सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, November 27, 2011

जिन्दगी का एक एपिसोड ऐसा भी रहा......

     यूं तो हम बड़ा हउंकते-फउंकते हैं कि हम ये हैं, हम वो हैं लेकिन शरीर की एक जरा सी नस क्या खिंच जाती है, नजरिया 'तिरपन-चउअन' हो उठती है। उस वक्त शरीर के सारे अवयव धमनी, शिराएं, नील, अलय, अलिंद एक साथ सारे कपाट सामूहिक क्रंदन करते हुए लगते हैं। अभी हाल ही में कुछ इन्हीं तरह की परिस्थितियों से दो चार हुआ हूँ।


          हुआ यूं कि बेड पर बैठे-बैठे लैपटाप पर कुछ काम कर रहा था कि अचानक लगा कि बायें पैर की नस कुछ खिंच सी रही है। लैपटाप साइड में रखकर खड़ा हुआ लेकिन नस सामान्य होने की बजाय और तेजी से खिंचने लगी। अभी एक-दो सेकंड बीते थे कि यूं लगा जैसे बांए पैर की नस एंठने सी लगी है, ठीक से खड़ा होना मुश्किल। श्रीमती जी और बच्चे एकसाथ चौंके कि ये क्या हो रहा है मेरे साथ। श्रीमती जी के कंधे का सहारा लेकर खड़े होने की कोशिश की लेकिन कटे पेड़ की तरह जमीन पर मैं गिरा जा रहा था। श्रीमती जी परेशान कि अब क्या करूं। और तभी मुझे अचानक ही तमाम आवाजें सुनाई देनी बंद हो गईं। कानों में एक पतली सीटी सी बजती लगी। भयंकर गर्मी से मेरा पूरा बदन पसीने से नहा गया। करीबन तीस-पैंतीस सेकण्ड बीते होंगे कि मुझे उल्टी सी आने लगी, किसी तरह श्रीमती जी वाश बेसिन की ओर ले गईं, पहुंचते ही भड़ाक्...... जो कुछ खाया पिया था सब बाहर।

अब......

    उल्टी होते ही अगले कुछ क्षणों में महसूस हुआ कि जी हल्का हुआ है, मेरा ध्यान पैरों की ओर गया। दर्द वहां कुछ कम तो हुआ था लेकिन नसें अब भी जैसे चटक रहीं थीं, खिंच रही थीं। एक दो सेकंड बाद आवाजें भी हल्के-हल्के सुनाई देनें लगीं, मेरी श्रवण शक्ति कुछ-कुछ लौट रही थी। नसों की एंठन अब भी रूकी न थी। जरा सा पैर हिलता और नस फिर खिंच उठती। मैं लेटना चाहता था, श्रीमती जी मुझे वाश बेसिन के पास से हटा उचित जगह पर सुलाना चाहती थीं लेकिन हालत ऐसी नहीं थी कि जरा भी आगे बढ़ पाउं। जरा सा पैर इधर-उधर मुड़ते ही फिर से नसों का भयानक दर्द शुरू होना चाहता। नतीजतन वाश बेसिन के पास वहीं जमीं पर मैं धीरे से लेट गया। परिवार के लोग सकते में थे कि क्या किया जाय, किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाय। उधर मैंने धीरे से अपना एक पैर दूसरे पैर पर सहारा देते हुए रख दिया। नसों का एंठना कुछ कम हुआ। धीरे-धीरे सारा दर्द कम से कमतर होता गया और अगले दो तीन मिनट के भीतर ही मैं सामान्य सा हो गया। वाश बेसिन में मुँह धोया, पानी के छींटे मारे और बिस्तर पर पड़ गया। श्रीमती जी ने चादर ओढ़ा दी। जिद करने लगीं कि डॉक्टर के पास अभी के अभी चला जाय, भाई भी तब तक आ गये, उन्होंने भी जिद किया कि चलिये अभी के अभी डॉक्टर के पास। लेकिन मुझे उस वक्त सोना अच्छा लग रहा था। मुँह पर पड़े पानी के छींटे शीतलता प्रदान कर रहे थे। मुझे जहां तक याद आ रहा है, मैं बिल्कुल बच्चे की तरह पैरों को सिकोड़कर सोया था और बदहवास श्रीमती जी जिद कर रही थीं कि डॉक्टर के पास चलते क्यों नहीं।

       आँख खोलकर श्रीमती जी को आश्वस्त किया कि अब सब ठीक है, सुबह चलते हैं। इस वक्त इतनी रात मैं नहीं जाने वाला। उधर छोटे भाई मुझ पर गुस्सा हो रहे थे कि नाहक जिद कर रहा हूँ। लेकिन मैं था कि उठना नहीं चाहता था और अंतत: नहीं ही गया। इतना याद है कि रात भर श्रीमती जी उठ उठ मुझे देखतीं, माथे पर हाथ रखतीं, पैर दबाती और फिर सो जातीं। मेरी नींद ऐसे में कई बार खुली। अगले दिन जब उठा तो सिर भारी-भारी लगा। सुबह सुबह ही अपने कश्मीरी डॉक्टर गुप्ता जी के पास पहुँचा। उनसे पिछली रात वाली घटना का जिक्र किया तो उन्होंने तुरंत ही CT Scan की सलाह दी। जरूरी भी था क्योंकि जिस वक्त नस खिंची थी मैं क्षण भर के लिये कुछ सुन नहीं पा रहा था और उस दौरान उल्टी भी आई थी। डॉक्टर से मिलते वक्त भी सिर दर्द हो रहा था। अमूमन सिर में या ऐसे किसी हादसे के बाद उल्टी आना काफी खतरनाक माना जाता है।

