सफेद घर में आपका स्वागत है।

Friday, October 28, 2011

ये भी इंडियै में होना था ? ........धुत्त..

        इस देश के कुत्ते तक फरारी से तेज भागते हैं। कम से कम इस वक्त समाचारों को देख कर तो यही महसूस हो रहा है।  फरारी के टेस्ट ड्राईव के दौरान कुछ कुत्ते न जाने किस ओर से आये और ट्रैक की ओर दौड़ लगा बैठे। बहुत संभव है माईकल शूमाकर ये सब देख हीनभावना से ग्रस्त न हो गये हों कि सारा जहां जीतकर मैं हारा तो इसी देश में जहां के कुत्तों तक ने मुझे चैलेंज दे दिया, हाय रे हतभागी।

        उधर इन कुत्तों के जज्बे को देख कुत्ता कम्यूनिटी ने आश्चर्यमिश्रित खुशी व्यक्त करते आज पार्टी करने का मन बनाया है। सुना है कि चेकोस्लोवाकिया से विदेशी नस्ल की एक श्वान नर्तकी को भी बुलाया गया है जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि उसके  सड़क पर निकलते ही ट्रैफिक जाम हो जाता है, सारे के सारे कुत्ते वहां इकट्ठे हो जाते हैं। वैसे अंदर की खबर तो ये है कि रेस के आयोजकों ने ही उस श्वान नर्तकी को डबल पेमेंट देकर बुलाया है ताकि सारे कुत्ते इसके आस पास बने रहें और फरारी की रेस शांतिपूर्वक निपट जाय।

      खैर, कुछ कचहरीबाज  कुत्तो ने बाकायदा जानकारी लेने हेतु आवेदन देकर  पूछा है कि आखिर वह क्या कारण था कि बिहैवियरल साइंस के प्रतिपादक Mr. Pavlov ने कुत्ते को ही अपने Classical Conditiong  प्रयोगों के लिये चुना। आप लोगों की जानकारी के लिये बता दूं कि मनोविज्ञान के एक  प्रयोग के दौरान व्यवहार का अध्ययन करने के लिये  एक कुत्ते को बांध कर रखा जाता था और एक घंटी समयानुसार बजाई जाती। घंटी बजने के तुरंत बाद प्लेट में भोजन परोसा जाता। इस क्रिया के दौरान देखा गया कि भोजन देखते ही कुत्ते के लार चूने लगता और उसे माप लिया जाता। धीरे धीरे उस कुत्ते की ये हालत हो गई कि वो बिना भोजन देखे केवल घंटी की आवाज सुनते ही लार चूआने लगता। बस यूं मान लिजिये कि उसकी हालत बिल्कुल हमारे भ्रष्ट राजनेताओं की तरह हो गई। एकदम पावलोव के कुत्ते की तरह हमारे राजनेता भी बिहेव करते हैं।

       मसलन पहले के समय सड़क बनने का प्रस्ताव बनता था, फिर बाकायदा टेंडर निकलता था और फिर सड़क बनाने के बाद जो कुछ ग्राह्य अग्राह्य होता था नेताओं तक पहुंचता था। नेताओं की लार तब सड़क बनने के दौरान ही टपकती थी कि इसमें से देखें कितना माल मसाला मिल जाता है। होते होते अब ये समय आ गया कि प्रस्ताव पास होने की कौन कहे, केवल सुनाई भर दे जाय घंटी की तरह....हमारे नेताओं की लार टपकने लगती है, सड़क फड़क जब बनेगी तब बनेगी, ये बताओ हमारा हिस्सा कितना। कुछ तो सड़क होने पर भी दुबारा उसे खन बहाने से नहीं चूकते। एक तरह से देखा जाय तो pavlov के कुत्ते से ज्यादा कुत्तई हमारे इस वर्ग में बेखटके देखी जा सकती है। एक बार कुत्तों का Saliva मापक यंत्र खाली रह सकता है लेकिन नेता वर्ग का Saliva ? लाओ न कितना मपनी लाना है, गैलन के गैलन भर देंगे फिर ले जाइये जहां भी अध्ययन आदि के लिये ले जाना है।

       उधर सुनने में आया है कि अब गहन जांच की जा रही है कि फार्मूला वन के ट्रैक पर कुत्ते कैसे आ गये। अच्छा तो यह होगा कि श्री धर्मेन्द्र जी से गुजारिश की जाय कि जब तक फार्मूला वन की रेसिंग चले तब तक कृपा करके ट्रैक के आस पास बने रहें।

 वो क्या है कि उनके डॉयलॉग - "कुत्ते मैं तेरा खून पी जाउंगा" की दहशत कुत्ता जमात में  कुछ ज्यादा ही है :)


- सतीश पंचम

Thursday, October 27, 2011

प्रेमी जोड़ों का लोकपाल.....

......
.....

- जानूं तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो...


- और तुम मुझे अच्छी लगती हो...

- लेकिन तुममें एक कमी है

- कैसी कमी...

- तुम कंजूस बहुत हो....

- इसमें सरकार का दोष है...

- सरकार ?

- हाँ सरकार, वो लोकपाल नहीं ला रही....

- उसका तुम्हारी कंजूसी से क्या रिश्ता...

- लोकपाल होता तो सारे भ्रष्टाचारी अंदर होते....जमाखोर जेलों में होते....

- तो

- तो क्या...नेचुरल है कि चीजों के दाम तब कम होते.....और मुझे कंजूस न होना पड़ता...

- लेकिन प्रियवर मुझे आपकी ये कंजूसी जरा भी अच्छी नहीं लग रही....ऐसे में हम लोगों का मिलन होना मुश्किल है...

- नहीं प्रिये...ऐसा न कहो....मैं जी न पाउंगा.... हम दोनों के बीच लोकपाल की दीवार ही तो है....

- ये दीवार हटानी होगी प्रियवर...अन्ना से कहिये लोकपाल के लिये थोड़ा और जोर लगायें

- अकेले अन्ना क्या क्या करें प्रिये....उनकी टीम के लोग विभिन्न प्लान के तहत भोथरे किये जा रहे हैं...

- मतलब...

- किसी को प्लान 'ए' के तहत तो किसी को प्लान 'बी' के तहत तो किसी को 'सी'.....

- ये भोथरई बंद नहीं हो सकती क्या...

- कैसे बंद होगी प्रिये.....धार लगाने वाली मशीनों का लाइसेंस सरकार के पास है.....

- फिर सरकार...

- हां प्रिये....इसलिये मैंने शुरू में ही कह दिया था कि सब सरकार का दोष है...

- तो क्या हमारा मिलन न होगा....

- होगा क्यों नहीं प्रिये...बस थोड़ा चुनावों तक इंतजार करो.....

- तो क्या चुनावों से हमारा मिलन हो जायगा...

- उम्मीद रखी जा सकती है कि लोकपाल समर्थक सरकार चुन कर आएगी...

- और यदि लोकपाल समर्थक सरकार न आई तो.....

- तो हम फिर इसी तरह बाग बगईचा में, पार्क-बस इस्टैंण्ड में मिलते रहेंगे.....इन्टरनेट पर.... फेसबुक पर.........

- तब तो हमें लोकपाल के लिये उठ खड़े होना होगा.....पूरा  जोर लगाना होगा.....
......

......

- ए चलो उठो यहां से.....चल रे ए छोकरी....चलो अपना-अपना घर जाओ.....

