का लंगड़ और अन्ना हजारे का 'एतिहासिक विपर्यय'

    श्रीलाल शुक्ल रचित रागदरबारी में एक बेहद दिलचस्प पात्र है ‘लंगड़’, जिसके बारे में लोगों का मानना है कि वह बड़ा झक्की आदमी है, उसकी बुद्धि बालकों सी है...फलां है, ढेकां है। बात ही बात में एक दिन लंगड़ के बारे में एक युवक रंगनाथ जानना चाहता है तो उसे गाँव वाले बताते है कि लंगड़ पास ही के गाँव का रहनेवाला है। घर-परिवार से बेपरवाह लंगड़ भगत आदमी है, भजन ओजन गाता रहता है।


          एक बार लंगड़ को तहसील से किसी मुकदमें के लिए एक पुराने फ़ैसले की नक़ल चाहिए थी। उसके लिए पहले तहसील में दरख्वास्त दी थी। दरख्वास्त में कुछ कमी रह गयी, इसलिए वह ख़ारिज हो गयी। इस पर इसने दूसरी दरख्वास्त दी। तहसील में जब लंगड़ नक़ल लेने गया तो नकलनवीस ने उससे पाँच रूपये माँगे। लंगड़ बोला कि रेट दो रूपये का है। इसी पर बहस हो गयी, लंगड़ और नक़ल-बाबू में बड़ी हुज्जत हुई। लंगड़ को भी गुस्सा आ गया। उसने अपनी कण्ठी छूकर कहा कि “जाओ बाबू, तुम क़ायदे से ही काम करोगे तो हम भी क़ायदे से ही काम करेंगे। अब तुमको एक कानी कौड़ी न मिलेगी। हमने दरख्वास्त लगा दी है, कभी-न-कभी तो नम्बर आयेगा ही। मैं बिना रिश्वत दिये ही नकल लूंगा”। उधर नक़ल बाबू ने कसम खायी है कि “रिश्वत न लूँगा और क़ायदे से ही नक़ल दूँगा”। इसी बात पर दोनों में ठन गई थी।

         दोनों की इस लड़ाई को गाँव का युवक रंगनाथ समझ नहीं पाया कि – ये क्या बात हुई। अब तक इतिहास में यही देखने में आया है कि एक पक्ष कहता था नहीं दूंगा दूसरा कहता था जरूर लूंगा। न जाने कितनी लड़ाईयां इसी वजह से हुईं। सिकन्दर ने भारत पर कब्ज़ा करने के लिए आक्रमण किया था; पुरू ने, उसका कब्ज़ा न होने पाये, इसलिए प्रतिरोध किया और लड़ाई हुई थी। अलाउद्दीन ने कहा था कि मैं पद्मिनी को लूँगा, राणा ने कहा कि मैं पद्मिनी को नहीं दूँगा। इसलिए लड़ाई हुई थी। सभी लड़ाईयों की जड़ में यही बात थी। एक पक्ष कहता था, लूँगा; दूसरा कहता था, नहीं दूँगा। इसी पर लड़ भिड़ जाते थे। पर यहाँ लंगड कहता था, धरम से नक़ल लूँगा। नक़ल बाबू कहता था, धरम से नक़ल दूँगा। फिर भी दोनों में लड़ाई चल रही थी। युवक रंगनाथ को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह ‘एतिहासिक विपर्यय’ क्योंकर है ?

         उधर नकलनवीस, पेशकार सभी की ओर से लंगड़ की अर्जी में कुछ न कुछ नुक्स निकाल लंगड़ की अर्जी लटका दी जाती। कभी मुकदमें की फीस वाला टिकट कम लगा बताया जाता तो कभी मिसिल का पता ग़लत लिखा है तो कोई ख़ाना अधूरा पड़ा है-ऐसी ही कोई बात बताकर नोटिस-बोर्ड पर लिख दिया जाता। यदि उसे दी गयी तारीख़ तक ठीक न किया जाये तो लंगड़ की दरख्वस्त खारिज कर दी जाती।