      नतीजतन, अगले ही घंटे CT Scan की मशीन के सामने था। फिल्मों में कई बार देखा था कि लोगों को सुलाकर एक मशीन के भीतर खिसकाया जाता था, लेकिन यह मेरा पहला अनुभव था। ठंडे ठंडे माहौल में जब मुझे मशीन पर लिटाकर उस गोल चैम्बर में खिसकाया जा रहा था, तब कुछ अजब सा लगा। अंदर चैम्बर में जब सिर गया तो अचानक आपरेटर ने कुछ बटन-बूटन दबाया और एक हल्की रोशनी मेरे सिर के इर्द गिर्द घूमने लगी। यूं लगा जैसे सारा ब्रह्माण्ड मेरे सिर के इर्द गिर्द चक्कर लगा रहा है। तीन चार मिनट बाद वह सारा जादुई माहौल खत्म हुआ। ठंडे चैम्बर से बाहर आया। मन में एक आशंका कि क्या होगा, क्या न होगा, बदन में अब भी पिछली रात के हादसे की वजह से हरारत थी। रिसेप्शन पर पूछा तो पता चला कि रिपोर्ट अगले दिन शाम को मिलेगी।

      घर पहुंचने तक मन में तमाम उलूल-जूलूल खयाल आते रहे। न जाने रिपोर्ट में क्या आये क्या न आये। ध्यान बंटाने के लिये फेसबुक पर समय बिताया, एकाध स्टेटस अपडेट किया। ब्लॉगों पर चक्कर लगाया तो हर जगह पवार को पड़े तमाचे की गूंज थी। हरविन्दर, पवार और तमाचा सब जगह छाया था। मन में आया कि फेसबुक पर स्टेटस लिख दूं - 'जब जब सीता जैसे पवित्र लोकतांत्रिक प्रणाली का  बलशाली नेताओं द्वारा हरण होगा, हरविन्दर जैसे जटायु झपट्टा मारते रहेंगे'। लेकिन वह सब लिखने का मन भी न हो रहा था.... न ही किसी की खिंचाई कर मौज लेने जैसी बात मन में उठ रही थी। ध्यान बार-बार पिछली रात के हादसे की ओर जा रहा था कि आखिर क्या था जो मेरी हालत अचानक ही एकदम असहाय, जीर्ण, कटे पेड़ सी हो गई थी। मन कई आशंकाओं से दो चार हो रहा था। किसी तरह एक दिन बीता। फेसबुक पर स्टेटस अपडेट में अपने इस मशीनी अनुभव को चंद पंक्तियों में लिखा। इस बीच घर में मेरी बड़ी फिक्र की गई। श्रीमती जी हर घंटे डेढ़ घंटे मेरा हालचाल लेती रहतीं। बड़ा अच्छा लग रहा था। मन किया ऐसे ही हालचाल लेती रहा करो, वरना तो बाजार से भिण्डी, तोरई और पालक लाना है जैसे रोजमर्रा वाली बातें ही सुनने में आती थी :)

       होते होते वह वक्त भी आया जब CT Scan की रिपोर्ट मेरे हाथ आई। खोलने से पहले ही धुकधुकी बढ़ गई कि क्या होगा। सफ़ेद कागज पर लिखे एक शब्द पर नजर पड़ी - Normal. और मैं चहक उठा। बाकी लाइनें भी पढ़ा। सारा कुछ नॉर्मल। दिल से जैसे कोई बोझ हट गया। काले रंग की शीट निकालकर देखा तो मेरे दिमाग की स्लाइस कटिंग दिखी। मन ही मन खुश हुआ कि चलो मेरे पास अब सबूत है कि हां, मेरे पास दिमाग है। वरना तो श्रीमती जी, कई बार मेरे दिमाग के होने न होने को लेकर आशंका व्यक्त कर चुकी हैं :)

      लौटानी में डॉक्टर से मिलता आया। उन्होंने भी राहत की सांस ली। ताकीद दी कि लैपटॉप आदि लेकर ज्यादा देर एक ही पोजिशन पर न बैठूं। उनकी बात सच भी थी। जिस वक्त नस खिंची थी उस दौरान करीब तीन चार घंटे लैपटाप के साथ बैठा था। श्रीमती जी, जो मेरे लैपटाप को हारमोनियम की तर्ज पर 'पेटी-बाजा' कहती हैं, ने उस वक्त भी टोका था कि - अब अपना 'पेटी-बाजा' बंद भी किजिए। चाय पड़े पड़े ठंडी हो रही है, लेकिन न जाने क्या हुआ कि मैं काफी देर तक सामने टीवी देखते हुए लैपटाप में घुसा रहा। कभी ऑफिस का कोई काम तो कभी अपना ही कोई लेख-लूख। इसी बीच पैर की नस खिंच गई। हड़बड़ी में लैपटॉप साईड में रख तुरंत खड़ा होने से नस पर नकारात्मक असर पड़ा और फिर एंठन जो हुई तो बढ़ती चली गई।