- तुम लोग कॉलेज छोड़ के इधर क्या मज्जा कर रेला है क्या..... चल ए चिकने.......

- चल बोला तो....चल निकल.... ए शाणें....तेरे को अलग से बोलना पड़ेगा क्या.....चल फुट इदर से....

- ए लाल दुपट्टा..... तेरे को क्या लिख के देना पड़ेगा क्या.....चल निकल....

- आईला आशिकी स्टाइल....चल रे ए कोट वाले ....ओ मैडम.....तुम लोग को क्या नोटिस-बिटिस देना पड़ेगा क्या ..चलो निकलो....

- ईधर दस दिन हो गया अउरत का ठीक से मुँह नहीं देखा.....रोज कुछ न कुछ खिटखिट.....कभी ये त्योहार...कभी वो रैली....कभी वो बंद ये बंद.....छुट्टी नईं....कुछ नहीं......उपर से ये छोकरा-छोकरी लोग का खिटखिट.....

- चल रे ए शाणें उठ.....

.....


- सतीश पंचम

Tuesday, October 25, 2011

तुम जाता कि नईं रे......

...........

- आमरा बेटी को जेल से छुड़ा के लाना.....खाली हाथ वापस आएंगा तो ये झाडू तेरा पिच्छू करके मोर जइसा बना देन्गा

- अइयो रामा....उधर वो जज लोग मेरा वकील का नई सुनता......दिल्ली वाला मैडम भी दूर दूर रेता .....पी यम भी नई सुनना मांगता.........तुम भी मेरा नई सुनना मांगता....बोलो मय क्या करना....

-ए डेय....तुम क्या करना वो तुमको मालूम.....मेरे कू मेरा बेटी दीवाली का टाईम घर में मांगता.....

- हलवा नई जी..... जज लोग बोलेन्गा तबिच तुमारा बेटी छूटेन्गा जेल से.....नईं तो कइसा लाएन्गा तुमिच सोचो....

- वो आमको कुच नईं मालूम.....आमको आम्रा बेटी मांगता......दीवाली टाइम लेके आना नई तो याद रखना....

- अइयो तुम आमको क्या समजा जी....आय एम पास्ट सी यम्म ....अइसा उंगली दिखा के मेरा से बात मत करना....

- आ रे सी यम्म.....येक बेटी को जेल से छुड़ा के लाना नईं होने को सकता.....सी यम्म....येन्ड रासकला...

- डेय....अन्गा डेय.....

- जा रे.....बड़वा.....

- इंगा पो......झाडू नईं मारना.....झाडू नईं मारना....अइयो कल्ला....अइयो...दया...

- चिल्ला अउर किसको बुलाना तू सबको बुला......आम नईं रूकेन्गा.....आमको आम्रा बेटी मांगता...

- झाड़ू मारने से तुम्रा बेटी आएन्गा क्या....

- वो आमको नई मालूम......आम्रा बेटी मांगता.....तुम जाज लोग का नईं सांबाल सकता तो पोलिस, बीलीस को तो संबाल सकता ना......क्यो वो बी मइच बताना.....

- बोले तो...

- बोले तो पोलीस बिलीस पानी पिलाना....तोड़ा मक्कन लगाना.....कइसा बी करके अपील नईं करना.....आमरा बेटी छूटता तो छूटने दो.....अपील नईं करना....

- लेकिन...

- तुम जाता क्या नईं रे...

- आम जाता....लेकिन ....

- .रासकला....सब गड़बड़ घोटल तुम लोग करेन्गा अउर फसायेन्गा आम्रा बेटी को.....इडियटा....डेय

- डेय....डेय.....

- ये झाड़ू देखता ना....एकदम मोर बना देन्गा...मोर  :-)


- सतीश पंचम

Saturday, October 22, 2011

अखिल भारतीय 'बाबा-बाबी' शैक्षिक अनुसन्धान संस्थान

    बेहद अय्याश माने जाने वाले  लिबिया के  तानाशाह गद्दाफी के मारे जाने के बाद बहुत संभव है उसकी ढेर सारी महिला बॉडीगॉर्ड्स अब रोजगार हेतु 'बाबा-बाबी स्पेशिलिटी कोर्स' करके कहीं प्रवचन आदि देने की तैयारी कर रही होंगी ......नाम भी गजब......सुश्री गद्दाफी देवी 'गॉर्जियस' .......सुश्री ब्लैक बेल्टहीया जी 'पटाखा'......सुश्री चमको 'फुलौरी'.......


         सोचता हूं मैं भी एकाध ऐसा ही आश्रम खोल लूं जहां कि ऐसे हालात के मारे बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध हो सके, कुछ खा कमा सकें। नाम हो - अखिल भारतीय बाबा-बाबी शैक्षिक अनुसन्धान केन्द्र। जहां तक मुझे लगता है कि आज रोजगार उपलब्ध करवाना प्राथमिकी है, भ्रष्टाचार तो कल भी मिट सकता है। यदि लोग बेरोजगार रहेंगे तो कल को लोग चोरी, राहजनी, लूटमार पर उतर आएंगे जो कि भ्रष्टाचार से कहीं ज्यादा घातक साबित हो सकता है।

        इसी बात पर सरकार को एक प्रस्ताव भेजने का मन कर रहा है जिसमें कि मुख्य बातें बिंदुवार ढंग से रखी जांय, मसलन -

  • बाबा-बाबी स्पेशिलिटी कोर्सेस से रोजगार सृजन में सहायता मिलेगी।
  • इसमें जीरो इन्वेस्टमेंट है, बोलबचन और स्नेहवचन से काम चल जाता है। बैंकों से लोन लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी, कर्ज के चुकते आदि का झंझट भी नहीं।
  • ऐसी शिक्षा व्यवस्था रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट आदि के जंजालों से मुक्त होगी।
  • आये दिन होने वाले मनरेगा आदि के भ्रष्टाचार से छुटकारा मिलने में आसानी होगी। आखिर कितनी सड़कें कागजों पर बनाई-बिगाड़ी जाएंगी और कब तक ?
  • शिक्षा पर सरकारों को बजट का कम हिस्सा खर्च करना पड़ेगा। देखा गया है कि हमारे बजट का ढेर सारा पैसा आई आई टी आदि तकनीकी संस्थानों पर खर्च होता है लेकिन वहां से इंजिनियर बनने के बाद वे बच्चे विदेशों में चले जाते हैं। उन पर सब्सिडाइज्ड शिक्षा वाला पैसा फिजूल चला जाता है, विदेशी नागरिक उनकी प्रतिभा का उपयोग कर लेते हैं। बाबा-बाबी स्पेशिलिटी कोर्स से निकले लोग इसका उल्टा करेंगे। वे विदेशी नागरिकों को भारत में बुला प्रवचन देंगे जिससे कि विदेशी मुद्रा की आवक बढ़ेगी, पर्यटन का विकास होगा। इस प्रकार से बाबा-बाबी इंस्टिट्यूटस ब्रेन ड्रेन की समस्या यानि प्रतिभा पलायन रोकने में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक होंगे ।
  • इस तरह की शिक्षा व्यवस्था हेतु ज्यादा जमीनों के अधिगृहण की जरूरत नहीं पड़ेगी और न ही नोयडा एक्सटेंशन आदि जैसा टेंशन पनपेगा। जिसे जहां सुभीता होगा वहीं पेड़ के नीचे अपनी प्रवचन की दुकान खोल सकता है।
  • इन क्रियाकलापों से विश्व मानचित्र पर भारत अपने वही पुराने अतीत 'गुरूओं वाला देश' जैसा स्टेटस पा सकता है। ए एल बाशम जैसे इतिहासकार अपनी किताबों का नाम Wonder that was india लिखने की बजाय 'Wonder that is india' रख सकते हैं।
  • हमारे नीति नियंताओं का शुरू से मानना रहा है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था सर्वसुलभ हो, हर किसी को शिक्षा उसकी अभिरूचि के अनुसार मिले, जीवन यापन में सहायक हो। इस बात में बाबा-बाबी इंस्टिटयूट्स पूरी तरह सहायक प्रतीत होते हैं। वैसे भी माना जाता है कि लोगों को अपने से ज्यादा दूसरों को समझाने में रूचि होती है, और यह गुण बाबा-बाबी प्रशिक्षुओं के लिये प्लस प्वाइंट है। बहुत संभव है भारतीय इस मामले में शेष विश्व से बीस ही ठहरें।  
         इन तमाम बातों को देख मुझे लग रहा है कि जब तक विदेशी लोग पेटेंट आदि के चक्कर में घुसें हमें अखिल भारतीय बाबा-बाबी शैक्षिक अनुसंन्धान केन्द्र खोलने में तनिक भी देरी न करनी चाहिये। वरना कल को ये हो सकता है कि हम केवल ताकते रह जांय और गद्दाफी की कोई महिला अंगरक्षक भारत में आकर प्रवचन देते देते कहीं 'Gaddafian Thoughts and Philosophy' न पढ़ाने लग जाय  :)