            इसीलिए लंगड़ अब पूरी-पूरी तैयारी के साथ मोर्चा संभालता है, अपने गाँव छोड़कर तहसील में ही बराबर नोटिस-बोर्ड के आसपास चक्कर काटा करता है। उसके द्वारा नकल लेने के सारे कायदे रट लिये जाते हैं। उसकी तमाम तैयारी आदि को देख पेशकार उसे झक्की और न जाने क्या क्या कह देता हैं, कुछ कुछ वैसे ही जैसे कि लोकपाल मसौदे को संसद में पेश करने को लेकर कुछ सांसदों द्वारा अन्ना हजारे पर छींटाकशी की गई थी। यहां भी मामला लंगड़ और सरकारी मुलाजिम की लड़ाई सरीखा ही है। उन्हीं की तरह यहां भी एक पक्ष कहता है कि हम लोकपाल कानूनी प्रक्रिया से लेकर रहेंगे तो सरकार भी कह रही है कि हां, हम भी लोकपाल कानूनी प्रक्रिया देकर ही रहेंगे। दोनों अपनी ओर से दे ही रहे हैं, फिर भी लड़ाई चल रही है। फिर वही एतिहासिक विपर्यय। ऐसे में जनता उस युवक रंगनाथ की तरह मन ही मन भावुक हुई जा रही है। रंगनाथ पर भी लंगड़ के इतिहास का गहरा प्रभाव पड़ा और वह भावुक हो गया। भावुक होते ही ‘कुछ करना चाहिए’ की भावना उसके मन को मथने लगी, पर ‘क्या करना चाहिए’ इसका जवाब उसके पास नहीं था। क्यों नहीं था इस बात को यदि आज के संदर्भ में देखा जाय तो समझा जा सकता है क्योंकि जनता भी उसी उहापोह से गुजर रही है। किस पार्टी को वह शुचित मानें, किस पार्टी को अपवित्र यह उसे समझ नहीं आ रहा। जो लोग लोकपाल को लेकर जोर शोर से समर्थन कर रहे हैं उन्हें जब ध्यान से देखती है जनता तो पाती है कि यही वे लोग हैं जिन्होंने खनन प्रक्रिया में रिश्वतखोरी के दम पर खान के खान उलट दिये हैं, तो दूसरे पक्ष पर नज़र पड़ते ही उसे टू जी स्पेक्ट्रम की बंटाई याद हो आती है कि फलां के इतने बिगहे स्पेक्रट्रम बंटे तो ढेकां के इतने बिगहे। जहां औरों पर भी नज़र जाती है तो सब कुछ गड्डम-गड्ड ही नज़र आ रहा है।
 
        ऐसे में जनता केवल यही कर पा रही है कि रंगनाथ की तरह भावुकता भरी बोली बोल रही है – "कुछ करना चाहिये",  लेकिन क्या करना चाहिये इसे न वह समझ पा रही है न दूसरों को समझा पा रही है, बस ‘भरमजाल’ में पड़ी है। देखें कब तक जनता इस ‘भरमजाल’ से निकल पाती है।
 
- सतीश पंचम

अपडेट: 30/12/2011 - @ नकलनवीस, पेशकार सभी की ओर से लंगड़ की अर्जी में कुछ न कुछ नुक्स निकाल लंगड़ की अर्जी लटका दी जाती। कभी मुकदमें की फीस वाला टिकट कम लगा बताया जाता तो कभी मिसिल का पता ग़लत लिखा है तो कोई ख़ाना अधूरा पड़ा है-ऐसी ही कोई बात बताकर नोटिस-बोर्ड पर लिख दिया जाता। यदि उसे दी गयी तारीख़ तक ठीक न किया जाये तो लंगड़ की दरख्वस्त खारिज कर दी जाती।

.............
कल रात दिये गये समय में नुक्स ठीक न करने की वजह से सांसदों द्वारा लंगड़ की दरख्वास्त फिर खारिज हो गई। लंगड़ को मिसिल अब तक नहीं मिल पाई है, अभी इंतजार और लंबा लगता है।

Sunday, December 11, 2011

हे अमात्य......हे लोकपाल.....हे द्वारपाल....

- द्वारपाल..... हमें सम्राट से मिलना है .....

- आपका परिचय  ?

- हम हैं सोलह महाजनपदों के 'महा-लोकपाल' ...

- प्रणाम स्वीकारें अमात्य.....खेद है कि आप सम्राट से नहीं मिल सकते....वो सीवीसी अफसरों की मीटिंग में व्यस्त हैं।

- शाम को तो मिलेंगे ?