        खैर, डॉक्टर की मीठी डांट सुन घर आया, परिजनों, मित्रों और ऑफिस के कलीग्स को इन्फार्म किया। घर में सबने राहत की सांस ली। उधर पिताजी का गाँव से फोन आया कि हरदम लैपटाप में आंख गड़ाये रहते हो, तनिक डोल-हिल लिया करो। श्रीमती जी, अलग भुनभुना रहीं थीं....और बैठो लैपटाप लेकर, .....फलां...ढेकां....और भी न जाने क्या-क्या। चुपचाप सब कुछ सुनता रहा। कर भी क्या सकता था। बाद में दोपहर में फेसबुक ओपन किया, थोड़ा रवीश कुमार के स्टेटस पढ़ा, थोड़ी मौज ली, थोड़ा ज्ञान जी के जवाहिरलाल से मौज ली। मन थोड़ा हल्लुक हुआ तो सोचा इस अनुभव को भी ब्लॉग पर शेयर किया जाय। आखिर ऐसे मौके बार बार थोड़े ही आते हैं कि सारा ब्रह्माण्ड अपने चारों तरफ घूमता लगे। जब मैंने यह बात फेसबुक पर लिखा तो प्रशांत प्रियदर्शी का कहना था कि - वह तो इस टेस्ट के दौरान सो गये थे :-)   विवेक सिंह जी का कहना था कि बिना मशीन में गये हुए ही उन्हें ब्रह्माण्ड अपने सिर के चारों ओर घूमता लगता है :)

         Anyway, अब अपनी तबियत बिल्कुल चंगी है। 'पेटी-बाजा' अब भी इस्तेमाल करता हूँ लेकिन संभलकर। लेकिन जिंदगी के इस भयानक एपिसोड से गुजरने के बाद अब महसूस हो रहा है कि उम्र के इस अड़तीसवें साल में डेंजर जोन आन पहुंचा है। गिरिजेश बाबू एक बार पहले भी ताकीद कर चुके हैं कि अब संभलना होगा, फुल बॉडी चेकअप होना मांगता। देखें कब उस फुल बॉडी चेकअप से दो-चार हो पाता हूं :) 

- सतीश पंचम

Tuesday, November 15, 2011

पूंजीवादी पोल-डांस v / s मेहनतकश भिखमंगे ........

       'किन्न-पिसर को बेलआउट चहिये...वही 'किन्न-पिसर' जिसके कैलेण्डरों में 'मलाई टांगों' वाली बालाएं अठखेलीयां करती नजर आती हैं जिन्हें देख देख मदेरनहे बूढ़े 'बाईग्रा टून्टी फोर' औ 'सिक्सटी प्लस' गुलखोंस की चाहना करने लगते हैं। जियो रे मदेरनहे बूढ़ो...जियो..।  उधर लाल घोड़ी जी कह रही हैं कि यह तो अमीरों, राजाओं का शौक है, जो हुआ उसमें कत्तई आपत्तिजनक नहीं है। वाह री लल्लन टाप छौंड़ी....जिती रह।

       बदे की बात है, वरना यही भंवरजाल वाली कहीं मदेरन के घर आकर लाली सिन्दूर पहन बैठ जाती, तो देखना था कि इन मोहतरमा का क्या रियेक्शन होता। क्या पता कोई बैठी भी हो लेकिन जतलाना न चाहती हों। भई राजाओं की पटरानी फटरानी जैसा भी तो कुछ होता है न, बस वही समझ लो। मैं इसीलिये इस तरह के लोगों के लिये 'खंभेबाज बुद्धिजीवी' शब्द इस्तेमाल करता हूं क्योंकि ये जानते हैं कि देश का समूचा सिस्टम डेमोक्रेसी के चार खंभों के इर्द गिर्द सिमटा है जिससे सटकर वह बेखटके पोल डांस कर सकते हैं, टांग उठाकर उसे नम कर सकते हैं, फ्लाइंग किस का आदान प्रदान कर बहस की जुगाली कर सकते हैं और तो और खुले आम ललकार कर कह सकते हैं कि जो करना है कर लो, हम तो ऐसे ही जीतकर आए हैं, और आगे भी आएंगे।

        उधर युवराज पर दिग्गी गुरू की संगत खूब गुल खिला रही है, खूब रंगत बिखेर रही है। कमाने धमाने, गरीबी को पीछे छोड़ विकास की अलख जगाने अपना गाँव-देश छोड़ कर बाहर गये लोग उन्हें भिखारी नज़र आते हैं। वाह रे सोच। गजब की सोचैती है। लेकिन क्या युवराज को यह नहीं दिखता कि हर प्रदेश में कहीं न कहीं से लोग माइग्रेट करके भिखमंगे बने हुए हैं, मेहनत से, पसीना बहाकर
किसी तरह जी खा रहे हैं। उन्हीं के लहजे में कहा जाय तो एक तरह से पूरा देश ही भिखमंगा है.... और ग्लोबल स्तर पर वे सारे देश जहां इस तरह की माइग्रेटरी परिस्थितियां मौजूद हैं। अमेरिका में तो अमूमन  ज्यादातर लोग भारत से भीख मांगने ही गये हैं, बाकायदा ग्रीन कार्ड और अला फला रंग के कार्ड लेकर।