 - सतीश पंचम

Wednesday, October 19, 2011

कुरसी ले आओ आर....काहे खड़े खड़े ताक रहे हो......

.......

- कृपया आप लोग सांत हो जाइये.....अरे भाई शांत हो जाओ आप लोग...... क्यों बात नहीं मान रहे...सांत हो जाइये.....

- अरे तो चप्पल ही तो फेका है, इसमें इतना उतेजित न होइये.....उतेजना में काम सही नहीं होता....

- अब आप लोग उनको मारेंगे तो ई तो हि्ंसा हो जाएगी....फिर उनमें और हममे फर्क क्या होगा...

- नहीं देखिये आप लोग गलत कर रहे हैं..... छोड़ दिजिए, वह भी इंसान है.... गलती हो जाती है....

- अ त चप्पल फेक दिया तो उसी में कट गये कि एकदम बेहोस हो गये....बात करते हैं....

- त मारियेगाsss .....हैं...ई कौन बात हुई कि चप्पल फेंका तो आप भी मारेंगे ?

- ए जैबरधन जी, तनिक हटाइये उन लोगों को...

- नहीं, बिचार बिचार में भिनता आ जाती है, लेकिन इसका ए मतलब थोड़ी है कि उसने चप्पल फेका तो आप लगेंगे थपड़ियाने....

- अरे रामनरायन जी को कहिये थोड़ा पंखा चला दें....हां...टेबुलै वाला कह रहा हूं तब क्या एतना जल्दी सीलींग वाला फिट करोगे तब हवा चलाओगे....

- नहीं, हमारे कहने का मतलब ए है कि सामने वाला यदि अचेत है, नासमझ है तो क्या आप भी नासमझी दिखाओगे.....

- तो आप जाकर उनसे पूछिए न, उनकी पिटाई हुई तो उसके लिये वो जवाबदार हैं हम नहीं, अरे यार पंखा अब तक नहीं चालू किये...

- अरे भाई, दस आदमी जुटे हैं, किसी बात पर मतभेद हो जाता है, कोई उखड़ जाता है, कोई पखड़ जाता है....ऐसे में सबको न संभालकर एक साथ लेकर चलना पड़ेगा......

- नहीं हम ओ नहीं कह रहे, हमारा कहनाम ये है कि मानलिजिए जिस आदमी के पास दो ही पैर था तो चल लेता था, दौड़ता था, तमाम दुनियावी काम करता था। अब जैसे ही उसके पास मान लो पचास पैर और आ जांय तो सुरूवात में लड़खड़ईबै करेगा, कभी एक गोड़ दूसरे में बझेगा त कभी दूसरा गोड़ आठवें दसवें पैर में बझेगा, लन्गी लगायेगा.... समझे कि नहीं समजे...

- त वईसे ही है, सब को एक साथ लेकर चलने में, संभलने में थोड़ा समै लगता है....

- हां, बिलकुल, आप की बात से बिलकुल सहमत हूं भाई....ए त देखिये राजनीति है ये तो आप जानते ही है

- त राजनीति जो है सो कुल आपसे करवाएगी, आपको समय आने पर गदहा भी बनना पड़ेगा, समय आने पर चोर भी बनना पड़ेगा औ समय आने पर सदपुरूस भी बनना पड़ेगा

- नहीं, त आप ....हां लाइये....पान लेंगे रमणीक जी.....लिजिए...चूना अलग से है...

- हां त वही बात कि सब टैम पर सब राजनीति के अनुसार बनना होना पड़ता है, एकदम से टैट होने से नहीं चलेगा, आप को झुकना भी पड़ेगा, चार बात सुनना भी पड़ेगा, औ जरूरत पड़ने पर लातौ घूंसा खाना पड़ेगा...

- न त हम कहां मना कर रहे हैं.....लात घूंसा चलाना भी पड़ता है लेकिन ये कोई अच्छी राजनेति नहीं है....बाकि तो....लिजिये चाहौ आ गई...

- एक कप और लाइये....बिन्देस्वरी जी आप चाय पियेन्गे कि काफी.....त काफीये लाइये...चाय रोक दिजिए.....

- तो वही बात कि.....अ देखिये पंखा भी चल पड़ा हरहरा कर.....नहीं तीन पर किजिए 'फास' एकदम.....हाँ  'नोबवा' घुमा दिजिए जौने चारू ओर घूमे.....

- तो वही बात कि........नहीं जियादे नहीं, अइसे बिचारधारा वाले बहुत कमै हैं लेकिन हैं.....
 
- अरे यार बात समझा करो........ तो हम कहां कह रहे हैं कि कसमीर दे दो......हम कत्तई न कहेंगे कि कसमीर दे दो....उन लोगों की आजादी की मांग पूरी करो....कभी नहीं कहेंगे......... 
 
- अरे ई  कौनो साहरूख खान वाला फिलिमया थोड़े है ओ का कहते थे दिल वाले दुलहिनिया ले जायेंगे  जिसमें अमरीस पुरीओ था,  कौनो हिरोइन थी ओ यार वो जो कमर ओमर बड़ा नीक डोलाती थी....हां......ओही.....

- अ देखिये रमकैलास जी को लक्क से हिरोइन का नाम बता दिये.....अरे बहुत पुराना खिलाड़ी हैं कि.....
 
- तो जैसे  दिल वाले दुलहनीया में कहता है  - जा बेटी जी ले अपनी जिनगी.....जा तुझे साहरूखवा के जइसन चाहने वाला नहीं मिलेगा....तुझे आजाद किये......त ई बात कसमीर पर थोड़े लागू होगी.....न.....कत्तई नहीं.......न तो  कसमीर साहरूख है न सिमरन.....कसमीर कसमीर है.....
 