- शाम को लिच्छवी नरेश से भिड़न्त के सिलसिले में सीबीआई से समन आया है.....उसी की इन्क्वायरी में जायेंगे।

- लेकिन लिच्छवी नरेश तो उनके करीबी हैं, आखिर उनसे कैसे भिड़न्त हो गई।

- कोई स्पेक्ट्रम की बंटाई में कुछ उंच नीच हो गई थी सो भिड़ गये।

- कितने बिगहे का स्पेक्ट्रम था ?

- यही कोई बावन बिगहा दस डिसमिल !

- लेकिन उसके लिये सम्राट को भिड़ने की क्या जरूरत थी, दण्डपाल को भेज दिये होते।

- दण्डपाल को आप लोग कुछ करने दो तब न.....

- हमने क्या किया ?

- महाजनपदों में हुई सैनिक भर्ती को लेकर आप लोग ही तो इन्क्वायरी कर रहे हैं

- तो महादण्डपाल या क्षेत्रपाल को भेज दिये होते...

- वो भी किसी भूमि अधिग्रहण के सिलसिले में फंसे हैं.......अवन्ति की जनता ने धांधली का आरोप लगाया है...

- कैसी धांधली ?

- सैनिक फार्म की जमीन को गांधार के वणिक विश्वशर्मन के हाथों औने पौने दामों में अलॉट करने के कारण।

- तो वह वणिक गांधार का विश्वशर्मन ही था ?

- हां, लेकिन आप क्यों पूछ रहे हैं लोकपाल जी ?

- हमारे लोकपाल भवन बनाने का ठेका भी उसी वणिक विश्वशर्मन को मिला है .

- तो क्या आपको गांधार के उस वणिक विश्वशर्मन की पृष्ठभूमि नहीं पता थी ?

- नहीं, हमारे पास ऐसी कोई सूचना प्रणाली नहीं है जिसके जरिये हम किसी की पृष्ठभूमि की जांच कर सकें.

- तब किस बूते आप लोग सोलहो महाजनपदों की लोकपाली करे जा रहे हैं ?

-किस बूते कर रहे हैं, अब कैसे बतायें द्वारपाल........अच्छा....ये बताओ कि सम्राट मिलेंगे कब

- सूखे सूखे बता दूँ ?

- ओह...समझा.....तो तुम्हें तर माल चाहिये ?

- अब आप लोगों से क्या छुपाना...सब कुछ तो जानते ही हैं.

- आपको भय नहीं लगता.....लोकपाल से ही रिश्वत मांगते ?

- भय कैसा लोकपाल जी, आप लोकपाल...मैं द्वारपाल.....और किसी नाते से न सही....कम से कम नामों की साम्यता के नाते ही इतना तो हक बनता है.

- तो ऐसे न बताओगे ?

- नहीं.

- तो जाओ हमें सम्राट से नहीं मिलना....हम ऐसे ही चले जाते हैं.....लेकिन याद रखो....हम सम्राट से तुम्हारी शिकायत जरूर करेंगे.

- तो जाओ कर लो......सम्राट खुद तुम से नहीं मिलना चाहते.....कह रहे थे उनके तमाम अमात्य, दण्डपाल, क्षेत्रपाल अपना काम धाम छोड़ तरह तरह की जाँच में फंसे हैं न कहीं नये पोखर खुद रहे हैं न राजप्रासाद....न कोई विजय-स्तम्भ गड़ रहे हैं न कुछ....औरों की छोड़िये, खुद राजमहल के नाबदान का निर्माण इन तमाम जांच प्रिक्रियाओं से बाधित हो रहा है.....और लोगों को लोकपाल के दायरे में लाते तो चलता, आपने सम्राट तक को लोकपाल के अधीन ला दिया......

- क्या करें, पारदर्शिता जरूरी है द्वारपाल

- पारदर्शिता माय फुट .... उधर शकों द्वारा सीमांत प्रदेश में लूटपाट की खबरें आ रही हैं....उन पर अंकुश करने की रणनिति बनाने की बजाय हमारे सम्राट राजमहल के नाबदान में उलझे हैं।

- शुक्र मनाओ कि नाबदान में ही उलझे हैं, कभी लोकपाल से उलझें तो पता चलेगा, बावन बिगहे का स्पेक्ट्रम, मात्र 'पगहे' भर में सिमटा देने का क्या अंजाम होता है.