        वैसे भी  जिस पंजाब के बारे में बड़ा गुमान से बतिया रहे हैं, क्या उन्हें नही पता कि पंजाब के भिखारी ( युवराज की जुबान में)  भारत के हर प्रदेश में स्पेयर पार्ट बेच रहे हैं, दूर दराज के इलाकों में भी ढाबा खोले हुए हैं। क्या उन्हें नहीं दिखता कि राजस्थान के मारवाड़ी भिखारी कलकत्ता में जमें हुए हैं, फल फूल रहे हैं। नहीं, उन्हें कैसे दिखेगा, उन्हें तो वही दिखेगा जो उन्हें दिखाया जायगा, पढ़ाया जाएगा। उन्हें किन्नफिसर की मंगैती में भिखमंगापन नजर नहीं आता, उस तरह के भिखमंगेपन में भी एक तरह की एलीटनैस नजर आती है। 'बेलआउट' जैसे शब्द ऐसे ही एलीट भिखमंगेपन को खूबसूरती से ढंकने वाले शब्द हैं।

        बहरहाल जो कुछ कहना था, ऐसी तैसी करनी थी युवराज ने कह दिया। अब दूसरे लोग खेलें 'हिंगोट'..... वही 'हिंगोट' जिसमें दो गाँवों के लोग जलते हुए गोलों को एक दूसरे पर फेंक खुश होते हैं, ठहाका लगाते हैं, हल्ला मचाते हैं और मौके पर परंपरानुसार पहुंचे बड़े गणमान्य लोग लोहे के जाल की ओट में बैठ खेल और उससे जुड़े सरोकार से जुड़ते हुए खेल का आनंद लेते हैं। यहां भी वही 'राजनीतिक हिंगोट' खेली जा रही है। एक पक्ष ने पहले जो कुछ कहना था कह दिया, अब दूसरा पक्ष अपने हिंगोट तौल रहा है, मिट्टी के तेल में भिगो रहा है। वह भी कुछ न कुछ करतब दिखायेगा ही वरना इस हिंगोटपन्ती का आनंद अधूरा रहेगा।

      इधर देखने में आया कि एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश के लोगों को भिखारी का तमगा दिये जाने से मगन हैं, साफ है कि उन्हें अपने विकसित होने पर गर्व है। उन्हें लगने लगा है कि औरों के मुकाबले हम विकास की दौड़ में आगे हैं। यह वह राजनीतिक जादूगरी है जो बिरले लोग ही कर पाते हैं। विकास को लेकर कुछ ठोस भले न किया हो, कम से कम एक प्रदेश को दूसरे का दाता बताकर जरूर उनमें विकसित होने का दंभ तो भरा जा सकता है। भले ही उस विकसित राज्य का फटा सीने में भिखारी राज्यों का खून-पसीना ही क्यूं न लगा हो। अभी कुछ दिनों पहले आंध्र प्रदेश में चलने वाले आंदोलन से के चलते रेल सेवाएं बाधित हुई, वहां से आने वाले कोयले की आवक पर असर पड़ने लगा और देखते ही देखते विकसित कहलाने वाले राज्य के हाथ पैर फूल गये कि इतने दिन का ही कोयला बचा है, बताओ कैसे चलेगा। न्यूक्लियर भट्टी लगाने का माद्दा है नहीं, जापानी विनाश को देख हिम्मत नहीं हो रही औ जुबान दस गज़ की, ......हम प्रभु प्रदेश हैं। हुंह......थू है ऐसी प्रभुताई पर जो गरीब गुरबों की पसीने की कीमत को एक झटके में भिखमंगा कहकर नकार दे।

       यदि बात भीख मांगने पर ही होनी है तो ठीक है, हम भिखमंगे ही सही, कहीं न कहीं कुछ कर खा लेंगे, जीयेंगे लेकिन इतना जरूर पता है कि युवराज और उन जैसे लाल घोड़ा छाप नेताओं को जिस दिन आम आदमी की तरह खटना पड़ेगा, सब्जी की भारी भरकम टोकरी सिर पर रख गली कूचे चलना पड़ेगा, ट्रक से बोरा उतार सड़क पार कर दुकान में रखने जैसा काम करना पड़ेगा उस दिन वे ईश्वर से जरूर मनायेंगे कि इससे अच्छा तो भगवान उन्हे मौत दे दे...कम से कम इस जीते जी नरक जैसा जीवन तो न जीना पड़ेगा.... तिल तिल कर मरना तो न होगा....कोई उनके मेहनत को हिकारत से देख अपने वोटों की ललक में भिखारी तो न बतायेगा।

    उफ्........अभी और कितना पतन बाकी है पूंजीवादियो.....और कितना.........मानव श्रम का ऐसा मान-मर्दन ?

घृणा आती है मुझे तुम जैसे राजनेताओं से सिर्फ घृणा...।


- सतीश पंचम

Saturday, November 12, 2011

गूँगा जहाज.......

     फेसबुक पर रवीश जी ने चील गाड़ी (विमान)  को इंगित करते हुए स्टेटस लिखा जिसे पढ़ते ही मुझे विवेकी राय का गूँगा जहाज वाला लेख याद आ गया। बेहद दिलचस्प ढंग से विवेकी राय जी ने उस गँवई माहौल के कोलाज को रचा है। प्रस्तुत है उनके उसी लेख का  अंश ......  