- हां,.... पुलिस वाले आ गये.....तब ठीक है..... उसी के हाथ में सौंप दिजिए उस चप्पलमार को बाकि अब का कहें....ससुर बड़ा नरक है राजनीति....
 
 
- सतीश पंचम

Tuesday, October 18, 2011

भदेस बतकूचन

- ई आडवाणीया भी रथ लेकर आ रहा है, देखिये कैसे इसवागत के लिये लोग ठाड़ हैं


- जिसको कुछ काम नहीं होता वही ठाड़ हो ऐसे काम में लगा रहता है

- तो अभी कौन सा आप खट रहे हो, मन हो तो आप भी ठाड़ हो जाइये

- वो लिफाफा मिले तो ठाड़ होउं, लेकिन मिले तब न

- कौन सा लिफाफा

- वही जो पत्रकार लोग को मिला था जिसमें हजार हजार का नोट था, अखबारों में फेवर में लिखने की इलतिजा करते हुए

- तब क्या खाकर कैश फार वोट मामले में भजपाई हलकान हैं, सुना है जेदुरप्पौ नाम का चमचमाता मेडल इनके सीने पर टंगा है

- औ कंगरेसी कौन से झुल्ले मुल्ल हैं, उनके पास कोई तमगन की कमी है, एक से एक घोटालेबाज चलित्तर

- कौन नहीं हैं, सपै को देख लिजिये, मायावतीयै को देख लिजिये....हर कोई एक से एक जबरजंग

- तो किसको वोट दिजिएगा

- अब जही तो यच्छ प्रश्न है

- तब जाकर यच्छै से पूछिये उसका उत्तर

- उनको भी न मालूम होगा

- तब किससे पूछियेगा

- यह दूसरा प्रश्न है

- करोड़पति करोड़पति नहीं खेल रहा हूं, वाकई पूछ रहा हूं

- यह तीसरा प्रश्न हो गया

- लांण.......... तुम यहीं प्रश्न गिनते रहो, हम चलते हैं

- कहां

- चउथा प्रश्न पूछने

- प्रश्न का नाम गाम कुछ होगा

- "वोटवा केंहर पड़ी"  ?   

:-)

****************
 
              -  Satish Pancham
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Sunday, October 16, 2011

दर्द का सरकारी रिश्ता......

         हाल ही में एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री को जेल में डालते ही उनके सीने में दर्द उठा। बेचारे जेल से अस्पताल ले जाये गये। ऐसे ही कई और भी राजनेता हैं जिन्हें जेल जाते ही सीने में, कमर में, अगल में बगल में दर्द उठने लगता है। समझ नहीं आता कि यह दर्द अदालती फैसले के आलोक में है या वास्तविक दर्द है। ऐसे लोगों की डॉक्टरी रिपोर्टें भी गजब अंदाज में आती हैं। सीधे सीधे गणित के विलोमानुपाती अंदाज में। मसलन, यदि सरकारें अनूकल हुई तो मेडिकल रिपोर्ट खराब आती है, शुगर, बीपी सब बढ़ जाता है, सरकार चिंता प्रकट करती है। और यदि सरकार प्रतिकूल हुई तो मेडिकल रिपोर्ट सब ठीक ठाक आता है। बीपी नॉर्मल होगा, शुगर लेवल सीमांत प्रदेश पर गुलछर्रे उड़ा रहा होगा और तो और डॉक्टर खुद ही कह देगा कि इन्हें कोई बीमारी नहीं है, वापस जेल ले जाया जा सकता है। ऐसे में उन मरीजों का दिल और बैठ जाता है, हांलाकि तब भी शिकायत होती है कि दिल ठीक से बैठ नहीं पा रहा, संभवत: उसे गठिया न हो गया हो। डॉक् साब जरा देख लेंगे तो अच्छा रहेगा, आपके बच्चे जियेंगे, पत्नी होगी तो खुश रहेगी और गर्ल फ्रेण्ड होगी तो सस्ते रेस्टोरेण्ट में भी निबाह लेगी। डॉक् साब.....डॉक् साब....


           अब ऐसे में उन डॉक्टरों की स्थिति समझी जा सकती है जिन्हें ऐसी रिपोरटें बनाने के लिये कहा जाता होगा। मसलन, जो डॉक्टर अपनी पांच साल की मेडिकल पढ़ाई और तमाम अनुभव आदि के जरिये पहली ही नजर में समझ जायेगा कि बंदा नाटक कर रहा है सीने में दर्द होने का वह पहले देखेगा कि दर्द सरकारी है या प्राइवेट। बंदा सरकार फ्रेण्डली है या एण्टी सरकारी। इसे ठीक ठाक बताने पर क्या प्रतिक्रिया हो सकती है, कहीं गाँव में पोस्टिंग न कर दी जाय। इन तमाम प्रश्नों के बीच उसे समझ आता है कि उसकी मेडिकल पढ़ाई में एक सब्जेक्ट जान बूझकर छोड़ दिया गया जिसमें इस तरह के लोगों के हैण्डल करने की विधि बतानी चाहिये थी। तमाम फिजूल की बातें पढ़ा दी जाती हैं - ये पैंक्रिया वाली बीमारी है, इसे ऐसे ठीक करना चाहिये, ये नसों की गड़बड़ी है, इसे फलां तरह से दवा देकर सक्रिय करना चाहिये लेकिन कहीं यह नहीं पढ़ाया जाता कि ऐसे हाई प्रोफाइल मरीजों के नकली दर्द को कैसे हैण्डल किया जाय। कैसे उनके चेले चपाटों से अपना गिरेबान बचा कर रखा जाय।

          उधर वार्ड ब्वॉय अलग परेशान होगा कि ऐसे नेता को कैसे वह संभाल कर बाथरूम ओथरूम ले जाय, कैसे उसकी सेवा टहल करे जबकि वह अच्छी तरह चल फिर सकता है, अच्छी तरह घूम नाच सकता है। नर्सें अलग परेशान कि ऐसे नाटक करने वाले मरीजों को कैसे दवा दे जोकि भले चंगे हैं। कुछ तो अपने पुराने अनुभव से जानती हैं कि ऐसे मरीजों के जाने के बाद सफाई करते वक्त फूलदान, बुके आदि की तलहटी में टेब्लैट्स जस के तस फेंके पाये जाते हैं, न उन्हें खाया जाता है न कुछ लेकिन मरीज भला-चंगा होकर जाता है। ये अलग बात है कि उनके स्वस्थ होने में जो समय लगता है वह न्यायिक हिरासत या पुलिस हिरासत के बीतने पर निर्भर करता है। इधर अदालत के द्वारा तय न्यायिक हिरासत की समय सीमा बीती उधर मरीज अपने आप भला चंगा हो जाता है।

         खैर, अब तो अस्पतालों में भी एलर्ट कर दिया जाना चाहिये कि जैसे ही किसी वी आई पी के गिरफ्तार करने की खबर आये तुरंत ही एम्बुलेंस, बिस्तर, आपरेशन थियेटर आदि तैयार रखें क्योंकि अभी उसके सीने में दर्द उठेगा और वह उठा पठाकर यहीं लाया जायेगा। सुना है अस्पतालों के सामने बैठते पानवाले भी अपनी त्वरित बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं और मण्डी से पान का तिगुना चौगुना स्टॉक लाकर रख देते हैं क्योंकि माना जाता है कि वहां जमा होने वाले नेता के चेले चपाटों का सर्वप्रिय खाद्य पदार्थ पान ही होता है। दूसरी कोई चीज उन्हें ऐसे में अच्छी नहीं लगती सिवाय पान के। और भला लग भी कैसे सकती है जब उनका नेता अन्दर जिन्दगी और मौत से जूझ रहा हो। यह अलग बात है कि अन्दर उनका नेता मजे से एसी कमरे में बैठ भांति भांति के व्यंजन भकोस रहा होता है।  सिर हिला-हिला कर कहता है....