- वो देखिये सम्राट यहीं चले आ रहे हैं......

- लेकिन वे रूककर मुझसे मिले क्यों नहीं

- लगता है नाबदान चोक होने से पानी फैल गया है.....अबके संभाले नहीं संभल रहा :)


- सतीश पंचम

Thursday, December 8, 2011

'ब्रिजायन'.....बजरिये मुम्बईया चौताल :)

          खबर सुनने में आई है कि राज्यसभा के स्टैंडिंग कमेटी की मीटिंग के दौरान भाजपा के सांसद अहलूवालिया और कांग्रेस के राशिद अल्वी के बीच कुछ धक्का धुक्की हुई। एक ने आरोप लगाया कि उसने मुझे धक्का मारा तो दूसरा कहता है कि मैंने नईं किता। खैर, इन दोनों की धक्कम धुक्की का मसला इतना बड़ा हो गया कि दोनों ही प्रेस में आकर बयान देने लगे। .च्च...च्च..च्च.। अब इन लोगों को क्या कहूं।


        मन करता है कि ऐसे लोगों को लाकर मुंबई के तमाम रेल्वे ब्रिजों में से किसी एक पर खड़ा कर दूं...ठीक वैसे समय जब प्लेटफार्म पर कोई गाड़ी आने वाली हो। न न मैं कोई उन्हें ब्रिज से नीचे धक्का देने की नहीं सोच रहा न कूदने के लिये प्रोत्साहित ही कर रहा हूं....बस उन्हें किसी ब्रिज पर खड़ा होने को कह रहा हूं। जो लोग मुंबई की लोकल से यात्रा करते हैं वह समझ गये होंगे कि मेरा इशारा किस ओर है। दरअसल ब्रिज पर खड़े होने वालों का अपना अपना उद्देश्य होता है, अपनी अपनी सुविधा होती है। होता यह है कि मुंबई की जीवनरेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेनें कुछ स्लो होती हैं कुछ फास्ट। स्लो से तात्पर्य ऐसी लोकल ट्रेनें जो हर स्टेशन पर रूकते जांय और फास्ट का मतलब ऐसी लोकल ट्रेनें जो कुछ बड़े स्टेशनों पर ही रूकते हुए जांय। अब मुंबई ठहरी मिनट मिनट का हिसाब रखने वाली। सो हर किसी को जल्दी होती है। हर कोई चाहता है कि घर या ऑफिस जल्दी पहुंचे और इसी दौरान उन्हें चुनाव करना होता है कि स्लो ट्रेन पकड़े या फास्ट। चूंकि दोनों ही किस्म के ट्रेनों के आने जाने का प्लेटफार्म अलग अलग होता है तो लोग दोनों प्लेटफार्मों के बीच यानि ब्रिज पर खड़े हो जाते हैं कि जो भी ट्रेन आये उसे पकड़ा जाय।

            ऐसे में होता यह है कि ब्रिज पर खड़े अनावश्यक लोगों की संख्या बढ़ जाती है। लोग वहीं ब्रिज के उपर खड़े होकर ताकते हैं कि देखें पहले कौन सी ट्रेन आती है....जो ट्रेन पहले आती दिखे लोग उसी प्लेटफार्म की ओर लपक लेते हैं। उधर ट्रेन के आते ही उसमें से उतरने वाले यात्री भी ब्रिज की ओर लपकते हैं और बड़ी तेजी से क्योंकि देर करते ही पीछे से आने वाले यात्रीयों की भीड़ बढ़ जायेगी और ब्रिज पर चढ़ना मुश्किल हो जायगा।