                                        गूँगा जहाज   -  डॉ. विवेकी राय

          मेरे विचारों के सिलसिले को सामने से आती हुई बैलगाड़ी के चरचर-मरमर शब्द ने खंडित कर दिया। सबसे पहले मैंने रास्ता छोड़कर एक बगल हट जाना उचित समझा। मैं दोनों लीकों के बीच में चल रहा था। वास्तव में चलने लायक नहीं रास्ता है। इधर-उधर दोनों बगल तो बैलगाड़ी के पहियों से घुटने भर धूल हो गयी है। यह धूल की मोटी तह खूब फैलकर जमी हुई है। पैदल चलने वाले का जूता डूब जाय, साइकिल पर चलने वाले को उतर कर खींचना पड़े और नंगे पैर चलने वाले के लिए यह जमी तरावट खूब रही। मरदाना गाड़ी है यह बैलगाड़ी। धीरे धीरे चलती है तो भी धूल उड़ाती है। जोर से या तेजी से इससे चला नहीं जाता। इसी प्रकार हचकती मचकती कोस-दो-कोस और चार-छ: कोस तक इधर-उधर जमीन पर बिछी इस धूलवाली छवर को धाँगती रहती है।


..........
       बैलगाड़ी पर बड़े बड़े बोरों में धान लदा है। मुँह पुआल से बन्द कर सी दिया गया है। कुछ कपड़े में बन्द छोटी गठरियाँ भी हैं। धान तो बन्द है, पर गठरी पर, बोरे पर और उसके मुँह पर कहीं से झाँक-झाँक कर बताता है कि मैं धान हूँ। सुनहरा धान, धरती के अंचल को धानी करने वाली शान हूँ, परम पवित्र प्रिय खुरखुरा चान हूँ और साक्षात ब्रम्ह हूँ। भला सोना कही छिपाया जा सकता है ? यही सब बात थी कि बिना पूछे मुझे ज्ञात हो गया कि बोरों में धान है। किसी सेठ साहुकार का माल होता तो शायद इतनी तेजी से उधर ध्यान नहीं जाता, पर यह धान गाड़ी के पीछे पीछे चुपचाप मैली लुगरी में आती चली उन अन्नपूर्णाओं का था, जिनके हाथों ने इस धान के एक एक पौधों को छुआ है, एक-एक बालियों का सत्कार किया है और एक-एक दाने को सँभाला-सहेजा है। वे लगभग एक दर्जन जीवात्माएँ।


............
   अचानक गाड़ी रूक गयी। मैंने जाना कि हल्ला करके पीछे आती स्त्रियों ने उसे रोकवाया था। मैं भी रूक गया। किसी कारण वहाँ एक बोरा एक जगह कुछ खुल गया और धान झड़ने लगा था। झपट कर एक स्त्री ने बोरे का मुँह बन्द किया और धूसर धूल पर गिरे सुनहरे धान को बटोरने लगी। धूल का प्रयत्न यह था कि अधिक से अधिक अन्न को अपने भीतर छिपा ले और स्त्री का प्रयत्न था, यदि धूल उसके अन्न को नहीं छोड़ती है तो वह धूल सहित उसे उठा लेगी। उसने आँचल पसार कर धूल सहित धान बटोर लिया। धूल-धान का यह विचित्र संयोग रहा। वह अंचल-आश्रय पाकर धन्य हुई। जब वह खड़ी हुई तो उसकी पाँच वर्षीय लड़की ने ध्यान दिलाया कि धान पीछे कुछ दूर से गिरता आया है। वह लड़की एक फ्रॉक पहने थी, परन्तु वह किस कपड़े का था, कहा नहीं जा सकता। उसके गरदन के पास फट जाने पर गाँठ दी गयी थी, जिससे पीछे की ओर से वह टँग गया था। वह अधिक मैला था या फटा-पुराना अधिक था, कहा नहीं जा सकता, परन्तु उस फ्रॉक की इज्जत धूल बचा रही थी।
      यह धूल ऐसी है कि जहाँ जम जाती है, वहाँ एक ऐसी पवित्रता आ जाती है कि और किसी बात की ओर ध्यान नहीं जाता।


      बड़े मनोयोग से एक-एक गिरे दाने को माँ-बेटी ने बीन-बीन कर इकट्ठा किया। साथ ही स्त्रियों ने भी उनके इस कार्य में सहायता की। इस बीच फुरसत पाकर गाड़ीवान ने सुर्ती मल कर ठोंक ली। वह भी एक लोहे का आदमी था। काठ-बाँस की गाड़ी पर उसी प्रकार काठ बना बैठा था। शरीर काला था या हो गया था, कहा नहीं जा सकता। एक काले जीर्ण कम्बल के ऊपर वह बैठा था। शरीर में बिना बटन का एक ऐसा कुर्ता था जिसकी बाँहें आधे पर से उड़ गयी थीं। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और सिर के बालों पर धूल छायी हुई थी। यह इसी प्रकार रात-दिन गाड़ी हांकता है। उसके लिये जाड़ा-गरमी सब बराबर। उसे बरसात की परवाह नहीं। खडे़ खड़े खा लेता है। बैठे-बैठे सो लेता है। बिना खाये-सोये भी उसके काम में कोई बाधा नहीं आती। हाँ, उसके बैल उसे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं।


     गाड़ीवान ने यह जानना चाहा कि किसके बोरे से धान झड़ रहा था, परन्तु बिना बताये आँचर में धूल-दान देखकर उसने समझ लिया कि किसका बोरा बढ़ रहा था। बेचारी माँ-बेटी ने एक महीना में एक बोरा धान कमाया है। उसने खूब जोर से कहा - "देखते चलना जी, नहीं तो बैलगाड़ी पर माल बढ़ जाता है। सब लोग अपनी-अपनी गठरी-मोटरी देख लो। अब गाड़ी चलती है।"


और उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी।


       मैं उस बैलगाड़ी को देख रहा था। उस पर लदे माल को देख रहा था और देख रहा था उसकी मालकिन लोगों को। एकदम मामूली और साधारण दृश्य था, परन्तु एक गजब की आकर्षण बात थी जो कथन की पकड़ में नहीं आ रही है।


........
......