- और दो रोटी रखो, चावल जरा सा रखना और सब्जी भी थोड़ा सा ही रखना...

- अरे थोड़ा बोला था ज्यादा रख दिया.....

- अच्छा रख दिया तो रखो अभी क्या बोलूं ...

- वो रसगुल्ला बोला था.........

- तो रखो ना

- अरे रखो यार...... रिपोर्ट की चिंता तुम काहे करते हो

- नहीं वो अचार मत रखना.... बहुत तीखा है, मत रखो...सुबह तफलीक होता है

- नहीं, उसका रिपोर्ट पब्लिक नहीं करना.....

- अरे यार समझा करो....कल को पब्लिक में खराब इमेज बनेगा ....अप्पोजीशन बवासीर-भगन्दर के नाम पर मजाक बनायेगा.......सो कीप इट प्राइवेट   :-)


- सतीश पंचम

Friday, October 14, 2011

अलहदा बमचक

          प्रशांत भूषण ने जब कश्मीर पर बयान दिया था तो मुझे उनके बयान पर कुछ ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। लगा कि जैसे एक और बुद्धिजीवी की बौद्धिकता तात्कालिक तौर पर ठांठे मारना चाहती है। लेकिन मुश्किल यह है कि इस तरह की ठंठैती भलाई कम और नुकसान ज्यादा करती है। उपर से देखने पर लगता है कि बहुत पढ़े लिखे जानकार लोग हैं। भला ये कैसे कोई गलत बात कह सकते हैं। लेकिन जब बात की तह में जाते हैं तो पता चलता है कि - न्यूटन चच्चा बालिग होना चाहते हैं। क्रिया और प्रतिक्रिया से उपर उठकर राजनीतिक तौर पर आध्यात्मिक होना चाहते हैं। एक तरह की मासूमियत भरी शुचितावादिता परोसना चाहते हैं। यह कश्मीर में रायशुमारी वाला बयान उसी मासूमियत भरी शुचितावादी राजनीति का भद्दा नमूना है। इस मासूमियत भरी  आध्यात्मिक राजनीति से कभी नेहरू जी भी बाधित हुए थे। उन्होंने भी कुछ यही बयानबाजी की थी कि लोगों की रायशुमारी से फैसला होगा, ऐसा वैसा होगा नतीजा यह कि, हम अब तक उस बयानबाजी के नासूर से उबर नहीं पाये। पाकिस्तान उन्हीं अलहदे विचारों की आड़ में जब तब हमें कोंचता रहता है।


        सवाल यह उठता है कि जो कोई भी पब्लिक आइकन इस तरह की अल्लम गल्लम बयानबाजी करता है क्या वह सचमुच इतना मासूम होता है या फिर इतना बुद्धिहीन कि उसे इसके नकारात्मक परिणामों का अंदाजा भी न लग पाता हो। क्या गारंटी है कि जो रायशुमारी होगी वह बिना किसी दबाव या बहकावे के होगी। क्या गारंटी है कि रायशुमारी के बाद हमसे अलग होने पर उत्तरी इलाकों में डिस्टर्बेंस बंद हो जायगा, सीमाएं सुरक्षित हो जाएंगी। और सबसे बड़ी बात यह कि आज कश्मीर में रायशुमारी मांगी जा रही है कल को कोई अन्य प्रदेश में भी यही सब दोहराने की मांग करे तब ? उस वक्त क्या मुंह लेकर उन लोगों की बात को रिजेक्ट किया जायगा ?

              कहा जाता है कि एक पॉलिटिशियन केवल वर्तमान की सोचता है, अपनी पीढ़ी के निर्माण की सोचता है लेकिन एक स्टैट्समैन अपनों से आगे की पीढ़ी के बारे में सोचता है। उसे केवल वर्तमान का ही निर्माण नहीं करना होता बल्कि भविष्य का भी ख्याल रखना होता है ताकि वर्तमान में लिये गये फैसलों का भविष्य में नकारात्मक असर न पड़े। इस अर्थ में प्रशांत भूषण की मांग ठीक उसी राजनेता के स्तर की है जो चाहता है कि किसी तरह मौजूदा टंटे को हल कर दिया जाय, आगे की देखी जाएगी। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि इसे मसले को हल करना नहीं कहते। बल्कि इस तरह के तुरंता निपटारे से अगली पीढ़ी के लिये कई और मसले खड़े हो जाएंगे जैसा कि नेहरू जी के गलत मान्यताओं के चलते हम देख रहे हैं। उसी वक्त हिम्मत करके साफ साफ मना कर देते, दृढ़ता दिखाते तो आज ये समस्या इतना विकराल रूप न धारण करती। उस समय वक्ती तौर पर एक सॉफ्ट पॉलिसी अपनाई गई और न जाने किस लगाव के चलते मासूमियत भरा बयान दिया गया कि हां, भविष्य में रायशुमारी की गुंजाइश है।

        खैर, तब जो हुआ सो हुआ। लेकिन इन तथाकथित पढ़निहारों का क्या जो रात दिन बहस करते हुए छतों के पलस्तर तक झड़ने की नौबत ला देते हैं। यदि और सब बातें छोड़ भी दी जाएं तो भी उन्हें अदालती प्रकिया के एक अंश से सीख लेनी चाहिये जिसके तहत अक्सर किसी पुराने फैसले को नजीर की तरह पेश किया जाता है, एक उदाहरण के रूप में आगामी मुकदमों हेतु संलग्न किया जाता है। कई ऐसे फैसले हैं जो पूर्व में लिये गये फैसलों को आधार बना कर दिये गये हैं। कल को इसी तरह की रायशुमारी को आधार बनाकर आगे भी विभिन्न घटकों ने मुकदमा बनाना शुरू किया तब ? और हमारी अदालतें......वे तो पहले ही केवल कानूनी नुक्तों और धाराओं पर ही फैसले देने के लिये ख्यात-विख्यात हैं। ऐसे में क्या गारंटी है कि लिजलिजे रीढ़विहीन राजनेता स्वार्थ साधने हेतु, वर्तमान संवारने हेतु संविधान को और नरम करने वाली धारा न लाएंगे।