 उसी बीच कोई मछली बेचने वाली अपना टोकरा लेकर आ गई तो हो गई मुसीबत। फिर तो उस भीड़ भड़क्के में आप हैं, आपकी घुटती हुई सांस है और है उपर से टपकता मछली वाला गन्धाता पानी। एक दो बूंदें पड़ने की देर है कि फिर सारा दिन आप ऑफिस में गन्धाते फिरेंगे। बहुत संभव है अमिताभ बच्चन जो पोलियो ड्राप पिलाते वक्त कहते हैं - 'दो बूंद जिन्दगी के' वाली पंचलाइन किसी ऐसे ही वक्त पर लिखी गई हो जब लेखक ऐसे ही किसी ब्रिज पर चढ़ने उतरने के दौरान अंटा पड़ा हो और पीछे खड़े मछलीवाले की टोकरी से दो बूंद उस पर टपक पड़े हों। वहीं से उसे अपनी जिन्दगी की ये दो भयंकर बूंदें याद रह गई हों और वही लिख मारा हो - दो बूंद जिन्दगी के। सच मानिये वे दो बूंदे किसी को भी जिन्दगी भर याद रहेंगी ऐसी तीखी गंध होती है मछलीवाली टोकरी से रिसते पानी का। अक्सर देखा गया है कि उन्हीं महिलाओं को ज्यादा अखरता है ये मछलीवाला पानी जो बहुत पावडर आदि लगा लूगू कर जाती हैं ऑफिस या फिर ऐसे टाईदार फस्स क्लास वाले यात्रीयों को जो कि नाक पर रूमाल रख चलने को मजबूर होते हैं।

ऐसे में मछलीवाले भी यह असहजता समझते हैं और बोलते हुए चलते हैं कि मच्छी का पानी...मच्छी का पानी ताकि सामने वाला थोड़ा रास्ता देकर चले अन्यथा दो बूंद टपक गया तो पूरा दिन ऑफिस में गन्धाते फिरेंगे। इसलिये लोग जैसे ही सुनते हैं - मच्छी पानी वैसे ही बगल हटने लगते हैं और मछली वाले को रास्ता मिलता जाता है। उसी बात का कुछ यात्री फायदा भी उठाते हैं और चुहल करते हुए नाहक मुंह से मच्छी पानी...मच्छी पानी की रट लगाते हैं जिससे कि भीड़ भाड़ में से रास्ता मिले और उन्हें रास्ता मिल भी जाता है , ये अलग बात है कि रास्ता देनें वाला उन्हें देर तक घूरते रहता है या मुंह में ही बड़बड़ाकर गरिया देता है।

           अब बात यहीं तक होती तो ठीक थी लेकिन यहां आप को ब्रिज पर चलने की अपनी रफ्तार सहयात्रियों की रफ्तार के साथ बनाये रखनी होती है। जरा सा भी आप रूके या धीमे हुए तो पीछे वाले यात्री चिल्लाने लगते हैं कि अरे जरा जल्दी चलो....नहीं चलने का तो साइड में हो जाओ। इस चिल्लाहट की भी अपनी वजह है। यात्री एक प्लेटफार्म पर उतर कर दूसरी ट्रेन बदलते हैं या दूसरे प्लेटफार्म पर किसी तेज लोकल के आने के अंदेशे में वहां जल्दी पहुंचना चाहते हैं ताकि ट्रेन छूटे नहीं। ऐसे में आप यदि चल रहे हैं तो पीछे वाले को भी लगना चाहिये कि आप को भी उतनी ही जल्दी है जितना कि उसे है वरना वो आप को टोकेगा कि जल्दी चलो। आपकी भाव भंगिमा ऐसी होनी चाहिये जैसे आप इस सुस्त चाल से परेशान हैं, चुपचाप चलने का मतलब है कि आप को कोई जल्दी नहीं है और पीछे वाला आपकी इस चाल को भांपते ही टोकेगा जरूर - अरे लवकर चलो ना।

           अब जहां इतनी जल्दीबाजी मचेगी तो शॉर्ट टेम्पर्ड लोगों के बीच कहासुनी भी होने की संभावनाएं हैं और जमकर कहा सुनी होती भी है। लोग समझते हैं इस धक्कामुक्की को और बच बचाकर चलते भी हैं कि किसी से धकड़ धुकड़ को लेकर कहासुनी न हो जाय वरना सुबह सुबह मूड खराब हो जायगा। कुछ रोचक स्लैंग्स या कहें बतकही भी सुनने में आती है। एक बार अंधेरी स्टेशन के ब्रिज पर देखा कि एक युवती किसी युवक से धक्का धुक्की वाली बात पर कुछ अनाप शनाप कह रही थी। युवक भी तैश में आ गया। लगा गरियाने कि - अगर तू इज्जतवाली होती तो ऐसे सबके सामने आरडा-ओरडा नहीं करती.....गरदी का टाईम है...धक्का लग गया तो शुरू हो गई बोम्बा-बोम्ब करने कू.... तू है ही अइसी लफड़ेवाली। अब युवक की इस बात से चौंकना स्वाभाविक है। हां भी नहीं कह सकते ना भी नहीं कह सकते। हो सकता है युवक ने जान बूझकर युवती को धक्का दिया हो या अनजाने में लग गया हो लेकिन युवती द्वारा आवाज उठाना उसे 'चालू टाइप' में कैटेगराइज कर गया। ( नारीवादी पढ़न्तू जरा इस पैरे को इग्नोर करके चलें....फालतू में हम बहसबाजी में अपना मूड़ खराब करना नहीं चाहते, क्योंकि असल मामला क्या था न मैं जानता हूं न कोई और...ये उन दोनों की बतकही थी जिसे जस का तस रखा गया है )