   तभी सड़क पर खेलते कुछ लड़के चिल्ला उठे - "गूँगी जहाज ! गूँगी जहाज !! गूँगी जहाज !!! "


   मैने देखा उत्तर पश्चिम में के कोने वाले क्षितिज पर एक चाँदी की सुनहरी मोटी लकीर उठी है और नि:शब्द आगे बढ़ रही है। अभी उसकी कुल लम्बाई एक लट्ठा के करीब है।


ओह ! यह तो जेट विमान था। परन्तु लड़के क्या चिल्ला रहे हैं ? गँगी जहाज ! एकदम सार्थक बात !

    गाड़ी के पीछे वाली स्त्रियों ने चिहा-चिहाकर देखा और बहुत आसानी से देख रही थीं। भला वह छिपने वाली चीज है ?


"देख रही है रे ? यह क्या 'बढ़निया' की तरह रोज उग जाता है ?"


गाँवों में 'बाढ़न' पुच्छल तारों को कहते हैं। बाढ़न का अर्थ है झाडू और उसकी शकल झाडू की तरह होती है।

"बढ़निया नहीं है, सखी" दूसरी स्त्री ने उत्तर दिया, "यह तो सगरे बदरी घड़ियाल की पूँछ की तरह छेंक लेती है।"


"मत टोको," एक अँधेड़ स्त्री बोली, "यह हरसू ब्रम्ह है। अपने संगी भैरवा के ब्रम्ह के पास मिलने जा रहे हैं।"


"जै हो बरम-बाबा," एक स्त्री ने गुहराया।


"अरे बाबा-साबा नहीं जी। रेलगाड़ी है। अब ऊपरे-उपर चलेगी।" एक ने कहा। इस कथन के बाद एक दूसरी स्त्री ने हँसकर कुछ लयात्मक ढंग से एक गीत-कड़ी उठाया -


छपरा के बाबू धरमचन रसिया -
धुआँ पर गाड़ी चलवले बा ।


अरे बाबा ! धुआँ की सड़क पर गाड़ी ! एक ने आश्चर्य प्रकट किया।


अकिल में रंगरेज (अंग्रेज) को कोई नहीं जीत सकता, एक अन्य स्त्री ने कहा।


हमारी बात सुना, एक स्त्री आगे बढ़कर बोली - एक अच्छा आदमी बता रहा था कि यह रावन का हुक्का है।


यह सुनकर गाड़ीवान का ज्ञान गरज उठा -


अरे मूर्खों यह रावन का हुक्का नहीं है। यह हनुमान की पूँछ है।


और बैलों को टिटकारी देकर गाड़ी तेज करते हुए उसने कहा - अब लंका दहन होगा।


इसके बाद गाड़ीवान ने निम्नलिखित चौपाई को खूब जोर से गाया -


रहा न नगर बसन घृत तेला,
बाढ़ि पूँछ कीन्ह कपि खेला ।


    और लड़के उसी प्रकार चिल्ला रहे थे - गूँगी जहाज...गूँगी जहाज। और विमान के पीछे बनी वह धुएँ की सड़क चूपचाप बीच आसमान में दक्षिण पूरब की ओर बढ़ती चली जा रही थी।


     मैंने मन में प्रश्न किया कि वास्तव में कौन गूँगी जहाज है ? और क्या इतिहास वास्तव में यहाँ रूक नहीं गया है ?

****************

 पुस्तक अंश - गूँगा जहाज
अनुराग प्रकाशन
चौक, वाराणसी - 221 001
मूल्य - 120/-
 
 प्रस्तुति - सतीश पंचम  

Tuesday, November 8, 2011

चल सन्यासी मन्दिर में.......

- कौन बोला.....कौन बोला.... जरा सामने तो बोले.......बहक गया हूं....सिहक रहा हूँ.....अहक रहा हूं....कौन बोल रहा है सब.......देखूं तो


- नहीं मैं न तो अहका सहका हूँ न कोई मुझमें ऐसी कोई चहक है कि ललनाओं के बीच जाकर रहूँ....

- किसने कहा....मेरे सामने कहे तो.....जरा कहके तो देखे.......बड़े आये मुझे ढोंगी कहने वाले...

- भगवा पहना है तो उससे क्या......क्या यह कहीं लिखा हुआ है कि भगवा पहन कर महिलाओं के बीच नहीं जा सकते.....

- सही कहा है मैंने......वहां माईक उठाकर फेकेंगे.....गाली धक्कड़ देंगे उससे तो अच्छा है बिग बास.....

- वो लोग खराब लोग नहीं है.....आप लोग अपने मन से कह रहे हैं.....