         उधर प्रशांत भूषण को पीटने वाले लफंगे भी कोई बहुत अच्छा काम नहीं किये हैं। इस तरह की टुच्चई उपरी तौर पर देखने में भले अच्छी लगे कि हां ठीक किया, अच्छा किया लेकिन उसका नकारात्मक असर श्नै श्नै जो सामाजिक व्यक्तित्व पर पड़ रहा है उसे कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है। यहां मुम्बई में ही देख लिजिए। जरा सा कुछ हुआ नहीं कि तमाम पार्टियों के लोग कूद पड़ेगे तोड़ फोड़ करने। लगेंगे चिल्लम चिल्ली करने। इस वजह से एक तरह की असुरक्षितता की भावना फिज़ा में छाती ही जा रही है। लोग अब जैसे एक अंदेशे में जीने लगे हैं कि जाने कब वह इस टुच्ची मानसिकता का शिकार हो जाय। ऑटो रिक्शा में बैठा घर जा रहा है और अचानक ही किसी मसले को लेकर हो रही तोड़ फोड़ से घिर जाय। उसके ऑटो रिक्शे पर ही न हमला हो जाय, पत्थरबाजी के दौरान उस पर ही न ढेला चल जाय। यह आशंकाएं पहले इतनी न थीं, या होंगी भी तो नगण्य। लेकिन जो पिछले चार पांच सालों में माहौल बदला है, राजनीतिक समीकरण बदले हैं, तमाम टुचहरे मुद्दों को लेकर मार पीट की घटनाएं हुई हैं वे यदि समय रहते कड़ाई से निपटाये गये होते तो आज इतना आशंकित माहौल न बनता। अब तो ऐसी पार्टियों के मुँह खून लग गया है। वे जानती हैं कि एक दो दिन कि हिरासत, हल्की फुल्की सजा के बदले मिलने वाली प्रसिद्धि ( कु) बड़ी चीज है। पहले इस पथ पर महानगरी चली, अब दिल्ली भी अग्रसर है। प्रशांत भूषण के हमलावर ठीक उसी अंदाज में एक दिन के हिरासत वाले कैदी बने जिस तरह मायानगरी में तोड़ फोड़ करने वाले बनते हैं। हल्की फुल्की सजा होगी, एकाध चेतावनी मिलेगी बस। बदले में जो मीडिया में कवरेज मिलेगी वह मिलने वाली सजा से कहीं बड़ी प्राप्ति होगी। एक तरह का लाभ ही होगा कि देखो जेल की भी परवाह नहीं करता यह बांका जवान। विडंबना यह है कि इस तरह की लफंगई को लोग प्रोत्साहित भी कर रहे हैं, देशभक्ति और तमाम जज्बे नाम पर सलाम और पता नहीं क्या क्या करे लिखे जा रहे हैं, भूल जाते हैं कि कि कल को यह प्रोत्साहन (कु) उन्हीं पर बूमरैंग कर सकता है, उन्हें भी लफंगई के कटु अनुभवों से दो चार करवा सकता है,  उनका भी शहर आशंकाओं के कोहरे में गुम सा हो सकता है जैसा कि आर्थिक राजधानी कहलाने वाला यह महानगर होता जा रहा है।


-  सतीश पंचम

Sunday, October 9, 2011

लेखन विधा में एक बीमारी ऐसी भी..........

         यूँ तो दुनिया में बहुत सारी लेखन विधाएं हैं। कोई कवित्त रचता है, कोई कहानी, कोई नाटक तो कोई उपन्यास। हर किसी की अपनी अपनी शैली है, अपना अपना मार्का है। लेकिन इन सभी के बीच एक अलग विधा है 'व्यंग्य लेखन' जिसे लोग या तो देखते नहीं या फिर नजर और दिमाग बचाकर निकाल जाने में ही भलाई समझते हैं। ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि जहां तक मैं समझता हूँ कविता, कहानी लिखने की लत यदि किसी को लग जाय तो एक बार चलाया जा सकता है, उसके कविता लेखन या कहानीकारी का उसके जीवन पर सीधा असर नहीं पड़ता। लेकिन व्यंग्य के मामले में मामला तनिक धीर गंभीर हो उठता है। व्यंग्य करने वाला इस विधा का इतना लती हो जाता है कि उसे अपने हर काम में व्यंग्य करने की सूझती है, तरह तरह के फलसफे गढ़ दुनिया के सामने परोसने में एक खुशी सी मिलती है। और तो और कभी कभी वह अपने परिवार के लोगों, अपने गुरूजनों, अपने ईष्टों पर भी व्यंग्य कर बैठता है।


              मान लिजिये व्यंग्यकार की पत्नी यदि साड़ी खरीद रही हो और अचानक ही लेखक की व्यंग्यकारिता जग जाय तो लेखक सीधे ही पत्नी पर कटाक्ष करते हुए कहेगा - लगता है तुमने जो वो बड़े बड़े छाप वाली जो साड़ी ली थी, उसके छाप छोटे हो गये हैं। अब छाप कोई शर्ट या पैंट तो है नहीं कि पहनने से छोटे हो गये हों। छाप तो छाप ही हैं। ऐसे में पत्नी जले भुने न तो क्या हो। नतीजा बमचक के रूप में सामने आता है। कभी रोटी ज्यादा जल उठी तो कभी पापड़ कम सिंके। और उस वक्त का क्या कहना जब पति का व्यंग्यभाव उन जली रोटियों पर चल उठे। व्यंग्यकार महोदय हंसते हंसते कहेंगे - लगता है साड़ी की छाप रोटियों में उतर आई है तभी इतने रंगीन हो उठे हैं। सुनते ही पत्नी और आग बबूला,  एक तो साड़ी खरीदते समय ही टोके बिना न रहे और अब रोटियों पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूक रहे। आग लगे इनकी व्यंग्यकारिता को। लोग कविता करते हैं, कहानी लिखते हैं तो अपने तक ही पक पुक के रह जाते हैं। कमसे कम उनके परिवारे को तो उनकी आदतों के चलते सिंकना तो न पड़ता होगा।

     वहीं एक बात और देखने में आती है कि व्यंग्यकार की व्यंग्यावलियों की आदत पा जाने पर उसके परिवार वाले भी व्यंग्य विधा में पारंगत होने लगते हैं। जैसे को तैसा जवाब सहज भाव से देने लगते हैं। पति यदि कहेगे -  "थाली में एक रोटी कम ही रखना आज भूख नहीं है" तो पत्नी भी कहने से नहीं चूकेगी - "अच्छा, मैंने अखबार में तो नहीं पढ़ा। कहीं टीवी में समाचार न बता रहे हों कि आज एक रोटी कम खाई जा रही है। तनिक टीवी चालू किजिए तो"।

        खैर, वह व्यंग्यकार ही क्या जो ऐसे छोटे मोटे रूकावटों पर रूक जांय। वो अपनी धुनकी में ही मस्त मिलेंगे। यार दोस्तों पर तो कभी साथी सहकर्मियों पर व्यंग्य कसते, हंसते ठठाते मिलेंगे। मान लिजिए कोई पान खा रहा हो तो व्यंग्यकार महोदय कहने से नहीं चूकेंगे - "और गुलफाम, लगता है एशियन पेन्टस वाले आजकल पान में भी रंग मिलाने लगे हैं, तभी लालिमा छा उठी है" । कोई चाय पी रहा हो तो कह बैठेंगे - "और भाईजान, कब लौटे आसाम से। सीटीसी वाले हाथ में ऑफर लेटर लेकर आपको ही ढूँढ रहे हैं चाय परखने वाली नौकरी के लिये। जाइये न कोई दूसरा रख उठेगा"