            ओह....इस चक्कर में तो हम भूल ही गये कि बात सांसदों के आपसी धक्का मुक्की की हो रही थी :) खैर, इन मुम्बईया ब्रिजों के बारे में थोड़ा और बताता चलूं कि जब कोई भी धक्का लगने को लेकर किसी यात्री से उलझता है तो उसे बदले में और भी धक्के लगते रहते हैं जिसका उसे पता तो चलता है लेकिन वह पहले वाले धक्के को लेकर ही अड़ा होता है कि मुझे धक्का क्यूं मारा ? उधर दोनों की पूछ पूछोर चलती रहती है पीछे वाले यात्री दोनों को धक्का देकर आगे निकलते जाते हैं। उनके लिये बाकी धक्के गौण हो जाते हैं, पहला धक्का अतिमहत्व का हो जाता है। तूने धक्का क्यों मारा......लगा क्या....लग गया तो भीड़ में चलता है.....वो छोड़.....तूने धक्का क्यों मारा ?

           समझ सकते हैं कि ऐसे माहौल में जब इन धक्काबाज सांसदों को खड़ा कर दिया जायगा तो क्या होगा ? इधर उनके बीच हुई धक्कम-धुक्की को लेकर बहस चल रही होगी उधर पीछे से आ रहे नये यात्रियों का रेला उन्हें आगे की ओर ठेल देगा। देश आगे बढ़े न बढ़े सांसद जी आगे जरूर बढ़ जायेंगे। दोनों में से कोई चालाक निकल गया तो घोषणा भी कर देगा कि मेरी लोकप्रियता का पैमाना नापना हो तो मेरे अगल बगल सट कर चल रहे लोगों को देखो, मैं कितना लोकप्रिय हूं कि लोग मूझे छूने को लालायित हैं.....सट कर चलने को बेताब हैं।

उधर दूसरा सांसद यदि और चालू निकल गया तो कहेगा - इन्हें मैने ही भेजा है...... तूम्हें घेरने के लिये :)

      हांय....ये सब मैं क्या लिख गया..... सांसद कोई  आम आदमी हैं जो इस तरह उल्लेखित किये जा सकते हैं......एक सिद्धू  भाई साहब को ही देख लिजिए.......गार्ड ने आईडेंटिटी क्या पूछ ली भाई साब  उखड़ लिये :)   कल को कहीं सिब्बल चच्चा ने देख लिया कि सांसदों को 'ब्रिजायन' करवा रहा हूँ  तो डिफेमेशन और विशेषाधिकार जैसी येअ बड़ी बड़ी धाराएं लगा देंगे......:) 

 क्या करें, जमाना बड़ा खराब है मउसी..... फिर कहा भी तो है -

रामचंद्र कह गये सिया से ऐसा भी युग आएगा,
सेंसर होगा फेसबुक और ट्वीटर भी हकलायेगा

ऐअे....रामचंद्र कह गये सिया से :)


- सतीश पंचम
 
 
 
Image Courtesy : http://www.flickr.com/photos/36838887@N05/

Tuesday, December 6, 2011

चकचोन्हर बालम.....मादलेन बबुनी.........