- मेरा सीधा मानना है कि वहां बिग बास में जो लोग हैं वे सारे लोग सन्यासी हैं.....और उनके बीच मुझे जाने में कोई परहेज नही......

- हां, मैं खम ठोंककर कहता हूँ कि वो लोग भी सन्यासी हैं.....इतने दिनों से अपना घर परिवार छोड़कर एक घर में टिके हुए है....मजाक है क्या.....यह सन्यास ही हुआ कि और कुछ......

- यह आपका काम है....आप जाइये और सन्यासी की परिभाषा शास्त्रों में ढूँढिये......

- यह कहीं भी लिखित में नहीं मिलेगा.....वह सब जनश्रुति है....यानि लिखित में न होकर सुनाने वाला ज्ञान विज्ञान....

- शक्ति कपूर गये अपनी गलती से गये.....

- मैं वह गलतीयां नहीं दोहराउंगा.......

- हां, क्या....नहीं छवि की चिंता उनको होती है जिनके मन में कुछ पाप होता है.....मैं भला क्यों डरूं.....

- नहीं कत्तई नहीं......अनैतिकता का मापदंड यदि आपके पास हो तो लाइये....मैं नपवाने के लिये तैयार हूं......

- जी ?

-वो आप जानिये....आप को क्या करना है....आप लोग जब नैतिक और अनैतिक की बात उठाते हो तो क्या साथ में नैतिकता नापने हेतु 'नपनी' लेकर नहीं चल सकते.....

- देखिये नैतिकता दो किलो की भी हो सकती है......दो टन की भी हो सकती है....यह तो व्यक्ति विशेष पर आधारित है....

- .........

- मैं इस पर कुछ कहना नहीं चाहता......

- देखिये अन्ना कहते थे कि मुझपर कोई सौ रूपये का भी भ्रष्टाचार साबित कर दे तो आंदोलन से हट जाउंगा और अब केजरीवाल बोले कि मेरा दस रूपये का भी साबित कर दो तो.....

-इस से पता चलता है कि इमानदारी का अवमूल्यन किस तेजी से हुआ है .....सौ से सीधे दस पर.......यानि इमानदारी का तो जमाना ही नहीं रहा वाला जुमला साक्षात देखिये.....

- तो इतने सारे संत कहां से लायेंगे जोकि लोकपाल चलायें......हम आलरेडी एक्सपिरियेन्स्ड हैं.......हमें पहला हक है तमाम कमिटियों में......

- मैं इस पर कुछ कहना नहीं चाहता......

- यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर की वस्तु है.....मैं इस पर कुछ भी कहना ठीक नहीं समझता.....

- जी.....बिग बास....हां पूछिये जो पूछना हो....

- नहीं.....हम तो सन्यासी आदमी ठहरे.....हमें कैसा डर.....

- अब वहां भी देखिये ज्यादे कुछ होता जाता नहीं है.......एकदम अवकाश ही समझिये....तो हम कुछ दिन बिग बास में ही रह लें तो कौन बुरा .....

- हैं.....ई गाना कौन लगाया जी......बंद कराओ.....चल सन्यासी मन्दिर में......तोरा चिमटा मेरी चूड़ियां दोनों साथ खनकायेंगे......गलत बात...

- और क्या....बिग बास का देबी लोग चूड़ी पहनती ही नहीं तो .........

- चिमटा हम नहीं रखते......एक बार रखा था.....लोग हमसे छीनकर हमीं पर पिल पडे.....तब से....

- आंय....बुलावा आ गया.....ठीक है ...राम राम....जंगली कार्ड आ गया है अब जाता हूं वाईल्ड कार्ड से एंटरी करने......

- अरे भई कहा न, वहां सब लोग सन्यासी ही हैं....अपना घर दुआर इतने दिन से छोड़े हुए हैं तो........

- सतीश पंचम

Monday, November 7, 2011

आमी रोल रोल ......

 - बहुत आच्छा दीदी बहुत सेयि बोला.....पेटरोल दाम बहुत जेयादा .........ना गारीब आदमी जिये ना मरे ..... मुझे भी भर भर के गुस्सा आया दीदी .... भर भर के।

- ये सरकार एकदम फालतू , आमि सपोर्ट नेयि करता तो अच्छा था दीदी ....

- ऐ तुमको बोला ना चुप अन चाप हो जाओ...... अभी आमार दीदी भाशन चालू .... तुमी चुप .....

- ए भौमिक.....की रे.....दीदी बोलन आसुन सुन तो की बोलछी.....

- की रे बोक्का....बीड़ी खेंच.....अउर खेंच......छाती मे सिल होशुन तो  मालूम होशुन .......

- की विपिन दा.....दीदी भाशन भीषन सत्ये.......पेटरोल में रोलबेक ......

- एय फीलू दा.....तुमको दीदी का भाशन नई सुनना ......तुम कभी नेई सुधरेगा.....जाओ कौमिनिश्ट भिन्ग का पास ....जाओ .....जाओ

- धिमान दादा.....दीदी भाशन..........

- अरे मारता क्यूं है दा.....अरे मत मारो.....

- क्यूँ मारा धिमान दा....तुम हमको क्यूं मारा.....हम कुछ लिया ना दिया.....फिर.....

- दीदी का नाम लेने से आप को गुस्सा आता है......फेर आप गलत आदमी हय..... तुमी कितना मारो लेकिन आमी गलत आदमी का साथ नेयि देगा...