      कहने का अर्थ ये कि बंदा घर परिवार, यार दोस्त जहां कहीं भी हो अपनी व्यंग्यकारिता से बाज नहीं आता। कुछ न कुछ मौके बे मौके व्यंग्य के नशे में कसता ही चला जाता है। बल्कि मेरा तो यहां तक मानना है कि ऐसे लोगों को नशेड़ी, गंजेड़ी, लतेड़ी की तर्ज पर व्यंगेड़ी कहा जा सकता है। इस तरह अलग से कैटेगराइज कर देने से एक लाभ यह होगा कि जब कभी कोई व्यंग्यकार किसी पर व्यंग्य कसेगा तो लोग जिस तरह नशेड़ियों, गंजेड़ियों को यह कहकर मुंह नहीं लगाते कि जाने दो नशेड़ी है उसके मुँह भला क्या लगना, तो यही बात लतेड़ी  व्यंगकारों के लिये भी कह सकते हैं कि - " अरे जाने दिजिए, वो तो व्यंगेड़ी ठहरा, भला उसकी बात का भी क्या बुरा मानना"। इस तरह जहां एक व्यंगेड़ियों को बेखटके अपनी व्यंग्य विधा को आजमाने का मौका मिल सकेगा तो वहीं लोगों को भी ऐसे व्यंगेड़ियों से बचकर निकलने में सुभीता हो जायगा। टकराव, बिलगाव आदि की गुंजाइश ही न रहेगी।
     वहीं एक और साईड इफेक्ट यह हो सकता है कि जैसे सरकार नशेड़ियों, गंजेड़ियों के लिये सुधार योजनायें चलाती है, उनके लिये सुधार गृह का निर्माण करती है वैसे ही व्यंगेड़ियों के लिये भी व्यंगेड़ी सुधार योजनायें चालू किये जा सकते हैं। व्यंग्यकारों के लिये सुधार गृह खोले जा सकते हैं। इस वजह से सरकार को प्रत्यक्ष रूप से एक और लाभ मिल सकता है कि उन्हें अपनी हास्यास्पद योजनाओं के लिये एक बार कविता, कहानियों के जरिये भले विरोध झेलना पड़े, कम से कम व्यंग्यकारों द्वारा विरोध न झेलना पड़ेगा। अमूमन देखा गया है कि सरकारो पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यंग्यकार ही ज्यादा मुखर होकर कुछ कहते हैं, टोकते हैं। यहां तक कि पिछले दिनों कुछ सरकारी कर्मचारी भी  व्यंग्य करते पाये गये। मौका था आर्थिक सर्वेक्षण का जिसके दम पर गरीबी अमीरी तय होनी थी। लोगों से जब उनकी आय स्त्रोत और खर्च आदि पर जानकारी मांगी जा रही थी तो कुछ लोगों ने जानकारीयां देने में आनाकानी की कि कहीं सरकार यह सारी जानकारी लेकर उन पर टैक्स न लगा दे। ऐसे में एक सरकारी अधिकारी ने सीधे सीधे जनता पर व्यंग्य कसते हुए कहा - "एक तो घर, गाड़ी, बैल, भैंस के बारे में बताते हुए कन्नी काटते हो, आय की पूरी जानकारी नहीं देते और जब 26 रूपये, 32 रूपये वाले अमीर घोषित हो जाते हो तो हल्ला मचाते हो"!

      जाहिर है सरकार के कान खड़े होने थे।  आम जनता का व्यंगेड़ी होना चल जाता है लेकिन एक सरकारी शख्स व्यंगेड़ी बनने की ओर अग्रसर हो जाय.....त्राहिमाम। सुना है सरकार अब एक टीकाकरण अभियान शुरू करने जा रही है जिसमें सरकारी और गैरसरकारी सभी जनों का टीकाकरण किया जायगा। यदि आप में भी व्यंगेड़ियों वाले लच्छन दिखें तो नजरअंदाज न करें, तुरंत अपने निकटतम स्वास्थ्य केन्द्र से सम्पर्क करें। वरना इधर आप केवल श्रीमती जी की साड़ी की छाप गिनते रह जाएंगे उधर सरकार आपका मुँह खुलते ही पोलियो ड्राप की तरह गिनकर मुँह में एन्टी व्यंगेड़ी ड्रॉप चुआ देगी - बस दो बूंद  व्यंग्यकारिता के। 


- सतीश पंचम

रू कतिया करूं.....

      चरखा चलाना, सूत कातना  इतना रोमांटिक हो सकता है क्या ? कम से कम रॉकस्टार फिल्म के   शब्द तो यही कहते हैं

सारी रातें कतिया करूं....
कतिया करूं....
कतिया करूं
सारी रातें कतिया करूं.....

  बहुत पहले अपनी पंजाबी की किसी किताब में पढ़ा था कि - नीम  दे रूख थल्ले चरखा कत्तदी,  तेरी यादां नूं जप्पदी पई....

 पूरा याद नहीं लेकिन कुछ कुछ वही अंदाज लिये ये रॉकस्टार का गीत पसंद आया। साहित्य इसी तरह फिल्मों में पिरोया जाय तो नॉस्टॉल्जिक आनंद मिलना स्वाभाविक है। 

    ईरशाद कामिल के लिखे गाने को जिस खूबसूरती से  ए. आर. रहमान ने संगीतबद्ध किया है, काबिले तारीफ है। एकदम सहज।  हां, फिल्मांकन थोड़ा सा अटपटा जरूर लगा वह भी तब  जबकि मूत्रविसर्जन करते कुछ लोगों को लड़की जाकर डिस्टर्ब करती है। अब ये तो फिल्म देखने के  बाद ही पता चलेगा कि यह दृश्य किस संदर्भ में क्या कहना चाहता है।

   बहरहाल फिल्ल्ल्लम जब देखा जाएगा तो देखा जाएगा, अभी तो आप   इस राप्चिक गाने का आनंद लें।  नोश फरमायें। 





Monday, October 3, 2011

इंतजार वाला दर्शन........दर्शन वाला इंतजार

         मुंबई के एक मंदिर में दर्शन करने के दौरान कुछ आवाजें कानों में पड़ रही थीं। कभी मराठी, कभी गुजराती तो कभी हिन्दी में।  तनिक सुनिये तो।

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- शांतिबेन वाघेला,  आप जहां कहीं हों, चप्पल स्टैंड के पास आ जाइये। वहाँ आपके पति आपका इंतजार कर रहे हैं।




- जिन लोगों ने मंदिर में दर्शन कर लिये हैं वो कृपया बाहर की तरफ निकल जांय, गेट के पास भीड़ न लगायें।


- तीन नंबर गेट के कार्यकर्ता स्त्रियों और पुरूषों के लिये अलग अलग कतार बनाये रखें। जो लोग अपनी पत्नी या पति से अलग होकर लाईन में नहीं लगना चाहते उन्हें आगे मत जाने दिजिए। व्यवस्था बनाये रखिये। लेडिज अलग, जेन्टस अलग।


-  देखिये आधे घंटे महिलाओं की लाइन छोड़ी जा रही है। फिर पुरूषों के लिये लाइन छोड़ी जाएगी। आप लोग हमारा सहयोग करें।


-  मोबाइल पर बातें न करें। कृपया अपने मोबाइल को बंद रखें।


- आगे आगे बढ़ते रहिये। आगे...अरे आप पीली शर्ट अरे आगे बढ़िये क्यों एक जगह रूक कर खड़े हो भाई साब।


-  आप लोग चप्पल उतार कर जाइये। चप्पल स्टैंड कई सारे बने हैं। बिना मूल्य सेवा है। टोकन लेते जाइये चप्पल उतारते जाइये।