    यह वो वक्त था जिस दिन दुपहरीये में साढ़े तीन बजे अयोध्या मसले पर फैसला आना था। चारों ओर फैले तनाव और दहशत के बीच यह शब्द कोलाज़ लिखा उठा। 'लिखा उठा' इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि उस माहौल में यही सब 'लिखहरी' चलती है, सारे  दिमागी तंतु तब च्यवनप्राश घोंटते प्रतीत होते हैं। उस पोस्ट के पुन:प्रकाशन के बीच पेश है वही......गुले-गुलज़ार.....चकचोन्हर बालम.....मादलेन बबुनी।

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       बस में बैठा हूँ...... मोबाइल एफ एम से गाने सुनते हुए नज़रें खिड़की के बाहर .......फिज़ा में अयोध्यात्मक धुंधलका फैला है...... …मन ही मन सोच रहा हूं.......उस अँधे कुँए की तलहटी किस युग तक गई होगी ......द्वापर....त्रेता....कलि.....या फिर वर्तमान सतयुग ही उस अँधे कुएं की तलहटी है.......साठ साल के अदालती उजाले से जी नहीं भरा प्यारे.......देखना चाहोगे सतयुग ईरा...... वो देखो कहीं बसों की खिड़कियों पर जाली बंधी है...... कहीं पुलिस की वैन खड़ी है........ कहीं राजनीतिक पार्टीयों के बैनर ........हर एक में पासपोर्ट साइज फोटो से लेकर लार्जर देन लाइफ वाले मुखड़े......जिन्हें देखते ही भय होता है.......इनके घर वाले इनको कैसे झेलते होंगे........कही कोई अदनी सी अपील कर रहा है शांति बनाए रखें......कोई भर भर के मार्मिक अपील कर रहा है......तो कोई धकधका कर अपील उड़ेल रहा है ....लेकिन अपील जरूर कर रहा है .........शांति की अपील.....अमन की अपील...... लेकिन किससे......जनता से.....पब्लिक से.......अरे.....जनता तो पहले ही शांत है बे...... उससे अपील क्या करना....लफड़ा करने वाले तुम लोग.....छूरी चाकू वाले तुम लोग...... औ अपील जनता से...... जा घोड़ा के सार लोग।

           एक बैनर बोल रहा है.....हिन्दु-मुसलिम-सिक्ख-इसाई.....आपस में सब भाई-भाई.....अच्छा....तो भाई होने से आपस में लड़ाई नहीं होती ......ओ अंबानीया........पढ़ा कि नहीं रे.....सर्व शिक्षा अभियान.....सब पढ़ो...सब बढ़ो............भाई भाई में कौन लड़ाई............अच्छा छोड़ो..... मत पढ़ो..... गाना सुनो एफएम वाला .....बीड़ी जलइले जिगर से पिया.....जिगर मां बड़ी आग है.....जियो रे जिगर......साला जिगर न हुआ कंपनी का बाइलर हो गया........फक फका कर जलता है।
             उ छुटभैया बैनर कहता है - जब Diwali में Ali है और Ramzan में Ram तो क्यों लड़े हिन्दु और क्यों लड़ें मुसलमान.....धुत् सारे ......अब रोमनवा में लिख लिख कर पब्लिक को बताएगा कि देखो इसमें ए है तो उसमें उ है..... इही को कहते हैं चोरकटई चाह। अरे जहां मन चंगा तो काहे का दंगा और तुम आए हो कहने इसमें अली है औ उसमें वली है.........हटाओ अपना बैनरहा बुद्धि .....साला फ्लैक्स की तरह बुद्धि भी फ्लैक्स वाली हो गई है तुम लोगन की......


              औह.......रह रह कर जेहन में ‘इनभर्सिटी’ के प्रोफेसर काशीनाथ सिंह की लिखी ‘काशी का अस्सी’ पन्ने दर पन्ने फड़फड़ा रही है – ‘परलै राम कुक्कुर के पाले....खींच खांच के लै जाएं खाले’ ......... अब जाकर पता चल रहा है कि इहका मतलब.............अशोक पांड़े जी कहिन बजरिए काशी का अस्सी............ कहां तो भगवान राम की महिमा.......और कहां तो राजनीतिक कुकुरबाजी.....ससुरों ने ले जाकर राम जी को भी मोकदिमा-मोहर्रिरी में घसीट लिया।


            बताया है काशीनाथ सिंहवा ने लिखते हुए कि - काशी के अस्सी घाट पर रहने वाले शास्त्री की दुविधा ........ मकान को किराए पर देना है इसाई महिला मादलेन को.....लेकिन कैसे दें...... एक तो इसाई.....औ दूजे महिला..... लेकिन मोह ए किराया बड़ा भारी...... लागी छूटे नाहीं रमवा............मन मारकर तैयार हुए.........आखिर समझाने वाले कन्नी गुरू ...... समस्या आई अटैच बाथरूम की......मादलेन को अटैच बाथरूम चाहिए....करने कुरने के लिए............