- एय लगता है दादा..... अरे तो दीदी आमार ......ये गलत है धिमान दा.....मारो मत.......हम दीदी को इनफोम .....

- अरे दादा तुम कौमनिस्ट भिन्ग में रहो हमको क्या है....लेकिन हम गलत का साथ नेयि देगा......

- जोर से लगता है दादा.....उधर फोड़ी है दादा......पक्का फोड़ी....भीशन दर्द.....दादा....दादा..

........

.......

- दादा आराम हो गया दादा......पूरा कचड़ा एक झटका में फोड़ी से बाहर आ गेया............येइ हमको नेयि करने होता था ......दस दिन से फोड़ी दुखता आशुन .....अमी हिम्मत नेयि होता चीरा लगाने के लिये........

- आमार दीदी का नाम लिया तो दरद चला गया...........पेटरोल रेट भी कम करके रएगी दीदी...देखना तुम.............

- पेटरोल से पेट में रोल-रोल.....रोल रोल पेटरोल.......अइक स्साला .....आमी तो सेरी करता है......गालिब अबी तुमारा क्या होगा .........

- तनमूल पार्टी वाला गालिब....आमी काल इश्तीफा दीदी को दे के सेरी करेगा.....गालिब जैसा काफिया पढ़ेगा.....अंतरा पर  दीदी साईन करेगा.....फिर इस्तीफा वापिस  ...ऐज यूजल आमी  पुराना रोल....

- रोल रोल पेटरोल.....रोल  :-)

- Satish Pancham

Friday, November 4, 2011

PUC वैन.......

            मैं सड़क के किनारे खड़ी PUC वैनों को जब भी देखता हूँ मुझे यूँ प्रतीत होता है जैसे यह PUC Van डिट्टो हमारी भारत सरकार ही है। चार बेहद पुराने घिसे पहियों पर टिकी वह वैन एकदम भारत सरकार का प्रतिरूप नजर आती है, जिसके पहियों को देख कुछ 'खंभेबाज बुद्धिजीवी' इन्हें लोकतंत्र के चार स्तम्भ बताने का शौक पालते हैं। यदि ध्यान से इस PUC Van को देखा जाय तो पता चलेगा कि पिछले डेढ-दो साल से यह PUC Van एक ही जगह खड़ी है, उस पर धूल की मोटी परत चढ़ी है, टायरों के पास छोटे-छोटे पौधे उग आये हैं, झाड़ झंखाड, चींटियां-तिलचट्टे रेंगने लगे हैं, चेसिस के नीचे एकाध कुत्ते जीभ बाहर निकाले ठंडक ले रहे हैं और ऐसे ही दिव्य माहौल में यह PUC Van बेफिक्र होकर शहर भर की महंगी-सस्ती, अच्छी-बुरी सभी गाड़ियों को लाइसेंस बांटे जा रही है। पचास रूपये टिकाओ, पंप सटाओ और पप्पू पास। अब ले जाइये इस 'पास' को शान से लहराते हुए।


          ठीक यही हाल हमारी सरकार का भी है। सालों से एक ही जगह टिकी उसकी छांह में भी दलाल टाइप श्वान प्रजाति छंहाती नजर आती हैं, छोटे छोटे पौधे, तिलचट्टे, चीटियों के मानिंद दलाल लोग रेंगते नजर आते हैं। कुटीर- बृहद...अल्प-बहुल सभी टाइप के लाभार्थी नजर आते हैं सरकारी छांह में। एकाध बार तो देखा गया गोजर टाइप की प्रजाति भी उसके टायरों में आश्रय पाने में सफल होती है जिसके चलते समय उसके पैरों का सिंक्रोनाइजेशन भ्रष्टाचारी हथेलीयों का समरूप नजर आता है। पहले इस विभाग में कुछ टिकाओ....फिर अगले....और अगले.....और.....तब आप की फाइल आगे बढेगी। मजे की बात तो ये कि सारे के सारे गोजर प्रजाति के जीव इन टायरों पर ही ज्यादा नजर आते हैं जिसे खंभेबाज बुद्धिजीवी लोकतंत्र के चार स्तम्भ बताते नहीं थकते। कुछ कविता भाव में कहूं तो - एक टायर कार्यपालिका का.....एक टायर न्यायपालिका का.....एक टायर विधायिका का....और एक टायर पत्रकारिता का। इन तमाम टायरों पर चिपके गोजर, फफूंद, तिलचटटे आदि मिलजुलकर एसा सटायर क्रियेट करते हैं मानों वे बने ही एक दूसरे के लिये हों। इसी बीच एकाध कुत्ता कहीं से आकर टायरों को नम कर जाता है तो उन टायरों में और नमी आ जाती है।

      बहरहाल, अगली बार आप जब भी किसी PUC वैन को देखें तो एक बार उसकी बॉडी लैंग्वेज, उसकी नाप-जोख, उसकी भाव भंगिमा पर थोड़ा ध्यान दें। बच्चों को यदि नागरिक शास्त्र पढ़ाना चाहें या दिखाना चाहें कि सरकार किसे कहा जाता है, वह दिखने में कैसी होती है, काम कैसे करती है तो बेखटके किसी PUC वैन के पास उन्हें लेकर जाइये और बताइये.......सरकार ऐसी होती है :-)



- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.