- ओ मोबाइल, अरे मोबाइल भाई साब, अरे सुनो यार आपसे ही कह रहा हूं। मोबाइल बंद रखिये।


- जो लोग मोबाइल पर गाने सुन रहे हैं, कृपया एक कान का प्लग निकाल कर रखें। निर्देश सुनते रहें।


- संगीता जोशी, आप जहां कहीं हों कृपया चप्पल स्टैंड के पास आ जाइये आप के पति वहां इंतजार कर रहे हैं।


- देखिये मैं बार बार कह रहा हूँ जल्दी दर्शन किजिए। बहुत ज्यादा कतार है।


- जब खुद की बारी आती है तो आप लोग भी धीमे हो जाते हो, जरा पीछे वालों का भी खयाल किजिए। चलिये जल्दी दर्शन किजिए।


- चप्पल उतार कर जाइये।
- अरे ओ भाई साहब सुनने में नहीं आ रहा क्या, मोबाईल बंद रखने के लिये कह रहा हूं।


- जल्दी चलिये। आप लोग पुरूष होकर क्या महिलाओं की तरह धीरे धीरे चल रहे हैं। आप लोगों से ज्यादा तेज तो महिलायें हैं। एक हाथ में बच्चे भी संभालती हैं, एक हाथ में पर्स, फिर भी आप लोगों से ज्यादा तेजी से दर्शन करती हैं।


- अरे भई जल्दी करिये, महिलाओं की कतार चालू होने वाली है।


- जल्दी...जल्दी। गेट नंबर दो के लोग महिलाओं और पुरूषों की कतार अलग अलग करवाने में मदद करें।


- मंदिर में दर्शन के बाद आप लोग कहां मिलेंगे तय  कर लें .....पुरूष..... महिला अलग अलग कतार बनाते जांय।


- ओ जीन्स वाले भाई साब.......... बाद में मिल लेना........कहीं भागी नहीं जा रहीं.........दर्शन हो जाने दिजिए फिर बाहर खूब बातें किजिए......... पुरूषों की  कतार में लगिये।


- कार्यकर्ता लोग तैयार रहें। महिलाओं की कतार खोलने के लिये।


- महिलाओं से निवेदन है अपने गहने उतार कर बैग में रख लें।


- हाथ में चप्पल उठाए हुए मत चलिये भाई साब ,  पूजा की थाली नहीं है। पहले से मैं कह रहा हूं आप लोग चप्पल स्टैंड पर अपनी चप्पलें उतार कर आगे बढ़िये।


- विजयलाल शर्मा आप जहां कहीं हों चप्पल स्टैंड के पास आ जाइये आपकी श्रीमती जी आपका वहां इंतजार कर रही हैं। विजयलाल शर्मा जी।


- कृपया मोबाइल पर माधुर्य भरी बातें दर्शन के बाद करें। पूरा दिन पड़ा है आप लोगों के पास।


- लाल शर्ट.....ओ भाई साब , आप....हां आप ही से कह रहा हूं....कतार के साथ आगे बढिये....साइड में होकर किसी का इंतजार मत किजिए.....चलिये...


- अरे बाबा आप जिसका इंतजार कर रहे होंगे वो भी आगे ही कहीं मिलेंगे आप को। चलिये बढ़िये आगे।


- पुरूष कतार के लोगों से निवेदन है कृपया मुड़ मुड़ कर महिलाओं की कतार में अपनी श्रीमती जी को न तलाशें, आगे बढ़ते रहें।


- दर्शन में ध्यान लगाइये। मंदिर में दर्शन हो जाने के बाद बाहर श्रीमती जी से आप लोग मिल लेंगें। अभी मंदिर के दर्शन में ध्यान लगाइये।


- चप्पल स्टैंड के पास ही अपनी चप्पलें जमा करें नहीं तो बाद में आप ही लोग ढूंढेंगे।


- चार नंबर गेट। पुरूषों की कतार रोक दो। महिलाओं की कतार चालू किजिए।


- मंदिर के गर्भगृह में जो पुरूष दर्शन कर रहे हैं वो जल्दी से अपना दर्शन पूरा कर बाहर आ जांय। महिलाओं की कतार खुलने वाली है।


- चलिये जल्दी किजिये।


- रोक दो पुरूष कतार। महिलाओें के लिये रास्ता छोड़िये।


- चलिये बहेन जी जल्दी जल्दी।


- हांजी, चप्पल स्टैंड के पास चप्पल उतारती जाइये।


- अरे ढेर सारे चप्पल स्टैंड हैं। आप लोग एक ही जगह क्यों चप्पल उतार रही हैं।


- आगे बढ़िये, जल्दी जल्दी।


- अपने गहने उतार कर बैग में रख लिजिए।


- ओ बहेन जी, नीली साड़ी वाली बहेन जी, आगे भी चप्पल स्टैंड है उधर आगे बढ़िये।


- अरे आप लोग समझ क्यों नहीं रहे। एक महिला अपनी चप्पल जहां उतारती है जरूरी है क्या पीछे वाली महिलाएं भी वहीं उतारें। आगे भी चप्पल स्टैंड है।


- ओ भाई साब, महिलाओं की दर्शन कतार चालू है, अभी तक आपका दर्शन नहीं हुआ क्या। कार्यकर्ता जल्दी जल्दी मंदिर के प्रांगण से पुरूष दर्शनार्थियों को रूकने न दें।


- अरे बाबा, मैं बार बार कह रहा हूं जिन्हें अपनी श्रीमती का इंतजार करना है वो बाहर की ओर जाकर इंतजार करें। एक ही गेट है सभी महिलाएं वहीं से निकलेंगी।


- ओ बहेनजी, आप लोग क्यों ऐसा कर रही हैं। एक ही चप्पल स्टैंड पर भीड़ मत लगाइये। आगे भी है चप्पल स्टैंड।


- अरे साथ में हैं मतलब क्या एक ही जगह भीड़ करना है क्या। आगे बढिये।


- दिनेश शुक्ला, आप जहां कहीं हों चप्पल स्टैंड के पास आ जाइये आपकी श्रीमती जी आपका इंतजार कर रही हैं।


- चलिये जल्दी...जल्दी।


- अरे बहेन जी जल्दी किजिए...क्या आप लोग बातें करने में लगी हैं। चलिये बातें घर में जाकर करिए।


- बच्चों का हाथ मत छोड़िये। चलिये जल्दी चलिये।


- प्रशांत परब, आप जहां कहीं हों चप्पल स्टैंड के पास आ जाइये वहां आपकी श्रीमती जी आपका इंतजार कर रही हैं।


- चलिये चलिये जल्दी आगे बढ़िये.........


- चलिये.......कार्यकर्तागण गेट नंबर एक से पुरूषों की कतार खोलने के लिये तैयार रहें।


- बहेन जी, आप आगे बढ़िये, आप के पति भी अभी पिछली कतार से दर्शन करने के लिये आ जाएंगे। मुड़ मुड़ के मत देखिये....आगे बढ़िये।


- चप्पल स्टैंड के पास जो लोग मिल गये हों कृपया बाहर की ओर निकल जांय, भीड़ न करें।


- ओ बहेन जी, पीली साड़ी वाली बहेन जी। रूकिये मत आगे बढ़िये.....


- हांजी आप लोग रूकिये मत आगे बढ़ते जाइये.....चप्पल स्टैंड.....चप्प.... 
 
 
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- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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