          तब बोले कन्नी गुरू.......औ जम के बोले...... शास्त्री जी आप का गोत्र मेरे गोत्र से नीचे है.....मेरा गोत्र आपके गोत्र से उंचा है........ मैं बता रहा हूँ ..... वही मानिए ...... टाइलेट के लिए वही कमरा दे दो.... थोड़ा फेरबदल करने से अटैच टाइलेट बन जाय तो क्या हरज ।
             अरे वो कमरा....... उहां तो महादेव जी हैं....रास्ते में आते जाते लोग फूल माला भी चढ़ाते हैं महादेव जी पर.........कैसे उसे स्थान को टाइलेट में बदल दूं.......लेकिन जब समझाने वाले कन्नी गुरू..... तो जाता कहां है रे......अरे महादेव जी कोई रामलला हैं जो एक जगह जम गए तो जम गए.....अरे महादेव जी ठहरे नंदी बैल वाले हैं....आज इहां....तो कल उहां.....वो कौनो एक जगह टिकने वाले थोड़ी हैं......और आप हो कि महादेव जी को कैद करके कुठुली में रखे हो.....पाप....घोर पाप..... दे दो कमरा मादलेन को....बना दो टाइलेट....और......देखते देखते घर के आगे बालू.....इंट....गिरने लगी......टाइलेट जरूरी..........किराया जरूरी.......जय हो प्रभू तार लिया..........ओ काशीनाथ.....आरे वही कासिनाथ राजेस ब्रदर के सामने पेपर बिछा कर लाई रख के एक झउआ मिरचा बूकता था.....ओही कासीनाथ.................जियो रे इनभर्सिटीया बुद्धि .....का लिक्खा है........जय हो मादलेन...... जय हो कन्नी गुरू.......जय हो दालमंडी.....दालमंडी बूझते हो न कि उहो में फइल......।

        लेकिन है बतिया वही........... कि राम रहें कि महजिद ..........औ फिर उन चकचोन्हर पार्टी लोगन का क्या.....किस पर लड़ेंगे.....किस पर लड़वाएंगे ........मु्द्दा खतम......ए नेताइन......कल ......कचहरी लग रही है...........फैसला हुई जाई.....आज से नेताई वाला खरचा पानी बन्न......कहां से खिलाएंगे लइका बच्चा.......कहां से फीस उस भरेंगे..............कचहरीया बालम छिटकाने वाले हैं. ..... इल्लो.... गुलजार बीड़ी सुलगाय दिए हैं...... जलाते हुए FM पर बोल रहे हैं..........इक दिन कचहरी लगाय लियो रे....बोलाय लियो रे ....दुपहरी...............का हो पांड़े........मुकदिमा का फैसला कब है........अरे उहै आर....कहा है न कि....... पान खाए मुन्नी जरूर मिलना...... साढ़े तीन बजे....... मुन्नी जरूर मिलना .........साढ़े तीन बजे......... चलो जो भी होगा..... फइसला मनबै के परी......बकि सुपरीम कोरटो त है बाद में........


           धुत्त सारे......तूम ठीक दुपहरीया की पैदाइस हो.........जौन होगा इहीं होगा कि तुम और सुपरीम कोरट को बीच में ला रहे हो.......एकरे बाद सब बवाल फवाल बंद........... का कहते हो यादौ जी......बोलो जोर से ...........बिरिन्दाबन बिहारी लाल की जय......राम लला की जै.......भईया राम राम..... जय सिरी राम....... गुड आफ्टरनून.......... अबे साले तुम अब जैरमी करना भी छोड़ि दोगे क्या .................बोलो आँख मून्न......गुड आफ्टर नून्न.


- सतीश पंचम


स्थान - अयोध्या से पन्नरह सौ किलोमीटर दूर।


समय - वही, जब साठ साल पुराने अँधे कुँएं मे झांकते समय आँखों पर चोन्हा मारने लगे।

(इस शब्द कोलाज़ का आधार काशीनाथ सिंह की लिखी 'काशी का अस्सी' और गुलज़ार की 'बीडी़ जलइले' है.....बेहतर परिणाम हेतु काशी का अस्सी जरूर पढ़े.....दिमाग के सारे तंतु खिल उठेंगे :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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